डॉक्टर असद अल्लाह ख़ान (मुंबई)
छुट्टियों के ये सत्तर-अस्सी दिन अब महज़ “आराम का वक़्त” नहीं, बल्कि ज़िंदगी, शख़्सियत और करियर की री-स्ट्रक्चरिंग का एक सुनहरा-तरीन मौक़ा हैं। सवाल ये है कि हम इस वक़्त को स्क्रीन की नज़्र करेंगे या इसे कुंदन बनने की भट्टी बनाएँगे?
बीस साल पहले का रिवायती दौर
तक़रीबन दो दहाइयाँ क़ब्ल, जब तालीमी निज़ाम और समाजी साख़्त एक मुख़्तलिफ़ नहज पर थी, तब भी इस बात पर गहरा अफ़सोस ज़ाहिर किया जाता था कि मैट्रिक और इंटर के इम्तिहानात के बाद तलबा के क़ीमती औक़ात को किस तरह ज़ाया किया जाता है। बीस-तीस साल पहले के इस रिवायती दौर में एक बड़ा अलमिया ये था कि इम्तिहानात से फ़ारिग़ होते ही ज़हीन बच्चों को स्कूलों में बुला कर इम्तिहानी पर्चों की जाँच (Paper Checking) के ग़ैर-क़ानूनी और ग़ैर-अख़्लाक़ी काम में झोंक दिया जाता था। नाम-निहाद उस्ताद अपनी बोरियत और बेगार टालने के लिए बच्चों के मुस्तक़बिल और अख़्लाक़ियात को दाँव पर लगा देते थे, और मासूम तलबा इस फ़र्सूदा अमल को “ख़िदमत” समझ कर अपने सत्तर-अस्सी दिन ज़ाया कर देते थे।
बीस-तीस साल पहले का वो दौर सिर्फ़ खेल-कूद, रिवायती मुतालए, समर इस्लामिक कोर्सेज़, मादरी ज़बान पर उबूर और बैंक या पोस्ट ऑफ़िस के लिए रिवायती मशवरों पर इंहिसार था, लेकिन आज आपके पास साइंसी और डिजिटल टूल्स मौजूद हैं।
1। अपने रुझान की पहचान
इन छुट्टियों में सबसे पहले साइकोमेट्रिक टेस्ट (Psychometric Tests) और प्रोफ़ेशनल काउंसलिंग के ज़रिये अपने रुझान (Aptitude) और रवैये (Attitude) की पहचान करें। आज का दौर सिर्फ़ रिवायती पेशों (डॉक्टर, इंजीनियर) का नहीं है। इन छुट्टियों में डिजिटल मार्केटिंग, डेटा साइंस, बिज़नेस एनालिटिक्स, और न्यू मीडिया जैसे जदीद शोबों की बुनियादी मालूमात हासिल करें। माहिरीन से सिर्फ़ मिलना काफ़ी नहीं, बल्कि LinkedIn जैसे प्लेटफ़ॉर्म्ज़ के ज़रिये दुनिया भर के प्रोफ़ेशनल्ज़ से जुड़ें और उनके तजरबात से सीखें।
2। डिजिटल और फ़्यूचर स्किल्स (Future-Proof Skill Development)
आज के दौर में सबसे बड़ी सरमायाकारी “स्किल डेवलपमेंट” है। अगर आपके पास डिग्री है लेकिन हुनर नहीं, तो आप इस मुसाबक़ती दौर में पीछे रह जाएँगे। इन छुट्टियों में ये कोर्सेज़ आपकी तरजीह होनी चाहिए: तकनीकी महारतें (Hard Skills): कोडिंग, पाइथन (Python), ग्राफ़िक डिज़ाइनिंग, वीडियो एडिटिंग, या प्रॉम्प्ट इंजीनियरिंग (Prompt Engineering) की बुनियादी बातें सीखें। शख़्सियती और फ़िक्री महारतें (Soft Skills): वक़्त की पाबंदी, तन्क़ीदी सोच और मसअला-हल करने की सलाहियत पैदा करें।
3। ग्लोबल कम्युनिकेशन और बैन-उल-अक़्वामी ज़बानें
बीस साल पहले मादरी ज़बान और बुनियादी अंग्रेज़ी पर ज़ोर था, जो आज भी अहम है, लेकिन आज का दौर “ग्लोबल विलेज” का है। अंग्रेज़ी अब सिर्फ़ एक ज़बान नहीं बल्कि एक ज़रूरत बन चुकी है; इसके साथ कोई और बैन-उल-अक़्वामी ज़बान सीखना आपके मवाक़े और बढ़ा देगा।
4। फ़िक्री पुख़्तगी और अस्री इस्लामी फ़िक्र (Holistic Contemporary Islamic Vision)
बदलते दौर में जहाँ इल्हाद (Atheism) और फ़िक्री इंतिशार की आँधियाँ चल रही हैं, नौजवानों के लिए अपने दीन की बुनियादी और अस्री मालूमात हासिल करना सबसे मज़बूत ढाल है। समर इस्लामिक कोर्सेज़ की अहमियत आज पहले से कहीं ज़्यादा है। लेकिन अब हमें रिवायती मालूमात से आगे बढ़ कर इस्लाम के निज़ाम-ए-हयात, इस्लामी मईशियात, और जदीद साइंसी चैलेंजेज़ के तनाज़ुर में दीन को समझना होगा। सीरत-ए-नबवी ﷺ और सीरत-ए-सहाबा रज़ि. के मुतालए से लीडरशिप स्किल्स (Leadership Skills) और बोहरानों से निपटने की हिकमत-ए-अमली (Crisis Management) सीखें, ताकि आपका किरदार सोसाइटी के लिए एक रोल मॉडल बन सके।
5। मालियाती ख़्वांदगी और जदीद निज़ाम से वाक़फ़ियत (Financial Literacy & Digital Ecosystem)
बीस साल पहले पोस्ट ऑफ़िस और बैंक जाना सिखाया जाता था, मगर आज का दौर डिजिटल बैंकिंग, यू.पी.आई. (UPI), और फ़िनटेक (FinTech) का है। इन छुट्टियों में मालियाती ख़्वांदगी (Financial Literacy) सीखें। बजट बनाना, बचत करना, और सरमायाकारी के बुनियादी उसूल (मसलन स्टॉक मार्केट, म्यूचुअल फ़ंड्स, और टैक्सेशन का बुनियादी इल्म) हासिल करें। हुकूमती पोर्टल्ज़, डिजिटल दस्तख़त (Digital Signatures), और ई-गवर्नेंस के निज़ाम को समझें ताकि आप एक ज़िम्मेदार और बाशऊर शहरी बन सकें।
जेब में धड़कता दुश्मन
मेरे अज़ीज़ो! ज़रा रुक कर सोचो… हमारे दौर में अस्लाफ़ कहते थे कि “ख़ाली दिमाग़ शैतान का कारख़ाना होता है”। तब ख़दशा सिर्फ़ इतना था कि कोई नौजवान तनहाई में बैठ कर ख़याली पुलाव पकाएगा, खुली आँखों से कुछ अधूरे ख़्वाब देखेगा और बस! लेकिन आज? आज का ख़तरा उस पुराने दौर से हज़ार गुना ज़्यादा हौलनाक, मक्कार और सहर-अंगेज़ है! आज वो कारख़ाना कहीं बाहर नहीं, बल्कि आपकी जेब में धड़कते मोबाइल फ़ोन में मौजूद है।
अगर आपने वक़्त की इस लहर को लगाम न दी… तो याद रखिए, ये स्क्रीन एडिक्शन (Screen Addiction) आपकी सोचने की सकत को चाट जाएगा! ये आपकी तवज्जोह की सलाहियत (Attention Span) को इस तरह राख कर देगा कि आप किताब का एक सफ़ा पढ़ने के लिए भी तरसेंगे। ये सुस्ती, ये बेमक़सदियत, और ये लामुतनाही स्क्रॉलिंग इंसान को गोश्त-पोस्त का इंसान नहीं रहने देती, बल्कि एक “डिजिटल ज़िंदा लाश” में तब्दील कर देती है! एक ऐसी लाश जिसका न कोई मक़सद-ए-हयात होता है, न कोई मंज़िल, और न कोई तड़प। क्या आप अपनी जवानी को इस बेरहम स्क्रीन के पिक्सल्ज़ (Pixels) की नज़्र करके एक गुमनाम मौत मरना चाहते हैं?
उठिए! कुंदन बनिए
नहीं! हरगिज़ नहीं! उठिए और अपने गिरेबान में झाँक कर अपने लहू की गर्मी को पहचानिए। हम मिट्टी के वो ढेर नहीं जो वक़्त के बहाव के साथ बह जाएँ। हम तो एक अज़ीम और लाज़वाल तारीख़ के अमीन हैं! हम कायनात का सबसे वाज़ेह, सबसे ख़ूबसूरत और सबसे जानदार तसव्वुर-ए-हयात रखने वाली उम्मत के फ़रज़ंद हैं!
तफ़रीह ज़रूर कीजिए, लेकिन वो तफ़रीह आपके आसाब को तोड़ने वाली न हो बल्कि आपकी रूह को ताज़गी देने वाली हो। आगे बढ़िए! अपनी पोशीदा सलाहियतों को छुट्टियों के इस तपते हुए ईंधन में झोंक दीजिए। इस वक़्त को वो भट्टी बनाइए जहाँ तप कर आप सोना नहीं, बल्कि “कुंदन” बन कर निकलें! उठिए! कि वक़्त आपके अज़्म का मुंतज़िर है। (इंशा अल्लाह)
डॉक्टर असद अल्लाह ख़ान

