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जब स्कूल ही नाकाम तो बच्चे कैसे होंगे कामयाब?

डॉ. असदुल्लाह ख़ान मकसद, जिम्मेदारी और समाधान की तलाश   एक पुराना रोना, एक नया ज़ख़्म मेयार-ए-तालीम का रोना कोई नया तो है नहीं, मनमोहन सिंह भी रो चुके और कपिल सिब्बल भी, लेकिन अभी फ़र्क़ नहीं पड़ा। शायद इसी लिए अब यह कहा जाने लगा है कि मौक़ा बह मौक़ा इस उनवान पर मातम ज़रूरी हो जाता है। बात ख़ुदा लगती है — हमारे उर्दू स्कूलों का इन्तिज़ामिया हो कि असातिज़ा, बस इसी ज़ेम में जिए जा रहे हैं कि अपने यहाँ तो सब ठीक ठाक है। मेयार के झंझट में कौन पड़े? हमारे तो सभी स्कूल मेयारी हैं। जब कि आलम यह है कि मेयारी स्कूल की कसौटी पर परखे जाएँ तो चंद एक को छोड़ कर बेशतर स्कूल किसी शुमार क़तार में ही नहीं। और हद तो यह है कि उन्हें ख़बर भी नहीं कि अच्छे स्कूल के लिए पैमाने क्या हैं — और जानने की कोई तड़प भी नहीं। शहर के मशहूर अंग्रेज़ी अख़बार में छपी इस ख़बर ने ज़ी शऊर और बेदार शहरियों को झंझोड़ कर रख दिया: रवाँ तालीमी साल में मुंबई के स्कूलों की सालाना जाँच में एक तिहाई से ज़ाइद स्कूल नाकाम रहे। महाराष्ट्र स्टेट बोर्ड की जानिब से ३२२८ स्कूलों में से सिर्फ़ ३८९ स्कूल ही दर्जा A से कामयाब क़रार दिए गए — यानी महज़ १३ फ़ीसद। यह अदाद-ओ-शुमार कोई मामूली तशवीश नहीं, यह हमारे पूरे तालीमी ढाँचे पर एक फ़र्द-ए-जुर्म है। अफ़सोस कि उर्दू हल्क़ों में इस ख़बर की बाज़गश्त भी नहीं सुनी गई। हमें तो एह्तिसाब करते रहने की पुरानी बीमारी है। इसी लिए आईना पोंछने के बजाए हम अपने चेहरे के धब्बों की ख़बर लेने में दिलचस्पी रखते हैं।   २००९ء से २०२६ء तक — क्या बदला, क्या नहीं बदला? वक़्त गुज़रा, साल बदले, हुकूमतें आईं और गईं… मगर स्कूल के दरवाज़े पर वही पुराना सवाल खड़ा है जब २००९ء में यह ख़बर शाइअ हुई कि मुंबई के ३२२८ स्कूलों में से सिर्फ़ ३८९ यानी महज़ १३ फ़ीसद स्कूल A ग्रेड से कामयाब हुए, तो यह एक धचका था — एक तकलीफ़देह आईना जिस में हम ने अपना चेहरा देखने से मुँह मोड़ लिया। उस वक़्त सोचा गया कि शायद एक नस्ल में हालात बदल जाएँगे। अब पंद्रह साल बाद, २०२६ء में, आईए देखते हैं कि क्या वाक़ई कोई बुनियादी तब्दीली आई — या बस काग़ज़ात पर अदाद बदले? पंद्रह साल बाद UDISE+ 2024-25 और ASER 2024 की रिपोर्टें हमारे सामने हैं। आईए आठ अहम पैमानों पर ईमानदारी से देखते हैं — क्या बदला, क्या वही रहा, और क्या अब भी बुह्रान है।   १. स्कूलों का मेयार — निज़ाम-ए-जाँच बदला ज़रूर है लेकिन तालीमी मेयार का बुह्रान अपनी जगह बरक़रार है!!! २००९ء में महाराष्ट्र स्टेट बोर्ड की इस जाँच ने मुंबई के स्कूलों की दर्जाबंदी की थी — और नतीजा सब के सामने था: सिर्फ़ १३ फ़ीसद स्कूल A ग्रेड के क़ाबिल। यह अदाद एक निज़ाम की नाकामी का एतिराफ़ थे। अब २०२४-२५ء में सूरतहाल यह है कि वह पुराना A/B/C/D/E दर्जाबंदी का निज़ाम अब मौजूद नहीं — UDISE+ ने स्कूलों की जाँच का पूरा तरीक़ा-ए-कार बदल दिया है। अब स्कूलों को उन के इन्फ़्रा इस्ट्रक्चर, दाख़िले, असातिज़ा की तादाद और डिजिटल सहूलियात की बुनियाद पर Online Report Card मिलता है। बज़ाहिर यह तब्दीली बेहतरी की अलामत है — मगर सवाल वही है कि क्या निज़ाम बदलने से हक़ीक़त बदली? दुख की बात यह है कि ASER 2024 की रिपोर्ट, जो लाखों बच्चों पर ज़मीनी सर्वे के बाद बनाई गई, बताती है कि बच्चों की सीखने की सलाहियत अभी भी एक बड़ा मसला है। तीसरी जमाअत के ७६.६ फ़ीसद बच्चे दूसरी जमाअत का मतन नहीं पढ़ सकते। यानी स्कूल का कार्ड बदल गया — बच्चे का नतीजा नहीं बदला।   २. बैत-उल-ख़ला की दस्तयाबी में कुछ बेहतरी हुई मगर वह नामुकम्मल है — सफ़ाई का सवाल जोंका तोंका मुँह पहाड़े खड़ा है। २००९ء में मुल्क के स्कूलों में बैत-उल-ख़ला की दस्तयाबी ६३ फ़ीसद से भी कम थी — और जो थे वह अक्सर नाक़ाबिल-ए-इस्तेमाल। यह वह वक़्त था जब लड़कियाँ सिर्फ़ इस लिए स्कूल छोड़ देती थीं कि बुलूग़त के बाद उन की बुनियादी ज़रूरत का कोई इन्तिज़ाम न था। अब UDISE+ 2024-25 के मुताबिक़ ९८.६ फ़ीसद स्कूलों में बैत-उल-ख़ला मौजूद है — यह वाक़ई एक क़ाबिल-ए-ज़िक्र पेशरफ़्त है। मगर अदाद की तह में उतरते हैं तो पता चलता है कि “मौजूद होना” और “क़ाबिल-ए-इस्तेमाल होना” दो अलग चीज़ें हैं। ASER 2024 बताती है कि २०२४ء में सिर्फ़ ७२ फ़ीसद स्कूलों में लड़कियों के लिए काम करने वाला और साफ़ बैत-उल-ख़ला मौजूद था — यानी २६ फ़ीसद में बैत-उल-ख़ला था ही नहीं या बंद पड़ा था। दीवार और दरवाज़ा लग गया — सफ़ाई और देखभाल नहीं आई। और सब से अहम बात: Swachh Bharat Mission के तहत अरब रुपए ख़र्च हुए — मगर वह लड़कियाँ जो आज भी नाक़ाबिल-ए-इस्तेमाल बैत-उल-ख़ला की वजह से परेशान होती हैं, उन्हें काग़ज़ी अदाद से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। बेहतरी अधूरी है मगर सफ़ाई और देखभाल का मसला अब भी बाक़ी है।   ३. कहीं कहीं नल मौजूद लेकिन पीने का पानी नदारद है। २००९ء में पीने के साफ़ पानी की सहूलियत स्कूलों में बड़े पैमाने पर ग़ैर मौजूद थी। बच्चे घर से पानी लाते थे, गर्मियों में प्यासे रहते थे, और बेहोशी के वाक़यात कोई नादर बात न थे। अब UDISE+ 2024-25 का दावा है कि ९९ फ़ीसद स्कूलों में पीने का पानी दस्तयाब है — यह अदाद काग़ज़ों पर इन्क़िलाब है। मगर यहाँ भी वही सवाल: “दस्तयाब” की तारीफ़ क्या है? क्या पानी साफ़ है? क्या रोज़ाना मिलता है? क्या बर्तन साफ़ हैं? बहुत से स्कूलों में नल लगा है मगर पानी नहीं आता, या आता है तो आलूदा आता है। ASER 2024 ने पीने के पानी की दस्तयाबी ७७.७ फ़ीसद दर्ज की — यानी काग़ज़ों के ९९ फ़ीसद और ज़मीनी हक़ीक़त के ७७.७ फ़ीसद के दरमियान २१ फ़ीसद का फ़र्क़ है। यह फ़र्क़ ही असल कहानी है। यह ज़ाहिरी बेहतरी है मगर काग़ज़ और ज़मीन के दरमियान का फ़र्क़ ख़तरनाक है।   ४. स्कूलों में कंप्यूटर और इंटरनेट के मामले में बड़ी पेशरफ़्त हुई है — लेकिन तस्वीर अब भी नामुकम्मल है। २००९ء में कंप्यूटर का तसव्वुर

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उस्ताद: मस्लूब फ़रिश्ता

डॉ۔ असद उल्लाह ख़ान जो मुअल्लिम हो वह मुफ़क्किर हो, जो मुफ़क्किर हो वह आज़ाद हो — और जो आज़ाद न हो वह न ख़ुद जी सकता है न दूसरों को जीना सिखा सकता है हर अहद अपने उस्ताद को एक नए सलीब पर चढ़ाता है। कभी ग़ुरबत की सलीब, कभी ग़ुलामी की, कभी पोर्टल और डेटा की, और कभी अपनी ही ज़ात के ज़वाल की। यह मज़मून दो मुख़्तलिफ़ लम्हों, दो मुख़्तलिफ़ मौसमों और दो मुख़्तलिफ़ कैफ़ियतों में लिखा गया था — एक में उस्ताद मज़लूम था, दूसरे में उस की अपनी ज़िम्मेदारी ज़ेरे-बहस थी। मगर जब दोनों आवाज़ों को एक साथ सुना जाए तो एक ही सच्चाई उभरती है: उस्ताद आज दोहरी चक्की में पिस रहा है — एक तरफ़ निज़ाम उसे ग़ुलाम बनाता है, दूसरी तरफ़ ज़िम्मेदारी का बोझ उसे आज़माइश में डालता है। यह तहरीर इसी दोहरे सच का हिसाब है। बाब अव्वल: हडपसर का सबक़ — जब उस्ताद, प्यून से भी कम था हम पूना में हडपसर के मक़ाम पर एक तालीमी कांफ्रेंस में मदऊ थे। हमें लेने के लिए जो साहब इस्टेशन पर आए, उन के लिबास और अंदाज़ से हरगिज़ यह गुमान न गुज़रा कि वह एक उस्ताद हैं। उन्हों ने हमारा सामान उठाया, बड़ी अक़ीदत से अपने स्कूटर पर बिठाया और जलसा-गाह तक ले आए। कांफ्रेंस के दौरान वह यहाँ वहाँ दौड़ते रहे, मेहमानों के हाथ धुलवाते रहे, और हम ने अपनी आँखों से देखा कि वह प्लेटें धो रहे थे जब कि उन के साथी खाना परोसने में मसरूफ़ थे। कांफ्रेंस में असातिज़ा की ज़िम्मेदारियों पर ख़ूब धुआँ-धार तक़रीरें हुईं, और मेज़बान चेयरमैन को उस दौर के सर सय्यद का ख़िताब दिया गया। हम उसे प्यून ही समझते रहे, यहाँ तक कि वापसी के आधे रास्ते में उन के स्कूटर का पेट्रोल ख़त्म हो गया। दम लेने को हम ने उन्हें चाय की दावत दी, और चाय की चुस्कियों के दौरान जो हक़ायक़ सामने आए, उन्हों ने हमें हैरत के समुन्दर में ग़र्क़ कर दिया। यह दुबला-पतला नौजवान, जिस की तालीमी लियाक़त बी.ए, बी.एड थी, एक मुआविन मुदर्रिस था — मगर इस्कूल में उस की और उस के साथियों की औक़ात प्यून से बदतर थी। कई बरसों से वह इस इस्कूल में मुलाज़िम था, 5-7 हज़ार रुपये माहवार का यह ग़ुलाम इस्कूल के लिए रेती-गारा भी ढो चुका था और दीवारों को रंग-ओ-रोग़न भी कर चुका था। अगर कभी अपना हक़ माँगे तो इस्कूल से निकाल दिया जाए। पूरी तनख़्वाह माँगने की मजाल तो क्या, वह स्कूटर में तेल भरवाने के लिए भी अपने आक़ा के सामने गिड़गिड़ाने पर मजबूर था। शायद यही वजह थी कि रुख़सत होते वक़्त पेट्रोल के पैसे माँगने पर चेयरमैन साहब की अहलिया ने उसे बुरी तरह डाँटा था, और अब वह उसी की सज़ा आधे रास्ते से स्कूटर घसीट कर भुगत रहा था। अपनी बेबसी की दास्तान सुनाते हुए उस की हिचकियाँ बंध गईं। ऐन उसी लम्हे हमारे कानों में कांफ्रेंस के उन मक़ालों की गूँज सुनाई दे रही थी जिन में असातिज़ा को उन की ज़िम्मेदारियों का एहसास दिलाया गया था। यह सिर्फ़ एक हडपसर की कहानी नहीं — यह रियासत भर के बेशतर उर्दू इस्कूलों का नौहा है। मर्दुम-शुमारी हो, सर्वे हो, इलेक्शन की ड्यूटी हो, शनाख़्ती कार्ड बाँटने हों या झोंपड़ों के फ़ोटो पास — हर सरकारी काम इन्हीं के कंधों पर आ कर टिकता है। और जब वह यह ग़ैर-तदरीसी काम करने हफ़्तों, महीनों के लिए जमाअतों से ग़ायब रहते हैं तो इन्हीं जमाअतों का कबाड़ा हो जाता है। नतीजा? खेप की खेप बरबाद। “हम इस्कूल की बुनियाद के पत्थर हैं, हम ने अपने लहू से उसे सींचा है — लेकिन क्या है हमारी औक़ात?” बाब दोम: अहद-ए-जदीद का ग़ुलाम — जब पोर्टल, इज़्ज़त से बड़ा हो गया हडपसर के इस उस्ताद की ज़ंजीर आज भी नहीं टूटी — सिर्फ़ उस की शक्ल बदल गई है। कल वह प्लेटें धो रहा था, आज वह स्क्रीन पर डेटा भर रहा है। कल स्कूटर का पेट्रोल माँगने पर डाँट पड़ती थी, आज GPS लोकेशन न मिलने पर तनख़्वाह रोक ली जाती है। आज हमारे तालीमी निज़ाम का सब से गहरा बहरान निसाब का नहीं, इमारत का नहीं, वसाइल का नहीं — उस्ताद का है। वह उस्ताद जो सदियों से तहज़ीब का अमीन और रूह का मुरब्बी रहा, आज आहिस्ता आहिस्ता एक इंतिज़ामी कारकुन, डेटा ऑपरेटर और पोर्टल मुलाज़िम में तब्दील किया जा रहा है। इस्कूल गर्मियों की छुट्टियों के लिए बंद हो जाते हैं, क्लासरूम ख़ामोश हो जाते हैं, बच्चे आज़ाद हो जाते हैं — मगर उस्ताद आज़ाद नहीं होता। उस के मोबाइल पर पैग़ामात जारी रहते हैं, व्हाट्सऐप ग्रुप्स ज़िंदा रहते हैं, पोर्टल खुले रहते हैं और नए अहकामात किसी भी वक़्त उस का सुकून मंसूख़ कर देते हैं। यही वजह है कि असातिज़ा के लिए आख़िरी पीरियड कभी नहीं आया। यह महज़ टाइम-टेबल का आख़िरी पीरियड नहीं — यह ज़िंदगी का वह वक़्फ़ा है जिस के बाद इंसान को सुकून, ग़ौर-ओ-फ़िक्र और अपने वुजूद की तरफ़ लौटने का मौक़ा मिलता है। जदीद उस्ताद की ज़िंदगी से यह मौक़ा छिन चुका है। अदाद-ओ-शुमार की ज़बान में देखें तो भारत में एक करोड़ से ज़ाइद असातिज़ा तालीमी निज़ाम से वाबस्ता हैं, और उन में से साठ फ़ीसद से ज़्यादा ग़ैर-तदरीसी फ़राइज़ के बोझ तले दबे हैं। एक लाख से ज़ाइद ऐसे इस्कूल हैं जहाँ सिर्फ़ एक उस्ताद, अकेले, पाँच जमाअतों को पढ़ाने, खाना पकवाने, डेटा भरने और मर्दुम-शुमारी करने की ज़िम्मेदारी निभाता है। UDISE+، DIKSHA، MDM، SATS، NISHTHA और ULLAS जैसे दर्जनों पोर्टल्स पर इतना वक़्त सर्फ़ होता है कि हक़ीक़ी तदरीसी वक़्त सिकुड़ता चला जाता है। एक उस्ताद के अल्फ़ाज़ याद रखने के क़ाबिल हैं: शाम चार बजे की घंटी बजती है मगर मैं फिर भी नहीं जाता — अभी पोर्टल बाक़ी है। दिसम्बर 2025 में महाराष्ट्र के वज़ीरे-तालीम ने वज़ीरे-आला को ख़त लिख कर मुतालबा किया कि असातिज़ा को बूथ लेवल ऑफ़िसर और दीगर इंतिख़ाबी कामों से फ़ौरी छुटकारा दिया जाए, क्योंकि तालीमी हक़ के क़ानून की दफ़ा सत्ताईस वाज़ेह कहती है कि उस्ताद का बुनियादी फ़रीज़ा सिर्फ़ तदरीस है। अक्तूबर 2025 में पंजाब के वज़ीरे-तालीम ने भी यही पुकार दोहराई: असातिज़ा सिर्फ़ सरकारी मुलाज़िम नहीं, वह इल्म के परचम-बरदार

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दस्ते-ख़िज़्र से शम्अ-ए-हिदायत ही छिन गई!

इस्तिदाद का क़हत, असातिज़ा की ऑनलाइन तिजारत और नई नस्ल का फ़िक्री क़त्ले-आम डॉ. असदुल्लाह ख़ान इत्तिलाआत व मालूमात का यह धमाका-ख़ेज़ दौर, जहाँ मस्नूई ज़ेहानत इंसानी सोच के मुतबादिल के तौर पर उभर रही है, वहाँ एक ऐसे उस्ताद की ज़रूरत थी जो मादी तरक़्क़ी के इस दौर में नई नस्ल के ज़मीर का निगहबान बनता। क़ौमों की तामीरे-नौ में उस्ताद का वुजूद रीढ़ की हड्डी की मानिंद होता है, क्योंकि उस्ताद सिर्फ़ किताब नहीं पढ़ाता, वह रूह की तराश-ख़राश करता है। कारे-मुअल्लिमी दरअसल कारे-नुबुव्वत है, जिसका मंसब तक़द्दुस और ज़िम्मेदारी का तक़ाज़ा करता है। लेकिन अफ़सोस! आज सन 2026 के हिंदुस्तान में जब हम अपने तालीमी ढाँचे और असातिज़ा की तरबियत के निज़ाम (Teacher Education) पर निगाह डालते हैं, तो रूह काँप उठती है। रहबर ही जब राहज़न बन जाएँ, तो कारवाँ की तबाही का गिला किससे किया जाए? हमने जिस दौर में बी.एड. कॉलेजों की बोलियों का रोना रोया था, वह तो महज़ नक़्द रक़म और चंद हज़ार रुपये की हीरा-फेरी का इब्तिदाई दौर था। आज का दौर तो डिजिटल माफ़िया और इदाराजाती बदउनवानी का वह मुहीब समंदर है जिसने पूरे मुल्क के मुस्तक़बिल को अपनी लपेट में ले लिया है। आज मीडिया की सुर्ख़ियां और अदालतों के फ़ैसले गवाह हैं कि असातिज़ा की तय्यारी से लेकर उनकी तअय्युनाती तक का पूरा निज़ाम कैंसर की आख़िरी स्टेज पर खड़ा है। महाराष्ट्र का (TAIT) और (TET) अभी ज़्यादा अर्सा नहीं गुज़रा जब महाराष्ट्र टीचर्स एलिजिबिलिटी टेस्ट (TET) में हज़ारों ऐसे असातिज़ा के नाम सामने आए जिन्होंने लाखों रुपये की रिशवत देकर कम्प्यूटराइज़्ड रिज़ल्ट शीट्स में अपने नम्बर बढ़वाए। जो उस्ताद ख़ुद एक अहलकार को चाय-पानी के नाम पर रिशवत देकर, या सर्वर हैक करवा कर पास हुआ हो, वह पुणे, नागपुर या मुम्बई के स्कूलों में बैठकर अगली नस्ल को दियानतदारी का क्या सबक़ देगा? उत्तर प्रदेश में असातिज़ा की भर्ती टीचर भर्ती के इम्तिहानात और बिहार के बीपीएससी टीचर इम्तिहानात के दौरान ब्लूटूथ डिवाइसेस, सॉल्वर गैंग्स (Solver Gangs) और पेपर लीक के जो शर्मनाक वाक़िआत सामने आए, उन्होंने मेरिट का जनाज़ा निकाल दिया। दसवीं जमाअत की किताब का दुरुस्त तलफ़्फ़ुज़ न कर पाने वाले, और ब्लैकबोर्ड पर अंग्रेज़ी में एजुकेशन की हिज्जे ग़लत लिखने वाले लोग लाखों रुपये की बोली लगाकर स्कूलों में ‘मुस्तक़्बिल के मेमार’ बनकर बैठ गए। बी.एड. और एम.एड. कालिजेस अब तालीमगाहें नहीं, शादी हॉलों की तरह नफ़ा-बख़्श कारोबार हैं। नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन और यूनिवर्सिटियों की जो मुआइना टीमें आती हैं, उनके लिए फ़ाइव स्टार होटलों में क़ियाम और डिजिटल ट्रांसफ़र्स के ज़रिए पहले ही सब कुछ तय कर दिया जाता है। कालिज में न लाइब्रेरी है, न लेबोरेटरी, न लेसन प्लान का वजूद—बस साल के आख़िर में एक सर्टिफ़ाइड मज़दूर तैयार करके मार्केट में फेंक दिया जाता है। उस्ताद जब ख़ुद इल्म के समन्दर से महरूम हो, तो वह दूसरों की प्यास क्या बुझाएगा? आज जो फ़ौज इन ट्रेनिंग कालिजों से निकल रही है, वह तालीम की ग़ैर-पैदावारी प्रोडक्ट है। यह वह भीड़ है जो किसी और पेशे में जगह न पा सकी, तो आख़िरी हर्बे के तौर पर मुअल्लिमी के मुक़द्दस पेशे में घुस आई। रवायती तालीमी निज़ाम का उस्ताद अपनी ज़ात में एक चलती-फिरती दरसगाह हुआ करता था। उसका अस्ल सरमाया उसका ज़ाती मुताला, किताबों से गहरा तअल्लुक़, लाइब्रेरियों से वाबस्तगी और इल्म के लिए न ख़त्म होने वाली प्यास होती थी। उसकी शख़्सियत में वक़ार, गुफ़्तार में संजीदगी और किरदार में ऐसी पुख़्तगी होती थी जो तुलबा के लिए ख़ुद एक ज़िन्दा नमूना बन जाती थी। उसके नज़दीक तदरीस सिर्फ़ निसाब मुकम्मल करने का नाम नहीं थी, बल्कि वह तालिब-ए-इल्म की शख़्सियत साज़ी, अख़लाक़ी तरबियत, फ़िक्री बालीदगी और किरदार की तामीर को अपनी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी समझता था। इम्तिहानात भी उसके नज़दीक महज़ नम्बर हासिल करने का ज़रिया नहीं थे, बल्कि वह सख़्त मेहनत, गहरी फ़िक्र, अस्ल इल्म और दियानतदाराना जांच के ज़रिए तालिब-ए-इल्म की हक़ीक़ी सलाहियत को परखने का पैमाना होते थे। इसके बरअक्स, जदीद दौर का नाम-निहाद सर्टिफ़ाइड उस्ताद एक ऐसे निज़ाम की पैदावार बनता जा रहा है जहां ख़ुद मुताला तक़रीबन ख़त्म हो चुका है। किताबों की जगह गूगल सर्च, तहक़ीक़ी मुताले की जगह वाट्सएप यूनिवर्सिटी, और इल्मी गुफ़्तगू की जगह सोशल मीडिया के मुख़्तसर क्लिप्स और रील्स ने ले ली है। क्लास रूम, जो कभी इल्म व हिकमत का मरकज़ था, अब बाज़ औक़ात महज़ रस्मी हाज़िरी और वक़्त गुज़ारी का मुक़ाम बनकर रह गया है। तदरीस का मक़सद भी तालिब-ए-इल्म की फ़िक्री और अख़लाक़ी तरबियत के बजाय सिर्फ़ हाज़िरी मुकम्मल करना, तन्ख़वाह हासिल करना और फ़ोटोकॉपी शुदा नोट्स तक़सीम करके अपनी ज़िम्मेदारी पूरी समझ लेना रह गया है। इसी ज़वाल का सबसे अफ़सोसनाक इज़हार इम्तिहानी निज़ाम में दिखाई देता है, जहां कभी मेहनत, इस्तिदाद और इल्मी क़ाबलियत कामयाबी का मेआर हुआ करती थी, वहां आज पेपर लीक, सॉल्वर गैंग्स, ग़ैर-क़ानूनी ज़राए, नुक़्ल, और जाली कामयाबियों की मण्डी ने मेरिट का गला घोंट दिया है। नतीजतन ऐसे अफ़राद तदरीस जैसे मुक़द्दस पेशे में दाख़िल हो रहे हैं जिनके पास डिग्रियां तो मौजूद हैं, मगर न इल्म की गहराई है, न तहक़ीक़ की सलाहियत, न किरदार की मज़बूती और न ही नई नस्ल की रहनुमाई का शुऊर। यही वह बुनियादी फ़र्क़ है जो रवायती मुअल्लिम और जदीद सर्टिफ़ाइड उस्ताद के दरमियान एक फ़िक्री, अख़लाक़ी और तहज़ीबी ख़लीज पैदा कर देता है, और यही ख़लीज आज हमारे पूरे तालीमी निज़ाम के ज़वाल की सबसे बड़ी अलामत बन चुकी है। जज़बाती और फ़िक्री दीवालियापन (हमें यह मानना होगा) कि हमारी अगली नस्लें गूंगी और ज़ेहनी तौर पर अपाहज होती जा रही हैं। इसकी वजह यह नहीं कि उनके पास मालूमात नहीं हैं, बल्कि वजह यह है कि उनके पास सही रहबर नहीं है। जब एक उस्ताद क्लास रूम में जाकर ख़ुद अपने मोबाइल में मसरूफ़ हो जाता है, या यूट्यूब की किसी सस्ती वीडियो का सहारा लेकर अपना लेक्चर पूरा करता है, तो वह तालिब-ए-इल्म के अन्दर छुपी तक़्लीक़ी सलाहियत का गला घोंट देता हैं। अलिफ़ के नाम पर लट्ठ लिए फिरने वाले यह पी.एच.डी. और अपना नाम तक दुरुस्त अंग्रेज़ी या उर्दू में न लिख पाने वाले यह बी.एड. असातिज़ा, दरअसल इस निज़ाम के मुजरिम हैं जिसने सलाहियत के बजाय ‘सिफ़ारिश और सरमाये’ को तरजीह

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बच्चे हमारे अहद के चालाक हो गए!!!

जदीद समाजी ज़वाल, डिजिटल यल्ग़ार और मासूमियत का क़त्ल-ए-आम डॉ. असदुल्लाह ख़ान देहली पब्लिक स्कूल के उस पुराने एमएमएस स्कैंडल को गुज़रे बरसों बीत गए, जिसे कभी समाज ने एक ग़ैर-मुतवक़्क़े (अप्रत्याशित) ज़लज़ला समझा था। उस वक़्त लोग चौंके थे कि पानी सर से ऊँचा हो चुका है। लेकिन आज, सन 2026 ई. के इस महीब (भयानक) डिजिटल दौर में जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो वो पुराना वाक़िया महज़ एक मासूमना लग़ज़िश (भूल) महसूस होता है। आज पानी सर से ऊँचा नहीं हुआ, बल्कि पूरा मुआशरा (समाज) ही इख़लाक़ी (नैतिक) दिवालियेपन और बे-हंगम टेक्नोलॉजी के तूफ़ान में ग़र्क़ हो चुका है। अब चौंकने का वक़्त भी गुज़र गया, अब तो सिर्फ़ मातम का दौर है। कल का बच्चा वक़्त से पहले बालिग़ हो रहा था, मगर आज का बच्चा वक़्त से पहले “चालबाज़” और मुजरिमाना ज़ेहनियत का हामिल (युक्त) हो रहा है। कल मासूमियत दाग़दार हुई थी, आज मासूमियत का बीज ही दज्जाली टेक्नोलॉजी की भट्टी में झुलसकर राख हो चुका है। आज हिंदुस्तान, बा-ख़ूसूस (विशेषकर) महाराष्ट्र और मुल्क के दीगर (अन्य) हिस्सों से रोज़ाना जो ख़बरें अख़बारात की सुर्खियाँ बनती हैं, वो रूह को कपकपा देने के लिए काफ़ी हैं। मुंबई और पुणे जैसे मेट्रो शहरों में नौवीं और दसवीं जमात (कक्षा) के मासूम नज़र आने वाले बच्चे इंस्टाग्राम और दीगर सोशल मीडिया ऐप्स पर जाली (फ़र्ज़ी) प्रोफ़ाइल्स बनाकर अपने ही हम-जमातों (सहपाठियों) या बड़ों को “हनी ट्रैप” कर रहे हैं और लाखों रुपये बटोर रहे हैं। मसनूई ज़हानत (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के इस दौर में अब किसी कैमरे से चोरी-छिपे वीडियो बनाने की ज़रूरत भी नहीं रही। स्कूल के बच्चे अपने ही दोस्तों और असातिज़ा (शिक्षकों) की तस्वीरों को चंद सेकेंड्स में “डीपफेक” टेक्नोलॉजी के ज़रिए नाज़ेबा (आपत्तिजनक) तस्वीरों और वीडियोज़ में तब्दील करके वायरल करने की धमकियाँ दे रहे हैं। महाराष्ट्र साइबर सेल के रिकॉर्ड्स ऐसे ना-बालिग़ मुजरिमों की दास्तानों से भरे पड़े हैं। बच्चों के बस्तों से अब सिर्फ़ मानए-हमल अद्वियात (गर्भनिरोधक दवाएँ) ही नहीं निकलतीं, बल्कि उनके मोबाइल वॉलेट्स में लाखों रुपये की डिजिटल करेंसी और ऑनलाइन सस्ते नशे सप्लाई करने वाले नेटवर्क्स के लिंक्स मिलते हैं, जिनका सुराग़ लगाना क़ानून के लिए भी दर्द-ए-सर बन चुका है। दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर या कोलकाता का कोई नाम-निहाद बा-वक़ार (प्रतिष्ठित) स्कूल अब इस वबा (महामारी) से महफ़ूज़ नहीं है। कच्ची उम्र की “मारिया” अब गली के नुक्कड़ पर ‘रॉकी’ का इंतज़ार नहीं करती, वो डेटिंग ऐप्स के ख़ुफ़िया चैट रूम्स में रात भर वर्चुअल उरियानियत (अश्लीलता) का सौदा करती है। “पुष्पा” अब सिर्फ़ बस्ता लेकर घर से ग़ायब नहीं होती, वो ऑनलाइन घोटाले के ज़रिए सरहद पार बैठे मुजरिमों के चंगुल में फँसकर इंसानी स्मगलिंग का ईंधन बन जाती है। उरियानियत का नया रूप: ओटीटी और प्राइवेट स्क्रीन्स हमारी नस्ल ने जिस “इडियट बॉक्स” यानी टेलीविज़न का रोना रोया था, वो तो अब ड्रॉइंग रूम का एक बे-ज़रर (हानिरहित) शो-पीस बनकर रह गया है। अब असल फ़ित्ना (आफ़त) हर बच्चे की जेब में मौजूद “ज़ाती स्क्रीन” (पर्सनल स्क्रीन) है। ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स पर सेंसरशिप की धज्जियाँ उड़ाते हुए जो मवाद (कांटेंट) पिघलाकर बच्चों के ज़ेहन में उतारा जा रहा है, उसने हया और पाकीज़गी के मफ़ाहीम (मायने) ही बदल दिए हैं। इंस्टाग्राम रील्स पर चंद “लाइक्स” और “व्यूज़” के लिए बारह-चौदह साल की बच्चियों का नीम-बरहना (अर्ध-नग्न) रक़्स और लड़कों का गैंग्स्टर कल्चर को आइडियल बनाना अब एक आम चलन है। इंटरनेट अब मालूमात (जानकारी) का ज़रिया नहीं, शहवत (कामुकता), ख़ुशूनत (हिंसा) और ज़ेहनी गंदगी का वो समंदर है जिसका कोई किनारा नहीं। नफ़्सियाती ज़वाल और ख़ुदकुशियों का सैलाब जब एक कच्चा और ना-पुख़्ता ज़ेहन इस महीब दलदल में क़दम रखता है, तो वो इसके अंजाम से बे-ख़बर होता है। वो सिर्फ़ एक “तजुर्बा” करना चाहता है, लेकिन ये तजुर्बा उसे एक ऐसे अंधे कुएँ में धकेल देता है जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं होता। पहले झिझक मरती है, फिर हया रुख़्सत होती है, फिर अक़्ल का चिराग़ गुल होता है और आख़िरकार जब वो अमली इक़दाम (कदम उठाने) की ज़िल्लत में फँसता है, तो ब्लैकमेलिंग, बदनामी और ज़ेहनी दबाव (तनाव) उसे मौत के मुँह में धकेल देते हैं। ये कोई फ़र्ज़ी कहानी नहीं है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के ताज़ा तरीन आदाद-ओ-शुमार (आँकड़े) गवाह हैं कि मुल्क में ना-बालिग़ बच्चों में ख़ुदकुशी की शरह (दर) में होल्नाक हद तक इज़ाफ़ा हुआ है। पिछली दहाई (दशक) के मुक़ाबले में नशा-आवर अश्या (मादक पदार्थों) का इस्तेमाल स्कूल के बच्चों में दुगना हो चुका है। कम-उम्र बच्चे अब जड़ाईम (अपराधों) की दुनिया का सिर्फ़ ईंधन नहीं हैं, बल्कि वो शूटर, सप्लायर और हैकर बनकर उभर रहे हैं। समाज के दानिशवर (बुद्धिजीवी) अब भी वही पुराना राग अलाप रहे हैं: “सेक्स एजुकेशन।” मगर सवाल ये है कि क्या सेक्स एजुकेशन इस तूफ़ान को रोक सकती है? हमारे स्कूलों का निज़ाम, जहाँ असातिज़ा ख़ुद इख़लाक़ी ज़वाल का शिकार हैं या इस मौज़ू (विषय) की हस्सासियत (संवेदनशीलता) से ना-वाक़िफ़ हैं, वहाँ ये तालीम सिर्फ़ एक तमाशा बनकर रह जाती है। हुकूमतें निसाब (पाठ्यक्रम) बदलती हैं, क्लासें चलाती हैं, लेकिन नतीजा? मासूम ज़ेहनों को वक़्त से पहले वो सब कुछ पता चल जाता है जिसकी उन्हें ज़रूरत भी नहीं थी। ये इलाज नहीं, बल्कि कच्चे ज़ेहनों में जिंसी जरासीम (यौन कीटाणुओं) की दानिस्ता (जानबूझकर) पैवंदकारी (प्लांटेशन) है। काम बनने के बजाय मज़ीद (और) बिगड़ जाता है। अभी हाल ही में महाराष्ट्र के दारुल-हुकूमत (राजधानी) मुंबई के एक इंतिहाई महँगे और नामवर इंटरनेशनल स्कूल का एक वाक़िया सामने आया, जिसने पुलिस और माहिरीन-ए-नफ़्सियात (मनोवैज्ञानिकों) दोनों को हिलाकर रख दिया। दसवीं जमात के तीन लड़कों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के टूल्स इस्तेमाल करके अपनी ही हम-जमात लड़कियों की तस्वीरों को नाज़ेबा और बरहना तस्वीरों में तब्दील कर दिया। बात यहाँ ख़त्म नहीं हुई। इन चौदह-पंद्रह साल के बच्चों ने इन तस्वीरों को सोशल मीडिया पर वायरल करने की धकमी देकर उन लड़कियों से लाखों रुपये और महँगे गैजेट्स का मुतालबा (माँग) किया। जब एक लड़की ने डिप्रेशन में आकर ख़ुदकुशी की कोशिश की, तब जाकर ये उक़्दा (राज़) खुला। ज़रा सोचिए, जिस उम्र में बच्चे खिलौनों और पढ़ाई के तनाव से गुज़रते थे, उस उम्र में वे साइबर क्राइम और ब्लैकमेलिंग के मास्टरमाइंड बन चुके हैं। ना-बालिग़ों में नशाख़ोरी का चलन महाराष्ट्र के

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चलो स्कूल, नाकामी सीखें!

जब तालीम का पहला दरवाज़ा ही एहसास-ए-महरूमी में खुलने लगे दाख़िलों की दौड़, बचपन की पहली शिकस्त और तालीम के बदलते हुए चेहरे की दास्तान डॉ. असदुल्लाह ख़ान वह सुबह, जिस दिन एक बच्चा पहली बार हार गया सुबह के सात बज रहे थे। बारिश अभी थमी ही थी और खिड़की के शीशों पर बारिश के चंद क़तरे अब भी ऐसे ठहरे हुए थे जैसे किसी ने वक़्त को चंद लम्हों के लिए रोक दिया हो। गली में स्कूल बस के हार्न की आवाज़ गूंजी तो चार साला साजिद अचानक बिस्तर से उछल कर उठ बैठा। उसने दौड़ते हुए अपनी नन्ही सी पानी की बोतल उठाई, अलमारी से नीले रंग का नन्हा सा बैग निकाला, उसे अपनी पुश्त पर लटकाया और आईने के सामने जा खड़ा हुआ। वह ख़ुद को बार-बार देख रहा था; कभी बैग सीधा करता, कभी अपने बालों पर हाथ फेरता, और कभी तसव्वुर ही तसव्वुर में किसी टीचर को “गुड मॉर्निंग मैम” कह कर मुस्कुरा देता। उसे यक़ीन था कि आज वह भी दूसरे बच्चों की तरह स्कूल जाएगा। वह नहीं जानता था कि स्कूल जाने के लिए सिर्फ़ मासूमियत काफ़ी नहीं रही, अब इसके लिए एक ऐसा इम्तिहान ज़रूरी है जिसकी न उसे ख़बर है, न इसके मायने मालूम हैं, और न इसके नताइज (परिणाम)। वह तो सिर्फ़ इतना जानता है कि स्कूल में दोस्त मिलते हैं, रंग-बिरंगी किताबें होती हैं, झूले होते हैं, और शायद एक ऐसी टीचर भी जो मां की तरह प्यार करती होगी। लेकिन इसी वक़्त घर के दूसरे कमरे में एक और मंज़र चल रहा था। खाने की मेज़ पर दाख़िला फ़ॉर्म, आधार कार्ड की फ़ोटो कॉपियां, पैदाइश का सर्टिफ़िकेट, बिजली का बिल, बैंक स्टेटमेंट, पासपोर्ट साइज़ तस्वीरें, पैन कार्ड, और न जाने कितने काग़ज़ात बिखरे हुए थे। साजिद की मां बार-बार एक फ़ाइल खोल कर बंद कर रही थी। बाप ख़ामोश बैठा था—एक ऐसी ख़ामोशी जिसके अंदर कई तूफ़ान थे। वह बार-बार घड़ी देखता, फिर फ़ाइल देखता, फिर अपने बेटे को और फिर न जाने क्यों अपनी ज़ात को तकने लगता। आज इम्तिहान साजिद का नहीं, बल्कि उसके वालिदैन (माता-पिता) का था। उनकी ज़बान, अंग्रेज़ी, मुलाज़मत, आमदनी, रहन-सहन, लिबास, शख़्सियत और शायद उनके समाजी मर्तबे का भी इम्तिहान था। यह वह इम्तिहान था जिसका निसाब (पाठ्यक्रम) किसी किताब में नहीं मिलता और जिसकी तैयारी किसी उस्ताद के पास नहीं होती। इसका नतीजा सिर्फ़ “दाख़िला मिला” या “दाख़िला नहीं मिला” नहीं होता, बल्कि बाज़ औक़ात एक नन्हें से दिल में यह पहला एहसास भी छोड़ जाता है कि शायद वह दूसरों से कमतर है। शायद यही वह लम्हा होता है जब बचपन पहली बार ज़िंदगी के सामने हारने लगता है। दाख़िले का मौसम या वालिदैन का इम्तिहान? हमने तालीम को हमेशा रोशनी, उम्मीद और मसावात (समानता) की अलामत समझा है। स्कूल वह जगह थी जहां मुआशरे (समाज) के हर तबक़े का बच्चा एक ही बेंच पर बैठ कर यह सीखता था कि इल्म इंसानों के दरमियान फ़र्क़ नहीं करता। उस्ताद वह शख़्सियत था जो नाम, नसब या आमदनी नहीं पूछता था, बल्कि सिर्फ़ यह देखता था कि सामने बैठा बच्चा सीखना चाहता है या नहीं। लेकिन वक़्त ने तालीम का चेहरा बदल दिया है। आज बहुत से शहरों में स्कूल का दरवाज़ा इल्म से पहले समाजी शिनाख़्त को देखने लगा है। दाख़िला फ़ॉर्म अब सिर्फ़ बच्चे की मालूमात नहीं मांगते, बल्कि वालिदैन की माशी हैसियत, पेशा, ज़बान, तालीमी क़ाबलियत और तर्ज़-ए-ज़िंदगी तक जानने की कोशिश करते हैं। यहां सवाल यह है कि क्या एक चार साला बच्चे की क़िस्मत का फ़ैसला वाक़ई उसके वालिदैन की तनख़्वाह, अंग्रेज़ी लहजे या ड्राइंग रूम के साइज़ से होना चाहिए? हिंदुस्तान में हर साल जून का महीना सिर्फ़ तालीमी साल के आग़ाज़ की ख़बर नहीं लाता, बल्कि लाखों घरों में उम्मीद और मायूसी की एक नई दास्तान रक़म करता है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, चेन्नई और कोलकाता जैसे बड़े शहरों में हर साल दाख़िलों के मौसम में यही बेचैनी देखने को मिलती है। अख़बारात में रात भर लगने वाली क़तारों, महदूद (सीमित) नशस्तों (सीटों) और नर्सरी दाख़िलों के लिए क़ायम ख़ुसूसी कोचिंग सेंटर्स पर मुसलसल ख़बरें शाया होती हैं। अदालतों, माहिरीन-ए-तालीम और पॉलिसी साज़ों के दरमियान यह बहस जारी है कि इब्तिदाई (प्राथमिक) तालीम के दरवाज़े पर इंसाफ़ को कैसे यक़ीनी बनाया जाए। लेकिन यह सब कुछ देखने के बावजूद सबसे ज़्यादा ख़ामोश वह बच्चा होता है जिसके नाम पर यह पूरी जंग लड़ी जा रही होती है। बचपन की सबसे ख़ूबसूरत बात यह है कि वह कामयाबी और नाकामी की लुग़त (शब्दकोश) से बेख़बर होता है। चार साल का बच्चा न मेरिट जानता है, न वेटिंग लिस्ट। वह सिर्फ़ इतना जानता है कि सामने वाले घर का अली आज स्कूल गया है, लिहाज़ा वह भी जाना चाहता है। लेकिन जब बड़ों की दुनिया उसकी राह में अपनी शर्तें और दीवारें खड़ी कर देती है, तो वह कुछ नहीं समझता। वह सिर्फ़ इतना पूछता है: “अब्बू… मेरा स्कूल कब शुरू होगा?” यह सवाल बज़ाहिर छोटा है, मगर एक हस्सास (संवेदनशील) बाप के लिए इसका जवाब पूरी ज़िंदगी के मुश्किल तरीन सवालों में से एक बन जाता है। मेरे एक दोस्त हैं, नाम बदल कर उन्हें राशिद कह लेते हैं। पेशा सहाफ़त (पत्रकारिता), किताबों से मोहब्बत, सच बोलने की आदत और अपने चार साला बेटे साजिद से बेपनाह इश्क़। जिस दिन शहर के एक मारूफ़ (प्रसिद्ध) स्कूल में इंटरव्यू था, उस दिन राशिद ने अपनी बेहतरीन क़मीज़ पहनी और बीवी ने फ़ाइल तरतीब दी। हर काग़ज़ अपनी जगह मौजूद था, मगर एक चीज़ कहीं दर्ज नहीं थी: अपने बच्चे के लिए एक बाप की मोहब्बत, क्योंकि इस मोहब्बत का कोई ख़ाना फ़ॉर्म में मौजूद नहीं था। हमारे मुआशरे का शायद ही कोई और इम्तिहान हो जिसकी तैयारी तीन साला बच्चा कम और उसके वालिदैन ज़्यादा करते हों। घर में रोज़ाना मश्क़ होती; “गुड मॉर्निंग”, “थैंक यू”, “एप्पल, बॉल, कैट”। मां तस्वीरें दिखाती, बाप रंग याद कराता, दादा दुआएं देता और दादी नज़र उतारती। इंटरव्यू शुरू हुआ तो राशिद के मुताबिक़ चंद रस्मी सवालात के बाद गुफ़्तगू का रुख़ अचानक बदल गया। “आप क्या करते हैं? माहना आमदनी कितनी है? घर अपना है या किराए का? कितने कमरों का फ़्लैट है? घर में कौन

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तालीम के ज़रिए۔۔۔ तामीर या तख़रीब ? ۔۔۔

डॉ. असदुल्लाह ख़ान बच्चों को आप स्कूल क्यों भेजते हैं? यह सवाल सुनने में जितना सादा लगता है, अपने बातिन (अंदर) में उतना ही तूफ़ान समोए हुए है। यह एक सवाल नहीं, एक तहज़ीब का एहतसाब (आत्म-मूल्यांकन) है। एक तड़पते हुए बाप का, एक फ़िक्रमंद मां का और एक बिखरती हुई क़ौम का वह मुक़दमा है जो आज अपने ही हाथों अपनी नस्ल को कटहरे में खड़ा कर रही है और इसे ख़बर भी नहीं! जब भी किसी बाप की आंखों में झांक कर यह पूछा जाए तो जवाब एक ही लय में, एक ही बेफ़िक्री से आता है: ”बच्चे पढ़ लिख कर कुछ बन जाएं।” लेकिन कभी तन्हाई में बैठकर सोचिए कि इस ”कुछ बनने” का ख़वाब कब का सुकड़ कर महज़ चंद हज़ार या चंद लाख की कमाई का हदफ़ (लक्ष्य) बन चुका है? शख़्सियत की तामीर, किरदार की परवरिश, ज़ेहन की रोशनी — यह अलफ़ाज़ अब सिर्फ़ स्कूलों के चमकदार ब्रोशरों में ख़ूबसूरत फ़ॉन्ट में छपते हैं, किसी के दिल में नहीं उतरते। वालिदैन बच्चों को स्कूल ऐसे भेजते हैं जैसे ख़त को लिफ़ाफ़े में बंद करके पोस्ट बॉक्स में डाल दिया जाए — कि अब आगे का ज़िम्मा डाकख़ाने का है, हमारा काम ख़त्म हुआ। साल २०२६ء का यह वह लमहा है जब इस सवाल की गहराई हमारी बर्दाश्त से बाहर हो चुकी है। मसनूई ज़हानत (Artificial Intelligence) का तूफ़ान अब दरवाज़े पर दस्तक नहीं दे रहा, वह तो हमारे बेडरूम्स और क्लास रूम्स के अंदर आ बैठा है। ChatGPT और Gemini अब हर चौथी जमात के बच्चे की जेब में हैं, हर स्मार्टफ़ोन के अंदर मौजूद हैं। वह हर सवाल का जवाब चंद सेकंड में उगल देते हैं। अब सवाल यह नहीं रहा कि आपके बच्चे का हाफ़िज़ा (याददाश्त) कितना तेज़ है और वह कितने जवाब जानता है — अब रोने का मुक़ाम यह है कि क्या वह सोचना भी जानता है? क्या हम हाड़-मांस के इंसान बना रहे हैं या माइक्रोचिप्स से चलने वाले बेजान आले (यंत्र)? स्कूल की चहार दीवारी: दरसगाह या उक़ूबत ख़ाना? जिस स्कूल में देर से आने की सज़ा यह हो कि आठ-दस किलो का बस्ता कांधों पर लाद कर मैदान के दस चक्कर लगवाए जाएं — वहां बच्चे के क़दम स्कूल की तरफ़ शौक़ से बढ़ेंगे या ख़ौफ़ से? जिस क्लास में एक की ग़लती पर पचास बच्चों के मासूम हाथों पर बेद मार कर लाल कर दिया जाए, वहां मोहब्बत का कौन सा फूल उगेगा? वहां सिर्फ़ इंतक़ाम (बदले) का कांटा परवान चढ़ेगा। यह जिस्मानी और ज़ेहनी तशद्दुद (हिंसा) अब सिर्फ़ माज़ी (भूतकाल) का क़िस्सा नहीं रहा, बल्कि आज हमारे आस-पास रोज़ का मामूल बन चुका है। मुल्क के अलग-अलग कोनों से आने वाली हालिया ख़बरें पढ़ कर रूह कांप उठती है और दिल ख़ून के आंसू रोता है: बेंगलुरु का वहशियाना वाक़िया: अभी हाल ही में बेंगलुरु के एक निजी स्कूल में महज़ दो दिन ग़ैर-हाज़िर रहने पर पांचवीं जमात के एक मासूम ९ साल के बच्चे को स्कूल के इंतिज़ामिया (प्रबंधन) ने प्लास्टिक के पाइप से इस बेरहमी से पीटा कि उसके पूरे जिस्म पर नील पड़ गए, और हद तो यह है कि उसे कई घंटों तक एक अंधेरे कमरे में अकेला बंद करके तड़पने के लिए छोड़ दिया गया। जब दुखी वालिदैन ने जवाब मांगा, तो उन्होंने ढिटाई से कहा: “हमारे यहां डिसिप्लिन सिखाने का यही तरीक़ा है!” आंध्र प्रदेश में मासूमियत पर वार: चित्तूर के एक स्कूल में छठी जमात की ११ साल की बच्ची क्लास में किसी से बात कर रही थी। तैश में आकर उस्ताद ने उसकी तरफ़ स्कूल का भारी बस्ता उठा कर फेंका। बस्ते के अंदर मौजूद स्टील का लंच बॉक्स बच्ची के सर पर इतनी ज़ोर से लगा कि वह वहीं चकरा कर गिर गई। बाद में जब दर्द न रुका तो हस्पताल के स्कैन में मालूम हुआ कि इस मासूम बच्ची के सर की हड्डी (Skull) में फ्रैक्चर आ चुका है। कर्नाटक की बर्बरीय्यत: एक और दिलसोज़ लहर उस वक़्त दौड़ी जब एक रिहायशी स्कूल (Residential School) के उस्ताद ने ९ साल के एक छोटे से बच्चे को सिर्फ़ इसलिए ज़मीन पर गिरा कर बेरहमी से लातों और थप्पड़ों से पीटा क्योंकि उसने हॉस्टल से अपने घर फ़ोन करने की “जसारत” (हिमाकत) की थी। वह मासूम बच्चा उस्ताद के पैरों में गिर कर रोते हुए माफ़ियां मांग रहा था, लेकिन उस जल्लाद का दिल नहीं पिघला। यह चंद मिसालें तो वह हैं जो मीडिया की नज़र चढ़ीं और एफ़आईआर तक पहुंचीं, वरना रोज़ाना ज़्यादातर मासूम रूहें इन चहार दीवारों के पीछे सिसकती हैं और किसी को ख़बर तक नहीं होती। हम डिसिप्लिन के नाम पर बच्चों को तहज़ीब नहीं सिखा रहे, बल्कि उनके अंदर के इंसान को क़त्ल कर रहे हैं। यह तो वह जिस्मानी वहशत है जो नज़र आ जाती है, लेकिन अब जो नई डिजिटल बर्बरीय्यत आई है, उसने रूहों को ऐसे ज़ख़्म दिए हैं जिनका कोई एक्स-रे नहीं हो सकता। मुंब्रा, कल्यान और भिवंडी के बाज़ अंग्रेज़ी स्कूलों में अब बच्चों के होमवर्क का ‘ऑनलाइन रिकॉर्ड’ रखा जाता है। बच्चा रात को थक कर सो गया, होमवर्क अधूरा रह गया। सुबह क्लास व्हाट्सऐप ग्रुप में, जहां पचास दीगर वालिदैन मौजूद हैं, बच्चे का नाम सुर्ख़ (लाल) हुरूफ़ में डाल दिया जाता है जैसे वह कोई मुजरिम हो। सत्तर साल पहले स्कूलों में सज़ा के तौर पर बच्चे के गले में तख़्ती लटकाई जाती थी जिस पर लिखा होता था: ‘I am Donkey’। आज वह तख़्ती डिजिटल हो गई है — स्कूल ऐप पर रेड अलर्ट, पैरेंट पोर्टल पर नाम, डैशबोर्ड पर रुसवाई! ज़रिया बदल गया, असातिज़ा (शिक्षकों) की वहशियाना ज़ेहनियत नहीं बदली। क्या यह तालीम है? या किसी नाज़ुक, मासूम आईने पर पत्थर मार-मार कर उसे चकनाचूर करना और फिर उसके मलबे को पॉलिश करके कहना कि देखो हमने कितना चमकदार शीशा बनाया है? अंग्रेज़ी का बुत और वालिदैन का सजदा हमारी क़ौम ने अंग्रेज़ी ज़बान के साथ जो रिश्ता जोड़ा है, वह अब ज़बान का रिश्ता नहीं रहा, वह अंधी पूजा बन चुका है। एक ऐसा बुत जिसके सामने हम अपनी ग़ैरत, अपनी तहज़ीब, और अपना सकून क़ुर्बान कर रहे हैं। एक ग़रीब बाप को देखिए, जो बारह-बारह घंटे ओवरटाइम करता है,

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मेहनत करे इंसान तो क्या हो नहीं सकता!

डॉ. असदुल्लाह ख़ान आज के दौर में आला तालीम हासिल कर लेने के बावजूद नौकरी पा लेना गोया जूए-शेर लाने से कम नहीं। आप में सैकड़ों सलाहियतें हों, मगर अगर एक भी ‘कमी’ नज़र आ जाए — कोई जिस्मानी माज़ूरी, कोई कमज़ोरी, कोई ‘दाग़’ — तो पूरा चराग़ नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। काम नामुमकिन नहीं होता, मगर मुश्किल ज़रूर हो जाता है। मुझे एक ऐसे ही होनहार नौजवान का क़िस्सा याद आता है। मुल्क के एक मुमताज़ इंजीनियरिंग इदारे से फ़ारिग़ुत्तहसील, तालीमी रिकॉर्ड इस क़दर शानदार कि काग़ज़ात देखते ही एक बड़ी कंपनी ने उसे हाथों-हाथ लेने का इरादा कर लिया। मगर जब इंटरव्यू में यह खुला कि वह नौजवान क़ुव्वत-ए-समाअत की एक बीमारी में मुब्तला है, तो वही कंपनी — जो अभी-अभी उसकी ज़ेहानत पर फ़रेफ़्ता थी — चुपचाप क़दम पीछे खींच लाई। डिग्री, मेहनत और क़ाबिलियत — सब एक ‘तिब्बी रिपोर्ट’ के सामने हार गए। मगर कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती, और न होनी चाहिए। क्योंकि माज़ूरी जिस्म की होती है, हौसले की नहीं। तारीख़ गवाह है कि जिन लोगों ने दुनिया बदली, उनमें से बेश्तर ने ‘कमी’ को ‘ताक़त’ में बदला। आइए आज ऐसे ही दस रोशन चराग़ों की दास्तानें सुनते हैं — जिनकी लौ आँधियों में भी बुझी नहीं, बल्कि और तेज़ हुई। अज़मत और हिम्मत की रोशन मिसालें इंसान अगर सच्चे दिल से कुछ करने का इरादा कर ले तो जिस्मानी आज़ा की महरूमी उसके ख़्वाबों के आड़े कभी नहीं आ सकती। तारीख़ और हाल के उफ़ुक़ पर ऐसे कई दरख़्शंदा सितारे चमक रहे हैं जिन्होंने अपनी हिम्मत के बलबूते पर तूफ़ानों का रुख़ मोड़ दिया। श्रीकांत बोल्ला (Srikanth Bolla): पैदाइशी तौर पर मुकम्मल नाबीना श्रीकांत बोल्ला को बचपन ही से इंतिहाई ग़ुर्बत और समाजी तअस्सुब का सामना करना पड़ा। हद तो यह हुई कि जब उन्होंने दसवीं जमाअत के बाद साइंस पढ़ने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की, तो भारतीय निज़ाम-ए-तालीम ने उनके नाबीना होने का बहाना बनाकर साफ़ इनकार कर दिया। उन्होंने इस नाइंसाफ़ी के आगे सर-ए-तस्लीम ख़म करने के बजाय अदालत का दरवाज़ा खटखटाया और छह माह की तवील क़ानूनी जद्दोजहद के बाद कामयाबी हासिल की, जिसके बाद उन्होंने ग्यारहवीं जमाअत में ९८ प्रतिशत नंबर लेकर सबको हैरान कर दिया। जब मुल्क के मायानाज़ इदारे आई आई टी (IIT) ने भी उन्हें दाख़िला देने से इनकार किया, तो उन्होंने हिम्मत हारने के बजाय अमरीका की मशहूर यूनिवर्सिटी एम आई टी (MIT) का रुख़ किया और वहाँ दाख़िला पाने वाले पहले बैनुल-अक़्वामी नाबीना तालिबे-इल्म बन गए। भारत वापस आकर उन्होंने ‘बोलान्ट इंडस्ट्रीज़’ (Bollant Industries) क़ायम की, जो माहौल-दोस्त मस्नूआत बनाती है और जहाँ सैकड़ों माज़ूर अफ़राद को रोज़गार फ़राहम किया गया है। आज श्रीकांत करोड़ों रुपये की कंपनी के मालिक और दुनिया भर के नौजवानों के लिए एक आलमी रोल मॉडल हैं। सुधा चंद्रन (Sudha Chandran): महज़ १६ साल की उम्र में एक ख़ौफ़नाक सड़क हादिसे और डॉक्टरों की मुजरिमाना ग़फ़लत की वजह से सुधा चंद्रन की दाहिनी टांग काटनी पड़ी। एक क्लासिकल रक़्क़ासा के लिए यह मुसीबत किसी मौत से कम न थी क्योंकि उनका पूरा करियर पाँव की थिरकन से वाबस्ता था। मगर सुधा ने बैसाखियों के सहारे जीने को ठुकरा दिया और ‘जयपुर फ़ुट’ (मसनूई टांग) लगवाकर इंतिहाई शदीद तकलीफ़ के बावजूद दोबारा रक़्स सीखना शुरू किया। मश्क़ के दौरान अक्सर उनके ज़ख़्मों से ख़ून बह निकलता था, मगर उनका अज़्म मुतज़लज़िल न हुआ। उन्होंने मसनूई टांग के साथ स्टेज पर वापसी की और ऐसा शानदार रक़्स पेश किया कि पूरी दुनिया दंग रह गई। आज वह न सिर्फ़ एक आलमी शोहरत-याफ़्ता रक़्क़ासा हैं बल्कि भारतीय फ़िल्म व टेलीविज़न की एक मानी हुई और कामयाब अदाकारा भी बन चुकी हैं। इरा सिंघल (Ira Singhal): रीढ़ की हड्डी की एक नायाब बीमारी ‘स्कोलियोसिस’ (Scoliosis) की वजह से इरा सिंघल के दोनों बाज़ुओं की हरकत इंतिहाई महदूद थी। उन्होंने अपनी इस कमज़ोरी को पढ़ाई के आड़े नहीं आने दिया और २०१० में मुल्क का सबसे मुश्किल इम्तिहान यू पी एस सी (UPSC) पास किया, मगर इंतिज़ामिया ने उनकी जिस्मानी हालत का बहाना बनाकर उन्हें सरकारी मुलाज़मत देने से इनकार कर दिया। इरा ने इस इम्तियाज़ी सुलूक़ को चुपचाप क़बूल करने के बजाय सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) में केस दायर किया और चार साल तक एक सब्र-आज़मा क़ानूनी जंग लड़कर अपना हक़ जीता। उन्होंने २०१४ में दोबारा इम्तिहान दिया और इस बार न सिर्फ़ कामयाब हुईं बल्कि पूरे मुल्क में पहली पोज़िशन (Rank 1) हासिल करके जनरल कैटेगरी में टॉप किया। आज वह एक बेहतरीन और निडर सिविल सर्विसेज़ ऑफ़िसर के तौर पर मुल्क की ख़िदमत कर रही हैं। अरुणिमा सिन्हा (Arunima Sinha): क़ौमी सतह की वॉलीबॉल खिलाड़ी अरुणिमा सिन्हा की ज़िंदगी में २०११ में उस वक़्त अँधेरा छा गया जब कुछ चोरों ने उन्हें चलती ट्रेन से नीचे फेंक दिया, जिसके बाइस उनकी एक टांग काटनी पड़ी। अस्पताल के बिस्तर पर जहाँ लोग उन पर तरस खा रहे थे और उन्हें ‘बेचारी’ समझ रहे थे, उन्होंने वहीं लेटे-लेटे दुनिया की बुलंद-तरीन चोटी सर करने का नाक़ाबिल-ए-यक़ीन फ़ैसला किया। अस्पताल से डिस्चार्ज होते ही उन्होंने पहली भारतीय ख़ातून एवरेस्ट फ़ातेह बचेंद्री पाल से सख़्त ट्रेनिंग शुरू की। सरफिरे अज़्म की बदौलत २०१३ में वह मसनूई टांग के साथ माउंट एवरेस्ट सर करने वाली दुनिया की पहली माज़ूर ख़ातून बनीं और उसके बाद उन्होंने दुनिया के तमाम ७ बर्र-ए-आज़मों की बुलंद-तरीन चोटियों पर कामयाबी से अपने मुल्क का तिरंगा लहराया। सातोशी ताजीरी (Satoshi Tajiri): जापान में पैदा होने वाले सातोशी ताजीरी को बचपन ही में ‘ऑटिज़्म’ (Autism) की तश्ख़ीस हुई, जो कि एक ऐसी ज़ेहनी हालत है जिसमें इंसान के लिए समाजी ताल्लुक़ात क़ायम करना और आम लोगों की तरह बात-चीत करना इंतिहाई मुश्किल हो जाता है। स्कूल में उनका कोई दोस्त नहीं बनता था और वह अकेले जंगलों में कीड़े-मकोड़े पकड़ते रहते थे, जिसकी वजह से लड़के उन्हें ‘पागल’ कहकर चिढ़ाते थे। मगर सातोशी के वालिदैन ने उनका यह शौक़ छुड़वाने के बजाय उनका हौसला बढ़ाया। सातोशी ने अपनी इसी तन्हाई और कीड़े-मकोड़े जमा करने के शौक़ को एक मुनफ़रिद आइडिया में बदला और सोचा कि काश बच्चे एक ही जगह ऐसी मुख़्तलिफ़ ख़याली मख़लूक़ात जमा कर सकें और आपस में शेयर कर सकें। उन्होंने निन्टेन्डो (Nintendo) कंपनी को एक गेम का आइडिया

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बे-बसीरत नस्ल-ए-नौ माँगे ज़िंदगी की ज़मानत

जेन ज़ी, तालीमी निज़ाम और मुस्तक़बिल के ख़ौफ़ की नफ़्सियात डॉ. असदुल्लाह ख़ान कभी-कभी मुआशरों में आने वाली तब्दीलियाँ शोर मचाकर नहीं आतीं। वह ख़ामोशी से नस्लों के रवैयों में उतरती हैं। फिर एक दिन हमें महसूस होता है कि दुनिया बदल चुकी है। आज दुनिया भर में एक अजीब मंज़र दिखाई देता है। इंजीनियर कारोबार सीख रहा है, डॉक्टर यूट्यूब चैनल चला रहा है, उस्ताद ऑनलाइन कोर्स बेच रहा है, तालिबे-इल्म शेयर मार्केट समझ रहा है, और यूनिवर्सिटी से फ़ारिग़ होने वाला नौजवान मुलाज़मत ढूँढ़ने से पहले “Passive Income” के तरीक़े तलाश कर रहा है। सवाल यह नहीं कि ऐसा क्यों हो रहा है, अस्ल सवाल यह है कि आख़िर ऐसी कौन-सी तब्दीली रूनुमा हुई है कि एक पूरी नस्ल नौकरी से पहले “Exit Plan” तैयार कर रही है? ऐसा क्यों है कि आज का नौजवान किसी कंपनी में दाख़िल होने से पहले उस दिन के बारे में सोच रहा है जब वह कंपनी उसे निकाल देगी? आख़िर वह कौन-सा ख़ौफ़ है जो इस नस्ल के ला-शऊर में बैठ गया है? पिछली नस्लों का ख़्वाब सादा था। पढ़ो, अच्छी डिग्री हासिल करो, अच्छी नौकरी हासिल करो, घर बनाओ, बच्चों को पढ़ाओ और रिटायर हो जाओ। यही कामयाबी थी, यही इस्तिहकाम था, यही ज़िंदगी का नक़्शा था। लेकिन आज का नौजवान इस नक़्शे पर यक़ीन नहीं रखता। क्यों? इसलिए कि उसने अपनी आँखों से देखा है कि बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ बेरोज़गारी की ज़मानत बन सकती हैं। उसने देखा कि कोरोना की एक लहर ने करोड़ों मुलाज़मतें ख़त्म कर दीं। उसने देखा कि मसनूई ज़ेहानत चंद सेकंड में वह काम कर रही है जो कभी हज़ारों अफ़राद किया करते थे। उसने देखा कि कई बरसों की वफ़ादारी के बाद भी एक ईमेल इंसान को बेरोज़गार बना सकती है। चुनाँचे इस नस्ल ने एक नया सबक़ सीख लिया: “किसी एक चीज़ पर इनहिसार ख़तरनाक है।” लेकिन यहाँ एक और सवाल जन्म लेता है। क्या वाक़ई मसअला सिर्फ़ रोज़गार का है, या मसअला इससे कहीं ज़्यादा गहरा है? मेरा ख़याल है कि यह सिर्फ़ मआशी बुहरान नहीं बल्कि तालीमी बुहरान भी है। क्योंकि हमारी पूरी तालीमी मशीनरी अब भी बीसवीं सदी के लिए बच्चों को तैयार कर रही है जबकि दुनिया इक्कीसवीं सदी के तीसरे अशरे में दाख़िल हो चुकी है। हम अब भी बच्चों से पूछते हैं: “बड़े होकर क्या बनोगे? डॉक्टर? इंजीनियर? पायलट? उस्ताद? अफ़सर?” मगर शायद अब सवाल बदलने का वक़्त आ गया है। आज का सवाल यह होना चाहिए: “तुम कौन-सी सलाहियतें पैदा करोगे जो हर दौर में तुम्हें ज़िंदा रख सकें?” यहाँ हमारी तालीम की एक बुनियादी कमज़ोरी सामने आती है। हम बच्चों को इम्तिहान पास करना सिखाते हैं, मसाइल हल करना नहीं। हम उन्हें मालूमात देते हैं, बसीरत नहीं देते। हम उन्हें नौकरी हासिल करना सिखाते हैं, मौक़े पैदा करना नहीं सिखाते। हम उन्हें याददाश्त देते हैं, तख़्लीक़ नहीं देते। आज का नौजवान एक अहम सवाल पूछ रहा है। शायद वह अल्फ़ाज़ में बयान न कर सके लेकिन उसके अंदर यह सवाल मुसलसल मौजूद है: “अगर मेरी डिग्री मुझे तहफ़्फ़ुज़ नहीं दे सकती तो फिर मुझे क्या चीज़ महफ़ूज़ बना सकती है?” इस सवाल का जवाब सिर्फ़ मुलाज़मत नहीं, सिर्फ़ कारोबार नहीं, सिर्फ़ सरमायाकारी नहीं, बल्कि सलाहियतों का ऐसा मजमूआ है जो इंसान को हर दौर में कारआमद बना दे। Communication Skills, Critical Thinking, Problem Solving, Leadership, Digital Literacy, Entrepreneurship, Character Building और सबसे बढ़कर Learning Agility यानी मुसलसल सीखते रहने की सलाहियत। बदक़िस्मती से हमारे बहुत से तालीमी इदारे अब भी सिर्फ़ निसाब मुकम्मल करने को तालीम समझते हैं। जबकि आने वाली दुनिया में निसाब से ज़्यादा अहम “क़ाबिलियत” होगी, इम्तिहान से ज़्यादा अहम “महारत” होगी और डिग्री से ज़्यादा अहम “Value Creation” होगी। यह भी एक दिलचस्प अलमिया है कि Gen Z को Work-Life Balance की नस्ल कहा जाता है, मगर हक़ीक़त यह है कि शायद यह नस्ल अपने वालिदैन से ज़्यादा काम कर रही है। दिन में नौकरी, रात में फ़्री-लांसिंग, हफ़्तावार कंटेंट क्रिएशन, सोशल मीडिया नेटवर्किंग और साथ में नई महारतें सीखने की कोशिश। यह सब क्यों? क्योंकि उन्हें काम से नफ़रत नहीं, उन्हें ग़ैर-यक़ीनी मुस्तक़बिल से ख़ौफ़ है। एक मुअल्लिम की हैसियत से मुझे सबसे ज़्यादा फ़िक्र इस बात की है कि कहीं हम नौजवानों को सिर्फ़ आमदनी पैदा करने वाली मशीनें न बना दें। क्योंकि ज़िंदगी सिर्फ़ माली आज़ादी का नाम नहीं, ज़िंदगी मक़सद का नाम भी है, अख़्लाक़ का नाम भी है, ख़िदमत का नाम भी है, किरदार का नाम भी है, मुआशरे की तामीर का नाम भी है। अगर तालीम सिर्फ़ पैसा कमाना सिखाए और इंसान बनना न सिखाए तो वह तालीम नहीं, महज़ तर्बियत-ए-मआश है। आने वाले ज़माने का सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होगा कि कौन-सी मुलाज़मत बाक़ी रहेगी, बल्कि यह होगा कि कौन-सा इंसान हर तब्दीली के बावजूद अपनी अफ़ादियत बरक़रार रख सकेगा। और यही वह मक़ाम है जहाँ तालीमी इदारों को अपना पूरा फ़लसफ़ा अज़सर-ए-नौ तरतीब देना होगा। हमारा मक़सद सिर्फ़ डॉक्टर, इंजीनियर, अफ़सर या ताजिर पैदा करना नहीं होना चाहिए बल्कि ऐसे इंसान पैदा करना होना चाहिए जो हालात के ग़ुलाम न हों बल्कि हालात को बदलने की सलाहियत रखते हों। शायद इसी लिए मैं समझता हूँ कि Gen Z नौकरीयों को मुस्तरद नहीं कर रही। वह काम से फ़रार नहीं चाहती, मेहनत से भी नहीं भाग रही। वह दरअसल एक ऐसी दुनिया में ज़िंदा रहने का रास्ता तलाश कर रही है जहाँ कोई चीज़ मुस्तक़िल नहीं रही। और शायद इस पूरी कहानी का सबसे अहम सबक़ यही है कि मुस्तक़बिल उन लोगों का नहीं होगा जिनके पास सिर्फ़ डिग्रियाँ होंगी, बल्कि उनका होगा जिनके पास सीखने, बदलने और नए रास्ते बनाने की सलाहियत होगी। और यही वह मक़ाम है जहाँ तालीम का अस्ल सफ़र शुरू होता है। “ज़माना बदलने से पहले अगर तालीम न बदले, तो फिर ज़माना तालीम को बे-मानी बना देता है।” Asadullahkhanschoolasadullahkhanschool.org

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तालीम की हक़ीक़ी रूह की तलाश!!!

डॉ. असदुल्लाह ख़ान अस्र-ए-हाज़िर का हिन्दुस्तान एक ऐसे फ़िक्री व तहज़ीबी मोड़ पर खड़ा है जहाँ मादी तरक़्क़ी की चकाचौंध तो उरूज पर है, मगर हमारी अख़्लाक़ी और तालीमी बुनियादें अंदर से खोखली होती जा रही हैं। आज जब हम अपने तालीमी गुलिस्तान पर नज़र डालते हैं, तो वहाँ इल्म की ख़ुशबू के बजाय इम्तिहानात का धुआँ और मुक़ाबलों का शोर सुनाई देता है। तालीम की हक़ीक़ी रूह जो इम्तिहानी परचों और मेरिट लिस्टों के नीचे दब कर दम तोड़ चुकी है, आज उसकी बाज़याफ़्त की पुकार ने बेचैन कर दिया है। इंसानी तारीख़ के औराक़ को पलट कर देखें तो कायनात के सबसे बड़े मुअल्लिम-ए-आज़म पर नाज़िल होने वाला पहला इल्हामी हुक्म “इम्तिहान दो” नहीं था। लौह-ए-महफ़ूज़ से इंसानियत के नाम जो पहला अबदी पैग़ाम उतरा, वह था— اِقْرَاْ بِاسْمِ رَبِّكَ الَّذِیْ خَلَقَ हुक्म हुआ— पढ़िए अपने रब के नाम से जिसने पैदा किया। इस पहले आसमानी सबक़ का मक़सद नम्बरात की दौड़ नहीं बल्कि शऊर की बेदारी था। उसका अव्वलीन हासिल कोई दुनियावी मुलाज़मत नहीं बल्कि ख़ालिक़ व मख़लूक़ की मारिफ़त था। इस्लाम की पूरी इल्मी तारीख़ इसी महवर के गिर्द घूमती है। जब तक तालीम एक इबादत थी, बग़दाद, क़ुर्तुबा, ग़रनाता, समरक़ंद, बुख़ारा और दिल्ली के मदारिस से ऐसे नाबिग़ा-ए-रोज़गार इंसान पैदा होते थे जो महज़ डिग्री-याफ़्ता मुलाज़िम नहीं, बल्कि कायनात के असरार व रुमूज़ को बेनक़ाब करने वाले फ़िलासफ़र, मोजिद और मुहक़्क़िक़ थे। इमाम ग़ज़ालीؒ, इब्न रुश्दؒ, इब्न ख़ल्दूनؒ, शाह वलीउल्लाहؒ और सर सैयद अहमद ख़ानؒ की इल्मी व फ़िक्री अज़मत का राज़ मालूमात के अम्बार में नहीं, बल्कि उनकी फ़िक्र की उस वुसअत में था जो ज़िंदगी और कायनात को अपने दामन में समेट लेती थी। मगर अफ़सोस! सदियों के इस सफ़र में हमने इस अस्ल-ए-असासा को कहीं खो दिया। आज का अलमिया यह है कि गूगल हमारी जेबों में तो मौजूद है लेकिन हिकमत हमारे दिलों से रुख़्सत हो चुकी है। हमारे पास मालूमात के अम्बार हैं मगर फ़िक्री गहराई का क़हत है। हमने ज़ेहनों को अंधा-धुंध मालूमात से भरना तो सीख लिया, मगर शख़्सियतों को तराशना और किरदार को तामीर करना यकसर भुला दिया। आज का हिन्दुस्तान तालीमी निज़ाम के नाम पर एक ऐसी कारगाह में तब्दील हो चुका है जहाँ इंसान नहीं, बल्कि “इम्तिहानी जंगजू” (Exam Warriors) तैयार किए जा रहे हैं। हालिया बरसों में NEET, JEE, CUET, SSC और HSC जैसे क़ौमी सतह के इम्तिहानात के गिर्द पैदा होने वाले पेपर लीक, इम्तिहानी माफ़िया, रिश्वत-स्तानी और संगीन बदउनवानियों के तनाज़आत ने पूरे मुल्क को हिला कर रख दिया है। लेकिन अलमिया देखिए कि हमारा समाज और पॉलिसी साज़ सिर्फ़ इस निज़ाम की ज़ाहिरी शाख़ों पर कुल्हाड़ी चला रहे हैं, कोई भी इस नासूर की अस्ल जड़ तक पहुँचने की ज़हमत नहीं कर रहा। असल बुहरान पेपर लीक होना नहीं है, बल्कि असल बुहरान यह है कि हमारा पूरा तालीमी ढाँचा अपनी रूह से महरूम हो चुका है। हमने तालीम को महज़ “मालूमात की मुन्तक़िली” (Information Transfer) का नाम दे दिया है, जबकि तालीम तो बुनियादी तौर पर “इंसान-साज़ी” (Human Making) का एक मुक़द्दस अमल था। आज एक मासूम बच्चे का पाँच साल की उम्र में स्कूल की दहलीज़ पर क़दम रखते ही बचपन का दायरा तंग कर दिया जाता है। उसके नातवाँ कंधों पर किताबों का भारी बस्ता लाद कर उसे एक ऐसी लामतनाही और अंधी दौड़ में धकेल दिया जाता है जहाँ हर अगला मोड़ पिछले से ज़्यादा बेरहम होता है— प्री-प्राइमरी से प्राइमरी की दौड़, प्राइमरी से सेकेंडरी की मशक़्क़त, सेकेंडरी से जूनियर कॉलेज का तनाव, जूनियर कॉलेज से एंट्रेंस इम्तिहानात के अज़ाब तक और आख़िर में रोज़गार की मंडी में ख़ुद को बेचने का मुक़ाबला। इस पूरी तग़-ओ-दौ में और इस तवील मसाफ़त के किसी भी मोड़ पर कोई हमदर्द उस्ताद या निज़ाम-ए-तालीम इस बच्चे से यह नहीं पूछता कि तुम क्या सोचते हो? तुम्हारे दिल के जज़्बात क्या हैं? तुम्हारे इन्फ़िरादी ख़्वाब क्या हैं? और तुम एक इंसान के तौर पर कैसे बन रहे हो? पूरा निज़ाम-ए-हुकूमत, स्कूल और वालिदैन सिर्फ़ एक ही रट लगाए बैठे हैं कि तुम्हारे परसेंटाइल कितने आए? मेरिट लिस्ट में तुम्हारा रैंक क्या है? यही वह तारीक लम्हा है जहाँ तालीम सिसक-सिसक कर दम तोड़ देती है और “इम्तिहान” एक जल्लाद की तरह ज़िंदा हो जाता है। यही वजह है कि फ़िक्रमंद अज़हान इन इम्तिहानात को समाजी कंट्रोल का हथियार क़रार देते हैं। यह एक ऐसा हथियार है जो लाखों नौजवानों की ज़िंदगी के सबसे ख़ूबसूरत, तख़्लीक़ी और सुनहरे सालों को तीन घंटे के एक बेजान परचे में क़ैद कर देता है। इस इम्तिहानी जुनून का नतीजा यह निकला है कि मुल्क में “कोचिंग इंडस्ट्री” के नाम से एक मुतवाज़ी और ज़ालिमाना तालीमी सल्तनत क़ायम हो चुकी है। करोड़ों रुपये के इस कारोबार में मासूम बच्चों का बचपन फ़रोख़्त हो रहा है, नौजवानों की सलाहियतें गिरवी रखी जा रही हैं, और उनके अछूते ख़्वाब इस मंडी में कौड़ियों के दाम नीलाम हो रहे हैं। फिर जब कोटा (Kota) जैसे तालीमी मराकिज़ से मासूम बच्चों की ख़ुदकुशियों की ख़बरें आती हैं, जब नौजवान नस्ल शदीद डिप्रेशन और ज़ेहनी तनाव का शिकार होकर मौत को गले लगाती है, तो यह समाज हैरत का इज़हार करता है! हम यह क्यों भूल जाते हैं कि हमने उन्हें जीना सिखाया ही कब था? हमने तो उन्हें सिर्फ़ मुक़ाबला करना सिखाया था। हमने उन्हें कामयाबी के तरीक़े तो रटाए, मगर ज़िंदगी का हक़ीक़ी मतलब नहीं बताया। हमने उन्हें नौकरी के लिए तो तैयार किया, मगर एक ज़िम्मेदार शहरी और बाक़िरदार इंसान बनने का गुर नहीं सिखाया। अगर हम ग़ौर व फ़िक्र की आँखों से देखें तो कायनात की कोई भी अज़ीम तब्दीली रट्टे-बाज़ी से नहीं आई। क़ुरआन करीम की आयात-ए-बय्यिनात का एक बड़ा हिस्सा इंसान को बार-बार तदब्बुर, तफ़क्कुर और तअक़्क़ुल की दावत देता है। कलाम-ए-इलाही पुकार-पुकार कर कहता है कि क़ुरआन का तालिब-ए-इल्म वह है जो अंधी तक़लीद नहीं करता, बल्कि कायनात का मुशाहदा करता है, अपने नफ़्स को पढ़ता है, तारीख़ की नब्ज़ पर हाथ रखता है और सवाल पूछता है। अगर तालीम सिर्फ़ तयशुदा निसाब को रट लेने का नाम होती तो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को फ़िरऔन के महल जैसे मुतज़ाद माहौल से इल्म और हिकमत न मिलती। अगर तालीम महज़ तयशुदा मालूमात तक

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मेहनत करे इंसाँ तो क्या हो नहीं सकता!!

जे ई ई एडवांस्ड 2026 के नताइज और नौजवान नस्ल के लिए कामयाबी का मंशूर डॉ. असदुल्लाह ख़ान कुछ नताइज ऐसे होते हैं जो सिर्फ़ चंद तलबा की कामयाबी की दास्तान नहीं सुनाते बल्कि पूरी नौजवान नस्ल के लिए पैग़ाम बन जाते हैं। वह बताते हैं कि ख़्वाब कैसे पूरे होते हैं, मंज़िलें कैसे हासिल की जाती हैं और किन कमज़ोरियों से बचकर इंसान अपनी ज़िंदगी बदल सकता है। वह सिर्फ़ यह नहीं बताते कि कौन कामयाब हुआ, बल्कि यह भी वाज़ेह करते हैं कि कामयाबी तक पहुँचने वालों ने कौन-सी आदतें अपनाईं, किन मुश्किलात का सामना किया और किस तरह अपनी कमज़ोरियों पर क़ाबू पाया। हाल ही में जे ई ई एडवांस्ड 2026 के नताइज का ऐलान हुआ। एक लाख उनासी हज़ार से ज़्यादा तलबा इस इम्तिहान में शरीक हुए। उनमें से तक़रीबन सत्तावन हज़ार तलबा कामयाब क़रार पाए। लेकिन पूरे मुल्क की तवज्जोह तीन नौजवानों पर मर्कूज़ हो गई। शुभम कुमार (AIR-1), कबीर छल्लर (AIR-2) और जातन चाहर (AIR-3)। जब हम उनकी कामयाबियों के पीछे झाँकते हैं तो एक हैरतअंगेज़ हक़ीक़त सामने आती है। उनमें से किसी ने कामयाबी का राज़ ग़ैर-मामूली ज़ेहानत को क़रार नहीं दिया। किसी ने यह नहीं कहा कि वह चौबीस घंटे पढ़ते थे। किसी ने शॉर्टकट, जादुई फ़ॉर्मूला या किसी ख़ुफ़िया तकनीक का ज़िक्र नहीं किया। बल्कि तीनों की ज़बान पर तक़रीबन एक ही पैग़ाम था, Dedication, Discipline and Consistency यानी वाबस्तगी, नज़्म-ओ-ज़ब्त और मुस्तक़िल-मिज़ाजी। यही कामयाबी का अस्ल नुस्ख़ा है। बिहार के एक आम घराने से ताल्लुक़ रखने वाले शुभम कुमार ने 360 में से 330 नंबर हासिल करके पूरे हिंदुस्तान में पहली पोज़िशन हासिल की। उनके वालिद हार्डवेयर की एक छोटी-सी दुकान चलाते हैं। उनके ख़ानदान में इंजीनियर बनने का ख़्वाब अभी पहली नस्ल का ख़्वाब था। शुभम ने एक ऐसी बात कही जो हर तालिबे-इल्म को ज़िंदगी भर याद रखनी चाहिए कि कामयाबी लंबे वक़्त तक पढ़ने में नहीं बल्कि मुस्तक़िल-मिज़ाजी और सीखने के अमल पर एतमाद में है। यह जुमला हमारे पूरे तालीमी निज़ाम के लिए आईना है। कबीर छल्लर ने 329 नंबर हासिल किए। वह सिर्फ़ एक नंबर से पहली पोज़िशन से पीछे रह गए, लेकिन उनकी सोच उन्हें लाखों तलबा से आगे ले गई। उन्होंने कभी नंबरों के पीछे दौड़ने की कोशिश नहीं की। वह Concepts को समझने पर तवज्जोह देते रहे। हर इम्तिहान के बाद अपनी ग़लतियों का तजज़िया करते, कमज़ोरियों की फ़ेहरिस्त बनाते और फिर उन्हें दूर करने पर काम करते। उन्होंने साबित किया कि कामयाब तलबा ग़लतियाँ नहीं छुपाते, बल्कि ग़लतियों से सीखते हैं। जातन चाहर ने सातवीं जमाअत से अपनी इल्मी बुनियादें मज़बूत करना शुरू कर दी थीं। उन्होंने ओलंपियाड्स में हिस्सा लिया। साइंस, फ़लकियात, केमिस्ट्री और दीगर इल्मी सरगर्मियों में ख़ुद को मसरूफ़ रखा। फिर एक मरहले पर वह टाइफ़ॉयड का शिकार हो गए। इम्तिहान छूट गए। क्लासें मुतास्सिर हुईं। मगर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। ख़ानदान और असातिज़ा की हौसला-अफ़ज़ाई के साथ दोबारा खड़े हुए और पूरे हिंदुस्तान में तीसरी पोज़िशन हासिल की। जातन ने बताया कि नाकामी, बीमारी या मुश्किलात कामयाबी की राह बंद नहीं करतीं, हिम्मत हार देना कामयाबी की राह बंद करता है। हमारे तलबा इम्तिहानात में क्यों पीछे रह जाते हैं? बतौर मुअल्लिम चालीस साल से ज़्यादा अरसे के तजुर्बे के बाद मैं पूरे यक़ीन से कह सकता हूँ कि आज के तलबा की सबसे बड़ी कमज़ोरी कम ज़ेहानत नहीं है। बल्कि बे-मक़सद मोबाइल इस्तेमाल, सोशल मीडिया की लत, ग़ैर-मुनज़्ज़म मुतालआ, वक़्त का ज़ियाँ, रट्टे पर इनहिसार, कमज़ोर मुतालआ आदात, नींद की कमी, ख़ुद-एहतिसाबी का फ़ुक़दान और जल्द नताइज हासिल करने की ख़्वाहिश — यह वह ख़ामियाँ हैं जो ज़हीन-तरीन तलबा को भी नाकामी की तरफ़ ले जाती हैं। अब सवाल यह है कि अगर हम वाक़ई अपनी ज़िंदगी बदलना चाहते हैं, बड़ी कामयाबी हासिल करना चाहते हैं तो हम क्या करें? इन टॉपर्स की बातें सुनने के बाद यह समझ में आता है कि हमें कामयाबी के लिए एक लाइह-ए-अमल बनाना होगा। कुछ उसूलों को अपनी ज़िंदगी में इख़्तियार करना होगा, मसलन— १. रोज़ाना के अहदाफ़ मुक़र्रर करें। बिना हदफ़ के पढ़ाई, बिना नक़्शे के सफ़र की तरह है। २. मोबाइल का वक़्त महदूद करें। मुतालआ के दौरान मोबाइल मुकम्मल बंद रखें। ३. ग़लतियों की डायरी बनाएँ। हर इम्तिहान के बाद अपनी ग़लतियाँ लिखें। टॉपर्स यही करते हैं। ४. तमाम Concepts समझें। रट्टा वक़्ती नंबर दिला सकता है, फ़हम ज़िंदगी भर कामयाबी देता है। ५. रोज़ाना Revision करें। पढ़ना ज़रूरी है, मगर दोहराना उससे ज़्यादा ज़रूरी है। ६. अच्छी नींद लें। नींद ज़ाया करना मेहनत नहीं बल्कि नुक़सान है। ७. हल्की जिस्मानी वर्ज़िश करें। सेहतमंद जिस्म ही तवील इल्मी सफ़र बर्दाश्त कर सकता है। ८. असातिज़ा से सवाल पूछें। जो तालिबे-इल्म सवाल पूछने से डरता है, वह सीखने से भी महरूम रह जाता है। ९. मुस्तक़िल-मिज़ाजी अपनाएँ। रोज़ाना दो घंटे की मुस्तक़िल पढ़ाई, दस घंटे की ग़ैर-मुस्तक़िल पढ़ाई से बेहतर है। १०. ख़ुद पर यक़ीन रखें। दुनिया आप पर यक़ीन करे या न करे, आपको ख़ुद पर यक़ीन होना चाहिए। इस मौक़े पर वालिदैन से यह गुज़ारिश करना चाहूँगा कि अपने बच्चों पर सिर्फ़ नंबरों का दबाव न डालें। उनके अंदर सीखने की मुहब्बत पैदा करें। उनका मुक़ाबला दूसरों से न करें। उनकी मेहनत को सराहें। उनकी ग़लतियों पर रहनुमाई करें। उनकी कामयाबी के सफ़र में उनके साथी बनें, जज नहीं। वहीं असातिज़ा से यह इल्तिजा है कि आप सिर्फ़ निसाब मुकम्मल न करें बल्कि तलबा के अंदर ख़्वाब भी पैदा करें। एतमाद पैदा करें। सोचने की सलाहियत पैदा करें। क्योंकि तारीख़ ने साबित किया है कि एक अज़ीम उस्ताद हज़ारों ज़िंदगियाँ बदल सकता है। मेरे अज़ीज़ तलबा! याद रखो! शुभम, कबीर और जातन किसी दूसरे सैयारे से नहीं आए थे। वह भी तुम्हारी तरह आम बच्चे थे। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना था कि उन्होंने अपनी आदतों को ग़ैर-मामूली बना लिया। उन्होंने वक़्त की क़द्र की। उन्होंने मुस्तक़िल-मिज़ाजी इख़्तियार की। उन्होंने अपनी ग़लतियों से सीखा। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और यही चीज़ उन्हें लाखों तलबा से मुमताज़ बना गई। आज अगर तुम मोबाइल के इस्तेमाल को क़ाबू में ले लो, अपनी तवज्जोह को महफ़ूज़ कर लो, अपने वक़्त की हिफ़ाज़त कर लो और रोज़ाना थोड़ा-सा बेहतर बनने का अहद कर लो तो यक़ीन जानो आने वाला हिंदुस्तान

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