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उस्ताद को हक़ीर मत जानो!

एक एंकर के जुमले से उठने वाला तूफ़ान और क़ौम के असल मेमारों का मुक़द्दमा डॉक्टर असदुल्लाह ख़ान कभी कभी एक जुमला सिर्फ़ जुमला नहीं होता, वो एक सोच की नुमाइंदगी करता है। कभी कभी एक तब्सिरा सिर्फ़ एक फ़र्द के ख़िलाफ़ नहीं होता, वो एक पूरे तबक़े के वक़ार को चैलेंज कर देता है, और कभी कभी एक टी.वी. स्टूडियो में बोले गए चंद अल्फ़ाज़ करोड़ों दिलों में इस लिए उतर जाते हैं कि वो महज़ अल्फ़ाज़ नहीं रहते बल्कि एहतिराम और तहक़ीर के दरमियान लकीर खींच देते हैं। गुज़श्ता दिनों मारूफ़ न्यूज़ एंकर अंजना ओम कश्यप के यूट्यूब उस्ताद और ऑनलाइन मुअल्लिमीन के बारे में दिए गए तब्सिरों ने पूरे मुल्क में एक ग़ैर-मामूली बहस को जन्म दिया। मुख़्तलिफ़ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ उन्होंने बाज़ “स्टार टीचर्ज़” को महज़ “एक्सप्लेनर” क़रार देते हुए उन पर व्यूज़, शोहरत और कारोबारी मफ़ादात के हुसूल का इल्ज़ाम आइद किया। उनके इन तब्सिरों के बाद जो रद्द-ए-अमल सामने आया वो सिर्फ़ चंद उस्ताद का रद्द-ए-अमल नहीं था बल्कि लाखों तलबा, वालिदैन, तालीमी हल्क़ों और समाजी मुबस्सिरीन की आवाज़ थी। लेकिन असल सवाल अंजना ओम कश्यप नहीं हैं। असल सवाल ये है कि क्या हम वाक़ई उस्ताद की अज़मत को समझते हैं? उस्ताद को इल्म अता करने वाला कहा गया है, और इस लिहाज़ से देखा जाए तो उस्ताद सिर्फ़ एक पेशा नहीं बल्कि तमाम पेशों की बुनियाद है। इक्कीसवीं सदी में उस्ताद की अहमियत इक्कीसवीं सदी में उस्ताद की अहमियत कम नहीं, कई गुना बढ़ गई है। एक ज़माना था जब उस्ताद मालूमात का वाहिद ज़रिया था। आज गूगल है, यूट्यूब है, मसनूई ज़हानत है, हज़ारों वेबसाइट्स हैं। तो क्या उस्ताद ग़ैर-ज़रूरी हो गया? हरगिज़ नहीं। आज उस्ताद की ज़िम्मेदारी पहले से कहीं ज़्यादा बढ़ गई है क्योंकि आज का मसअला मालूमात की कमी नहीं बल्कि मालूमात का सैलाब है। आज नौजवान के पास मालूमात तो बेशुमार हैं मगर रहनुमाई कम है। आज उस्ताद सिर्फ़ सबक़ नहीं पढ़ाता। वो झूट और सच में फ़र्क़ सिखाता है। वो तन्क़ीदी सोच पैदा करता है। वो जज़्बाती इस्तिहकाम देता है। वो ख़ुद-एतमादी पैदा करता है। वो नाकामी के बाद दोबारा खड़ा होना सिखाता है। गूगल मालूमात दे सकता है, मसनूई ज़हानत जवाब दे सकती है, लेकिन एक शिकस्त-ख़ुर्दा नौजवान के कंधे पर हाथ रख कर ये सिर्फ़ उस्ताद ही कह सकता है “बेटा! तुम एक इम्तिहान में नाकाम हुए हो, ज़िंदगी में नहीं।” यूट्यूब उस्ताद पर एतमाद क्यों? हक़ीक़त ये है कि हिंदुस्तान के तालीमी मंज़रनामे में ऑनलाइन तालीम ने एक ख़ामोश इंक़िलाब बरपा किया है। एक मोतबर अख़बार ने अपने इदारिये में ये सवाल उठाया कि आख़िर लाखों तलबा यूट्यूब उस्ताद पर एतमाद क्यों करते हैं? इसका जवाब सिर्फ़ सब्सक्राइबर्ज़ या व्यूज़ में नहीं बल्कि हिंदुस्तानी तालीम की ज़मीनी हक़ीक़तों में पोशीदा है। कई दहाइयों तक आला मेयार की कोचिंग सिर्फ़ बड़े शहरों और साहिब-ए-इस्तिताअत तबक़े तक महदूद थी। अगर आज एक ग़रीब का नौजवान बग़ैर लाखों रुपये ख़र्च किए मुक़ाबला-जाती इम्तिहानात की तैयारी कर सकता है तो इसमें इन ऑनलाइन उस्ताद का भी किरदार है जिन्होंने इल्म को इमारतों से आज़ाद करके स्क्रीनों तक पहुँचा दिया। क़ौमें टी.आर.पी. से नहीं, उस्ताद से बनती हैं आपने देखा होगा कि टी.वी. मुबाहसे चंद घंटों बाद ख़त्म हो जाते हैं, सोशल मीडिया ट्रेंड चंद दिन बाद मर जाते हैं लेकिन एक उस्ताद का असर नस्लों तक ज़िंदा रहता है। तारीख़ शाहिद है कि जब जापान जंग के बाद तबाह हुआ तो उसने अपने उस्ताद को मरकज़ बनाया। जब सिंगापुर ने तरक़्क़ी की राह इख़्तियार की तो उस्ताद को इज़्ज़त दी। फ़िनलैंड के तालीमी मोजज़े की बुनियाद उस्ताद के मक़ाम पर रखी गई। किसी भी क़ौम के उरूज का रास्ता उसके तालीमी इदारों से गुज़रता है और तालीमी इदारों की रूह उस्ताद होता है। मैडम, आप तन्क़ीद कीजिए, लेकिन तहक़ीर नहीं हम मानते हैं कि हर यूट्यूबर उस्ताद नहीं होता। ये भी दुरुस्त है कि डिजिटल दुनिया में शोहरत, कारोबार और सनसनी-ख़ेज़ी के अनासिर मौजूद हैं। ये भी सही है कि कुछ ऑनलाइन तख़्लीक़-कार तनाज़ुआत और तवज्जोह हासिल करने के लिए इश्तिआल-अंगेज़ मवाद भी इस्तेमाल करते हैं, लेकिन सवाल ये है कि क्या चंद मिसालों की बुनियाद पर पूरे तबक़ा-ए-उस्ताद को मश्कूक क़रार दिया जा सकता है? अगर चंद डॉक्टर ग़लत हों तो क्या पूरी तिब्ब मश्कूक हो जाती है? अगर चंद सहाफ़ी ग़ैर-ज़िम्मेदार हों तो क्या पूरी सहाफ़त पर सवाल उठा दिया जाता है? अगर नहीं, तो फिर चंद मिसालों की बुनियाद पर लाखों मुअल्लिमीन की ख़िदमात को क्यों नज़रअंदाज़ किया जाए? इस तनाज़े का सबसे अहम पहलू वो रद्द-ए-अमल था जो तलबा की जानिब से सामने आया। सोशल मीडिया पर हज़ारों नहीं बल्कि लाखों तलबा ने अपने उस्ताद के हक़ में आवाज़ बुलंद की। किसी ने बताया कि यूट्यूब के एक उस्ताद ने उसे पहली नौकरी दिलाने में मदद की, किसी ने बताया कि वो कोचिंग की भारी फ़ीस अदा नहीं कर सकता था मगर इन्हीं उस्ताद की बदौलत उसने अपनी मंज़िल पाई। मैडम, अपने पैमाने से मत नापिए क्योंकि जिस दिन आप पहली बार क़लम पकड़ कर स्कूल गई थीं, उस दिन आपके सामने भी एक उस्ताद खड़ा था, जिस दिन आपने पहली बार बोलना, लिखना और सोचना सीखा, वहाँ भी एक उस्ताद मौजूद था। जिस दिन आप सहाफ़त की दुनिया में दाख़िल हुईं, उस दिन भी किसी उस्ताद की मेहनत आपके साथ थी। उस्ताद को हक़ीर मत जानो! माना कि दुनिया मसनूई ज़हानत के दौर में दाख़िल हो रही है। मशीनें तेज़ी से सीख रही हैं। टेक्नोलॉजी बदल रही है। तालीम के तरीक़े बदल रहे हैं, लेकिन एक चीज़ आज भी नहीं बदली। क़ौमों का मुस्तक़बिल अब भी उस्ताद के हाथ में है क्योंकि मशीनें मालूमात दे सकती हैं लेकिन किरदार नहीं बना सकतीं। मशीनें हिसाब कर सकती हैं लेकिन ख़्वाब नहीं जगा सकतीं। मशीनें जवाब दे सकती हैं लेकिन उम्मीद नहीं जगा सकतीं। ये काम आज भी सिर्फ़ उस्ताद करता है, और जो क़ौम अपने उस्ताद की इज़्ज़त नहीं करती, वो दरहक़ीक़त अपने मुस्तक़बिल की इज़्ज़त नहीं करती। उस्ताद को हक़ीर मत समझिए, क्योंकि वही वो हस्ती है जो आम इंसानों को ग़ैर-मामूली इंसान बनाती है। आख़िर में सिर्फ़ इतना अर्ज़ करना चाहूँगा कि उस्ताद को महज़ एक पेशा, एक मुलाज़मत

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डिजिटल सराब और नस्ल-ए-नौ का मुस्तक़बिल!!!

उठो! क्या अब भी वक़्त-ए-बेदारी नहीं आया? डॉक्टर असदुल्लाह ख़ान अस्र-ए-हाज़िर का सबसे बड़ा अलमिया ये है कि हमने मादी तरक़्क़ी की चकाचौंध में अपने नौनिहालों के शऊर को एक ऐसे बेरहम और बेलगाम निज़ाम के हवाले कर दिया है, जहाँ उनकी मासूमियत और वक़्त का हर लम्हा बिकाऊ माल बन चुका है। कुआलालंपुर से उठने वाली हालिया क़ानून-साज़ी की लहर—जिसके तहत 16 साल से कम उम्र बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट्स पर क़तई पाबंदी आइद कर दी गई है, महज़ एक इंतिज़ामी फ़ैसला नहीं, बल्कि आलमी सतह पर ज़मीर-ए-इंसानी की बेदारी का एक वाज़ेह ऐलान है। मलेशिया ने ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया की मानिंद मादी मफ़ादात पर इंसानी अक़दार को तरजीह देते हुए ये साबित किया है कि नस्ल-ए-नौ के फ़िक्री तहफ़्फ़ुज़ के लिए सख़्त-तरीन फ़ैसले नागुज़ीर हैं। कहीं बैन-उल-अक़्वामी अख़बार The Korea Times ने सुर्ख़ी लगाई कि मलेशिया का नौ-उम्रों पर सोशल मीडिया अकाउंट बनाने पर पाबंदी का नफ़ाज़ — एशिया में डिजिटल सियानत का नया बाब, तो जर्मनी का आलमी इदारा DW News लिखता है मलेशिया का टेक कंपनियों पर दबाव — 16 साल से कम उम्र बच्चों के अकाउंट्स पर पाबंदी, और इसने नाकामी पर भारी जुर्माने की तफ़सीली रिपोर्ट पेश की। और हमारे यहाँ भी मामला एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहाँ ये सवाल महज़ एक बहस नहीं रहा, बल्कि हमारे घरों का सुलगता हुआ मसअला बन चुका है। इंटरनेट की बेलगाम अर्ज़ानी ने हमारे समाज को शदीद स्क्रीन की लत, साइबर हरासानी और अख़्लाक़ी पसमांदगी की तरफ़ धकेल दिया है। 1- गहरे मुतालए की सलाहियत इंसानी दिमाग़ का वो हिस्सा जो मुस्तक़बिल-बीनी और ज़ब्त-ए-नफ़्स का ज़िम्मेदार है, वो लड़कपन में अभी तश्कीली मराहिल से गुज़र रहा होता है। सोशल मीडिया के लामुतनाही स्क्रॉलिंग और फ़ौरी तस्कीन के मेकानिज़्म ने बच्चों के अंदर गहरे मुतालए और पेचीदा मसाइल को हल करने की सलाहियत को मफ़लूज कर दिया है। क्या हमारी तवज्जोह और गहरे मुतालए की सलाहियत सस्ती मक़बूलियत की नज़्र हो जाएगी? इस ख़लल के ख़ात्मे से ही तलबा के अंदर इल्म की प्यास और फ़िक्री गहराई दोबारा जन्म ले सकेगी। 2- ख़्वाब-ए-ख़रगोश और जिस्मानी तवानाई का तहफ़्फ़ुज़ देर रात तक स्क्रीन की नीली रौशनी का तवाफ़ करना और वर्चुअल दुनिया की सहर-अंगेज़ी में गुम रहना बच्चों की पुर-सुकून नींद का क़त्ल-ए-आम कर रहा है। क्या आधी रात तक स्क्रीन चमकाना नींद और सुकून का क़त्ल नहीं? जब ज़ेहन इस मादी कशिश से आज़ाद होगा, तो न सिर्फ़ जिस्मानी सेहत बहाल होगी बल्कि सुबह के वक़्त क्लासरूम में बेदारी, बेहतरीन याददाश्त और आला तालीमी कारकरदगी के दर वा होंगे। 3- मायूसी के महीब साये और ज़ेहनी दबाव से नजात मौजूदा दौर का तालिब-ए-इल्म किताबी मुक़ाबलों से ज़्यादा “लाइक्स” (Likes) की गिनती और दूसरों की मसनूई ख़ुशहाली के झूटे मुज़ाहरों से ज़ेहनी तनाव का शिकार है। ऐसे वर्चुअल जाल में धँस जाना क़ौमी अलमिए से कम नहीं। मरहला-वार निज़ाम (Graded, Age-Based Framework) ताहम, एक वसीअ और कसीर-उल-सक़ाफ़ती मुल्क होने के नाते, महज़ एक मुतलक़ पाबंदी शायद “ममनूआ फल” की तरह बच्चों को चोरी-छुपे वी.पी.एन. (VPN) और मज़ीद तारीक रास्तों की तरफ़ राग़िब कर दे। लिहाज़ा, वक़्त का तक़ाज़ा है कि हम एक ज़्यादा अमली, मुंसिफ़ाना और मरहला-वार निज़ाम (Graded, Age-Based Framework) वज़ा करें। 8 से 12 साल (सख़्त-तरीन सद्द-ए-बाब और सियानत-ए-मासूमियत) ये उम्र ज़ेहन-ए-इंसानी की वो कच्ची मिट्टी है जहाँ नक़्श-ए-अव्वल क़ायम होता है। इस नाज़ुक मरहले पर तिजारती गिद्धों को बच्चों के मासूम रुझानात की मख़्फ़ी निगरानी (Data Tracking) की क़तई इजाज़त नहीं दी जा सकती। इस दौर में डिजिटल दुनिया तक रसाई सिर्फ़ और सिर्फ़ वालिदैन की हतमी, शऊरी और फ़आल रज़ामंदी से मशरूत होनी चाहिए, और रोज़ाना स्क्रीन के वक़्त (Screen Time) पर एक ऐसा कड़ा और ग़ैर-लचकदार पहरा होना चाहिए जो बचपन के फ़ितरी खेलों और रिश्तों के लम्स को तकनीकी आलूदगी से महफ़ूज़ रख सके। 12 से 16 साल (मशरूत व फ़िल्टर-शुदा रसाई और तहज़ीब-ए-नफ़्स) लड़कपन का ये दौर जज़्बात की तुग़यानी और तजस्सुस की बेबाकी का अहद होता है। यहाँ मुकम्मल ममानिअत अक्सर बग़ावत का सबब बन जाया करती है। इसलिए, यहाँ हिकमत-ए-अमली “मशरूत रसाई” होनी चाहिए। रात के सहर-अंगेज़ और तनहाई के औक़ात में, जब ज़ेहन थकावट के बाइस मग़लूब होता है, तमाम सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्ज़ पर लॉग-इन की मुकम्मल पाबंदी होनी चाहिए। मज़ीद बराँ, अल्गोरिदम के महीब पंजों पर ऐसे सख़्त अख़्लाक़ी और तहज़ीबी फ़िल्टर्ज़ नाफ़िज़ किए जाएँ जो किसी भी क़िस्म के जिन्सी, मुतशद्दिद या फ़िक्री तौर पर गुमराह-कुन मवाद को इन मासूम ज़ेहनों की दहलीज़ तक पहुँचने से पहले ही नेस्त-ओ-नाबूद कर दें। 16 से 18 साल (निगरानी के साथ ख़ुदमुख़्तारी और तामीर-ए-शख़्सियत) ये सिन-ए-बुलूग़त की वो मंज़िल है जहाँ परिंदे अपनी उड़ान का दायरा ख़ुद तय करना चाहते हैं। चुनाँचे, यहाँ हद से ज़्यादा सख़्ती शख़्सियत को मस्ख़ कर सकती है। इस उम्र में नौ-उम्रों को प्लेटफ़ॉर्म के इस्तेमाल की बज़ाहिर आज़ादी तो दी जाए, लेकिन पस-ए-पर्दा रियासत के साइबर तहफ़्फ़ुज़, सख़्त-तरीन एंटी-हरासमेंट गार्ड रेल्स और तादीबी क़वानीन का ऐसा मुस्तहकम साया मौजूद हो जो उन्हें किसी भी मुमकिना ब्लैकमेलिंग, डीपफ़ेक या ऑनलाइन इस्तिहसाल से फ़ौलादी ढाल फ़राहम कर सके। हमें ये हक़ीक़त रोज़-ए-रौशन की तरह तस्लीम करनी होगी कि नस्ल-ए-नौ और सरमाया-ए-मिल्लत की हक़ीक़ी तर्बियत महज़ निसाबी किताबों के चंद ख़ुश्क सफ़हात की मरहून-ए-मिन्नत नहीं होती। इल्म तो सिर्फ़ रौशनी दिखाता है, लेकिन इस रौशनी को मुस्तक़िल शोला बनाने के लिए एक पुर-सुकून, साज़गार और पाकीज़ा ख़ानदानी व समाजी माहौल की ज़रूरत होती है। आज जब हम एक नाज़ुक-तरीन दोराहे पर खड़े हैं, तो हमें मस्लहतों के नक़ाब उलट कर ख़ुद से, अपने दिल से और अपनी तहज़ीब से ये तल्ख़ सवाल पूछना होगा कि: क्या हम वाक़ई इतने बेबस और बेहिस हो चुके हैं कि अपने बच्चों के मासूम बचपन, उनकी ज़ेहनी परवाज़ और उनके दरख़शाँ मुस्तक़बिल को चंद मल्टीनेशनल कंपनियों के हवाले कर दें? हमें ये फ़ैसला करना होगा कि हमारे बच्चों की फ़िक्री तहारत और उनका ज़ेहनी सुकून किसी कॉर्पोरेट मुनाफ़े का मदफ़न नहीं बन सकता। हमें टेक्नोलॉजी को इंसानी तरक़्क़ी का ज़ीना बनाना है, मासूमियत का जल्लाद नहीं! हमें हर क़ीमत पर अपने नौनिहालों को इस वर्चुअल क़ैद और डिजिटल असारत से रिहा कराना ही होगा। याद रहे कि खिलौने छीन कर इन मासूम हाथों में स्क्रीन हरगिज़ ना

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छुट्टियों की नई सरमायाकारी: अस्र-ए-हाज़िर के तक़ाज़े और नई जिहतें

डॉक्टर असद अल्लाह ख़ान (मुंबई) छुट्टियों के ये सत्तर-अस्सी दिन अब महज़ “आराम का वक़्त” नहीं, बल्कि ज़िंदगी, शख़्सियत और करियर की री-स्ट्रक्चरिंग का एक सुनहरा-तरीन मौक़ा हैं। सवाल ये है कि हम इस वक़्त को स्क्रीन की नज़्र करेंगे या इसे कुंदन बनने की भट्टी बनाएँगे? बीस साल पहले का रिवायती दौर तक़रीबन दो दहाइयाँ क़ब्ल, जब तालीमी निज़ाम और समाजी साख़्त एक मुख़्तलिफ़ नहज पर थी, तब भी इस बात पर गहरा अफ़सोस ज़ाहिर किया जाता था कि मैट्रिक और इंटर के इम्तिहानात के बाद तलबा के क़ीमती औक़ात को किस तरह ज़ाया किया जाता है। बीस-तीस साल पहले के इस रिवायती दौर में एक बड़ा अलमिया ये था कि इम्तिहानात से फ़ारिग़ होते ही ज़हीन बच्चों को स्कूलों में बुला कर इम्तिहानी पर्चों की जाँच (Paper Checking) के ग़ैर-क़ानूनी और ग़ैर-अख़्लाक़ी काम में झोंक दिया जाता था। नाम-निहाद उस्ताद अपनी बोरियत और बेगार टालने के लिए बच्चों के मुस्तक़बिल और अख़्लाक़ियात को दाँव पर लगा देते थे, और मासूम तलबा इस फ़र्सूदा अमल को “ख़िदमत” समझ कर अपने सत्तर-अस्सी दिन ज़ाया कर देते थे। बीस-तीस साल पहले का वो दौर सिर्फ़ खेल-कूद, रिवायती मुतालए, समर इस्लामिक कोर्सेज़, मादरी ज़बान पर उबूर और बैंक या पोस्ट ऑफ़िस के लिए रिवायती मशवरों पर इंहिसार था, लेकिन आज आपके पास साइंसी और डिजिटल टूल्स मौजूद हैं। 1। अपने रुझान की पहचान इन छुट्टियों में सबसे पहले साइकोमेट्रिक टेस्ट (Psychometric Tests) और प्रोफ़ेशनल काउंसलिंग के ज़रिये अपने रुझान (Aptitude) और रवैये (Attitude) की पहचान करें। आज का दौर सिर्फ़ रिवायती पेशों (डॉक्टर, इंजीनियर) का नहीं है। इन छुट्टियों में डिजिटल मार्केटिंग, डेटा साइंस, बिज़नेस एनालिटिक्स, और न्यू मीडिया जैसे जदीद शोबों की बुनियादी मालूमात हासिल करें। माहिरीन से सिर्फ़ मिलना काफ़ी नहीं, बल्कि LinkedIn जैसे प्लेटफ़ॉर्म्ज़ के ज़रिये दुनिया भर के प्रोफ़ेशनल्ज़ से जुड़ें और उनके तजरबात से सीखें। 2। डिजिटल और फ़्यूचर स्किल्स (Future-Proof Skill Development) आज के दौर में सबसे बड़ी सरमायाकारी “स्किल डेवलपमेंट” है। अगर आपके पास डिग्री है लेकिन हुनर नहीं, तो आप इस मुसाबक़ती दौर में पीछे रह जाएँगे। इन छुट्टियों में ये कोर्सेज़ आपकी तरजीह होनी चाहिए: तकनीकी महारतें (Hard Skills): कोडिंग, पाइथन (Python), ग्राफ़िक डिज़ाइनिंग, वीडियो एडिटिंग, या प्रॉम्प्ट इंजीनियरिंग (Prompt Engineering) की बुनियादी बातें सीखें। शख़्सियती और फ़िक्री महारतें (Soft Skills): वक़्त की पाबंदी, तन्क़ीदी सोच और मसअला-हल करने की सलाहियत पैदा करें। 3। ग्लोबल कम्युनिकेशन और बैन-उल-अक़्वामी ज़बानें बीस साल पहले मादरी ज़बान और बुनियादी अंग्रेज़ी पर ज़ोर था, जो आज भी अहम है, लेकिन आज का दौर “ग्लोबल विलेज” का है। अंग्रेज़ी अब सिर्फ़ एक ज़बान नहीं बल्कि एक ज़रूरत बन चुकी है; इसके साथ कोई और बैन-उल-अक़्वामी ज़बान सीखना आपके मवाक़े और बढ़ा देगा। 4। फ़िक्री पुख़्तगी और अस्री इस्लामी फ़िक्र (Holistic Contemporary Islamic Vision) बदलते दौर में जहाँ इल्हाद (Atheism) और फ़िक्री इंतिशार की आँधियाँ चल रही हैं, नौजवानों के लिए अपने दीन की बुनियादी और अस्री मालूमात हासिल करना सबसे मज़बूत ढाल है। समर इस्लामिक कोर्सेज़ की अहमियत आज पहले से कहीं ज़्यादा है। लेकिन अब हमें रिवायती मालूमात से आगे बढ़ कर इस्लाम के निज़ाम-ए-हयात, इस्लामी मईशियात, और जदीद साइंसी चैलेंजेज़ के तनाज़ुर में दीन को समझना होगा। सीरत-ए-नबवी ﷺ और सीरत-ए-सहाबा रज़ि. के मुतालए से लीडरशिप स्किल्स (Leadership Skills) और बोहरानों से निपटने की हिकमत-ए-अमली (Crisis Management) सीखें, ताकि आपका किरदार सोसाइटी के लिए एक रोल मॉडल बन सके। 5। मालियाती ख़्वांदगी और जदीद निज़ाम से वाक़फ़ियत (Financial Literacy & Digital Ecosystem) बीस साल पहले पोस्ट ऑफ़िस और बैंक जाना सिखाया जाता था, मगर आज का दौर डिजिटल बैंकिंग, यू.पी.आई. (UPI), और फ़िनटेक (FinTech) का है। इन छुट्टियों में मालियाती ख़्वांदगी (Financial Literacy) सीखें। बजट बनाना, बचत करना, और सरमायाकारी के बुनियादी उसूल (मसलन स्टॉक मार्केट, म्यूचुअल फ़ंड्स, और टैक्सेशन का बुनियादी इल्म) हासिल करें। हुकूमती पोर्टल्ज़, डिजिटल दस्तख़त (Digital Signatures), और ई-गवर्नेंस के निज़ाम को समझें ताकि आप एक ज़िम्मेदार और बाशऊर शहरी बन सकें। जेब में धड़कता दुश्मन मेरे अज़ीज़ो! ज़रा रुक कर सोचो… हमारे दौर में अस्लाफ़ कहते थे कि “ख़ाली दिमाग़ शैतान का कारख़ाना होता है”। तब ख़दशा सिर्फ़ इतना था कि कोई नौजवान तनहाई में बैठ कर ख़याली पुलाव पकाएगा, खुली आँखों से कुछ अधूरे ख़्वाब देखेगा और बस! लेकिन आज? आज का ख़तरा उस पुराने दौर से हज़ार गुना ज़्यादा हौलनाक, मक्कार और सहर-अंगेज़ है! आज वो कारख़ाना कहीं बाहर नहीं, बल्कि आपकी जेब में धड़कते मोबाइल फ़ोन में मौजूद है। अगर आपने वक़्त की इस लहर को लगाम न दी… तो याद रखिए, ये स्क्रीन एडिक्शन (Screen Addiction) आपकी सोचने की सकत को चाट जाएगा! ये आपकी तवज्जोह की सलाहियत (Attention Span) को इस तरह राख कर देगा कि आप किताब का एक सफ़ा पढ़ने के लिए भी तरसेंगे। ये सुस्ती, ये बेमक़सदियत, और ये लामुतनाही स्क्रॉलिंग इंसान को गोश्त-पोस्त का इंसान नहीं रहने देती, बल्कि एक “डिजिटल ज़िंदा लाश” में तब्दील कर देती है! एक ऐसी लाश जिसका न कोई मक़सद-ए-हयात होता है, न कोई मंज़िल, और न कोई तड़प। क्या आप अपनी जवानी को इस बेरहम स्क्रीन के पिक्सल्ज़ (Pixels) की नज़्र करके एक गुमनाम मौत मरना चाहते हैं? उठिए! कुंदन बनिए नहीं! हरगिज़ नहीं! उठिए और अपने गिरेबान में झाँक कर अपने लहू की गर्मी को पहचानिए। हम मिट्टी के वो ढेर नहीं जो वक़्त के बहाव के साथ बह जाएँ। हम तो एक अज़ीम और लाज़वाल तारीख़ के अमीन हैं! हम कायनात का सबसे वाज़ेह, सबसे ख़ूबसूरत और सबसे जानदार तसव्वुर-ए-हयात रखने वाली उम्मत के फ़रज़ंद हैं! तफ़रीह ज़रूर कीजिए, लेकिन वो तफ़रीह आपके आसाब को तोड़ने वाली न हो बल्कि आपकी रूह को ताज़गी देने वाली हो। आगे बढ़िए! अपनी पोशीदा सलाहियतों को छुट्टियों के इस तपते हुए ईंधन में झोंक दीजिए। इस वक़्त को वो भट्टी बनाइए जहाँ तप कर आप सोना नहीं, बल्कि “कुंदन” बन कर निकलें! उठिए! कि वक़्त आपके अज़्म का मुंतज़िर है। (इंशा अल्लाह) डॉक्टर असद अल्लाह ख़ान Asadullahkhanschoolasadullahkhanschool.org

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तालीम की हक़ीक़ी रूह??? — The True Spirit of Education

डॉक्टर असद अल्लाह ख़ान क्या हिंदुस्तान सलाहियतों के मामले में क़हत-उल-रिजाल से गुज़र रहा है? क्या अब नेहरू या गांधी, टैगोर या विवेकानंद जैसी कोई अब्क़री शख़्सियत इस सरज़मीन पर जन्म नहीं लेगी? ये सवाल महज़ सवाल नहीं, एक तहज़ीब की चीख़ है। सवालात की लहरें क्या अब टैगोर या विवेकानंद जैसा कोई फ़लसफ़ी इस भारत वर्ष में जन्म नहीं लेगा? क्या क़ारी मोहम्मद तय्यब, मौलाना अबुल आला मौदूदी, मौलाना अहमद रज़ा ख़ाँ, मौलाना अशरफ़ अली थानवी, मौलाना अबुल हसन अली नदवी, मौलाना मोहम्मद अली जौहर, मौलाना शौकत अली, सर सय्यद अहमद ख़ान, सर रास मसूद और हकीम अब्दुल हमीद जैसी अज़ीम शख़्सियात से ये सरज़मीन ख़ाली रहेगी? क्या अब रामानुजम, डॉक्टर होमी भाभा, डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन, डॉक्टर राधाकृष्णन और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसी शख़्सियात नहीं पैदा होंगी? जब इन सवालात के कंकरों से ख़यालात की सिमटती फैलती लहरों में इर्तिआश पैदा किया गया तो सोच की लहरें वसीअ-तर होती चली गईं। ये लहरें चौंका देने वाली भी थीं और डरा देने वाली भी। ज़ेहन को सोच पर उभारने वाले और दिमाग़ पर बार-बार कचोके लगाने वाले इन सवालात की ये लहरें हस्सास ज़ेहनों को परेशानी में मुब्तला कर देती हैं। बेमक़सद तालीम का तसव्वुर… तहज़ीब-ओ-तमद्दुन के नाम पर उर्यानियत… इल्म-ओ-तअल्लुम के नाम पर फ़हाशी व बेहयाई की तरग़ीब… मेहनत-ओ-मशक़्क़त के तसव्वुर से ख़ाली बेमक़सद ज़िंदगियाँ… और दूसरी तरफ़… शोर-ओ-ग़ुल, हंगामे, हड़तालें, बंद, तोड़फोड़, फ़सादात, मारधाड़, ग़ुंडागर्दी, एनकाउंटर? इनमें से क्या नहीं है हमारे अतराफ़, हमारे घरों में, हमारे कॉलेजों और कैंपस के दामन में? क्या दर्स पा रही हैं इनसे हमारी नई और आइंदा नस्लें? ऐसे हालात में कहाँ से मिलेंगे वो फ़लसफ़ियाना अज़हान? कहाँ से मिलेंगी वो रहनुमायाना क़ाबिलियतें? कहाँ से उभरेंगी वो अब्क़री शख़्सियतें? कहाँ से आएँगी वो दानिशवराना सलाहियतें? नौजवानों का तसव्वुर-ए-हयात क्या है हमारे नौजवानों का तसव्वुर-ए-हयात? यही ना… कि वो बहुत जल्दी बहुत ही अमीर बन जाना चाहते हैं। ये मिनटों और सेकंडों में बग़ैर किसी मेहनत-ओ-जद्दोजहद के लाखों और करोड़ों के ख़्वाब देखते हैं। ये अपनी ख़याली दुनिया में आलीशान बंगले, गाड़ियाँ, होटल-बाज़ी, अय्याशी, यार-बाशी, क़ुमार-बाज़ी और मय-नोशी के सपने बुनते हैं। पुर-तअय्युश ज़िंदगी का तसव्वुर उनके रग-ओ-पय में सरायत कर चुका है। घर-घर पहुँचती मग़रिबी तहज़ीब से मुतअस्सिर उनके अज़हान मग़रिबज़दा तख़रीब का शिकार होते जा रहे हैं, और हमारी ख़ामोशी इस बढ़ते नज़रिये पर तौसीक़ की मोहर सब्त करती है। मख़्लूत तालीम के नाम पर आइए देखें राधाकृष्णन! अपने ख़्वाबों के हिंदुस्तान को जिन तालीमी तब्दीलियों के वो ख़्वाहाँ थे हम उनमें कहाँ तक कामयाब हो पाए हैं? मख़्लूत तालीम (Co-education) के नाम पर खुलम-खुला मिलाप… फिर हँसी-मज़ाक़… मर्द-ओ-ज़न के हम-आहंग क़हक़हे… दोस्ती के नाम पर हाथों का काँधों तक पहुँचना… पार्कों में सजावट बनना… रेस्तराँ में पुर-तकल्लुफ़ शामों की ख़्वाहिश… और फिर तनहाई की माँग… हम कितना आगे निकल आए हैं? कौन कहता है कि हिंदुस्तान ग़रीब मुल्क है। आइए देखें ग़रीबी हटाओ का ख़्वाब देखने वाले कि किस तरह कॉलेज जाने वाले बच्चे बेजा अख़राजात और इसराफ़ के ज़रिये अपनी अय्याशी का बिल अपने माँ-बाप के काँधों पर रख रहे हैं? दिखावा, नुमूद, नुमाइश के दलदल में कैसे धँसते जा रहे हैं? सिन्फ़-ए-मुख़ालिफ़ (Opposite Sex) से दोस्ती का ये कल्चर इतना तरक़्क़ी पा चुका है कि अब एक से ज़ाइद गर्लफ़्रेंड या बॉयफ़्रेंड रखना बाइस-ए-इज़्ज़त-ओ-इफ़्तिख़ार समझा जा रहा है। पुराने कपड़ों की तरह दोस्त बदलने का ये माहौल आख़िर किस कल्चर को फ़रोग़ दे रहा है। Rose day, Valentine day, Saree day, Tie day, Traditional day जैसे रंग-बिरंगे दिनों के इस सैलाब में हमारी नई नस्ल बहती चली जा रही है। किताबों से बेज़ारी क्योंकि अब किताबें दोस्त, साथी या हमदम-ओ-रफ़ीक़ नहीं रहीं बल्कि अब तो वो सिर्फ़ नशिस्तों और गद्दों का काम देती हैं। अब किताबों और उनके मज़ामीन पर इल्मी तब्सिरे और मुबाहसे नहीं होते बल्कि अब बेतुकी और घटिया बातों पर ला-यानी तब्सिरों और उनके इख़्तिताम पर बेढंगे क़हक़हों ने उनकी जगह ले ली है। हमारी इस Fast food Generation को किताबें खंगालने से कोई दिलचस्पी नहीं है। इन्हें तो Ready made material की लत लग चुकी है। और दूसरी तरफ़ जब बाज़ार में मौजूद घटिया क़िस्म की सस्ती किताबें इम्तिहानी ज़रूरतों को पूरा कर रही हैं तो हुसूल-ए-इल्म के लिए सर खपाने की फ़िक्र किसे हो सकती है? और अगर इससे भी बात न बने तो इम्तिहानी पर्चे को क़ब्ल-अज़-वक़्त ज़ाहिर करवा लेने का इंतिज़ाम कीजिए, अगर इस पर भी बात न बने तो इम्तिहानी मरकज़ पर नक़ल का सहारा मयस्सर कराया जा सकता है, और अगर इस पर भी बात न बने तो इम्तिहान के बाद पर्चा जाँचने वाले के घर जा कर जोड़तोड़ कीजिए। ये हैं ऊँची से ऊँची डिग्री हासिल करने के आसान मदारिज! रोल मॉडल का बोहरान टैगोर और आज़ाद को अपना रोल मॉडल मान कर बहर-उल-उलूम से सेराब होने की फ़िक्र अब किसे है? और हो भी कैसे सकती है जब उनके रोल मॉडल तो वो फ़िल्मी सितारे हैं जिनकी नक़ल में वक़्त और सरमाया दोनों ज़ाया किए जा रहे हैं। कैसी बेशर्मी है कि ग्यारहवीं जमात में पढ़ने वाली लड़की माँ की मौजूदगी में अपनी पसंद के फ़िल्मी अदाकार के लिए कुछ भी कर डालने का दावा कर रही है। ऐसे ही माहौल में तर्बियत पा कर स्कूलों और कॉलेजों की दहलीज़ें पार करने वाली लड़कियों के करतूत देख कर शरीफ़ घरानों के लोग हैरत-ओ-इस्तेजाब के समंदर में ग़र्क़ हो जाते हैं। बेहिस्सी की चादर ऐसे पुर-फ़ितन हालात में भी हम बेहिस्सी की चादर ताने ग़फ़लत में पड़े हुए हैं और इसी लिए अब हम तैयार हैं इसके नतायज भुगतने के लिए जो सामने आते जा रहे हैं। हम तो इतने बेहिस होते जा रहे हैं कि अब आए दिन अपने समाज में बढ़ती बेराह-रवी को आम होते देख कर भी नहीं शरमाते। इसे ज़िंदगी का हिस्सा समझा जाने लगा है। ऐसे हालात में क्या हम ये समझें कि अब यही हमारा कल्चर है, यही हमारी तहज़ीब है, यही हमारी सभ्यता है? आवाज़ उठाइए तालीमी बेदारी के अलमबरदारों को जगाइए और पूछिए उनसे कि क्या इसी माहौल का ईंधन बनाने के लिए हम अपने जिगर-गोशों को मैदान-ए-तालीम में आगे बढ़ाएँ? अरे साहब! अगर बुराई के इस माहौल को ख़त्म कर देने की सलाहियत आप में नहीं है

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ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शब-गज़ीदा सहर… तालीमी निज़ाम में नक़ब-ज़नी की अंदरूनी कहानी

डॉक्टर असदुल्लाह ख़ान (मुंबई) हिंदुस्तान में क़ाबिलियत और मेरिट की बालादस्ती का जो भरम बरसों से क़ायम था, वो अब मुकम्मल तौर पर चकनाचूर हो चुका है। जो बातें कभी कोचिंग सेंटर्ज़ की बंद गलियों में सरगोशियों की सूरत में सुनी जाती थीं, अब मरकज़ी तहक़ीक़ाती इदारे (CBI) ने उन्हें पूरी दुनिया के सामने बेनक़ाब कर दिया है। क़ौमी अहलियत व दाख़िला टेस्ट (NEET-UG 2026) अब ज़हानत, मेहनत और रातों की बेदारी का इम्तिहान नहीं रहा, बल्कि ये एक ऐसी खुली नीलामी बन चुका है जहाँ मुस्तक़बिल के डॉक्टरों ने अपनी डिग्रियाँ और स्टेथोस्कोप (Stethoscopes) मेहनत से नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये नक़द दे कर ख़रीदे। लातूर का गठजोड़ — दो मरकज़ी किरदार इस मुनज़्ज़म और शर्मनाक घपले के पीछे महाराष्ट्र में कोचिंग के सबसे बड़े गढ़, लातूर का एक ख़तरनाक गठजोड़ काम कर रहा था। इस गैंग के दो मरकज़ी किरदार हैं — पहला श्री पी. वी. कुलकर्णी (NTA का साबिक़ इनसाइडर और रिटायर्ड केमिस्ट्री प्रोफ़ेसर) और दूसरा शिवराज मोटीगाँवकर (रीनाकाई केमिस्ट्री क्लासेज़ — RCC का अरबपति मालिक)। इस साज़िश के तरीक़ा-कार ने हमारे पूरे इम्तिहानी ढाँचे की कमज़ोरियों को नंगा कर दिया है। पी. वी. कुलकर्णी कोई आम दलाल नहीं था; उसने अपने चुनिंदा तलबा को एक बंद कमरे में जमा किया, जहाँ उनके मोबाइल फ़ोन ज़ब्त कर लिए गए (ताकि कोई तस्वीर खींच कर सोशल मीडिया पर वायरल न कर दे)। कुलकर्णी ने ख़ुद एक एक सवाल, उसके चारों ऑप्शन्ज़ और दुरुस्त जवाबात (Answer Keys) तलबा को ज़बानी लिखवाए। बच्चों ने उन्हें सादा नोटबुक्स पर अपने हाथ से लिखा। सी.बी.आई. ने बाद में यही नोटबुक्स बरामद कीं, जिनके सवालात NTA के असल पेपर से 100 फ़ीसद मैच कर रहे थे। अवाम के लिए “गेस पेपर” का ड्रामा — The Mass Track दूसरी तरफ़ एक ड्रामा रचा गया जिसमें अवाम के लिए “गेस पेपर” का खेल था। यहीं से शिवराज मोटीगाँवकर और उसके इदारे “RCC” का गंदा खेल शुरू होता है। मोटीगाँवकर और कुलकर्णी पुराने वाक़िफ़कार थे, लेकिन माज़ी में उनके दरमियान शदीद कारोबारी दुश्मनी थी। मगर इस बार, करोड़ों रुपये कमाने के लिए दोनों ने पुरानी दुश्मनी भुला कर हाथ मिला लिया। मोटीगाँवकर ने इस चोरी-शुदा पेपर को बराह-ए-रास्त बाँटने के बजाय, इसके 42 बिल्कुल असल सवालात को अपने कोचिंग इंस्टिट्यूट के आख़िरी “मॉक टेस्ट” (Mock Test) में शामिल कर दिया। उसने अपने हज़ारों तलबा को बताया कि ये उसकी “बरसों की महारत और पेशगोई” का नतीजा है। मक़सद ये था कि जब असल इम्तिहान में यही सवालात आएँ, तो उसके इदारे का “नतीजा” शानदार दिखे और अगले साल और ज़्यादा बच्चे उसकी मोटी फ़ीस अदा करके दाख़िला लें। क़ीमत — करोड़ों की बोली सी.बी.आई. के छापों में एक तरफ़ ये भी सामने आया कि लातूर के एक नामवर ताजिर के घर पर छापा मारा गया जिसने अपनी बेटी के लिए 5 लाख रुपये नक़द दिए थे। जबकि राजस्थान के सीकर (Sikar) और जयपुर में एक एक पेपर की क़ीमत 10 से 15 लाख रुपये वसूल की जा रही थी। सी.बी.आई. ने अब तक जयपुर, सीकर, गुरुग्राम, नासिक, पुणे और अहिल्या नगर से 9 कलीदी मुलज़िमान को गिरफ़्तार किया है, जो इस इम्तिहानी चोरी को एक कॉर्पोरेट बिज़नेस की तरह चला रहे थे। 24 लाख ख़्वाबों का इज्तिमाई क़त्ल इस बदउनवान और ग़लीज़ निज़ाम का सबसे बड़ा और दर्दनाक ख़मियाज़ा मुल्क के मासूम और मेहनती तलबा को भुगतना पड़ा। जब पेपर बड़े पैमाने पर लीक हुआ, तो हुकूमत को मजबूरन 12 मई को ये इम्तिहान मंसूख़ करना पड़ा और अब दोबारा इम्तिहान (Re-exam) लेने का ऐलान किया गया है। 24 लाख तलबा का मुस्तक़बिल दाँव पर लगा दिया गया। मुल्क भर के 24 लाख से ज़ाइद मेडिकल के ख़्वाहिशमंद तलबा, जिन्होंने दिन रात एक करके पढ़ाई की थी, आज ज़ेहनी अज़ियत का शिकार हैं। ग़रीब ख़ानदानों पर मआशी बोझ अलग पड़ा। दोबारा इम्तिहान देने के लिए लाखों ग़रीब और मुतवस्सित तबक़े के ख़ानदानों को दोबारा सफ़र, होटल और ट्रांसपोर्ट के अख़राजात बर्दाश्त करने पड़ रहे हैं, जिनकी जेबें पहले ही ख़ाली हो चुकी हैं। एक ईमानदार बच्चे को बार-बार यही समझाया जाता है कि “अगर मैं मेहनत करूँगा, तो मुझे मेरा हक़ मिलेगा।” लेकिन ये उम्मीद एक धोका है! ये एक ऐसा जाल है जिसमें ईमानदार बच्चों को सिर्फ़ उलझाए रखा जाता है, जबकि मेडिकल की असल सीटें पुणे के बंद कमरों और लातूर के लग्ज़री कोचिंग सेंटर्ज़ में पहले ही फ़रोख़्त हो चुकी होती हैं। कुलकर्णी और मोटीगाँवकर जैसे लोग उस्ताद नहीं, तालीमी माफ़िया के सरग़ना हैं। उन्होंने लाखों बच्चों के ख़ून-पसीने और उनके आँसुओं पर अपनी तिजोरियाँ भरीं। जब एक किसान का बेटा गाँव की मद्धम रौशनी में केमिस्ट्री के फ़ार्मूले रट रहा था, उस वक़्त एक अमीर डॉक्टर का बेटा पुणे के एक बंगले में चाय की चुस्कियाँ लेते हुए असल इम्तिहानी पेपर अपनी कॉपी में उतार रहा था। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) एक नाकाम और खोखला इदारा बन चुकी है, जिसे चंद लालची दलाल जब चाहें अपने इशारों पर नचा सकते हैं। सिर्फ़ सी.बी.आई. की इन्क्वायरी बिठा देना या अगले साल से कंप्यूटर पर टेस्ट ले लेना इस कैंसर का इलाज नहीं है। वक़्त आ गया है कि इस सरमायादाराना कोचिंग कल्चर को जड़ से उखाड़ फेंका जाए जिसने तालीम को एक मंडी बना दिया है। अगर ये हुकूमत और ये निज़ाम बच्चों के लिए एक इम्तिहानी पेपर की हिफ़ाज़त नहीं कर सकता—तो हम इसे एक ख़ुदकुशी कहेंगे, या इस करप्ट तालीमी निज़ाम के हाथों एक एलानिया क़त्ल? पेपर ख़रीदने वाले अमीर डॉक्टरों और सरमायादारों से: जब आपके बच्चे चोरी के पेपर्ज़ और बैसाखियों के सहारे डॉक्टर बनेंगे, तो वो कल हस्पतालों में मरीज़ों का इलाज करेंगे या इंसानी जानों का सौदा करके इस चोरी की क़ीमत वसूल करेंगे? अगर इस मुल्क में एक ग़रीब का बच्चा अपनी क़ाबिलियत, दिन रात की मेहनत और ईमानदारी के बलबूते पर एक मुअज़्ज़ज़ पेशा इख़्तियार नहीं कर सकता, तो फिर ये “बराबरी और मेरिट” का आईनी वादा सिर्फ़ किताबों की ज़ीनत क्यों है? क्या अब क़ाबिलियत का मेयार सिर्फ़ और सिर्फ़ बैंक बैलेंस रह गया है? — डॉक्टर असदुल्लाह ख़ान, मुंबई Asadullahkhanschoolasadullahkhanschool.org

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ख़ामोश इर्तिक़ा या डूबता हुआ मुस्तक़बिल… ख़लील-ए-वक़्त! तेरी ख़ामोशी देखी नहीं जाती

डॉक्टर असद अल्लाह ख़ान (मुंबई) — 09967893333 तालीम सिर्फ़ किताब, क्लासरूम और इम्तिहान का नाम नहीं; तालीम वो चराग़ है जिससे क़ौमें अपना रास्ता पहचानती हैं, वो आईना है जिसमें तहज़ीब अपना चेहरा देखती है, और वो तराज़ू है जिस पर मुआशरे के शऊर, किरदार और मुस्तक़बिल का वज़न किया जाता है। इम्तिहानी नतायज महज़ नंबर नहीं होते, ये नस्लों की सम्त, घरों की तरजीहात, वालिदैन की फ़िक्र, बच्चों की नफ़सियात और समाज की ख़ामोश तब्दीलियों का ऐलान होते हैं। मार्कशीट एक काग़ज़ ज़रूर है, मगर कभी कभी यही काग़ज़ पूरी तहज़ीब का समाजी एक्सरे बन जाता है। एक मानी-ख़ेज़ मंज़र — बेटियाँ आगे, बेटे कहाँ? आज हिंदुस्तान के तालीमी उफ़ुक़ पर एक निहायत मानी-ख़ेज़ मंज़र उभर रहा है। हमारी बेटियाँ मुसलसल आगे बढ़ रही हैं, कामयाबी के ज़ीने तय कर रही हैं, बोर्ड इम्तिहानात में नुमायाँ मक़ाम हासिल कर रही हैं, और अपनी मेहनत, नज़्म-ओ-ज़ब्त, इस्तिक़ामत और ख़ुद-एतमादी से ये साबित कर रही हैं कि जब लड़की को मौक़ा मिलता है तो वो सिर्फ़ अपना नहीं, पूरे ख़ानदान और मुआशरे का मुस्तक़बिल रौशन कर सकती है। लेकिन इसी रौशन मंज़र के पस-मंज़र में एक गहरा सवाल भी सर उठा रहा है: हमारे बेटे कहाँ जा रहे हैं? आदाद के पर्दे के पीछे एक और दास्तान भी लिखी जा रही है — एक ख़ामोश मगर मुसलसल बढ़ती हुई ख़लीज की दास्तान। हर साल तालिबात, तलबा से आगे निकल रही हैं। कभी तीन फ़ीसद, कभी चार, कभी छह फ़ीसद। ये फ़र्क़ मामूली नहीं। ये महज़ इम्तिहानी बरतरी नहीं, बल्कि नफ़सियाती, समाजी, तहज़ीबी और फ़िक्री तब्दीली का इस्तिआरा है। ये नतायज अपनी ज़बान-ए-हाल से पुकार पुकार कर कह रहे हैं कि हमारी बेटियाँ वक़्त की रफ़्तार को समझ चुकी हैं। वो जान चुकी हैं कि तालीम सिर्फ़ नंबर लेने का अमल नहीं बल्कि अपनी शनाख़्त, ख़ुदमुख़्तारी, इज़्ज़त और मुस्तक़बिल की जंग है। इसी लिए वो ख़ामोशी से मेहनत कर रही हैं, मुसलसल आगे बढ़ रही हैं, और हर साल कामयाबी के उफ़ुक़ पर अपना नाम और रौशन कर रही हैं। और दूसरी तरफ़… हमारे बहुत से बेटे डिजिटल ख़लफ़शार, बे-मक़सद मसरूफ़ियात, फ़ौरी लज़्ज़तों और ज़ेहनी इंतिशार के ऐसे जंगल में भटक रहे हैं जहाँ रास्ते कम और सराब ज़्यादा हैं। ये आदाद-ओ-शुमार हमें सिर्फ़ नतायज नहीं बता रहे, बल्कि हमें आईना दिखा रहे हैं। वो आईना जिसमें एक तरफ़ बेटियों की बेदार आँखें हैं, और दूसरी तरफ़ बेटों की बिखरती हुई तवज्जोह। ये ख़ामोश फ़र्क़ अगर इसी रफ़्तार से बढ़ता रहा तो आने वाले बरसों में एक नया समाजी असंतुलन पैदा हो सकता है। लड़कियाँ तालीम को सिर्फ़ डिग्री नहीं समझतीं; वो इसे आज़ादी का रास्ता, इज़्ज़त का ज़रिया, माली ख़ुदमुख़्तारी का दरवाज़ा और समाजी वक़ार की ज़मानत समझती हैं। यही वजह है कि उनके अंदर एक गहरी अंदरूनी तहरीक पैदा होती है। वो जानती हैं कि किताब उनके हाथ में आए तो क़िस्मत बदल सकती है, क़लम उनके हाथ में आए तो नस्लें सँवर सकती हैं, और तालीम उनके हिस्से में आए तो घर, ख़ानदान और मुआशरा सब बदल सकते हैं। बेटों का ख़ामोश इंख़ला दूसरी तरफ़ हमारे बहुत से लड़के फ़ौरी मआशी फ़ायदे, ख़ानदानी कारोबार, जल्द रोज़गार, ऑनलाइन गेमिंग, सोशल मीडिया और डिजिटल फ़रारियत के भँवर में उलझते जा रहे हैं। वो लंबी तालीमी जद्दोजहद से उकता जाते हैं, फ़ौरी नतीजा चाहते हैं, मगर इल्म का सफ़र फ़ौरी तालियाँ नहीं देता; वो सब्र, मेहनत, तसलसुल और मक़सद माँगता है। क्या हमने लड़कों को मक़सद दिया? क्या हमने उनके लिए मज़बूत तालीमी रोल मॉडल्स तैयार किए? क्या हमने उन्हें बताया कि मर्दानगी सिर्फ़ कमाने का नाम नहीं, बल्कि शऊर, किरदार, ज़िम्मेदारी और इल्म का नाम भी है? आज लड़कियों की तालीमी तरक़्क़ी ख़ुश-आइंद है, क़ाबिल-ए-फ़ख़्र है, क़ाबिल-ए-तहसीन है। लेकिन अगर इसी के साथ लड़कों की इल्मी बेज़ारी बढ़ती रही तो ये एक अधूरा इंक़िलाब बनकर रह जाएगा। बेटियों की तालीम — क़ौम की बक़ा की शर्त हमें ये बात पूरी क़ुव्वत से माननी होगी कि लड़कियों की तालीम किसी क़ौम पर एहसान नहीं, बल्कि क़ौम की बक़ा की शर्त है। एक तालीमयाफ़्ता औरत सिर्फ़ ख़ुद नहीं सँवरती; वो घर सँवारती है, नस्ल सँवारती है, मुआशरा सँवारती है। एक बाशऊर माँ आने वाली नस्लों की पहली दर्सगाह होती है। अगर माँ तालीमयाफ़्ता हो तो घर का माहौल बदलता है, बच्चों की ज़बान बदलती है, सोच बदलती है, अख़्लाक़ बदलते हैं और मुस्तक़बिल बदलता है। बेटियों को आगे बढ़ाना और बेटों को पीछे छोड़ देना तरक़्क़ी नहीं, अदम-तवाज़ुन है। क़ौमें तब मज़बूत होती हैं जब उनकी बेटियाँ भी तालीमयाफ़्ता हों और बेटे भी मक़सद-शनास हों। अगर बेटियाँ इल्म की बुलंदियों पर हों और बेटे बे-सम्ती, लत, बेज़ारी और कम-हौसलगी का शिकार हों तो ये तरक़्क़ी नहीं, एक अधूरा इंक़िलाब है। आज की ज़रूरत — तवाज़ुन की हिकमत आज ज़रूरत है कि हम लड़कियों की तालीम को और मज़बूत करें, उनके लिए महफ़ूज़ तालीमी माहौल बनाएँ, उन्हें आला तालीम और अमली ज़िंदगी में आगे बढ़ने के मवाक़े दें। साथ ही लड़कों के लिए Mentorship Programs, Vocational Integration, Digital Discipline और Purpose-based Education को तालीमी निज़ाम का लाज़िमी हिस्सा बनाएँ। और अगर हमने क्लासरूम को इंसान-साज़ी का मरकज़ न बनाया तो कल डिग्रियाँ होंगी, मगर किरदार कमज़ोर होगा; नौकरियाँ होंगी, मगर मक़सद ग़ायब होगा; कामयाबी होगी, मगर सुकून नहीं होगा। इसलिए हमें आज ही अहद करना होगा कि तालीम को सिर्फ़ इम्तिहान नहीं रहने देंगे, इसे तहरीक बनाएँगे; इसे सिर्फ़ रोज़गार नहीं रहने देंगे, इसे किरदार बनाएँगे; इसे सिर्फ़ डिग्री नहीं रहने देंगे, इसे तहज़ीब की तामीर का ज़रिया बनाएँगे। क़ौमें उस वक़्त तरक़्क़ी करती हैं जब वो अपनी बेटियों को तालीम देती हैं, मगर तहज़ीबें उस वक़्त महफ़ूज़ रहती हैं जब वो अपने बेटों को भी गुम होने नहीं देतीं। भारत का मुस्तक़बिल किसी दफ़्तर की फ़ाइल में नहीं, किसी पॉलिसी के सफ़े पर नहीं, किसी तक़रीर के नारे में नहीं; भारत का मुस्तक़बिल इसके क्लासरूम में बैठे बच्चों की आँखों में लिखा जा रहा है। और ख़लील-ए-वक़्त! अगर हमने इस तहरीर को आज न पढ़ा, तो कल तारीख़ हमें मुआफ़ नहीं करेगी। — डॉक्टर असद अल्लाह ख़ान, मुंबई Asadullahkhanschoolasadullahkhanschool.org

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नौजवान, ख़ुदकुशी और हमारी इज्तिमाई बे-हिस्सी का अलमिया

डॉक्टर असदुल्लाह ख़ान (मुंबई) इंसानी तहज़ीब की तारीख़ में बाज़ अदवार ऐसे आते हैं जब मुआशरे बज़ाहिर तरक़्क़ी की मेराज पर होते हैं मगर अंदर से शिकस्त-ओ-रेख़्त का शिकार हो चुके होते हैं। सड़कें रौशन होती हैं मगर ज़ेहन तारीक, इमारतें बुलंद होती हैं मगर किरदार पस्त, मालूमात का समंदर मौजज़न होता है मगर रूहें प्यासी रह जाती हैं। आज हम एक ऐसे ही अहद के मुसाफ़िर हैं—एक ऐसा दौर जहाँ इंसान ने चाँद पर क़दम रख दिया मगर अपने ही दिल की वीरानी को आबाद न कर सका। जहाँ Artificial Intelligence ने हैरतअंगेज़ तरक़्क़ी कर ली मगर इंसानी जज़्बात की शिकस्तगी का इलाज अब भी नायाब है। जहाँ राबते बेशुमार हैं मगर ताल्लुक़ात मर चुके हैं। जहाँ हर हाथ में स्मार्टफ़ोन है मगर हर दिल में ख़ामोश इज़्तिराब। और सबसे बड़ा अलमिया ये है कि इस तहज़ीबी तूफ़ान का सबसे पहला शिकार हमारी नौजवान नस्ल बन रही है। ये वो नस्ल है जिसके काँधों पर मुस्तक़बिल की तामीर थी, मगर आज वही नस्ल ज़ेहनी दबाव, वुजूदी बोहरान, तालीमी ख़ौफ़, डिजिटल इंतिशार और रूहानी ख़ला के बोझ तले ख़ामोशी से बिखर रही है। आज का नौजवान बज़ाहिर हँसता है मगर अंदर से टूटा हुआ है। वो दोस्तों के हुजूम में जितना घिरता जा रहा है, उतना ही तनहा होता जा रहा है। उसकी मुस्कुराहट और उसके अंदर के बोहरान के दरमियान एक गहरी ख़लीज है जो दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। और ये तनहाई, ये ख़ामोश घुटन, धीरे-धीरे उसे उस मोड़ पर ले आती है जहाँ ज़िंदगी ख़ुद एक बोझ महसूस होने लगती है। हालिया बरसों में हिंदुस्तान भर से नौजवानों की ख़ुदकुशी के वाक़ियात पूरे मुआशरे की रूह को ज़ख़्मी कर रहे हैं, और इन्हें अक्सर तालीमी निज़ाम के पैदा करने वाले ज़ेहनी बोहरान से जोड़ा जा रहा है। उधर राजस्थान के कोचिंग मरकज़ “कोटा” में 2024 के दौरान दर्जनों तलबा ने ख़ुदकुशी की, जिनमें कई NEET और JEE के उम्मीदवार थे। बोर्ड इम्तिहानात के नतायज, NEET और JEE जैसे मुक़ाबला-जाती इम्तिहानात, कोचिंग कल्चर, वालिदैन की ग़ैर-महसूस तवक़्क़ुआत, सोशल मीडिया का तक़ाबुली ज़हर, और मुस्तक़बिल का ख़ौफ़—ये सब मिलकर नौजवान ज़ेहनों को एक ऐसे नफ़सियाती शिकंजे में क़ैद कर रहे हैं जहाँ बाज़ औक़ात एक नतीजा पूरी ज़िंदगी से बड़ा महसूस होने लगता है। एक काग़ज़ का लीक होना दरअसल लाखों ख़्वाबों का लीक होना था। एक इम्तिहान का Cancel होना सिर्फ़ Academic Crisis नहीं था बल्कि Emotional Collapse था। कोसा मुंब्रा का सदमा और ऐन उसी हंगामा-ए-इज़्तिराब में, कोसा मुंब्रा की फ़िज़ा से उठने वाली एक ख़बर ने जैसे पूरे मुआशरे की रूह को लरज़ा दिया। एक ऐसी ख़बर जिसने दिलों की धड़कनों को मुंजमिद और सोच की रगों को सुन्न कर दिया। एक नौजवान डॉक्टर… महज़ अट्ठाईस, तीस बरस की उम्र… तीन मासूम बच्चों की माँ… वही डॉक्टर जिसने कोरोना की तारीक-तरीन रातों में ख़ौफ़ के बजाय ख़िदमत का चराग़ जलाए रखा, जो मौत के साये में भी लोगों की ज़िंदगी बचाने के लिए दिन-रात अस्पतालों में खड़ी रही, जिसने अपने सुकून, अपनी नींद, अपनी राहत सब इंसानियत के नाम कर दिए— मगर शायद अपनी ही रूह की ख़ामोश थकन को कोई न देख सका। वो तालीम जो इंसान बना नहीं रही, सिर्फ़ मुक़ाबला पैदा कर रही है। हम बच्चों को याददाश्त ज़रूर दे रहे हैं मगर बसीरत नहीं। हम उन्हें नंबर्ज़ सिखा रहे हैं मगर सब्र नहीं। हम उन्हें Career दे रहे हैं मगर Character नहीं। आज एक तालिब-ए-इल्म किताब से ज़्यादा Comparison से ख़ौफ़ज़दा है। वो निसाब से कम और Expectations से ज़्यादा दबाव में है। उसे ये नहीं सिखाया गया कि नाकामी ज़िंदगी का इख़्तिताम नहीं, कम नंबर इंसान की क़ीमत का पैमाना नहीं, और एक इम्तिहान ख़ुदा का आख़िरी फ़ैसला नहीं। आज का नौजवान महज़ इम्तिहान नहीं दे रहा, वो वालिदैन की उम्मीदों का बोझ उठा रहा है, मुआशरे की दौड़ में अपनी शनाख़्त तलाश कर रहा है, डिजिटल दुनिया में अपनी हैसियत साबित करने की कोशिश कर रहा है, और ख़ामोशी से Anxiety, Depression और Emotional Burnout से लड़ रहा है। इस्लाम की नज़र में इंसान… नंबर नहीं, अमानत है इस्लाम इंसान को सिर्फ़ जिस्म नहीं बल्कि रूह, शऊर, जज़्बात और अमानत समझता है। “وَلَقَدْ كَرَّمْنَا بَنِي آدَمَ” (और यक़ीनन हमने औलाद-ए-आदम को इज़्ज़त बख़्शी) इस्लाम ने ख़ुदकुशी को हराम क़रार दिया क्योंकि ज़िंदगी इंसान की मिल्कियत नहीं बल्कि अल्लाह की अता-कर्दा अमानत है, “وَلَا تَقْتُلُوا أَنفُسَكُمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ كَانَ بِكُمْ رَحِيمًا” लेकिन इस्लाम सिर्फ़ हराम क़रार देकर ख़ामोश नहीं हो जाता बल्कि उस दर्द को भी समझता है। इस्लाम जानता है कि बाज़ औक़ात इंसान का ज़ेहन इस क़दर ज़ख़्मी हो जाता है कि उसकी सोचने, बर्दाश्त करने और फ़ैसला करने की सलाहियत मुतअस्सिर हो जाती है। इसी लिए किसी मरहूम के बारे में आख़िरी फ़ैसले सादिर करना दीन की रूह के ख़िलाफ़ है। इस्लाम का मिज़ाज नफ़रत नहीं, रहमत है। इंसान भी अगर चाहे तो दुनिया बदल सकता है, मगर शर्त ये है कि वो अपनी तवानाई को फ़ुज़ूल मशाग़िल से निकाले, अपनी रूह को मक़सद से जोड़े, और अपनी ज़ात को महज़ “Career” नहीं बल्कि “Mission” बनाए। लेकिन आज इंसान के पास वक़्त कम नहीं, इर्तिकाज़ कम है। मसअला ये नहीं कि नौजवान पढ़ना नहीं चाहते, मसअला ये है कि उनके ज़ेहन हज़ार टुकड़ों में तक़सीम हो चुके हैं। मुख़्तसर वीडियोज़, मुसलसल Notifications, ऑनलाइन गेमिंग, मसनूई शोहरत, Virtual Validation—ये सब नौजवान ज़ेहन को इस हद तक मुंतशिर कर रहे हैं कि गहरी सोच, मुतालआ, सब्र और यकसूई नापैद होती जा रही है। आज नौजवान, हज़ारों Followers रखते हैं मगर एक मुख़्लिस दोस्त नहीं, रोज़ाना घंटों Scroll करते हैं मगर ख़ुद को नहीं पढ़ते, हर चीज़ जानते हैं मगर ख़ुद को नहीं जानते। ये सिर्फ़ Attention Crisis नहीं, ये Identity Crisis है। इक़बाल का शाहीन और आज का नौजवान अल्लामा इक़बाल ने नौजवान को शाहीन से तश्बीह दी थी क्योंकि शाहीन, बुलंदी का आशिक़ होता है, मुर्दार पर नहीं जीता, आँधियों से घबराता नहीं, और तनहाई में अपनी क़ुव्वत पैदा करता है। नहीं है नाउम्मीद इक़बाल अपनी किश्त-ए-वीराँ सेज़रा नम हो तो ये मिट्टी बहुत ज़रख़ेज़ है साक़ी— अल्लामा इक़बाल इस्लाम मायूसी का मज़हब नहीं “لَا تَقْنَطُوا مِن رَّحْمَةِ اللَّهِ” (अल्लाह की रहमत से नाउम्मीद न हो) ज़िंदगी

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दाग़ दाग़ उजाला — पर्चों की नीलामी, दियानत का जनाज़ा

ये तहरीर उस मुआशरे के नाम है जो अपने बच्चों से मुस्तक़बिल तो माँगता है, मगर उन्हें इंसाफ़ नहीं देता। कभी कभी क़ौमें जंगों से तबाह नहीं होतीं, बल्कि इम्तिहान-गाहों में ख़ामोशी से मर जाती हैं। एक कमरा। एक मेज़। एक एडमिट कार्ड। पानी की बोतल के साथ रखा हुआ ख़्वाब। और सामने बैठा एक अठारह साला नौजवान — जिसकी आँखों में डॉक्टर बनने की ज़िद है, माँ की उम्मीद है, बाप के क़र्ज़ की नमी है, और मुआशरे के ताने का ख़ौफ़ है। फिर अचानक उसे मालूम होता है कि उसके दो साला जिहाद को किसी व्हाट्सऐप ग्रुप ने “फ़ॉरवर्ड” कर दिया था। और रियासत कहती है “सिस्टम आलूदा पाया गया।” क्या ख़ूब लफ़्ज़ है — आलूदा। गोया ये कोई दरिया था जिसमें ग़लती से गंदगी आ गई। हालाँकि हक़ीक़त ये है कि ये दरिया नहीं, पूरा निज़ाम ही एक सीवरेज लाइन में तब्दील हो चुका है। हमारा निज़ाम जो इम्तिहान नहीं लेता, आसाब निचोड़ता है। हिंदुस्तान में तालीम अब इल्म का सफ़र नहीं रही, ये एक नफ़सियाती शिकंजा बन चुकी है। यहाँ तालिब-ए-इल्म किताब नहीं पढ़ता, बल्कि अपनी ज़ेहनी क़ब्र खोदता है। सुबह के कोचिंग टेस्ट। रात के MCQs। यूट्यूब लेक्चर्स। रिवीज़न शीट्स। और इन सबके दरमियान एक नौजवान की आहिस्ता आहिस्ता मरती हुई शख़्सियत। ज़रूर, मगर नज़्म-ओ-ज़ब्त बेहतरीन था। जब इदारे जवाबदेह न रहें, तो क़ौमें बीमार हो जाती हैं। तक़रीबन हर बोहरान के बाद यही एक ड्रामा दोहराया जाता है — CBI तहक़ीक़ात करेगी। कमेटी बनेगी। सख़्त कार्रवाई होगी। ज़ीरो टॉलरेंस होगा। सिस्टम मज़बूत होगा। और फिर ढाक के तीन पात, फिर अगले साल एक नया लीक सामने आ जाता है। ये महज़ इंतिज़ामी नाकामी नहीं बल्कि अख़्लाक़ी दिवालियापन है। क़ौमें उस वक़्त ज़वालपज़ीर नहीं होतीं जब उनके पुल टूटते हैं बल्कि उस वक़्त जब उनके इदारे सच बोलना छोड़ देते हैं। क्या हमारे मुल्क ये पहली बार हुआ? जी नहीं। व्यापम स्कैंडल तो याद है ना? जहाँ इम्तिहान नहीं, ज़िंदगियाँ लीक हो गई थीं। और AIPMT याद है? या REET याद है? रियासती भर्तियों के लीक्स याद हैं? ये हादसात नहीं। ये एक तसलसुल है। ये ऐसा ही है जैसे हर साल एक इमारत गिर जाए और इंजीनियर कहे कि हमें अफ़सोस है, मगर तामीराती मेयार पर हमारा मुकम्मल एतमाद है। और मुल्क की कोचिंग इंडस्ट्री वो तो ख़्वाबों का ऐसा बाज़ार है जिसने ज़ेहनी ग़ुलामी की फ़ैक्ट्री खोल रखी है, जहाँ तालीम अब इबादत नहीं रही बल्कि सरमायाकारी बन चुकी है। किसी ग़रीब बाप से पूछिए जो अपनी बेटी को कोचिंग भेजने के लिए मोटर अंदर से गलना शुरू हो जाती हैं। किसी ने कहा कंप्यूटराइज़्ड इम्तिहान हो? साहब, वायरस मशीन में नहीं, ज़मीर में है। अब नई बहस ये है कि इम्तिहान CBT होगा या Pen-Paper। कितनी दिलचस्प बात है। गोया मसअला दरवाज़े के ताले का है, चोर के इरादे का नहीं। जब नीयतें फ़रोख़्त हो जाएँ, तो सर्वर भी बिकता है, सिस्टम भी बिकता है, और मुस्तक़बिल भी। आप Artificial Intelligence ला सकते हैं, लेकिन Character Intelligence कहाँ से लाएँगे? आज हमारे तलबा, इंसान नहीं रह गए बल्कि क़ौमी तजरबा-गाह के चूहे बन गए हैं? ये नस्ल अजीब दौर में पैदा हुई है। इसे बचपन में कहा गया कि मेहनत करो, कामयाब हो जाओगे। फिर जवानी में बताया गया कि मुआफ़ करना, पेपर लीक हो गया था। हमारा नौजवान अब किताबों से नहीं थका लेकिन नाइंसाफ़ी से थक चुका है। वो सवालों से नहीं डरता लेकिन सिस्टम से डरता है। आज इस मुल्क का सबसे बड़ा अलमिया नाख़्वांदगी नहीं, बल्कि तालीमयाफ़्ता नौजवानों का इंसाफ़ से मायूस हो जाना है। सबसे ख़तरनाक चीज़ करप्शन नहीं होती। सबसे ख़तरनाक चीज़ मामूल बन चुकी करप्शन होती है। अब हमें हैरत नहीं होती। अब लीक यानी पर्चों का क़ब्ल-अज़-वक़्त अफ़शाँ हो जाना ख़बर नहीं, रिवायत बन चुका है। यही ज़वाल की आख़िरी अलामत — एक इम्तिहान नहीं, बल्कि ये एक तहज़ीबी मुक़द्दमा है। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ने कहा: “सिस्टम आलूदा था।” नहीं साहब। आलूदा सिर्फ़ इम्तिहान नहीं। आलूदा तरजीहात हैं। आलूदा एहतिसाब है। आलूदा सियासत है। आलूदा वो ख़ामोशी है जिसने करप्शन को मामूल बनने दिया। याद रखिए, तहज़ीबें हमलों से कम, और अंदरूनी बेईमानी से ज़्यादा तबाह होती हैं। आज हिंदुस्तान के लाखों नौजवान सिर्फ़ दोबारा इम्तिहान नहीं दे रहे, वो अपने एतमाद का पोस्टमॉर्टम कर रहे हैं — और अगर अब भी इस मुल्क ने इदारा-जाती दियानत, शफ़्फ़ाफ़ियत, और अख़्लाक़ी एहतिसाब की बुनियाद दोबारा तामीर न की तो आने वाली नस्लें किताबों में सिर्फ़ ये नहीं पढ़ेंगी कि NEET का पेपर लीक हुआ था बल्कि वो ये पढ़ेंगी कि एक मुल्क ने और उसके निज़ाम ने अपने बच्चों की मेहनत को व्हाट्सऐप फ़ॉरवर्ड में तब्दील होने दिया था। रोको सूरज को ख़ुदकुशी से — असदुल्लाह ख़ान, ठाणे Asadullahkhanschoolasadullahkhanschool.org

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जब ज़बान सिर्फ़ सियासत नहीं, क़ौमों के मुस्तक़बिल का सवाल बन जाए!!!

महाराष्ट्र के एस एस सी नताइज, मराठी की बहस, और हमारी लिसानी ज़िम्मेदारियों का मुहासबा डॉक्टर असद उल्लाह ख़ान आदाद-ओ-शुमार बज़ाहिर ख़ामोश होते हैं मगर उनकी ख़ामोशी में पूरे मुआशरों की कहानियाँ बोलती हैं। हर फ़ीसद के पीछे हज़ारों ख़्वाब होते हैं, हर नतीजे के पीछे बरसों की तालीमी जद्द-ओ-जहद, और हर तालीमी रिपोर्ट के पस-मंज़र में एक क़ौम की फ़िक्री तरजीहात पोशीदा होती हैं। एक मुहक़्क़िक़ के लिए आदाद सिर्फ़ रियाज़ियाती हक़ीक़त नहीं होते, बल्कि वो मुआशरे के ज़हनी रुजहानात, तहज़ीबी वाबस्तगियों और तालीमी सिम्तों को समझने की कुंजियाँ होते हैं। इसी लिए बाज़ इम्तिहानी नताइज महज़ कामयाबी और नाकामी की ख़बर नहीं देते, बल्कि वो ये भी बताते हैं कि क़ौमें अपनी ज़बानों, अपनी किताबों, अपने तालीमी इदारों और अपनी आने वाली नस्लों के साथ किस नौईयत का तअल्लुक़ उस्तवार कर रही हैं। महाराष्ट्र के एस एस सी इम्तिहान 2026 के नताइज को भी इसी वसी तनाज़ुर में देखने की ज़रूरत है, क्योंकि यहाँ बहस सिर्फ़ नंबरों की नहीं, ज़बान, तहज़ीब, तालीम और शनाख़्त के बाहमी रिश्ते की है। महाराष्ट्र स्टेट बोर्ड के एस एस सी इम्तिहान 2026 के नताइज ने भी ऐसा ही एक मुकालमा छेड़ दिया है। एक तरफ़ उर्दू बहैसियत पहली ज़बान 95.47 फ़ीसद कामयाबी के साथ नुमायाँ रही, जबकि दूसरी जानिब मराठी बहैसियत पहली ज़बान 92.57 फ़ीसद नताइज के साथ रियासत भर में बहस-ओ-मुबाहसे का मौज़ू बन गई। ज़ाहिरी तौर पर ये फ़र्क़ सिर्फ़ चंद फ़ीसद का मालूम होता है, लेकिन दरहक़ीक़त इसके पस-मंज़र में ज़बान, तालीम, तहज़ीब, शनाख़्त, सियासत और मुस्तक़बिल के कई अहम सवालात पोशीदा हैं। ये सवाल सिर्फ़ उर्दू या मराठी का नहीं, बल्कि ये सवाल हर उस ज़बान का है जिसके सहारे कोई क़ौम सोचती, महसूस करती, ख़्वाब देखती और अपनी शनाख़्त क़ायम रखती है। आज सवाल ये नहीं कि किस ज़बान ने ज़्यादा नंबर हासिल किए। असल सवाल ये है कि क्या हमारी नई नस्ल ज़बानों से अपना रिश्ता खो रही है? क्या किताब की जगह स्क्रीन ने ले ली है? क्या मुतालिए की जगह महज़ मालूमात ने ले ली है? और क्या ज़बान अब तहज़ीब के बजाय सिर्फ़ इम्तिहान का एक मज़मून बनकर रह गई है? मराठी के नताइज ने एक अजीब रियासती बेचैनी को जन्म दिया। एस एस सी के नताइज के बाद महाराष्ट्र के मुतअद्दिद अख़बारात, इदारियों और टी वी मुबाहसों में एक सवाल बार-बार सुनाई दिया कि आख़िर वो ज़बान जो महाराष्ट्र की सरकारी, तारीख़ी और तहज़ीबी ज़बान है, उसके नताइज मुसलसल तशवीश का बाइस क्यों बन रहे हैं? दस लाख से ज़ाइद तलबा ने मराठी बहैसियत पहली ज़बान इम्तिहान दिया, लेकिन हज़ारों तलबा इस मज़मून में कामयाब न हो सके। ये महज़ एक तालीमी मसला नहीं था। ये एक तहज़ीबी इज़्तिराब था। अख़बारात ने इसकी मुख़्तलिफ़ वुजूहात बयान कीं। किसी ने मुतालिए के ज़वाल को ज़िम्मेदार क़रार दिया। किसी ने मोबाइल कल्चर और मुख़्तसर वीडियोज़ की यलग़ार को। किसी ने अंग्रेज़ी मीडियम के बढ़ते हुए रुजहान को मौरिद-ए-इल्ज़ाम ठहराया और कुछ माहिरीन-ए-तालीम ने निसाब, तदरीसी हिक्मत-ए-अमली और असातिज़ा की तरबियत पर संजीदा सवालात उठाए। लेकिन शायद असल मसला इन तमाम अवामिल से कहीं ज़्यादा गहरा है। ज़बानें उस वक़्त कमज़ोर नहीं होतीं जब उनके बोलने वाले कम हो जाएँ, ज़बानें उस वक़्त कमज़ोर होती हैं जब उनके पढ़ने वाले कम हो जाएँ। इसी दौरान उर्दू के नताइज ने भी तालीम-दोस्त हल्क़ों की तवज्जोह अपनी तरफ़ मबज़ूल कराई। उर्दू को पहली ज़बान के तौर पर मुंतख़ब करने वाले तलबा की तादाद मराठी के मुक़ाबले में बहुत कम है, लेकिन कामयाबी का तनासुब नुमायाँ तौर पर बुलंद रहा। ये यक़ीनन उर्दू असातिज़ा, वालिदैन और तलबा की मेहनत का एतिराफ़ है। लेकिन इस कामयाबी के पीछे एक और हक़ीक़त भी पोशीदा है। उर्दू अभी तक महज़ निसाबी ज़बान नहीं बनी। वो आज भी घरों की गुफ़्तगू में ज़िंदा है। मस्जिदों के ख़ुत्बात में ज़िंदा है। अदबी महफ़िलों में ज़िंदा है। अख़बारात और रसाइल में ज़िंदा है। शायरी, नात, अफ़साने और दीनी लिटरेचर में ज़िंदा है। इसी लिए शायद उर्दू के नताइज हमें एक अहम सबक़ देते हैं। जब ज़बान सिर्फ़ इम्तिहान का मज़मून बन जाए तो नंबर कम होने लगते हैं, और जब ज़बान तहज़ीब, मुतालिआ और शनाख़्त बन जाए तो नताइज ख़ुद बुलंद होने लगते हैं। लेकिन उर्दू वालों के लिए भी ये वक़्त जश्न से ज़्यादा एहतिसाब का है। क्या हमारे बच्चे वाक़ई उर्दू पढ़ रहे हैं? क्या उनके घरों में किताबें मौजूद हैं? क्या वो उर्दू अख़बारात से वाक़िफ़ हैं? क्या वो ग़ालिब, इक़बाल, हाली, शिबली, फ़ैज़, फ़िराक़ और मंटो के नाम जानते हैं? अगर इन सवालात का जवाब नफ़ी में है तो फिर सिर्फ़ इम्तिहानी कामयाबी हमारी मंज़िल नहीं हो सकती। एस एस सी नताइज के साथ ही महाराष्ट्र में एक और ज़बान से मुतअल्लिक़ बहस ज़ोर पकड़ गई। रिक्शा और टैक्सी ड्राइवरों के लिए बुनियादी मराठी ज़बान जानने की शर्त। इस मौज़ू ने अख़बारात, सियासी जमाअतों, समाजी तंज़ीमों और अवामी हल्क़ों में शदीद रद्द-ए-अमल पैदा किया। हामियों का कहना था कि अवामी ख़िदमात फ़राहम करने वालों को रियासत की ज़बान आनी चाहिए। मुख़ालिफ़ीन का इस्तिदलाल था कि रोज़गार को ज़बान से मशरूत करना मुनासिब नहीं। दोनों तरफ़ दलाइल मौजूद थे। दोनों तरफ़ जज़्बात भी थे। इस पूरे मुबाहसे में सबसे अहम बात ये है कि तक़रीबन तमाम संजीदा माहिरीन-ए-तालीम, अदबी शख़्सियात और पॉलिसी साज़ एक बुनियादी नुक्ते पर मुत्तफ़िक़ नज़र आते हैं कि ज़बान का मसला महज़ सियासत का मसला नहीं बल्कि तालीम, मुतालिआ और तहज़ीब का मसला है। कोई ज़बान सिर्फ़ क़ानून के ज़ोर पर ज़िंदा नहीं रह सकती और न ही सिर्फ़ जज़्बाती नारों से तरक़्क़ी कर सकती है। दादा भुसे ने मराठी तालीम को मज़बूत बनाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया, लक्ष्मीकांत देशमुख ने मादरी ज़बान की बुनियाद को अहम क़रार दिया, एकनाथ शिंदे ने किताब और लाइब्रेरी कल्चर की हिमायत की, जबकि राज ठाकरे ने लिसानी शनाख़्त के तहफ़्फ़ुज़ को ज़रूरी बताया। इन मुख़्तलिफ़ आरा का मुश्तरका पैग़ाम यही है कि ज़बानों की बक़ा का रास्ता तालीमी मेयार, मुतालिए की आदत, अदबी शुऊर और मुआशरती वाबस्तगी से होकर गुज़रता है, न कि सिर्फ़ क़ानूनी जब्र या सियासी नारों से। लेकिन शायद इस बहस का सबसे मुतवाज़िन और तामीरी नुक़्ता-ए-नज़र ये है कि ज़बान का एहतिराम ज़रूरी है,

जब ज़बान सिर्फ़ सियासत नहीं, क़ौमों के मुस्तक़बिल का सवाल बन जाए!!! Read More »

तालीम की गुमशुदा रूह???

हिन्दुस्तान के तालीमी बोहरान का फ़िक्री मुहासबा डॉक्टर असद उल्लाह ख़ान आजकल हिन्दुस्तान के तालीमी निज़ाम की जिन ख़राबियों पर बहस की जा रही है, वो बिलाशुबा अहम हैं। पेपर लीक, इम्तिहानी बदउनवानी, रट्टा सिस्टम, नाक़िस स्कूल इंफ़्रास्ट्रक्चर, कमज़ोर तदरीसी मेयार और रोज़गार से महरूम ग्रेजुएट्स — ये सब तल्ख़ हक़ीक़तें हैं। लेकिन बतौर एक मुअल्लिम और चालीस बरस से ज़ाइद अरसा तालीम के मैदान में दश्त-नवर्दी करने वाले शख़्स के तौर पर जो कुछ हमने देखा है या समझा है, उनसे इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि मसला इन तमाम ख़राबियों से भी ज़्यादा गहरा है। हमारा असल बोहरान तालीमी नहीं, फ़िक्री बोहरान है। हमने तालीम को इम्तिहान समझ लिया है। हमने स्कूल को इमारत समझ लिया है। हमने उस्ताद को मुलाज़िम समझ लिया है, और हमने तालिब-ए-इल्म को रोल नंबर बना दिया है। नतीजा ये है कि पूरा निज़ाम अपनी रूह खो चुका है। एक ज़माना था जब तालीम का मक़सद इंसान बनाना था। आज तालीम का मक़सद नंबर बन गया है। एक ज़माना था जब स्कूल शख़्सियत-साज़ी के मराकिज़ होते थे। आज वो कोचिंग सेंटरों के तौसीई दफ़्तर बनते जा रहे हैं। एक ज़माना था जब उस्ताद ज़हनों को रोशन करता था। आज उससे नतीजे पैदा करने वाली मशीन बनने की तवक़्क़ो की जाती है। तालीम सिर्फ़ मालूमात की मुंतक़ली का नाम नहीं है। अगर मालूमात ही तालीम होतीं तो गूगल दुनिया का सबसे बड़ा उस्ताद होता। अगर याददाश्त ही ज़हानत होती तो कंप्यूटर सबसे बड़े मुफ़क्किर होते। तालीम दरअसल सोचने की सलाहियत पैदा करने का नाम है। सवाल पूछने का हौसला पैदा करने का नाम है। किरदार-साज़ी का नाम है। अख़्लाक़ी शुऊर पैदा करने का नाम है। मुआशरती ज़िम्मेदारी का एहसास बेदार करने का नाम है। अफ़सोस कि हमारा पूरा तालीमी निज़ाम अभी तक उन्नीसवीं सदी के इम्तिहानी मॉडल पर खड़ा है, जबकि दुनिया इक्कीसवीं सदी की मस्नूई ज़हानत के दौर में दाख़िल हो चुकी है। आज का बच्चा ChatGPT, मस्नूई ज़हानत, रोबोटिक्स, डिजिटल मईशत और आलमी मुसाबक़त की दुनिया में दाख़िल हो रहा है। लेकिन हम अब भी उससे पूछ रहे हैं — तारीफ़ लिखिए।फ़र्क़ लिखिए।ख़ाली जगह पुर कीजिए।सही जवाब पर निशान लगाइए। ये सवालात मुस्तक़बिल नहीं बनाते। ये सिर्फ़ इम्तिहानी कॉपियाँ भरने में मदद देते हैं। असल सवाल ये है कि क्या हमारा तालिब-ए-इल्म सोच सकता है? क्या वो मसला हल कर सकता है? क्या वो इख़्तिलाफ़-ए-राय को बर्दाश्त कर सकता है? क्या वो टीम के साथ काम कर सकता है? क्या वो अख़्लाक़ी फ़ैसले ले सकता है? क्या वो अपनी बात मुअस्सर अंदाज़ में पेश कर सकता है? अगर इन सवालात का जवाब नफ़ी में है तो फिर चाहे वो 95 फ़ीसद नंबर ले आए, तालीमी निज़ाम नाकाम है। हमने देहाती इलाक़ों से लेकर शहरी बस्तियों तक हज़ारों तलबा को देखा है। हम ऐसे बच्चे से मिल चुके हैं जो वसाइल से महरूम हैं लेकिन ज़हानत से मालामाल हैं। हमने ऐसे इदारे भी देखे हैं जिनके पास इमारतें हैं मगर तालीमी रूह नहीं। इसी लिए मैं हमेशा कहता हूँ कि तालीम की पहली इस्लाह निसाब से नहीं बल्कि उस्ताद से शुरू होनी चाहिए। एक बेहतरीन उस्ताद एक कमज़ोर इमारत में भी मोजज़ा पैदा कर सकता है। लेकिन एक ग़ैर-तरबियत-याफ़्ता उस्ताद जदीदतरीन कैंपस को भी नाकाम बना सकता है। इसलिए क़ौमी सतह पर असातिज़ा की तरबियत को सबसे बड़ी तरजीह बनाना होगा। दूसरी ज़रूरत स्कूलों को सियासी और बयूरोक्रेटिक मुदाख़लत से आज़ाद करना है। तालीम को फ़ाइलों के ज़रिए नहीं, तालीमी माहिरीन के ज़रिए चलाया जाना चाहिए। तीसरी ज़रूरत तालीम को किरदार, अक़दार और क़ौम-साज़ी के साथ जोड़ने की है। सिर्फ़ STEM काफ़ी नहीं। सिर्फ़ AI काफ़ी नहीं। सिर्फ़ Coding काफ़ी नहीं। अगर इंसानियत, अख़्लाक़, दयानतदारी, ज़िम्मेदारी और समाजी शुऊर पैदा न हो तो टेक्नोलॉजी भी तबाही का ज़रिया बन सकती है। आज हिन्दुस्तान के सामने सबसे बड़ा सवाल ये नहीं कि कितने बच्चे इम्तिहान पास कर रहे हैं। असल सवाल ये है कि हम किस क़िस्म के इंसान पैदा कर रहे हैं। अगर हमने इस सवाल का सही जवाब तलाश कर लिया तो पेपर लीक, नक़ल, बदउनवानी और बेरोज़गारी जैसे मसाइल ख़ुद-ब-ख़ुद कम होने लगेंगे। तालीम की हक़ीक़ी कामयाबी डिग्रियों की तादाद में नहीं बल्कि ऐसे इंसानों की तादाद में होती है जो मुआशरे को बेहतर बना सकें — क्योंकि क़ौमों का मुस्तक़बिल पार्लियामेंटों में नहीं बनता, वो ख़ामोश क्लासरूमों में बनता है। वो उस्ताद के हाथों में बनता है। वो तालिब-ए-इल्म के ज़हन में बनता है, और वो उस तालीमी फ़लसफ़े में बनता है जो इंसान को सिर्फ़ कामयाब नहीं बल्कि बाकिरदार बनाता है। आज हिन्दुस्तान को तालीमी इस्लाहात से ज़्यादा तालीमी बेदारी की ज़रूरत है, वरना हम इम्तिहानात तो लेते रहेंगे, लेकिन मुस्तक़बिल खोते रहेंगे। लेकिन सवाल ये है कि हम इस मक़ाम तक पहुँचे कैसे? ये बोहरान किसी एक वज़ीर, किसी एक हुकूमत, किसी एक बोर्ड या किसी एक पॉलिसी की पैदावार नहीं है। ये कई दहाइयों पर मुहीत उन ग़लत तरजीहात का नतीजा है जिनमें इमारतों को तालीम समझ लिया गया, निसाब को इल्म समझ लिया गया और इम्तिहानात को क़ाबिलियत का पैमाना क़रार दे दिया गया। हमने स्कूल तो बनाए लेकिन तालीमी सक़ाफ़त पैदा न कर सके। हमने निसाब तो मुरत्तब किए लेकिन तजस्सुस पैदा न कर सके। हमने इम्तिहानात तो मुनअक़िद किए लेकिन फ़िक्र पैदा न कर सके। हमने डिग्रियाँ तो तक़सीम कीं लेकिन बसीरत पैदा न कर सके। आज हमारे तालीमी इदारों में दाख़िल होने वाला बच्चा सवाल पूछने के फ़ितरी जज़्बे के साथ आता है, मगर निज़ाम उसे जवाब रटने की मशीन बनाकर बाहर निकालता है। वो बच्चा जो आसमान को देखकर पूछता है कि सितारे क्यों चमकते हैं, चंद साल बाद सिर्फ़ इतना जानता है कि इम्तिहान में कितने नंबर हासिल करने हैं। वो बच्चा जो तितली के रंगों पर हैरान होता है, उसे चंद बरसों में सिर्फ़ सही ऑप्शन पर टिक लगाना सिखा दिया जाता है। ये तालीमी नाकामी नहीं, इंसानी सलाहियतों का क़त्ल है। दुनिया की बड़ी अक़वाम ने अपनी तरक़्क़ी का सफ़र उस वक़्त शुरू किया जब उन्होंने तालीम को महज़ रोज़गार का ज़रिया नहीं बल्कि क़ौम-साज़ी का सबसे मुअस्सर हथियार समझा। जापान की तामीर फ़ैक्ट्रियों में शुरू नहीं हुई थी, कमरा-ए-जमाअतों में हुई थी। जर्मनी की ताक़त सिर्फ़ उसकी

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