डॉक्टर असदुल्लाह ख़ान (मुंबई)
हिंदुस्तान में क़ाबिलियत और मेरिट की बालादस्ती का जो भरम बरसों से क़ायम था, वो अब मुकम्मल तौर पर चकनाचूर हो चुका है। जो बातें कभी कोचिंग सेंटर्ज़ की बंद गलियों में सरगोशियों की सूरत में सुनी जाती थीं, अब मरकज़ी तहक़ीक़ाती इदारे (CBI) ने उन्हें पूरी दुनिया के सामने बेनक़ाब कर दिया है।
क़ौमी अहलियत व दाख़िला टेस्ट (NEET-UG 2026) अब ज़हानत, मेहनत और रातों की बेदारी का इम्तिहान नहीं रहा, बल्कि ये एक ऐसी खुली नीलामी बन चुका है जहाँ मुस्तक़बिल के डॉक्टरों ने अपनी डिग्रियाँ और स्टेथोस्कोप (Stethoscopes) मेहनत से नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये नक़द दे कर ख़रीदे।
लातूर का गठजोड़ — दो मरकज़ी किरदार
इस मुनज़्ज़म और शर्मनाक घपले के पीछे महाराष्ट्र में कोचिंग के सबसे बड़े गढ़, लातूर का एक ख़तरनाक गठजोड़ काम कर रहा था। इस गैंग के दो मरकज़ी किरदार हैं — पहला श्री पी. वी. कुलकर्णी (NTA का साबिक़ इनसाइडर और रिटायर्ड केमिस्ट्री प्रोफ़ेसर) और दूसरा शिवराज मोटीगाँवकर (रीनाकाई केमिस्ट्री क्लासेज़ — RCC का अरबपति मालिक)।
इस साज़िश के तरीक़ा-कार ने हमारे पूरे इम्तिहानी ढाँचे की कमज़ोरियों को नंगा कर दिया है। पी. वी. कुलकर्णी कोई आम दलाल नहीं था; उसने अपने चुनिंदा तलबा को एक बंद कमरे में जमा किया, जहाँ उनके मोबाइल फ़ोन ज़ब्त कर लिए गए (ताकि कोई तस्वीर खींच कर सोशल मीडिया पर वायरल न कर दे)। कुलकर्णी ने ख़ुद एक एक सवाल, उसके चारों ऑप्शन्ज़ और दुरुस्त जवाबात (Answer Keys) तलबा को ज़बानी लिखवाए। बच्चों ने उन्हें सादा नोटबुक्स पर अपने हाथ से लिखा। सी.बी.आई. ने बाद में यही नोटबुक्स बरामद कीं, जिनके सवालात NTA के असल पेपर से 100 फ़ीसद मैच कर रहे थे।
अवाम के लिए “गेस पेपर” का ड्रामा — The Mass Track
दूसरी तरफ़ एक ड्रामा रचा गया जिसमें अवाम के लिए “गेस पेपर” का खेल था। यहीं से शिवराज मोटीगाँवकर और उसके इदारे “RCC” का गंदा खेल शुरू होता है। मोटीगाँवकर और कुलकर्णी पुराने वाक़िफ़कार थे, लेकिन माज़ी में उनके दरमियान शदीद कारोबारी दुश्मनी थी। मगर इस बार, करोड़ों रुपये कमाने के लिए दोनों ने पुरानी दुश्मनी भुला कर हाथ मिला लिया।
मोटीगाँवकर ने इस चोरी-शुदा पेपर को बराह-ए-रास्त बाँटने के बजाय, इसके 42 बिल्कुल असल सवालात को अपने कोचिंग इंस्टिट्यूट के आख़िरी “मॉक टेस्ट” (Mock Test) में शामिल कर दिया। उसने अपने हज़ारों तलबा को बताया कि ये उसकी “बरसों की महारत और पेशगोई” का नतीजा है। मक़सद ये था कि जब असल इम्तिहान में यही सवालात आएँ, तो उसके इदारे का “नतीजा” शानदार दिखे और अगले साल और ज़्यादा बच्चे उसकी मोटी फ़ीस अदा करके दाख़िला लें।
क़ीमत — करोड़ों की बोली
सी.बी.आई. के छापों में एक तरफ़ ये भी सामने आया कि लातूर के एक नामवर ताजिर के घर पर छापा मारा गया जिसने अपनी बेटी के लिए 5 लाख रुपये नक़द दिए थे। जबकि राजस्थान के सीकर (Sikar) और जयपुर में एक एक पेपर की क़ीमत 10 से 15 लाख रुपये वसूल की जा रही थी।
सी.बी.आई. ने अब तक जयपुर, सीकर, गुरुग्राम, नासिक, पुणे और अहिल्या नगर से 9 कलीदी मुलज़िमान को गिरफ़्तार किया है, जो इस इम्तिहानी चोरी को एक कॉर्पोरेट बिज़नेस की तरह चला रहे थे।
24 लाख ख़्वाबों का इज्तिमाई क़त्ल
इस बदउनवान और ग़लीज़ निज़ाम का सबसे बड़ा और दर्दनाक ख़मियाज़ा मुल्क के मासूम और मेहनती तलबा को भुगतना पड़ा। जब पेपर बड़े पैमाने पर लीक हुआ, तो हुकूमत को मजबूरन 12 मई को ये इम्तिहान मंसूख़ करना पड़ा और अब दोबारा इम्तिहान (Re-exam) लेने का ऐलान किया गया है।
24 लाख तलबा का मुस्तक़बिल दाँव पर लगा दिया गया। मुल्क भर के 24 लाख से ज़ाइद मेडिकल के ख़्वाहिशमंद तलबा, जिन्होंने दिन रात एक करके पढ़ाई की थी, आज ज़ेहनी अज़ियत का शिकार हैं। ग़रीब ख़ानदानों पर मआशी बोझ अलग पड़ा। दोबारा इम्तिहान देने के लिए लाखों ग़रीब और मुतवस्सित तबक़े के ख़ानदानों को दोबारा सफ़र, होटल और ट्रांसपोर्ट के अख़राजात बर्दाश्त करने पड़ रहे हैं, जिनकी जेबें पहले ही ख़ाली हो चुकी हैं।
एक ईमानदार बच्चे को बार-बार यही समझाया जाता है कि “अगर मैं मेहनत करूँगा, तो मुझे मेरा हक़ मिलेगा।” लेकिन ये उम्मीद एक धोका है! ये एक ऐसा जाल है जिसमें ईमानदार बच्चों को सिर्फ़ उलझाए रखा जाता है, जबकि मेडिकल की असल सीटें पुणे के बंद कमरों और लातूर के लग्ज़री कोचिंग सेंटर्ज़ में पहले ही फ़रोख़्त हो चुकी होती हैं।
कुलकर्णी और मोटीगाँवकर जैसे लोग उस्ताद नहीं, तालीमी माफ़िया के सरग़ना हैं। उन्होंने लाखों बच्चों के ख़ून-पसीने और उनके आँसुओं पर अपनी तिजोरियाँ भरीं। जब एक किसान का बेटा गाँव की मद्धम रौशनी में केमिस्ट्री के फ़ार्मूले रट रहा था, उस वक़्त एक अमीर डॉक्टर का बेटा पुणे के एक बंगले में चाय की चुस्कियाँ लेते हुए असल इम्तिहानी पेपर अपनी कॉपी में उतार रहा था।
नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) एक नाकाम और खोखला इदारा बन चुकी है, जिसे चंद लालची दलाल जब चाहें अपने इशारों पर नचा सकते हैं। सिर्फ़ सी.बी.आई. की इन्क्वायरी बिठा देना या अगले साल से कंप्यूटर पर टेस्ट ले लेना इस कैंसर का इलाज नहीं है।
वक़्त आ गया है कि इस सरमायादाराना कोचिंग कल्चर को जड़ से उखाड़ फेंका जाए जिसने तालीम को एक मंडी बना दिया है। अगर ये हुकूमत और ये निज़ाम बच्चों के लिए एक इम्तिहानी पेपर की हिफ़ाज़त नहीं कर सकता—तो हम इसे एक ख़ुदकुशी कहेंगे, या इस करप्ट तालीमी निज़ाम के हाथों एक एलानिया क़त्ल?
पेपर ख़रीदने वाले अमीर डॉक्टरों और सरमायादारों से:
जब आपके बच्चे चोरी के पेपर्ज़ और बैसाखियों के सहारे डॉक्टर बनेंगे, तो वो कल हस्पतालों में मरीज़ों का इलाज करेंगे या इंसानी जानों का सौदा करके इस चोरी की क़ीमत वसूल करेंगे?
अगर इस मुल्क में एक ग़रीब का बच्चा अपनी क़ाबिलियत, दिन रात की मेहनत और ईमानदारी के बलबूते पर एक मुअज़्ज़ज़ पेशा इख़्तियार नहीं कर सकता, तो फिर ये “बराबरी और मेरिट” का आईनी वादा सिर्फ़ किताबों की ज़ीनत क्यों है? क्या अब क़ाबिलियत का मेयार सिर्फ़ और सिर्फ़ बैंक बैलेंस रह गया है?
— डॉक्टर असदुल्लाह ख़ान, मुंबई

