नौजवान, ख़ुदकुशी और हमारी इज्तिमाई बे-हिस्सी का अलमिया

डॉक्टर असदुल्लाह ख़ान (मुंबई)

इंसानी तहज़ीब की तारीख़ में बाज़ अदवार ऐसे आते हैं जब मुआशरे बज़ाहिर तरक़्क़ी की मेराज पर होते हैं मगर अंदर से शिकस्त-ओ-रेख़्त का शिकार हो चुके होते हैं। सड़कें रौशन होती हैं मगर ज़ेहन तारीक, इमारतें बुलंद होती हैं मगर किरदार पस्त, मालूमात का समंदर मौजज़न होता है मगर रूहें प्यासी रह जाती हैं।

आज हम एक ऐसे ही अहद के मुसाफ़िर हैं—एक ऐसा दौर जहाँ इंसान ने चाँद पर क़दम रख दिया मगर अपने ही दिल की वीरानी को आबाद न कर सका। जहाँ Artificial Intelligence ने हैरतअंगेज़ तरक़्क़ी कर ली मगर इंसानी जज़्बात की शिकस्तगी का इलाज अब भी नायाब है। जहाँ राबते बेशुमार हैं मगर ताल्लुक़ात मर चुके हैं। जहाँ हर हाथ में स्मार्टफ़ोन है मगर हर दिल में ख़ामोश इज़्तिराब। और सबसे बड़ा अलमिया ये है कि इस तहज़ीबी तूफ़ान का सबसे पहला शिकार हमारी नौजवान नस्ल बन रही है।

ये वो नस्ल है जिसके काँधों पर मुस्तक़बिल की तामीर थी, मगर आज वही नस्ल ज़ेहनी दबाव, वुजूदी बोहरान, तालीमी ख़ौफ़, डिजिटल इंतिशार और रूहानी ख़ला के बोझ तले ख़ामोशी से बिखर रही है।

आज का नौजवान बज़ाहिर हँसता है मगर अंदर से टूटा हुआ है। वो दोस्तों के हुजूम में जितना घिरता जा रहा है, उतना ही तनहा होता जा रहा है। उसकी मुस्कुराहट और उसके अंदर के बोहरान के दरमियान एक गहरी ख़लीज है जो दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। और ये तनहाई, ये ख़ामोश घुटन, धीरे-धीरे उसे उस मोड़ पर ले आती है जहाँ ज़िंदगी ख़ुद एक बोझ महसूस होने लगती है।

हालिया बरसों में हिंदुस्तान भर से नौजवानों की ख़ुदकुशी के वाक़ियात पूरे मुआशरे की रूह को ज़ख़्मी कर रहे हैं, और इन्हें अक्सर तालीमी निज़ाम के पैदा करने वाले ज़ेहनी बोहरान से जोड़ा जा रहा है। उधर राजस्थान के कोचिंग मरकज़ “कोटा” में 2024 के दौरान दर्जनों तलबा ने ख़ुदकुशी की, जिनमें कई NEET और JEE के उम्मीदवार थे।

बोर्ड इम्तिहानात के नतायज, NEET और JEE जैसे मुक़ाबला-जाती इम्तिहानात, कोचिंग कल्चर, वालिदैन की ग़ैर-महसूस तवक़्क़ुआत, सोशल मीडिया का तक़ाबुली ज़हर, और मुस्तक़बिल का ख़ौफ़—ये सब मिलकर नौजवान ज़ेहनों को एक ऐसे नफ़सियाती शिकंजे में क़ैद कर रहे हैं जहाँ बाज़ औक़ात एक नतीजा पूरी ज़िंदगी से बड़ा महसूस होने लगता है। एक काग़ज़ का लीक होना दरअसल लाखों ख़्वाबों का लीक होना था। एक इम्तिहान का Cancel होना सिर्फ़ Academic Crisis नहीं था बल्कि Emotional Collapse था।

कोसा मुंब्रा का सदमा

और ऐन उसी हंगामा-ए-इज़्तिराब में, कोसा मुंब्रा की फ़िज़ा से उठने वाली एक ख़बर ने जैसे पूरे मुआशरे की रूह को लरज़ा दिया। एक ऐसी ख़बर जिसने दिलों की धड़कनों को मुंजमिद और सोच की रगों को सुन्न कर दिया।

एक नौजवान डॉक्टर… महज़ अट्ठाईस, तीस बरस की उम्र… तीन मासूम बच्चों की माँ… वही डॉक्टर जिसने कोरोना की तारीक-तरीन रातों में ख़ौफ़ के बजाय ख़िदमत का चराग़ जलाए रखा, जो मौत के साये में भी लोगों की ज़िंदगी बचाने के लिए दिन-रात अस्पतालों में खड़ी रही, जिसने अपने सुकून, अपनी नींद, अपनी राहत सब इंसानियत के नाम कर दिए— मगर शायद अपनी ही रूह की ख़ामोश थकन को कोई न देख सका।

वो तालीम जो इंसान बना नहीं रही, सिर्फ़ मुक़ाबला पैदा कर रही है। हम बच्चों को याददाश्त ज़रूर दे रहे हैं मगर बसीरत नहीं। हम उन्हें नंबर्ज़ सिखा रहे हैं मगर सब्र नहीं। हम उन्हें Career दे रहे हैं मगर Character नहीं।

आज एक तालिब-ए-इल्म किताब से ज़्यादा Comparison से ख़ौफ़ज़दा है। वो निसाब से कम और Expectations से ज़्यादा दबाव में है। उसे ये नहीं सिखाया गया कि नाकामी ज़िंदगी का इख़्तिताम नहीं, कम नंबर इंसान की क़ीमत का पैमाना नहीं, और एक इम्तिहान ख़ुदा का आख़िरी फ़ैसला नहीं।

आज का नौजवान महज़ इम्तिहान नहीं दे रहा, वो वालिदैन की उम्मीदों का बोझ उठा रहा है, मुआशरे की दौड़ में अपनी शनाख़्त तलाश कर रहा है, डिजिटल दुनिया में अपनी हैसियत साबित करने की कोशिश कर रहा है, और ख़ामोशी से Anxiety, Depression और Emotional Burnout से लड़ रहा है।

इस्लाम की नज़र में इंसान… नंबर नहीं, अमानत है

इस्लाम इंसान को सिर्फ़ जिस्म नहीं बल्कि रूह, शऊर, जज़्बात और अमानत समझता है।

“وَلَقَدْ كَرَّمْنَا بَنِي آدَمَ” (और यक़ीनन हमने औलाद-ए-आदम को इज़्ज़त बख़्शी)

इस्लाम ने ख़ुदकुशी को हराम क़रार दिया क्योंकि ज़िंदगी इंसान की मिल्कियत नहीं बल्कि अल्लाह की अता-कर्दा अमानत है, “وَلَا تَقْتُلُوا أَنفُسَكُمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ كَانَ بِكُمْ رَحِيمًا”

लेकिन इस्लाम सिर्फ़ हराम क़रार देकर ख़ामोश नहीं हो जाता बल्कि उस दर्द को भी समझता है। इस्लाम जानता है कि बाज़ औक़ात इंसान का ज़ेहन इस क़दर ज़ख़्मी हो जाता है कि उसकी सोचने, बर्दाश्त करने और फ़ैसला करने की सलाहियत मुतअस्सिर हो जाती है। इसी लिए किसी मरहूम के बारे में आख़िरी फ़ैसले सादिर करना दीन की रूह के ख़िलाफ़ है। इस्लाम का मिज़ाज नफ़रत नहीं, रहमत है।

इंसान भी अगर चाहे तो दुनिया बदल सकता है, मगर शर्त ये है कि वो अपनी तवानाई को फ़ुज़ूल मशाग़िल से निकाले, अपनी रूह को मक़सद से जोड़े, और अपनी ज़ात को महज़ “Career” नहीं बल्कि “Mission” बनाए।

लेकिन आज इंसान के पास वक़्त कम नहीं, इर्तिकाज़ कम है। मसअला ये नहीं कि नौजवान पढ़ना नहीं चाहते, मसअला ये है कि उनके ज़ेहन हज़ार टुकड़ों में तक़सीम हो चुके हैं। मुख़्तसर वीडियोज़, मुसलसल Notifications, ऑनलाइन गेमिंग, मसनूई शोहरत, Virtual Validation—ये सब नौजवान ज़ेहन को इस हद तक मुंतशिर कर रहे हैं कि गहरी सोच, मुतालआ, सब्र और यकसूई नापैद होती जा रही है।

आज नौजवान, हज़ारों Followers रखते हैं मगर एक मुख़्लिस दोस्त नहीं, रोज़ाना घंटों Scroll करते हैं मगर ख़ुद को नहीं पढ़ते, हर चीज़ जानते हैं मगर ख़ुद को नहीं जानते। ये सिर्फ़ Attention Crisis नहीं, ये Identity Crisis है।

इक़बाल का शाहीन और आज का नौजवान

अल्लामा इक़बाल ने नौजवान को शाहीन से तश्बीह दी थी क्योंकि शाहीन, बुलंदी का आशिक़ होता है, मुर्दार पर नहीं जीता, आँधियों से घबराता नहीं, और तनहाई में अपनी क़ुव्वत पैदा करता है।

नहीं है नाउम्मीद इक़बाल अपनी किश्त-ए-वीराँ से
ज़रा नम हो तो ये मिट्टी बहुत ज़रख़ेज़ है साक़ी
— अल्लामा इक़बाल

इस्लाम मायूसी का मज़हब नहीं

“لَا تَقْنَطُوا مِن رَّحْمَةِ اللَّهِ” (अल्लाह की रहमत से नाउम्मीद न हो)

ज़िंदगी में नाकामियाँ आएँगी, दरवाज़े बंद होंगे, लोग छोड़ जाएँगे, ख़्वाब टूटेंगे—मगर यही ज़िंदगी है। असल कामयाबी कभी न गिरने में नहीं, बल्कि हर बार गिर कर दोबारा उठने में है। मायूसी, डिप्रेशन या इंतिशार नहीं बल्कि नमाज़, दुआ, क़ुरआन, ज़िक्र, अच्छी सोहबत, वालिदैन की मोहब्बत, उस्ताद की शफ़क़त, और मक़सद से जुड़ी हुई ज़िंदगी इंसान को दोबारा ज़िंदा कर सकती है।

उठो! आज भी वक़्त है

माना कि हमारी यूनिवर्सिटियाँ डिग्रियाँ तो दे रही हैं मगर सुकून नहीं, हमारे स्कूल ज़हीन दिमाग़ तो पैदा कर रहे हैं मगर मज़बूत आसाब नहीं, हमारे नौजवान कामयाब तो हो रहे हैं मगर जीने से थक रहे हैं—तो हमें रुक कर सोचना होगा कि कहीं हम तरक़्क़ी के नाम पर इंसानियत तो नहीं हार रहे?

क़ौमें सिर्फ़ इंफ़्रास्ट्रक्चर से नहीं बनतीं। तहज़ीबें सिर्फ़ मईशत से ज़िंदा नहीं रहतीं। मुआशरे सिर्फ़ टेक्नोलॉजी से महफ़ूज़ नहीं होते। क़ौमें उस वक़्त ज़िंदा रहती हैं जब उनके नौजवान उम्मीद से भरे हों, मक़सद से जुड़े हों, रूहानी तौर पर मज़बूत हों और उन्हें ये यक़ीन हो कि उनकी ज़िंदगी सिर्फ़ नंबर, नौकरी और दुनियावी कामयाबी से कहीं ज़्यादा क़ीमती है।

जब तारीख़ हमारे ज़माने का मुहासबा करेगी तो शायद लिखे कि उन्होंने अपने बच्चों को उड़ना तो सिखाया, मगर गिरने के बाद उठना न सिखा सके। कि हमने अपनी औलाद को मशीनों से बात करना तो सिखा दिया, मगर अपने ज़ख़्मों से गुफ़्तगू करना न सिखाया। कि हमने बच्चों को कामयाब इंसान तो बनाया, मगर पुरसुकून इंसान न बना सके।

जिसने सूरज की शुआओं को गिरफ़्तार किया
ज़िंदगी की शब-ए-तारीक सहर कर न सका
— डॉक्टर असदुल्लाह ख़ान, मुंबई

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