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तअलीम: इंसान बनाने का फ़न या इम्तिहान पास कराने की मशीन?

इल्म वो है जो इंसान को इंसान बनाए, न कि वो जो उसे मशीन बना दे डॉ. असदुल्लाह ख़ान ज़िन्दगी में कभी-कभी ऐसा होता है कि आप कोई तहरीर हाथ में लेते हैं और पढ़ते-पढ़ते अचानक रुक जाते हैं। क़लम नीचे रख देते हैं। आँखें बंद कर लेते हैं। और दिल के किसी गहरे गोशे से एक आवाज़ आती है कि यही तो मैं कह रहा था। हुआ यूँ कि आज के टाइम्ज़ ऑफ़ इंडिया में NCERT के डायरेक्टर, प्रोफ़ेसर दिनेश प्रसाद सकलानी का मज़मून पढ़ा तो यूँ महसूस हुआ जैसे मेरे दिल-व-दिमाग़ में मुद्दतों से गर्दिश करने वाले ख़यालात को किसी और ने लफ़्ज़ों के क़ालब में ढाल दिया हो। हर सतर, हर इस्तिदलाल और हर सवाल मेरे अपने फ़िक्री सफ़र की बाज़गश्त मालूम हुआ। मुझे मीर का वो मिसरा याद आ गया जो उर्दू शाअरी की सबसे लतीफ़ नफ़्सियाती दरयाफ़्तों में से एक है — “मैंने यह जाना कि गोया यह भी मेरे दिल में है।” यह मिसरा महज़ एक शेरी तजुर्बे का बयान नहीं — यह उस कैफ़ियत का नाम है जब कोई बात आपके अन्दर इतनी गहरी उतर चुकी हो कि आप उसे अपनी समझते ही नहीं, और फिर जब कोई दूसरा इंसान वही बात कह दे तो आप चौंक उठते हैं। वो लिखते हैं कि रट्टा लगाना कभी हिन्दुस्तान की रूह नहीं रहा। कि इस सरज़मीन ने नचिकेता को पैदा किया जिसने मौत से सवाल किया, गार्गी पैदा की जिसने ब्रह्मनों के सरदार को ख़ामोश किया, कनाद पैदा किया जिसने ऐटम का तसव्वुर दिया, सुश्रुत पैदा किया जिसने जिराही सिखाई, आर्य भट्ट पैदा किया जिसने सिफ़र दरयाफ़्त किया — और यह सब रट्टे से नहीं, सवाल से, तजुर्बे से, मुशाहिदे से, दलील से पैदा हुए। यह पढ़कर मैंने सोचा — क्या यह सिर्फ़ तअलीम की कहानी है? नहीं। यह हमारी पूरी तहज़ीबी रूह की कहानी है। अगर आज नचिकेता किसी इस्कूल में दाख़िल हो जाए तो क्या होगा? वही नचिकेता जिसने मौत के देवता यमराज के दरवाज़े पर तीन दिन और तीन रात खड़े रहकर इल्म तलब किया था। वही नचिकेता जिसके सवालों ने कठ उपनिशद को जन्म दिया। वो बच्चा जो मौत से न डरा, क्या वो हमारे निसाब की तंग गलियों में साँस ले पाता? क्या आज का उस्ताद उसकी हौसला-अफ़ज़ाई करता? क्या आज के इस्कूल में उसके लिए कोई जगह होती? या उसे यह कहकर ख़ामोश करा दिया जाता कि “यह सवाल निसाब में नहीं है, इम्तिहान में नहीं आएगा, वक़्त ज़ाया मत करो।” यह सवाल महज़ एक फ़र्ज़ी तसव्वुर नहीं। यह हमारे पूरे निज़ाम-ए-तअलीम के लिए एक बेरहम आईना है। असल मसला यह नहीं कि हमारे बच्चे क्या पढ़ रहे हैं। असल और बुनियादी मसला यह है कि हम उन्हें सोचने दे रहे हैं या नहीं। हिन्दुस्तानी इल्मी रिवायत की गहराइयाँ जब हम हिन्दुस्तानी इल्मी रिवायत की गहराइयों में उतरते हैं तो एक अनोखा और फ़ख़्र-अंगेज़ मंज़र सामने आता है। यहाँ इल्म कभी भी एक मुर्दा मालूमात का ज़ख़ीरा नहीं रहा। यहाँ सवाल इबादत था, मुकालमा तअलीम था, तलाश-ए-हक़ीक़त ज़िन्दगी का मक़सद थी। उपनिशदों के अज़ीम मुबाहिसे देखिए — जहाँ उस्ताद शागिर्द को जवाब नहीं देता था, बल्कि सवाल पूछता था। नालंदा और तक्षशिला की मेहान दर्सगाहों को देखिए जहाँ दुनिया के कोने-कोने से तालिब-ए-इल्म आते थे — न डिग्री के लिए, बल्कि इल्म की प्यास बुझाने के लिए। नालंदा में दस हज़ार से ज़ाइद तालिब-ए-इल्म और दो हज़ार असातिज़ा थे। वहाँ का कुतुब-ख़ाना इतना अज़ीम था कि जब उसे जलाया गया तो वो तीन माह तक जलता रहा। नालंदा का कुतुब-ख़ाना तीन माह तक जलता रहा — क्योंकि इल्म वहाँ काग़ज़ों में नहीं, रूहों में महफ़ूज़ था फिर ऐसा क्या हुआ? यह वो सवाल है जो हर मुहिब्ब-ए-तअलीम की नींद उड़ा देता है। ऐसा क्या हुआ कि सवाल करने वाली क़ौम रट्टा करने वाली क़ौम बन गई? 1835ء में जब लॉर्ड मैकाले ने अपना वो बदनाम-ए-ज़माना “मिनट” लिखा तो उसने सिर्फ़ एक निसाब नहीं बदला — उसने एक पूरी क़ौम के सोचने का अन्दाज़ बदल दिया। उसने लिखा कि हमें ऐसे अफ़राद चाहिएँ जो “ख़ून और रंग में हिन्दुस्तानी हों लेकिन ज़ौक़, राय, अख़्लाक़ और अक़्ल में अंग्रेज़ हों।” आहिस्ता-आहिस्ता तअलीम ज़िन्दगी की तैयारी के बजाय इम्तिहान की तैयारी बन गई। इस्कूल शख़्सियत-साज़ी के मराकिज़ के बजाय इम्तिहानी कारख़ाने बन गए। 1947ء में हमने सियासी आज़ादी हासिल की लेकिन ज़हनी आज़ादी? वो अभी भी नो-आबादियाती ज़ंजीरों में जकड़ी हुई थी। हमने इस्कूल बनाए, इमारतें बनाईं, निसाब बनाए लेकिन इंसान बनाना भूल गए आज का दौर — जब मोबाइल मालूमात देता है, मगर हिकमत नहीं आज हम एक ऐसे अहद में जी रहे हैं जहाँ एक मोबाइल फ़ोन सेकंडों में वो मालूमात फ़राहम कर सकता है जिसे कभी हासिल करने में पूरी ज़िन्दगी लग जाती थी। ऐसे में अगर हमारी तअलीम का वाहिद मक़सद मालूमात याद कराना है तो फिर उस्ताद की, इस्कूल की, यूनिवर्सिटी की ज़रूरत ही क्या रह जाएगी? World Economic Forum की 2023ء की रिपोर्ट बताती है कि अगले पाँच सालों में 23 फ़ीसद मुलाज़मतें तबदील हो जाएँगी। आज जो बच्चा पहली जमाअत में बैठा है, वो 2040ء की दुनिया में काम करेगा। McKinsey Global Institute की तहक़ीक़ के मुताबिक़ आने वाले बरसों में AI उन तमाम कामों को कर सकेगी जो महज़ “याद करने” पर मुन्हसिर हैं। जो इंसान बाक़ी रहेगा, वो वही होगा जो सोच सकता है, तख़्लीक़ कर सकता है, महसूस कर सकता है। हमने बच्चों को क्या दिया? मैंने देखा कि एक बच्चा जो घर में हज़ार सवाल पूछता है, जो परिंदों को देखकर हैरान होता है, जो आसमान की तरफ़ देखकर सितारों के बारे में पूछता है — वही बच्चा इस्कूल में आने के चंद सालों के बाद ख़ामोश हो जाता है। वो सवाल करना छोड़ देता है। क्यों? क्योंकि हमने उसे सिखा दिया कि सवाल परेशान-कुन है, ख़ामोशी क़ाबिल-ए-तअरीफ़ है। आज भी एक बच्चे की ज़हानत उसके सवालों से नहीं बल्कि उसके नम्बरों से नापी जाती है। हमने उन्हें बताया कि जवाब क्या है, मगर यह नहीं सिखाया कि जवाब तक पहुँचा कैसे जाता है। हमने उन्हें मालूमात दीं, मगर हिकमत नहीं दी। हमने मालूमात दीं, हिकमत नहीं दी — हक़ाइक़ याद कराए, हक़ीक़त तलाश करना नहीं सिखाया नम्बरों की दौड़

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नफ़रतों के अँधेरे में मुहब्बत का चराग़

भीवंडी के मुसलमानों ने इंसानियत, अख़ुव्वत और हिन्दुस्तानी तहज़ीब की एक नई तारीख़ रक़म कर दी डॉ. असदुल्लाह ख़ान आज के दौर में जब अख़बारात, टेलीविज़न और सोशल मीडिया पर हर तरफ़ नफ़रत, तअस्सुब, फ़िर्क़ापरस्ती और तक़सीम की ख़बरें ज़्यादा नुमायाँ नज़र आती हैं, ऐसे में अगर कहीं मुहब्बत, अख़ुव्वत, ख़िदमत और इंसानियत की ख़ुशबू बिखरती है तो वो सिर्फ़ एक वाक़िआ नहीं रहता बल्कि पूरी क़ौम के लिए उम्मीद का चराग़ बन जाता है। भीवंडी की सरज़मीन ने एक मर्तबा फिर साबित कर दिया कि हिन्दुस्तान की असल रूह नफ़रत में नहीं बल्कि मुहब्बत में, तक़सीम में नहीं बल्कि इत्तिहाद में, और मज़हबी बर्तरी में नहीं बल्कि इंसानी बराबरी में पोशीदा है। नीट (NEET) जैसे क़ौमी सतह के अहम इम्तिहान के मौक़े पर भीवंडी के मुसलमानों, मसाजिद, मदारिस, जमाअत ख़ानों, तअलीमी इदारों और नौजवान रज़ाकारों ने जिस अज़ीम ज़र्फ़, वसीउल-क़ल्बी और बेमिसाल मेहमान-नवाज़ी का मुज़ाहरा किया, वो सिर्फ़ एक इंतिज़ामी ख़िदमत नहीं बल्कि इंसानियत के माथे का जूमर और हिन्दुस्तान की गंगा-जमुनी तहज़ीब का रौशन इस्तिआरा बन गया। शदीद गर्मी का दिन था और मुल्क के मुख़्तलिफ़ शहरों से सैकड़ों वालिदैन अपने बच्चों को NEET के इम्तिहान दिलवाने के लिए भीवंडी पहुँचे थे। गर्मी, भीड़, ट्रैफ़िक और लम्बा इन्तिज़ार — हर शख़्स ज़हनी तौर पर एक मुश्किल दिन के लिए तैयार था, लेकिन जैसे ही वो इम्तिहानी मराकिज़ के आस-पास पहुँचे, उनके सामने एक ऐसा मंज़र था जिसकी शायद उन्होंने कभी तवक़्क़ो भी न की होगी। मसाजिद के दरवाज़े खुले हुए थे, मदारिस के हॉल मेहमानों से भरे हुए थे और जमाअत ख़ानों में पानी, चाय, कोल्ड ड्रिंक्स और नाश्ते का इन्तिज़ाम किया जा चुका था और मस्जिदें सिर्फ़ इबादत-गाहें नहीं बल्कि इंसानियत की पनाह-गाहें बन गईं। रज़ाकार हर आने वाले को अपना मेहमान समझ कर ख़ुश-आमदीद कह रहे थे। कोई यह नहीं पूछ रहा था कि आप किस मज़हब से ताल्लुक़ रखते हैं और कोई यह नहीं देख रहा था कि आप किस ज़बान या किस रियासत से आए हैं। वो सिर्फ़ एक बात जानते थे कि “ये हमारे मेहमान हैं, और मेहमान अल्लाह की रहमत होते हैं।” मौलाना ने सिर्फ़ दरवाज़े ही नहीं, अपने दिल भी खोल दिए। दारुल-उलूम दीनियात, मस्जिद और मदरसे के ज़िम्मेदारान ने सिर्फ़ हॉल मुहैया नहीं किए बल्कि एक ऐसा काम किया जिसने हज़ारों दिल जीत लिए। मौलाना क़ारी ग़ुलाम ने तलबा के कमरों को भी ख़ाली करवा दिया ताकि दूर-दराज़ से आने वाले वालिदैन चंद घंटे सुकून से आराम कर सकें। ज़मीन पर बिछी हुई सादा चटाइयाँ शायद दुनिया के किसी मँहगे होटल के नर्म बिस्तरों से कहीं ज़्यादा क़ीमती महसूस हो रही थीं, क्योंकि वहाँ आराम के साथ इज़्ज़त, एहतिराम और मुहब्बत भी मौजूद थी। यह वो जज़्बा था जो किताबों में नहीं पढ़ाया जाता, यह किरदार मदारिस की हक़ीक़ी तअलीम का आईना था। मेहँदी के चंद नक़ूश और मुहब्बत के हज़ारों रंग भीवंडी के ख़ातून रज़ाकारों ने एक ऐसा ख़ूबसूरत मंज़र भी पेश किया जिसने हर देखने वाले का दिल मोह लिया। इम्तिहान के दौरान इन्तिज़ार करती हुई हिन्दू माओं और बहनों के हाथों पर मेहँदी लगाई जा रही थी। बज़ाहिर यह एक मामूली अमल था लेकिन हक़ीक़त में यह हिन्दुस्तान की मुश्तरका तहज़ीब, भाईचारे और सक़ाफ़ती हुस्न की एक ख़ामोश मगर निहायत मुअस्सर अलामत थी। मुहब्बत का इज़हार हमेशा बड़ी तक़रीरों से नहीं होता, कभी-कभी मेहँदी का एक छोटा सा नक़्श भी दिलों के दरमियान सदियों के फ़ासले मिटा देता है। बहुत से वालिदैन ने एतिराफ़ किया कि यह उनकी ज़िन्दगी का पहला मौक़ा था जब वो किसी मस्जिद या मदरसे के अन्दर दाख़िल हुए थे। उनके ज़हनों में न जाने कितने सवाल, ख़दशात और ग़लतफ़हमियाँ थीं, लेकिन चंद लम्हों में ही वो तमाम फ़ासले ख़त्म हो गए। जब पहली मर्तबा मस्जिद में क़दम रखा तो कैफ़ियत कुछ और थी और थोड़ी ही देर में ख़ौफ़, मुहब्बत में बदल गया। सलाहुद्दीन अय्यूबी उर्दू हाई स्कूल व जूनियर कॉलेज में क़याम करने वाले ठाणे के रहाइशी नरेश शर्मा जज़्बात पर क़ाबू न रख सके। उन्होंने कहा: “हमारा ख़याल जिस मुहब्बत, इज़्ज़त और ख़ुलूस के साथ रखा गया, वो हमारी ज़िन्दगी का ना-क़ाबिल-ए-फ़रामोश तजुर्बा है। यह इंसानियत की बेहतरीन मिसाल है।” यह सिर्फ़ एक जुमला नहीं था, यह बरसों से ज़हनों में क़ायम होने वाली दीवारों के गिरने की आवाज़ थी। जब एहतिराम ने मज़हब की तमाम सरहदें मिटा दीं वो मंज़र यक़ीनन देखने वालों की आँखें नम कर देने वाला था जब कई हिन्दू बुज़ुर्गों ने मुहब्बत और एहतिराम के जज़्बे से मुतअस्सिर होकर मौलाना साहिबान के क़दम छू लिए। बाज़ ख़वातीन ने हिचकिचाते हुए कहा: “हम पहली मर्तबा मस्जिद के अन्दर आई हैं।” तो मौलाना क़ारी ग़ुलाम ने मुस्कुराते हुए फ़रमाया: “यह अल्लाह का घर है… और अल्लाह का घर सबका घर है। आप बला-झिझक अन्दर आइए, यह आपका भी अपना घर है।” यह चंद अल्फ़ाज़ शायद हज़ारों ख़ुत्बात से ज़्यादा मुअस्सर थे। असल हिन्दुस्तान यही है नरेश शर्मा की एक बात पूरे वाक़िए का ख़ुलासा बन गई। उन्होंने कहा: “बराह-ए-करम इस वाक़िए में मज़हब को दरमियान में न लाएँ। न मौलाना साहिबान ने मज़हब की बात की, न हमने। यह सिर्फ़ इंसानों की तरफ़ से इंसानों की ख़िदमत थी।” यही हिन्दुस्तान की असल पहचान है और यही वो तहज़ीब है जिसने सदियों से मुख़्तलिफ़ मज़ाहब, ज़बानों, सक़ाफ़तों और रिवायात को एक धागे में पिरो रखा है। भीवंडी ने सिर्फ़ इम्तिहान नहीं सँभाला… क़ौम को रास्ता दिखा दिया इस पूरे अमल में सिर्फ़ मसाजिद ही नहीं बल्कि रईस हाई स्कूल, समदिया हाई स्कूल, सलाहुद्दीन अय्यूबी उर्दू हाई स्कूल, मुख़्तलिफ़ जमाअत ख़ाने, दीनी इदारे और भीवंडी स्टूडेंट्स हेल्प फ़ोरम जैसे नौजवानों के गुरोह भी बराबर शरीक रहे। यह किसी एक फ़र्द या एक इदारे की ख़िदमत नहीं थी बल्कि पूरे शहर की इज्तिमाई इंसान-दोस्ती थी। यह वो सबक़ है जिसकी आज हिन्दुस्तान को सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। अब सवाल यह है कि आगे क्या? अगर भीवंडी यह मिसाल क़ायम कर सकता है तो मुल्क का हर शहर ऐसा क्यों नहीं कर सकता? अगर एक इम्तिहान के दिन मस्जिदों के दरवाज़े सबके लिए खुल सकते हैं तो फिर दूसरे मवाक़े पर क्यों नहीं? आइए हम सब चंद अमली अह्द करें: मज़हबी मक़ामात को इंसानियत के मराकिज़ बनाएँ। मसाजिद, मंदिर, गुरुद्वारे,

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मुम्बई लोकल ट्रेन का एक अलमिया, ख़ामोश मुआशरा और मरती हुई इंसानियत

डॉ. असदुल्लाह ख़ान कुछ दिन पहले पूरी दुनिया सूरज ग्रहण को देखने के लिए बेताब थी। लोग हिफ़ाज़ती चश्मे ख़रीद रहे थे, दूरबीनें लगा रहे थे और आसमान की तरफ़ नज़रें उठाए इस नादिर फ़लकियाती मंज़र का इन्तिज़ार कर रहे थे। लेकिन अफ़सोस… हम आसमान पर छाने वाले चंद लम्हों के अँधेरे को तो देख लेते हैं, मगर अपने दिलों, अपने मुआशरे और अपनी तहज़ीब पर छा जाने वाले दाइमी अँधेरे को महसूस नहीं करते। सूरज पर लगने वाला ग्रहण चंद मिनटों में ख़त्म हो जाता है, मगर इंसान के ज़मीर पर लगने वाला ग्रहण नस्लों तक बाक़ी रहता है। मुम्बई की लोकल ट्रेन में पेश आने वाला मेनक लोहार का अलमनाक क़त्ल इसी अन्दरूनी ग्रहण की एक ख़ौफ़नाक अलामत है। यह सिर्फ़ एक नौजवान की मौत नहीं, यह हमारी इज्तिमाई बेहिसी, हमारे बिखरते हुए समाजी रिश्तों और मरती हुई तहज़ीब का नौहा है। मुम्बई लोकल… सिर्फ़ ट्रेन नहीं, पूरे शहर का दिल है मुम्बई की लोकल ट्रेन को लोग महज़ एक ट्रांसपोर्ट सिस्टम समझते हैं, लेकिन हक़ीक़त में यह शहर की शह-रग है। यह रोज़ाना लाखों ख़्वाबों को अपने साथ लेकर चलती है। कोई मज़दूर अपने बच्चों की रोटी के लिए सफ़र कर रहा होता है, कोई तालिब-ए-इल्म अपने मुस्तक़बिल की तलाश में निकलता है, कोई माँ अपने बीमार बच्चे के इलाज के लिए जा रही होती है, और कोई नौजवान अपनी पहली मुलाज़मत के ख़्वाब सजा रहा होता है। कोई नौजवान अपनी पहली तनख़्वाह के ख़्वाब सजाता है। इन्हीं डब्बों में कितनी दुआएँ सफ़र करती हैं, कितनी उम्मीदें बैठती हैं, कितने मंसूबे जन्म लेते हैं। यह ट्रेन सिर्फ़ जिस्मों को नहीं बल्कि उम्मीदों, ख़्वाबों, ज़िम्मेदारियों और मुस्तक़बिल को एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक पहुँचाती है। मगर जब इसी ट्रेन के अन्दर ख़ून बहने लगे, तो समझ लीजिए कि सिर्फ़ एक मुसाफ़िर नहीं मरा, बल्कि पूरा मुआशरा ज़ख़्मी हुआ है। सिर्फ़ एक जुमला… एक दरख़्वास्त और एक ज़िन्दगी हमेशा के लिए ख़ामोश कर दी गई। मंगल, 23 जून की वो रात बज़ाहिर हर रात की तरह मामूल की थी। चर्च गेट से नालासोपारा जाने वाली फ़ास्ट लोकल अपनी रफ़्तार से दौड़ रही थी। फ़र्स्ट क्लास कोच में आम दिनों की तरह लोग बैठे थे; किसी के कानों में एयर फ़ोन थे, कोई मोबाइल पर मसरूफ़ था, और कोई थकन से ऊँघ रहा था। इसी दौरान बाईस साला मेनक लोहार ने सिर्फ़ इतनी सी गुज़ारिश की कि दरवाज़ा बंद कर दिया जाए। सोचिए… सिर्फ़ एक जुमला। सिर्फ़ एक गुज़ारिश। “बराह-ए-करम दरवाज़ा बंद कर दीजिए।” क्या किसी मुहज़्ज़ब मुआशरे में यह जुमला मौत की सज़ा बन सकता है? लेकिन मुम्बई की इस लोकल ट्रेन में ऐसा ही हुआ। यह एक मामूली दरख़्वास्त थी, लेकिन सामने खड़ा शख़्स 30 साला, मुम्बई एयरपोर्ट के कार्गो सेक्शन में काम करने वाला रोशन सूर्णा, मामूली ज़हनी कैफ़ियत में नहीं था। उसके अन्दर शायद बरसों का ग़ुस्सा, नाकामियाँ, मायूसियाँ, शराब का नशा, और अना का ज़हर जमा था। एक लम्हे में चाक़ू निकला, चंद सेकंड में कई वार हुए, और एक हँसता खेलता नौजवान हमेशा के लिए ख़ामोश हो गया। एक बाईस साला नौजवान, जिसके वालिदैन ने शायद सुबह उसे दुआओं के साथ घर से रुख़्सत किया होगा, जिसकी माँ ने शाम को उसके पसन्दीदा खाने का सोचा होगा, जिसके ख़्वाब अभी हक़ीक़त बनने ही वाले थे… चंद लम्हों में ख़ून में नहला दिया गया। क़ातिल सिर्फ़ एक शख़्स नहीं था…? अख़बारात लिखेंगे कि क़ातिल फ़लाँ शख़्स था, पुलिस चार्ज शीट दाख़िल करेगी, और अदालत सज़ा सुनाएगी। लेकिन अगर हम सिर्फ़ इतना समझकर मुतमइन हो जाएँ तो शायद हम असल मुजरिम को कभी न पहचान सकें। सवाल यह है कि इस बोगी में बैठे हुए दर्जनों मुसाफ़िर क्या कर रहे थे? क्या उनमें से कोई एक शख़्स भी आगे नहीं बढ़ सकता था? क्या चार पाँच अफ़राद मिलकर क़ातिल को क़ाबू नहीं कर सकते थे? या फिर हम उस मक़ाम पर पहुँच चुके हैं जहाँ इंसान सिर्फ़ अपनी जान बचाने का नाम है? यह ख़ामोश तमाशाई कौन थे? हम… आप… हम सब। क़ातिल सिर्फ़ एक शख़्स था… या हम सब? पुलिस अपनी कार्रवाई मुकम्मल कर लेगी। तब शायद अदालत क़ातिल को सज़ा दे। और फिर अख़बारात नई सुर्ख़ियाँ तलाश कर लेंगे। लेकिन एक सवाल शायद कभी ख़त्म न हो। जब मेनक ज़मीन पर गिरा था… जब उस पर वार हो रहे थे… जब वो ज़िन्दगी और मौत के दरमियान आख़िरी साँसें ले रहा था… तब इस बोगी में बैठे हुए दर्जनों लोग क्या कर रहे थे? क्या उनके हाथ बाँध दिए गए थे? क्या उनकी ज़बानें गूँगी हो गई थीं? या फिर उनके दिलों से इंसानियत रुख़्सत हो चुकी थी? यह सवाल सिर्फ़ उन मुसाफ़िरों से नहीं… यह सवाल हम सब से है। हम कब इतने बेबस, इतने ख़ौफ़-ज़दा और इतने ख़ुदग़र्ज़ हो गए कि एक इंसान को मरता देखकर भी ख़ामोश बैठे रहे? यही वो लम्हा था जब एक शख़्स ने चाक़ू चलाया, मगर दरहक़ीक़त पूरा मुआशरा ख़ामोश खड़ा रहा। दुनिया में सबसे ख़तरनाक आवाज़ गोली की नहीं होती… सबसे ख़तरनाक आवाज़ अच्छे लोगों की ख़ामोशी की होती है। अब हमें इंसानों से नहीं, उनके ग़ुस्से से डर लगता है आज अगर कोई शख़्स ट्रेन में बुलंद आवाज़ में मोबाइल चला रहा हो… अगर कोई बदतमीज़ी कर रहा हो… अगर कोई दूसरों को तकलीफ़ पहुँचा रहा हो… तो अक्सर लोग ख़ामोश रहते हैं। इस लिए नहीं कि वो ग़लत को सही समझते हैं। बल्कि इस लिए कि अब हमें क़ानून से ज़्यादा इंसानों के अन्दर छुपे हुए ग़ुस्से से ख़ौफ़ आने लगा है। हर शख़्स सोचता है… “अगर मैंने कुछ कहा तो?” “अगर सामने वाला ज़हनी दबाव का शिकार हुआ तो?” “अगर उसके हाथ में चाक़ू हुआ तो?” “अगर कल अख़बार में मेरी तस्वीर छप गई तो?” सोचिए… जिस मुआशरे में सही बात कहना जान का ख़तरा बन जाए, वहाँ तहज़ीब ज़िन्दा कैसे रह सकती है? यह ख़ौफ़ सिर्फ़ एक फ़र्द का नहीं, यह पूरे शहर की नफ़्सियात बन चुका है। हम सब के अन्दर एक ख़ामोश जंग जारी है। एक माहिर-ए-नफ़्सियात की नज़र से देखें तो अक्सर लोग उस बात पर ग़ुस्सा नहीं करते जिस पर वो चीख़ते हैं, असल ग़ुस्सा कहीं और होता है। कोई बेरोज़गारी से टूट चुका है, कोई

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उस्ताद को हक़ीर मत जानो!

एक एंकर के जुमले से उठने वाला तूफ़ान और क़ौम के असल मेमारों का मुक़द्दमा डॉक्टर असदुल्लाह ख़ान कभी कभी एक जुमला सिर्फ़ जुमला नहीं होता, वो एक सोच की नुमाइंदगी करता है। कभी कभी एक तब्सिरा सिर्फ़ एक फ़र्द के ख़िलाफ़ नहीं होता, वो एक पूरे तबक़े के वक़ार को चैलेंज कर देता है, और कभी कभी एक टी.वी. स्टूडियो में बोले गए चंद अल्फ़ाज़ करोड़ों दिलों में इस लिए उतर जाते हैं कि वो महज़ अल्फ़ाज़ नहीं रहते बल्कि एहतिराम और तहक़ीर के दरमियान लकीर खींच देते हैं। गुज़श्ता दिनों मारूफ़ न्यूज़ एंकर अंजना ओम कश्यप के यूट्यूब उस्ताद और ऑनलाइन मुअल्लिमीन के बारे में दिए गए तब्सिरों ने पूरे मुल्क में एक ग़ैर-मामूली बहस को जन्म दिया। मुख़्तलिफ़ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ उन्होंने बाज़ “स्टार टीचर्ज़” को महज़ “एक्सप्लेनर” क़रार देते हुए उन पर व्यूज़, शोहरत और कारोबारी मफ़ादात के हुसूल का इल्ज़ाम आइद किया। उनके इन तब्सिरों के बाद जो रद्द-ए-अमल सामने आया वो सिर्फ़ चंद उस्ताद का रद्द-ए-अमल नहीं था बल्कि लाखों तलबा, वालिदैन, तालीमी हल्क़ों और समाजी मुबस्सिरीन की आवाज़ थी। लेकिन असल सवाल अंजना ओम कश्यप नहीं हैं। असल सवाल ये है कि क्या हम वाक़ई उस्ताद की अज़मत को समझते हैं? उस्ताद को इल्म अता करने वाला कहा गया है, और इस लिहाज़ से देखा जाए तो उस्ताद सिर्फ़ एक पेशा नहीं बल्कि तमाम पेशों की बुनियाद है। इक्कीसवीं सदी में उस्ताद की अहमियत इक्कीसवीं सदी में उस्ताद की अहमियत कम नहीं, कई गुना बढ़ गई है। एक ज़माना था जब उस्ताद मालूमात का वाहिद ज़रिया था। आज गूगल है, यूट्यूब है, मसनूई ज़हानत है, हज़ारों वेबसाइट्स हैं। तो क्या उस्ताद ग़ैर-ज़रूरी हो गया? हरगिज़ नहीं। आज उस्ताद की ज़िम्मेदारी पहले से कहीं ज़्यादा बढ़ गई है क्योंकि आज का मसअला मालूमात की कमी नहीं बल्कि मालूमात का सैलाब है। आज नौजवान के पास मालूमात तो बेशुमार हैं मगर रहनुमाई कम है। आज उस्ताद सिर्फ़ सबक़ नहीं पढ़ाता। वो झूट और सच में फ़र्क़ सिखाता है। वो तन्क़ीदी सोच पैदा करता है। वो जज़्बाती इस्तिहकाम देता है। वो ख़ुद-एतमादी पैदा करता है। वो नाकामी के बाद दोबारा खड़ा होना सिखाता है। गूगल मालूमात दे सकता है, मसनूई ज़हानत जवाब दे सकती है, लेकिन एक शिकस्त-ख़ुर्दा नौजवान के कंधे पर हाथ रख कर ये सिर्फ़ उस्ताद ही कह सकता है “बेटा! तुम एक इम्तिहान में नाकाम हुए हो, ज़िंदगी में नहीं।” यूट्यूब उस्ताद पर एतमाद क्यों? हक़ीक़त ये है कि हिंदुस्तान के तालीमी मंज़रनामे में ऑनलाइन तालीम ने एक ख़ामोश इंक़िलाब बरपा किया है। एक मोतबर अख़बार ने अपने इदारिये में ये सवाल उठाया कि आख़िर लाखों तलबा यूट्यूब उस्ताद पर एतमाद क्यों करते हैं? इसका जवाब सिर्फ़ सब्सक्राइबर्ज़ या व्यूज़ में नहीं बल्कि हिंदुस्तानी तालीम की ज़मीनी हक़ीक़तों में पोशीदा है। कई दहाइयों तक आला मेयार की कोचिंग सिर्फ़ बड़े शहरों और साहिब-ए-इस्तिताअत तबक़े तक महदूद थी। अगर आज एक ग़रीब का नौजवान बग़ैर लाखों रुपये ख़र्च किए मुक़ाबला-जाती इम्तिहानात की तैयारी कर सकता है तो इसमें इन ऑनलाइन उस्ताद का भी किरदार है जिन्होंने इल्म को इमारतों से आज़ाद करके स्क्रीनों तक पहुँचा दिया। क़ौमें टी.आर.पी. से नहीं, उस्ताद से बनती हैं आपने देखा होगा कि टी.वी. मुबाहसे चंद घंटों बाद ख़त्म हो जाते हैं, सोशल मीडिया ट्रेंड चंद दिन बाद मर जाते हैं लेकिन एक उस्ताद का असर नस्लों तक ज़िंदा रहता है। तारीख़ शाहिद है कि जब जापान जंग के बाद तबाह हुआ तो उसने अपने उस्ताद को मरकज़ बनाया। जब सिंगापुर ने तरक़्क़ी की राह इख़्तियार की तो उस्ताद को इज़्ज़त दी। फ़िनलैंड के तालीमी मोजज़े की बुनियाद उस्ताद के मक़ाम पर रखी गई। किसी भी क़ौम के उरूज का रास्ता उसके तालीमी इदारों से गुज़रता है और तालीमी इदारों की रूह उस्ताद होता है। मैडम, आप तन्क़ीद कीजिए, लेकिन तहक़ीर नहीं हम मानते हैं कि हर यूट्यूबर उस्ताद नहीं होता। ये भी दुरुस्त है कि डिजिटल दुनिया में शोहरत, कारोबार और सनसनी-ख़ेज़ी के अनासिर मौजूद हैं। ये भी सही है कि कुछ ऑनलाइन तख़्लीक़-कार तनाज़ुआत और तवज्जोह हासिल करने के लिए इश्तिआल-अंगेज़ मवाद भी इस्तेमाल करते हैं, लेकिन सवाल ये है कि क्या चंद मिसालों की बुनियाद पर पूरे तबक़ा-ए-उस्ताद को मश्कूक क़रार दिया जा सकता है? अगर चंद डॉक्टर ग़लत हों तो क्या पूरी तिब्ब मश्कूक हो जाती है? अगर चंद सहाफ़ी ग़ैर-ज़िम्मेदार हों तो क्या पूरी सहाफ़त पर सवाल उठा दिया जाता है? अगर नहीं, तो फिर चंद मिसालों की बुनियाद पर लाखों मुअल्लिमीन की ख़िदमात को क्यों नज़रअंदाज़ किया जाए? इस तनाज़े का सबसे अहम पहलू वो रद्द-ए-अमल था जो तलबा की जानिब से सामने आया। सोशल मीडिया पर हज़ारों नहीं बल्कि लाखों तलबा ने अपने उस्ताद के हक़ में आवाज़ बुलंद की। किसी ने बताया कि यूट्यूब के एक उस्ताद ने उसे पहली नौकरी दिलाने में मदद की, किसी ने बताया कि वो कोचिंग की भारी फ़ीस अदा नहीं कर सकता था मगर इन्हीं उस्ताद की बदौलत उसने अपनी मंज़िल पाई। मैडम, अपने पैमाने से मत नापिए क्योंकि जिस दिन आप पहली बार क़लम पकड़ कर स्कूल गई थीं, उस दिन आपके सामने भी एक उस्ताद खड़ा था, जिस दिन आपने पहली बार बोलना, लिखना और सोचना सीखा, वहाँ भी एक उस्ताद मौजूद था। जिस दिन आप सहाफ़त की दुनिया में दाख़िल हुईं, उस दिन भी किसी उस्ताद की मेहनत आपके साथ थी। उस्ताद को हक़ीर मत जानो! माना कि दुनिया मसनूई ज़हानत के दौर में दाख़िल हो रही है। मशीनें तेज़ी से सीख रही हैं। टेक्नोलॉजी बदल रही है। तालीम के तरीक़े बदल रहे हैं, लेकिन एक चीज़ आज भी नहीं बदली। क़ौमों का मुस्तक़बिल अब भी उस्ताद के हाथ में है क्योंकि मशीनें मालूमात दे सकती हैं लेकिन किरदार नहीं बना सकतीं। मशीनें हिसाब कर सकती हैं लेकिन ख़्वाब नहीं जगा सकतीं। मशीनें जवाब दे सकती हैं लेकिन उम्मीद नहीं जगा सकतीं। ये काम आज भी सिर्फ़ उस्ताद करता है, और जो क़ौम अपने उस्ताद की इज़्ज़त नहीं करती, वो दरहक़ीक़त अपने मुस्तक़बिल की इज़्ज़त नहीं करती। उस्ताद को हक़ीर मत समझिए, क्योंकि वही वो हस्ती है जो आम इंसानों को ग़ैर-मामूली इंसान बनाती है। आख़िर में सिर्फ़ इतना अर्ज़ करना चाहूँगा कि उस्ताद को महज़ एक पेशा, एक मुलाज़मत

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डिजिटल सराब और नस्ल-ए-नौ का मुस्तक़बिल!!!

उठो! क्या अब भी वक़्त-ए-बेदारी नहीं आया? डॉक्टर असदुल्लाह ख़ान अस्र-ए-हाज़िर का सबसे बड़ा अलमिया ये है कि हमने मादी तरक़्क़ी की चकाचौंध में अपने नौनिहालों के शऊर को एक ऐसे बेरहम और बेलगाम निज़ाम के हवाले कर दिया है, जहाँ उनकी मासूमियत और वक़्त का हर लम्हा बिकाऊ माल बन चुका है। कुआलालंपुर से उठने वाली हालिया क़ानून-साज़ी की लहर—जिसके तहत 16 साल से कम उम्र बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट्स पर क़तई पाबंदी आइद कर दी गई है, महज़ एक इंतिज़ामी फ़ैसला नहीं, बल्कि आलमी सतह पर ज़मीर-ए-इंसानी की बेदारी का एक वाज़ेह ऐलान है। मलेशिया ने ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया की मानिंद मादी मफ़ादात पर इंसानी अक़दार को तरजीह देते हुए ये साबित किया है कि नस्ल-ए-नौ के फ़िक्री तहफ़्फ़ुज़ के लिए सख़्त-तरीन फ़ैसले नागुज़ीर हैं। कहीं बैन-उल-अक़्वामी अख़बार The Korea Times ने सुर्ख़ी लगाई कि मलेशिया का नौ-उम्रों पर सोशल मीडिया अकाउंट बनाने पर पाबंदी का नफ़ाज़ — एशिया में डिजिटल सियानत का नया बाब, तो जर्मनी का आलमी इदारा DW News लिखता है मलेशिया का टेक कंपनियों पर दबाव — 16 साल से कम उम्र बच्चों के अकाउंट्स पर पाबंदी, और इसने नाकामी पर भारी जुर्माने की तफ़सीली रिपोर्ट पेश की। और हमारे यहाँ भी मामला एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहाँ ये सवाल महज़ एक बहस नहीं रहा, बल्कि हमारे घरों का सुलगता हुआ मसअला बन चुका है। इंटरनेट की बेलगाम अर्ज़ानी ने हमारे समाज को शदीद स्क्रीन की लत, साइबर हरासानी और अख़्लाक़ी पसमांदगी की तरफ़ धकेल दिया है। 1- गहरे मुतालए की सलाहियत इंसानी दिमाग़ का वो हिस्सा जो मुस्तक़बिल-बीनी और ज़ब्त-ए-नफ़्स का ज़िम्मेदार है, वो लड़कपन में अभी तश्कीली मराहिल से गुज़र रहा होता है। सोशल मीडिया के लामुतनाही स्क्रॉलिंग और फ़ौरी तस्कीन के मेकानिज़्म ने बच्चों के अंदर गहरे मुतालए और पेचीदा मसाइल को हल करने की सलाहियत को मफ़लूज कर दिया है। क्या हमारी तवज्जोह और गहरे मुतालए की सलाहियत सस्ती मक़बूलियत की नज़्र हो जाएगी? इस ख़लल के ख़ात्मे से ही तलबा के अंदर इल्म की प्यास और फ़िक्री गहराई दोबारा जन्म ले सकेगी। 2- ख़्वाब-ए-ख़रगोश और जिस्मानी तवानाई का तहफ़्फ़ुज़ देर रात तक स्क्रीन की नीली रौशनी का तवाफ़ करना और वर्चुअल दुनिया की सहर-अंगेज़ी में गुम रहना बच्चों की पुर-सुकून नींद का क़त्ल-ए-आम कर रहा है। क्या आधी रात तक स्क्रीन चमकाना नींद और सुकून का क़त्ल नहीं? जब ज़ेहन इस मादी कशिश से आज़ाद होगा, तो न सिर्फ़ जिस्मानी सेहत बहाल होगी बल्कि सुबह के वक़्त क्लासरूम में बेदारी, बेहतरीन याददाश्त और आला तालीमी कारकरदगी के दर वा होंगे। 3- मायूसी के महीब साये और ज़ेहनी दबाव से नजात मौजूदा दौर का तालिब-ए-इल्म किताबी मुक़ाबलों से ज़्यादा “लाइक्स” (Likes) की गिनती और दूसरों की मसनूई ख़ुशहाली के झूटे मुज़ाहरों से ज़ेहनी तनाव का शिकार है। ऐसे वर्चुअल जाल में धँस जाना क़ौमी अलमिए से कम नहीं। मरहला-वार निज़ाम (Graded, Age-Based Framework) ताहम, एक वसीअ और कसीर-उल-सक़ाफ़ती मुल्क होने के नाते, महज़ एक मुतलक़ पाबंदी शायद “ममनूआ फल” की तरह बच्चों को चोरी-छुपे वी.पी.एन. (VPN) और मज़ीद तारीक रास्तों की तरफ़ राग़िब कर दे। लिहाज़ा, वक़्त का तक़ाज़ा है कि हम एक ज़्यादा अमली, मुंसिफ़ाना और मरहला-वार निज़ाम (Graded, Age-Based Framework) वज़ा करें। 8 से 12 साल (सख़्त-तरीन सद्द-ए-बाब और सियानत-ए-मासूमियत) ये उम्र ज़ेहन-ए-इंसानी की वो कच्ची मिट्टी है जहाँ नक़्श-ए-अव्वल क़ायम होता है। इस नाज़ुक मरहले पर तिजारती गिद्धों को बच्चों के मासूम रुझानात की मख़्फ़ी निगरानी (Data Tracking) की क़तई इजाज़त नहीं दी जा सकती। इस दौर में डिजिटल दुनिया तक रसाई सिर्फ़ और सिर्फ़ वालिदैन की हतमी, शऊरी और फ़आल रज़ामंदी से मशरूत होनी चाहिए, और रोज़ाना स्क्रीन के वक़्त (Screen Time) पर एक ऐसा कड़ा और ग़ैर-लचकदार पहरा होना चाहिए जो बचपन के फ़ितरी खेलों और रिश्तों के लम्स को तकनीकी आलूदगी से महफ़ूज़ रख सके। 12 से 16 साल (मशरूत व फ़िल्टर-शुदा रसाई और तहज़ीब-ए-नफ़्स) लड़कपन का ये दौर जज़्बात की तुग़यानी और तजस्सुस की बेबाकी का अहद होता है। यहाँ मुकम्मल ममानिअत अक्सर बग़ावत का सबब बन जाया करती है। इसलिए, यहाँ हिकमत-ए-अमली “मशरूत रसाई” होनी चाहिए। रात के सहर-अंगेज़ और तनहाई के औक़ात में, जब ज़ेहन थकावट के बाइस मग़लूब होता है, तमाम सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्ज़ पर लॉग-इन की मुकम्मल पाबंदी होनी चाहिए। मज़ीद बराँ, अल्गोरिदम के महीब पंजों पर ऐसे सख़्त अख़्लाक़ी और तहज़ीबी फ़िल्टर्ज़ नाफ़िज़ किए जाएँ जो किसी भी क़िस्म के जिन्सी, मुतशद्दिद या फ़िक्री तौर पर गुमराह-कुन मवाद को इन मासूम ज़ेहनों की दहलीज़ तक पहुँचने से पहले ही नेस्त-ओ-नाबूद कर दें। 16 से 18 साल (निगरानी के साथ ख़ुदमुख़्तारी और तामीर-ए-शख़्सियत) ये सिन-ए-बुलूग़त की वो मंज़िल है जहाँ परिंदे अपनी उड़ान का दायरा ख़ुद तय करना चाहते हैं। चुनाँचे, यहाँ हद से ज़्यादा सख़्ती शख़्सियत को मस्ख़ कर सकती है। इस उम्र में नौ-उम्रों को प्लेटफ़ॉर्म के इस्तेमाल की बज़ाहिर आज़ादी तो दी जाए, लेकिन पस-ए-पर्दा रियासत के साइबर तहफ़्फ़ुज़, सख़्त-तरीन एंटी-हरासमेंट गार्ड रेल्स और तादीबी क़वानीन का ऐसा मुस्तहकम साया मौजूद हो जो उन्हें किसी भी मुमकिना ब्लैकमेलिंग, डीपफ़ेक या ऑनलाइन इस्तिहसाल से फ़ौलादी ढाल फ़राहम कर सके। हमें ये हक़ीक़त रोज़-ए-रौशन की तरह तस्लीम करनी होगी कि नस्ल-ए-नौ और सरमाया-ए-मिल्लत की हक़ीक़ी तर्बियत महज़ निसाबी किताबों के चंद ख़ुश्क सफ़हात की मरहून-ए-मिन्नत नहीं होती। इल्म तो सिर्फ़ रौशनी दिखाता है, लेकिन इस रौशनी को मुस्तक़िल शोला बनाने के लिए एक पुर-सुकून, साज़गार और पाकीज़ा ख़ानदानी व समाजी माहौल की ज़रूरत होती है। आज जब हम एक नाज़ुक-तरीन दोराहे पर खड़े हैं, तो हमें मस्लहतों के नक़ाब उलट कर ख़ुद से, अपने दिल से और अपनी तहज़ीब से ये तल्ख़ सवाल पूछना होगा कि: क्या हम वाक़ई इतने बेबस और बेहिस हो चुके हैं कि अपने बच्चों के मासूम बचपन, उनकी ज़ेहनी परवाज़ और उनके दरख़शाँ मुस्तक़बिल को चंद मल्टीनेशनल कंपनियों के हवाले कर दें? हमें ये फ़ैसला करना होगा कि हमारे बच्चों की फ़िक्री तहारत और उनका ज़ेहनी सुकून किसी कॉर्पोरेट मुनाफ़े का मदफ़न नहीं बन सकता। हमें टेक्नोलॉजी को इंसानी तरक़्क़ी का ज़ीना बनाना है, मासूमियत का जल्लाद नहीं! हमें हर क़ीमत पर अपने नौनिहालों को इस वर्चुअल क़ैद और डिजिटल असारत से रिहा कराना ही होगा। याद रहे कि खिलौने छीन कर इन मासूम हाथों में स्क्रीन हरगिज़ ना

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छुट्टियों की नई सरमायाकारी: अस्र-ए-हाज़िर के तक़ाज़े और नई जिहतें

डॉक्टर असद अल्लाह ख़ान (मुंबई) छुट्टियों के ये सत्तर-अस्सी दिन अब महज़ “आराम का वक़्त” नहीं, बल्कि ज़िंदगी, शख़्सियत और करियर की री-स्ट्रक्चरिंग का एक सुनहरा-तरीन मौक़ा हैं। सवाल ये है कि हम इस वक़्त को स्क्रीन की नज़्र करेंगे या इसे कुंदन बनने की भट्टी बनाएँगे? बीस साल पहले का रिवायती दौर तक़रीबन दो दहाइयाँ क़ब्ल, जब तालीमी निज़ाम और समाजी साख़्त एक मुख़्तलिफ़ नहज पर थी, तब भी इस बात पर गहरा अफ़सोस ज़ाहिर किया जाता था कि मैट्रिक और इंटर के इम्तिहानात के बाद तलबा के क़ीमती औक़ात को किस तरह ज़ाया किया जाता है। बीस-तीस साल पहले के इस रिवायती दौर में एक बड़ा अलमिया ये था कि इम्तिहानात से फ़ारिग़ होते ही ज़हीन बच्चों को स्कूलों में बुला कर इम्तिहानी पर्चों की जाँच (Paper Checking) के ग़ैर-क़ानूनी और ग़ैर-अख़्लाक़ी काम में झोंक दिया जाता था। नाम-निहाद उस्ताद अपनी बोरियत और बेगार टालने के लिए बच्चों के मुस्तक़बिल और अख़्लाक़ियात को दाँव पर लगा देते थे, और मासूम तलबा इस फ़र्सूदा अमल को “ख़िदमत” समझ कर अपने सत्तर-अस्सी दिन ज़ाया कर देते थे। बीस-तीस साल पहले का वो दौर सिर्फ़ खेल-कूद, रिवायती मुतालए, समर इस्लामिक कोर्सेज़, मादरी ज़बान पर उबूर और बैंक या पोस्ट ऑफ़िस के लिए रिवायती मशवरों पर इंहिसार था, लेकिन आज आपके पास साइंसी और डिजिटल टूल्स मौजूद हैं। 1। अपने रुझान की पहचान इन छुट्टियों में सबसे पहले साइकोमेट्रिक टेस्ट (Psychometric Tests) और प्रोफ़ेशनल काउंसलिंग के ज़रिये अपने रुझान (Aptitude) और रवैये (Attitude) की पहचान करें। आज का दौर सिर्फ़ रिवायती पेशों (डॉक्टर, इंजीनियर) का नहीं है। इन छुट्टियों में डिजिटल मार्केटिंग, डेटा साइंस, बिज़नेस एनालिटिक्स, और न्यू मीडिया जैसे जदीद शोबों की बुनियादी मालूमात हासिल करें। माहिरीन से सिर्फ़ मिलना काफ़ी नहीं, बल्कि LinkedIn जैसे प्लेटफ़ॉर्म्ज़ के ज़रिये दुनिया भर के प्रोफ़ेशनल्ज़ से जुड़ें और उनके तजरबात से सीखें। 2। डिजिटल और फ़्यूचर स्किल्स (Future-Proof Skill Development) आज के दौर में सबसे बड़ी सरमायाकारी “स्किल डेवलपमेंट” है। अगर आपके पास डिग्री है लेकिन हुनर नहीं, तो आप इस मुसाबक़ती दौर में पीछे रह जाएँगे। इन छुट्टियों में ये कोर्सेज़ आपकी तरजीह होनी चाहिए: तकनीकी महारतें (Hard Skills): कोडिंग, पाइथन (Python), ग्राफ़िक डिज़ाइनिंग, वीडियो एडिटिंग, या प्रॉम्प्ट इंजीनियरिंग (Prompt Engineering) की बुनियादी बातें सीखें। शख़्सियती और फ़िक्री महारतें (Soft Skills): वक़्त की पाबंदी, तन्क़ीदी सोच और मसअला-हल करने की सलाहियत पैदा करें। 3। ग्लोबल कम्युनिकेशन और बैन-उल-अक़्वामी ज़बानें बीस साल पहले मादरी ज़बान और बुनियादी अंग्रेज़ी पर ज़ोर था, जो आज भी अहम है, लेकिन आज का दौर “ग्लोबल विलेज” का है। अंग्रेज़ी अब सिर्फ़ एक ज़बान नहीं बल्कि एक ज़रूरत बन चुकी है; इसके साथ कोई और बैन-उल-अक़्वामी ज़बान सीखना आपके मवाक़े और बढ़ा देगा। 4। फ़िक्री पुख़्तगी और अस्री इस्लामी फ़िक्र (Holistic Contemporary Islamic Vision) बदलते दौर में जहाँ इल्हाद (Atheism) और फ़िक्री इंतिशार की आँधियाँ चल रही हैं, नौजवानों के लिए अपने दीन की बुनियादी और अस्री मालूमात हासिल करना सबसे मज़बूत ढाल है। समर इस्लामिक कोर्सेज़ की अहमियत आज पहले से कहीं ज़्यादा है। लेकिन अब हमें रिवायती मालूमात से आगे बढ़ कर इस्लाम के निज़ाम-ए-हयात, इस्लामी मईशियात, और जदीद साइंसी चैलेंजेज़ के तनाज़ुर में दीन को समझना होगा। सीरत-ए-नबवी ﷺ और सीरत-ए-सहाबा रज़ि. के मुतालए से लीडरशिप स्किल्स (Leadership Skills) और बोहरानों से निपटने की हिकमत-ए-अमली (Crisis Management) सीखें, ताकि आपका किरदार सोसाइटी के लिए एक रोल मॉडल बन सके। 5। मालियाती ख़्वांदगी और जदीद निज़ाम से वाक़फ़ियत (Financial Literacy & Digital Ecosystem) बीस साल पहले पोस्ट ऑफ़िस और बैंक जाना सिखाया जाता था, मगर आज का दौर डिजिटल बैंकिंग, यू.पी.आई. (UPI), और फ़िनटेक (FinTech) का है। इन छुट्टियों में मालियाती ख़्वांदगी (Financial Literacy) सीखें। बजट बनाना, बचत करना, और सरमायाकारी के बुनियादी उसूल (मसलन स्टॉक मार्केट, म्यूचुअल फ़ंड्स, और टैक्सेशन का बुनियादी इल्म) हासिल करें। हुकूमती पोर्टल्ज़, डिजिटल दस्तख़त (Digital Signatures), और ई-गवर्नेंस के निज़ाम को समझें ताकि आप एक ज़िम्मेदार और बाशऊर शहरी बन सकें। जेब में धड़कता दुश्मन मेरे अज़ीज़ो! ज़रा रुक कर सोचो… हमारे दौर में अस्लाफ़ कहते थे कि “ख़ाली दिमाग़ शैतान का कारख़ाना होता है”। तब ख़दशा सिर्फ़ इतना था कि कोई नौजवान तनहाई में बैठ कर ख़याली पुलाव पकाएगा, खुली आँखों से कुछ अधूरे ख़्वाब देखेगा और बस! लेकिन आज? आज का ख़तरा उस पुराने दौर से हज़ार गुना ज़्यादा हौलनाक, मक्कार और सहर-अंगेज़ है! आज वो कारख़ाना कहीं बाहर नहीं, बल्कि आपकी जेब में धड़कते मोबाइल फ़ोन में मौजूद है। अगर आपने वक़्त की इस लहर को लगाम न दी… तो याद रखिए, ये स्क्रीन एडिक्शन (Screen Addiction) आपकी सोचने की सकत को चाट जाएगा! ये आपकी तवज्जोह की सलाहियत (Attention Span) को इस तरह राख कर देगा कि आप किताब का एक सफ़ा पढ़ने के लिए भी तरसेंगे। ये सुस्ती, ये बेमक़सदियत, और ये लामुतनाही स्क्रॉलिंग इंसान को गोश्त-पोस्त का इंसान नहीं रहने देती, बल्कि एक “डिजिटल ज़िंदा लाश” में तब्दील कर देती है! एक ऐसी लाश जिसका न कोई मक़सद-ए-हयात होता है, न कोई मंज़िल, और न कोई तड़प। क्या आप अपनी जवानी को इस बेरहम स्क्रीन के पिक्सल्ज़ (Pixels) की नज़्र करके एक गुमनाम मौत मरना चाहते हैं? उठिए! कुंदन बनिए नहीं! हरगिज़ नहीं! उठिए और अपने गिरेबान में झाँक कर अपने लहू की गर्मी को पहचानिए। हम मिट्टी के वो ढेर नहीं जो वक़्त के बहाव के साथ बह जाएँ। हम तो एक अज़ीम और लाज़वाल तारीख़ के अमीन हैं! हम कायनात का सबसे वाज़ेह, सबसे ख़ूबसूरत और सबसे जानदार तसव्वुर-ए-हयात रखने वाली उम्मत के फ़रज़ंद हैं! तफ़रीह ज़रूर कीजिए, लेकिन वो तफ़रीह आपके आसाब को तोड़ने वाली न हो बल्कि आपकी रूह को ताज़गी देने वाली हो। आगे बढ़िए! अपनी पोशीदा सलाहियतों को छुट्टियों के इस तपते हुए ईंधन में झोंक दीजिए। इस वक़्त को वो भट्टी बनाइए जहाँ तप कर आप सोना नहीं, बल्कि “कुंदन” बन कर निकलें! उठिए! कि वक़्त आपके अज़्म का मुंतज़िर है। (इंशा अल्लाह) डॉक्टर असद अल्लाह ख़ान Asadullahkhanschoolasadullahkhanschool.org

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तालीम की हक़ीक़ी रूह??? — The True Spirit of Education

डॉक्टर असद अल्लाह ख़ान क्या हिंदुस्तान सलाहियतों के मामले में क़हत-उल-रिजाल से गुज़र रहा है? क्या अब नेहरू या गांधी, टैगोर या विवेकानंद जैसी कोई अब्क़री शख़्सियत इस सरज़मीन पर जन्म नहीं लेगी? ये सवाल महज़ सवाल नहीं, एक तहज़ीब की चीख़ है। सवालात की लहरें क्या अब टैगोर या विवेकानंद जैसा कोई फ़लसफ़ी इस भारत वर्ष में जन्म नहीं लेगा? क्या क़ारी मोहम्मद तय्यब, मौलाना अबुल आला मौदूदी, मौलाना अहमद रज़ा ख़ाँ, मौलाना अशरफ़ अली थानवी, मौलाना अबुल हसन अली नदवी, मौलाना मोहम्मद अली जौहर, मौलाना शौकत अली, सर सय्यद अहमद ख़ान, सर रास मसूद और हकीम अब्दुल हमीद जैसी अज़ीम शख़्सियात से ये सरज़मीन ख़ाली रहेगी? क्या अब रामानुजम, डॉक्टर होमी भाभा, डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन, डॉक्टर राधाकृष्णन और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसी शख़्सियात नहीं पैदा होंगी? जब इन सवालात के कंकरों से ख़यालात की सिमटती फैलती लहरों में इर्तिआश पैदा किया गया तो सोच की लहरें वसीअ-तर होती चली गईं। ये लहरें चौंका देने वाली भी थीं और डरा देने वाली भी। ज़ेहन को सोच पर उभारने वाले और दिमाग़ पर बार-बार कचोके लगाने वाले इन सवालात की ये लहरें हस्सास ज़ेहनों को परेशानी में मुब्तला कर देती हैं। बेमक़सद तालीम का तसव्वुर… तहज़ीब-ओ-तमद्दुन के नाम पर उर्यानियत… इल्म-ओ-तअल्लुम के नाम पर फ़हाशी व बेहयाई की तरग़ीब… मेहनत-ओ-मशक़्क़त के तसव्वुर से ख़ाली बेमक़सद ज़िंदगियाँ… और दूसरी तरफ़… शोर-ओ-ग़ुल, हंगामे, हड़तालें, बंद, तोड़फोड़, फ़सादात, मारधाड़, ग़ुंडागर्दी, एनकाउंटर? इनमें से क्या नहीं है हमारे अतराफ़, हमारे घरों में, हमारे कॉलेजों और कैंपस के दामन में? क्या दर्स पा रही हैं इनसे हमारी नई और आइंदा नस्लें? ऐसे हालात में कहाँ से मिलेंगे वो फ़लसफ़ियाना अज़हान? कहाँ से मिलेंगी वो रहनुमायाना क़ाबिलियतें? कहाँ से उभरेंगी वो अब्क़री शख़्सियतें? कहाँ से आएँगी वो दानिशवराना सलाहियतें? नौजवानों का तसव्वुर-ए-हयात क्या है हमारे नौजवानों का तसव्वुर-ए-हयात? यही ना… कि वो बहुत जल्दी बहुत ही अमीर बन जाना चाहते हैं। ये मिनटों और सेकंडों में बग़ैर किसी मेहनत-ओ-जद्दोजहद के लाखों और करोड़ों के ख़्वाब देखते हैं। ये अपनी ख़याली दुनिया में आलीशान बंगले, गाड़ियाँ, होटल-बाज़ी, अय्याशी, यार-बाशी, क़ुमार-बाज़ी और मय-नोशी के सपने बुनते हैं। पुर-तअय्युश ज़िंदगी का तसव्वुर उनके रग-ओ-पय में सरायत कर चुका है। घर-घर पहुँचती मग़रिबी तहज़ीब से मुतअस्सिर उनके अज़हान मग़रिबज़दा तख़रीब का शिकार होते जा रहे हैं, और हमारी ख़ामोशी इस बढ़ते नज़रिये पर तौसीक़ की मोहर सब्त करती है। मख़्लूत तालीम के नाम पर आइए देखें राधाकृष्णन! अपने ख़्वाबों के हिंदुस्तान को जिन तालीमी तब्दीलियों के वो ख़्वाहाँ थे हम उनमें कहाँ तक कामयाब हो पाए हैं? मख़्लूत तालीम (Co-education) के नाम पर खुलम-खुला मिलाप… फिर हँसी-मज़ाक़… मर्द-ओ-ज़न के हम-आहंग क़हक़हे… दोस्ती के नाम पर हाथों का काँधों तक पहुँचना… पार्कों में सजावट बनना… रेस्तराँ में पुर-तकल्लुफ़ शामों की ख़्वाहिश… और फिर तनहाई की माँग… हम कितना आगे निकल आए हैं? कौन कहता है कि हिंदुस्तान ग़रीब मुल्क है। आइए देखें ग़रीबी हटाओ का ख़्वाब देखने वाले कि किस तरह कॉलेज जाने वाले बच्चे बेजा अख़राजात और इसराफ़ के ज़रिये अपनी अय्याशी का बिल अपने माँ-बाप के काँधों पर रख रहे हैं? दिखावा, नुमूद, नुमाइश के दलदल में कैसे धँसते जा रहे हैं? सिन्फ़-ए-मुख़ालिफ़ (Opposite Sex) से दोस्ती का ये कल्चर इतना तरक़्क़ी पा चुका है कि अब एक से ज़ाइद गर्लफ़्रेंड या बॉयफ़्रेंड रखना बाइस-ए-इज़्ज़त-ओ-इफ़्तिख़ार समझा जा रहा है। पुराने कपड़ों की तरह दोस्त बदलने का ये माहौल आख़िर किस कल्चर को फ़रोग़ दे रहा है। Rose day, Valentine day, Saree day, Tie day, Traditional day जैसे रंग-बिरंगे दिनों के इस सैलाब में हमारी नई नस्ल बहती चली जा रही है। किताबों से बेज़ारी क्योंकि अब किताबें दोस्त, साथी या हमदम-ओ-रफ़ीक़ नहीं रहीं बल्कि अब तो वो सिर्फ़ नशिस्तों और गद्दों का काम देती हैं। अब किताबों और उनके मज़ामीन पर इल्मी तब्सिरे और मुबाहसे नहीं होते बल्कि अब बेतुकी और घटिया बातों पर ला-यानी तब्सिरों और उनके इख़्तिताम पर बेढंगे क़हक़हों ने उनकी जगह ले ली है। हमारी इस Fast food Generation को किताबें खंगालने से कोई दिलचस्पी नहीं है। इन्हें तो Ready made material की लत लग चुकी है। और दूसरी तरफ़ जब बाज़ार में मौजूद घटिया क़िस्म की सस्ती किताबें इम्तिहानी ज़रूरतों को पूरा कर रही हैं तो हुसूल-ए-इल्म के लिए सर खपाने की फ़िक्र किसे हो सकती है? और अगर इससे भी बात न बने तो इम्तिहानी पर्चे को क़ब्ल-अज़-वक़्त ज़ाहिर करवा लेने का इंतिज़ाम कीजिए, अगर इस पर भी बात न बने तो इम्तिहानी मरकज़ पर नक़ल का सहारा मयस्सर कराया जा सकता है, और अगर इस पर भी बात न बने तो इम्तिहान के बाद पर्चा जाँचने वाले के घर जा कर जोड़तोड़ कीजिए। ये हैं ऊँची से ऊँची डिग्री हासिल करने के आसान मदारिज! रोल मॉडल का बोहरान टैगोर और आज़ाद को अपना रोल मॉडल मान कर बहर-उल-उलूम से सेराब होने की फ़िक्र अब किसे है? और हो भी कैसे सकती है जब उनके रोल मॉडल तो वो फ़िल्मी सितारे हैं जिनकी नक़ल में वक़्त और सरमाया दोनों ज़ाया किए जा रहे हैं। कैसी बेशर्मी है कि ग्यारहवीं जमात में पढ़ने वाली लड़की माँ की मौजूदगी में अपनी पसंद के फ़िल्मी अदाकार के लिए कुछ भी कर डालने का दावा कर रही है। ऐसे ही माहौल में तर्बियत पा कर स्कूलों और कॉलेजों की दहलीज़ें पार करने वाली लड़कियों के करतूत देख कर शरीफ़ घरानों के लोग हैरत-ओ-इस्तेजाब के समंदर में ग़र्क़ हो जाते हैं। बेहिस्सी की चादर ऐसे पुर-फ़ितन हालात में भी हम बेहिस्सी की चादर ताने ग़फ़लत में पड़े हुए हैं और इसी लिए अब हम तैयार हैं इसके नतायज भुगतने के लिए जो सामने आते जा रहे हैं। हम तो इतने बेहिस होते जा रहे हैं कि अब आए दिन अपने समाज में बढ़ती बेराह-रवी को आम होते देख कर भी नहीं शरमाते। इसे ज़िंदगी का हिस्सा समझा जाने लगा है। ऐसे हालात में क्या हम ये समझें कि अब यही हमारा कल्चर है, यही हमारी तहज़ीब है, यही हमारी सभ्यता है? आवाज़ उठाइए तालीमी बेदारी के अलमबरदारों को जगाइए और पूछिए उनसे कि क्या इसी माहौल का ईंधन बनाने के लिए हम अपने जिगर-गोशों को मैदान-ए-तालीम में आगे बढ़ाएँ? अरे साहब! अगर बुराई के इस माहौल को ख़त्म कर देने की सलाहियत आप में नहीं है

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ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शब-गज़ीदा सहर… तालीमी निज़ाम में नक़ब-ज़नी की अंदरूनी कहानी

डॉक्टर असदुल्लाह ख़ान (मुंबई) हिंदुस्तान में क़ाबिलियत और मेरिट की बालादस्ती का जो भरम बरसों से क़ायम था, वो अब मुकम्मल तौर पर चकनाचूर हो चुका है। जो बातें कभी कोचिंग सेंटर्ज़ की बंद गलियों में सरगोशियों की सूरत में सुनी जाती थीं, अब मरकज़ी तहक़ीक़ाती इदारे (CBI) ने उन्हें पूरी दुनिया के सामने बेनक़ाब कर दिया है। क़ौमी अहलियत व दाख़िला टेस्ट (NEET-UG 2026) अब ज़हानत, मेहनत और रातों की बेदारी का इम्तिहान नहीं रहा, बल्कि ये एक ऐसी खुली नीलामी बन चुका है जहाँ मुस्तक़बिल के डॉक्टरों ने अपनी डिग्रियाँ और स्टेथोस्कोप (Stethoscopes) मेहनत से नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये नक़द दे कर ख़रीदे। लातूर का गठजोड़ — दो मरकज़ी किरदार इस मुनज़्ज़म और शर्मनाक घपले के पीछे महाराष्ट्र में कोचिंग के सबसे बड़े गढ़, लातूर का एक ख़तरनाक गठजोड़ काम कर रहा था। इस गैंग के दो मरकज़ी किरदार हैं — पहला श्री पी. वी. कुलकर्णी (NTA का साबिक़ इनसाइडर और रिटायर्ड केमिस्ट्री प्रोफ़ेसर) और दूसरा शिवराज मोटीगाँवकर (रीनाकाई केमिस्ट्री क्लासेज़ — RCC का अरबपति मालिक)। इस साज़िश के तरीक़ा-कार ने हमारे पूरे इम्तिहानी ढाँचे की कमज़ोरियों को नंगा कर दिया है। पी. वी. कुलकर्णी कोई आम दलाल नहीं था; उसने अपने चुनिंदा तलबा को एक बंद कमरे में जमा किया, जहाँ उनके मोबाइल फ़ोन ज़ब्त कर लिए गए (ताकि कोई तस्वीर खींच कर सोशल मीडिया पर वायरल न कर दे)। कुलकर्णी ने ख़ुद एक एक सवाल, उसके चारों ऑप्शन्ज़ और दुरुस्त जवाबात (Answer Keys) तलबा को ज़बानी लिखवाए। बच्चों ने उन्हें सादा नोटबुक्स पर अपने हाथ से लिखा। सी.बी.आई. ने बाद में यही नोटबुक्स बरामद कीं, जिनके सवालात NTA के असल पेपर से 100 फ़ीसद मैच कर रहे थे। अवाम के लिए “गेस पेपर” का ड्रामा — The Mass Track दूसरी तरफ़ एक ड्रामा रचा गया जिसमें अवाम के लिए “गेस पेपर” का खेल था। यहीं से शिवराज मोटीगाँवकर और उसके इदारे “RCC” का गंदा खेल शुरू होता है। मोटीगाँवकर और कुलकर्णी पुराने वाक़िफ़कार थे, लेकिन माज़ी में उनके दरमियान शदीद कारोबारी दुश्मनी थी। मगर इस बार, करोड़ों रुपये कमाने के लिए दोनों ने पुरानी दुश्मनी भुला कर हाथ मिला लिया। मोटीगाँवकर ने इस चोरी-शुदा पेपर को बराह-ए-रास्त बाँटने के बजाय, इसके 42 बिल्कुल असल सवालात को अपने कोचिंग इंस्टिट्यूट के आख़िरी “मॉक टेस्ट” (Mock Test) में शामिल कर दिया। उसने अपने हज़ारों तलबा को बताया कि ये उसकी “बरसों की महारत और पेशगोई” का नतीजा है। मक़सद ये था कि जब असल इम्तिहान में यही सवालात आएँ, तो उसके इदारे का “नतीजा” शानदार दिखे और अगले साल और ज़्यादा बच्चे उसकी मोटी फ़ीस अदा करके दाख़िला लें। क़ीमत — करोड़ों की बोली सी.बी.आई. के छापों में एक तरफ़ ये भी सामने आया कि लातूर के एक नामवर ताजिर के घर पर छापा मारा गया जिसने अपनी बेटी के लिए 5 लाख रुपये नक़द दिए थे। जबकि राजस्थान के सीकर (Sikar) और जयपुर में एक एक पेपर की क़ीमत 10 से 15 लाख रुपये वसूल की जा रही थी। सी.बी.आई. ने अब तक जयपुर, सीकर, गुरुग्राम, नासिक, पुणे और अहिल्या नगर से 9 कलीदी मुलज़िमान को गिरफ़्तार किया है, जो इस इम्तिहानी चोरी को एक कॉर्पोरेट बिज़नेस की तरह चला रहे थे। 24 लाख ख़्वाबों का इज्तिमाई क़त्ल इस बदउनवान और ग़लीज़ निज़ाम का सबसे बड़ा और दर्दनाक ख़मियाज़ा मुल्क के मासूम और मेहनती तलबा को भुगतना पड़ा। जब पेपर बड़े पैमाने पर लीक हुआ, तो हुकूमत को मजबूरन 12 मई को ये इम्तिहान मंसूख़ करना पड़ा और अब दोबारा इम्तिहान (Re-exam) लेने का ऐलान किया गया है। 24 लाख तलबा का मुस्तक़बिल दाँव पर लगा दिया गया। मुल्क भर के 24 लाख से ज़ाइद मेडिकल के ख़्वाहिशमंद तलबा, जिन्होंने दिन रात एक करके पढ़ाई की थी, आज ज़ेहनी अज़ियत का शिकार हैं। ग़रीब ख़ानदानों पर मआशी बोझ अलग पड़ा। दोबारा इम्तिहान देने के लिए लाखों ग़रीब और मुतवस्सित तबक़े के ख़ानदानों को दोबारा सफ़र, होटल और ट्रांसपोर्ट के अख़राजात बर्दाश्त करने पड़ रहे हैं, जिनकी जेबें पहले ही ख़ाली हो चुकी हैं। एक ईमानदार बच्चे को बार-बार यही समझाया जाता है कि “अगर मैं मेहनत करूँगा, तो मुझे मेरा हक़ मिलेगा।” लेकिन ये उम्मीद एक धोका है! ये एक ऐसा जाल है जिसमें ईमानदार बच्चों को सिर्फ़ उलझाए रखा जाता है, जबकि मेडिकल की असल सीटें पुणे के बंद कमरों और लातूर के लग्ज़री कोचिंग सेंटर्ज़ में पहले ही फ़रोख़्त हो चुकी होती हैं। कुलकर्णी और मोटीगाँवकर जैसे लोग उस्ताद नहीं, तालीमी माफ़िया के सरग़ना हैं। उन्होंने लाखों बच्चों के ख़ून-पसीने और उनके आँसुओं पर अपनी तिजोरियाँ भरीं। जब एक किसान का बेटा गाँव की मद्धम रौशनी में केमिस्ट्री के फ़ार्मूले रट रहा था, उस वक़्त एक अमीर डॉक्टर का बेटा पुणे के एक बंगले में चाय की चुस्कियाँ लेते हुए असल इम्तिहानी पेपर अपनी कॉपी में उतार रहा था। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) एक नाकाम और खोखला इदारा बन चुकी है, जिसे चंद लालची दलाल जब चाहें अपने इशारों पर नचा सकते हैं। सिर्फ़ सी.बी.आई. की इन्क्वायरी बिठा देना या अगले साल से कंप्यूटर पर टेस्ट ले लेना इस कैंसर का इलाज नहीं है। वक़्त आ गया है कि इस सरमायादाराना कोचिंग कल्चर को जड़ से उखाड़ फेंका जाए जिसने तालीम को एक मंडी बना दिया है। अगर ये हुकूमत और ये निज़ाम बच्चों के लिए एक इम्तिहानी पेपर की हिफ़ाज़त नहीं कर सकता—तो हम इसे एक ख़ुदकुशी कहेंगे, या इस करप्ट तालीमी निज़ाम के हाथों एक एलानिया क़त्ल? पेपर ख़रीदने वाले अमीर डॉक्टरों और सरमायादारों से: जब आपके बच्चे चोरी के पेपर्ज़ और बैसाखियों के सहारे डॉक्टर बनेंगे, तो वो कल हस्पतालों में मरीज़ों का इलाज करेंगे या इंसानी जानों का सौदा करके इस चोरी की क़ीमत वसूल करेंगे? अगर इस मुल्क में एक ग़रीब का बच्चा अपनी क़ाबिलियत, दिन रात की मेहनत और ईमानदारी के बलबूते पर एक मुअज़्ज़ज़ पेशा इख़्तियार नहीं कर सकता, तो फिर ये “बराबरी और मेरिट” का आईनी वादा सिर्फ़ किताबों की ज़ीनत क्यों है? क्या अब क़ाबिलियत का मेयार सिर्फ़ और सिर्फ़ बैंक बैलेंस रह गया है? — डॉक्टर असदुल्लाह ख़ान, मुंबई Asadullahkhanschoolasadullahkhanschool.org

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ख़ामोश इर्तिक़ा या डूबता हुआ मुस्तक़बिल… ख़लील-ए-वक़्त! तेरी ख़ामोशी देखी नहीं जाती

डॉक्टर असद अल्लाह ख़ान (मुंबई) — 09967893333 तालीम सिर्फ़ किताब, क्लासरूम और इम्तिहान का नाम नहीं; तालीम वो चराग़ है जिससे क़ौमें अपना रास्ता पहचानती हैं, वो आईना है जिसमें तहज़ीब अपना चेहरा देखती है, और वो तराज़ू है जिस पर मुआशरे के शऊर, किरदार और मुस्तक़बिल का वज़न किया जाता है। इम्तिहानी नतायज महज़ नंबर नहीं होते, ये नस्लों की सम्त, घरों की तरजीहात, वालिदैन की फ़िक्र, बच्चों की नफ़सियात और समाज की ख़ामोश तब्दीलियों का ऐलान होते हैं। मार्कशीट एक काग़ज़ ज़रूर है, मगर कभी कभी यही काग़ज़ पूरी तहज़ीब का समाजी एक्सरे बन जाता है। एक मानी-ख़ेज़ मंज़र — बेटियाँ आगे, बेटे कहाँ? आज हिंदुस्तान के तालीमी उफ़ुक़ पर एक निहायत मानी-ख़ेज़ मंज़र उभर रहा है। हमारी बेटियाँ मुसलसल आगे बढ़ रही हैं, कामयाबी के ज़ीने तय कर रही हैं, बोर्ड इम्तिहानात में नुमायाँ मक़ाम हासिल कर रही हैं, और अपनी मेहनत, नज़्म-ओ-ज़ब्त, इस्तिक़ामत और ख़ुद-एतमादी से ये साबित कर रही हैं कि जब लड़की को मौक़ा मिलता है तो वो सिर्फ़ अपना नहीं, पूरे ख़ानदान और मुआशरे का मुस्तक़बिल रौशन कर सकती है। लेकिन इसी रौशन मंज़र के पस-मंज़र में एक गहरा सवाल भी सर उठा रहा है: हमारे बेटे कहाँ जा रहे हैं? आदाद के पर्दे के पीछे एक और दास्तान भी लिखी जा रही है — एक ख़ामोश मगर मुसलसल बढ़ती हुई ख़लीज की दास्तान। हर साल तालिबात, तलबा से आगे निकल रही हैं। कभी तीन फ़ीसद, कभी चार, कभी छह फ़ीसद। ये फ़र्क़ मामूली नहीं। ये महज़ इम्तिहानी बरतरी नहीं, बल्कि नफ़सियाती, समाजी, तहज़ीबी और फ़िक्री तब्दीली का इस्तिआरा है। ये नतायज अपनी ज़बान-ए-हाल से पुकार पुकार कर कह रहे हैं कि हमारी बेटियाँ वक़्त की रफ़्तार को समझ चुकी हैं। वो जान चुकी हैं कि तालीम सिर्फ़ नंबर लेने का अमल नहीं बल्कि अपनी शनाख़्त, ख़ुदमुख़्तारी, इज़्ज़त और मुस्तक़बिल की जंग है। इसी लिए वो ख़ामोशी से मेहनत कर रही हैं, मुसलसल आगे बढ़ रही हैं, और हर साल कामयाबी के उफ़ुक़ पर अपना नाम और रौशन कर रही हैं। और दूसरी तरफ़… हमारे बहुत से बेटे डिजिटल ख़लफ़शार, बे-मक़सद मसरूफ़ियात, फ़ौरी लज़्ज़तों और ज़ेहनी इंतिशार के ऐसे जंगल में भटक रहे हैं जहाँ रास्ते कम और सराब ज़्यादा हैं। ये आदाद-ओ-शुमार हमें सिर्फ़ नतायज नहीं बता रहे, बल्कि हमें आईना दिखा रहे हैं। वो आईना जिसमें एक तरफ़ बेटियों की बेदार आँखें हैं, और दूसरी तरफ़ बेटों की बिखरती हुई तवज्जोह। ये ख़ामोश फ़र्क़ अगर इसी रफ़्तार से बढ़ता रहा तो आने वाले बरसों में एक नया समाजी असंतुलन पैदा हो सकता है। लड़कियाँ तालीम को सिर्फ़ डिग्री नहीं समझतीं; वो इसे आज़ादी का रास्ता, इज़्ज़त का ज़रिया, माली ख़ुदमुख़्तारी का दरवाज़ा और समाजी वक़ार की ज़मानत समझती हैं। यही वजह है कि उनके अंदर एक गहरी अंदरूनी तहरीक पैदा होती है। वो जानती हैं कि किताब उनके हाथ में आए तो क़िस्मत बदल सकती है, क़लम उनके हाथ में आए तो नस्लें सँवर सकती हैं, और तालीम उनके हिस्से में आए तो घर, ख़ानदान और मुआशरा सब बदल सकते हैं। बेटों का ख़ामोश इंख़ला दूसरी तरफ़ हमारे बहुत से लड़के फ़ौरी मआशी फ़ायदे, ख़ानदानी कारोबार, जल्द रोज़गार, ऑनलाइन गेमिंग, सोशल मीडिया और डिजिटल फ़रारियत के भँवर में उलझते जा रहे हैं। वो लंबी तालीमी जद्दोजहद से उकता जाते हैं, फ़ौरी नतीजा चाहते हैं, मगर इल्म का सफ़र फ़ौरी तालियाँ नहीं देता; वो सब्र, मेहनत, तसलसुल और मक़सद माँगता है। क्या हमने लड़कों को मक़सद दिया? क्या हमने उनके लिए मज़बूत तालीमी रोल मॉडल्स तैयार किए? क्या हमने उन्हें बताया कि मर्दानगी सिर्फ़ कमाने का नाम नहीं, बल्कि शऊर, किरदार, ज़िम्मेदारी और इल्म का नाम भी है? आज लड़कियों की तालीमी तरक़्क़ी ख़ुश-आइंद है, क़ाबिल-ए-फ़ख़्र है, क़ाबिल-ए-तहसीन है। लेकिन अगर इसी के साथ लड़कों की इल्मी बेज़ारी बढ़ती रही तो ये एक अधूरा इंक़िलाब बनकर रह जाएगा। बेटियों की तालीम — क़ौम की बक़ा की शर्त हमें ये बात पूरी क़ुव्वत से माननी होगी कि लड़कियों की तालीम किसी क़ौम पर एहसान नहीं, बल्कि क़ौम की बक़ा की शर्त है। एक तालीमयाफ़्ता औरत सिर्फ़ ख़ुद नहीं सँवरती; वो घर सँवारती है, नस्ल सँवारती है, मुआशरा सँवारती है। एक बाशऊर माँ आने वाली नस्लों की पहली दर्सगाह होती है। अगर माँ तालीमयाफ़्ता हो तो घर का माहौल बदलता है, बच्चों की ज़बान बदलती है, सोच बदलती है, अख़्लाक़ बदलते हैं और मुस्तक़बिल बदलता है। बेटियों को आगे बढ़ाना और बेटों को पीछे छोड़ देना तरक़्क़ी नहीं, अदम-तवाज़ुन है। क़ौमें तब मज़बूत होती हैं जब उनकी बेटियाँ भी तालीमयाफ़्ता हों और बेटे भी मक़सद-शनास हों। अगर बेटियाँ इल्म की बुलंदियों पर हों और बेटे बे-सम्ती, लत, बेज़ारी और कम-हौसलगी का शिकार हों तो ये तरक़्क़ी नहीं, एक अधूरा इंक़िलाब है। आज की ज़रूरत — तवाज़ुन की हिकमत आज ज़रूरत है कि हम लड़कियों की तालीम को और मज़बूत करें, उनके लिए महफ़ूज़ तालीमी माहौल बनाएँ, उन्हें आला तालीम और अमली ज़िंदगी में आगे बढ़ने के मवाक़े दें। साथ ही लड़कों के लिए Mentorship Programs, Vocational Integration, Digital Discipline और Purpose-based Education को तालीमी निज़ाम का लाज़िमी हिस्सा बनाएँ। और अगर हमने क्लासरूम को इंसान-साज़ी का मरकज़ न बनाया तो कल डिग्रियाँ होंगी, मगर किरदार कमज़ोर होगा; नौकरियाँ होंगी, मगर मक़सद ग़ायब होगा; कामयाबी होगी, मगर सुकून नहीं होगा। इसलिए हमें आज ही अहद करना होगा कि तालीम को सिर्फ़ इम्तिहान नहीं रहने देंगे, इसे तहरीक बनाएँगे; इसे सिर्फ़ रोज़गार नहीं रहने देंगे, इसे किरदार बनाएँगे; इसे सिर्फ़ डिग्री नहीं रहने देंगे, इसे तहज़ीब की तामीर का ज़रिया बनाएँगे। क़ौमें उस वक़्त तरक़्क़ी करती हैं जब वो अपनी बेटियों को तालीम देती हैं, मगर तहज़ीबें उस वक़्त महफ़ूज़ रहती हैं जब वो अपने बेटों को भी गुम होने नहीं देतीं। भारत का मुस्तक़बिल किसी दफ़्तर की फ़ाइल में नहीं, किसी पॉलिसी के सफ़े पर नहीं, किसी तक़रीर के नारे में नहीं; भारत का मुस्तक़बिल इसके क्लासरूम में बैठे बच्चों की आँखों में लिखा जा रहा है। और ख़लील-ए-वक़्त! अगर हमने इस तहरीर को आज न पढ़ा, तो कल तारीख़ हमें मुआफ़ नहीं करेगी। — डॉक्टर असद अल्लाह ख़ान, मुंबई Asadullahkhanschoolasadullahkhanschool.org

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नौजवान, ख़ुदकुशी और हमारी इज्तिमाई बे-हिस्सी का अलमिया

डॉक्टर असदुल्लाह ख़ान (मुंबई) इंसानी तहज़ीब की तारीख़ में बाज़ अदवार ऐसे आते हैं जब मुआशरे बज़ाहिर तरक़्क़ी की मेराज पर होते हैं मगर अंदर से शिकस्त-ओ-रेख़्त का शिकार हो चुके होते हैं। सड़कें रौशन होती हैं मगर ज़ेहन तारीक, इमारतें बुलंद होती हैं मगर किरदार पस्त, मालूमात का समंदर मौजज़न होता है मगर रूहें प्यासी रह जाती हैं। आज हम एक ऐसे ही अहद के मुसाफ़िर हैं—एक ऐसा दौर जहाँ इंसान ने चाँद पर क़दम रख दिया मगर अपने ही दिल की वीरानी को आबाद न कर सका। जहाँ Artificial Intelligence ने हैरतअंगेज़ तरक़्क़ी कर ली मगर इंसानी जज़्बात की शिकस्तगी का इलाज अब भी नायाब है। जहाँ राबते बेशुमार हैं मगर ताल्लुक़ात मर चुके हैं। जहाँ हर हाथ में स्मार्टफ़ोन है मगर हर दिल में ख़ामोश इज़्तिराब। और सबसे बड़ा अलमिया ये है कि इस तहज़ीबी तूफ़ान का सबसे पहला शिकार हमारी नौजवान नस्ल बन रही है। ये वो नस्ल है जिसके काँधों पर मुस्तक़बिल की तामीर थी, मगर आज वही नस्ल ज़ेहनी दबाव, वुजूदी बोहरान, तालीमी ख़ौफ़, डिजिटल इंतिशार और रूहानी ख़ला के बोझ तले ख़ामोशी से बिखर रही है। आज का नौजवान बज़ाहिर हँसता है मगर अंदर से टूटा हुआ है। वो दोस्तों के हुजूम में जितना घिरता जा रहा है, उतना ही तनहा होता जा रहा है। उसकी मुस्कुराहट और उसके अंदर के बोहरान के दरमियान एक गहरी ख़लीज है जो दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। और ये तनहाई, ये ख़ामोश घुटन, धीरे-धीरे उसे उस मोड़ पर ले आती है जहाँ ज़िंदगी ख़ुद एक बोझ महसूस होने लगती है। हालिया बरसों में हिंदुस्तान भर से नौजवानों की ख़ुदकुशी के वाक़ियात पूरे मुआशरे की रूह को ज़ख़्मी कर रहे हैं, और इन्हें अक्सर तालीमी निज़ाम के पैदा करने वाले ज़ेहनी बोहरान से जोड़ा जा रहा है। उधर राजस्थान के कोचिंग मरकज़ “कोटा” में 2024 के दौरान दर्जनों तलबा ने ख़ुदकुशी की, जिनमें कई NEET और JEE के उम्मीदवार थे। बोर्ड इम्तिहानात के नतायज, NEET और JEE जैसे मुक़ाबला-जाती इम्तिहानात, कोचिंग कल्चर, वालिदैन की ग़ैर-महसूस तवक़्क़ुआत, सोशल मीडिया का तक़ाबुली ज़हर, और मुस्तक़बिल का ख़ौफ़—ये सब मिलकर नौजवान ज़ेहनों को एक ऐसे नफ़सियाती शिकंजे में क़ैद कर रहे हैं जहाँ बाज़ औक़ात एक नतीजा पूरी ज़िंदगी से बड़ा महसूस होने लगता है। एक काग़ज़ का लीक होना दरअसल लाखों ख़्वाबों का लीक होना था। एक इम्तिहान का Cancel होना सिर्फ़ Academic Crisis नहीं था बल्कि Emotional Collapse था। कोसा मुंब्रा का सदमा और ऐन उसी हंगामा-ए-इज़्तिराब में, कोसा मुंब्रा की फ़िज़ा से उठने वाली एक ख़बर ने जैसे पूरे मुआशरे की रूह को लरज़ा दिया। एक ऐसी ख़बर जिसने दिलों की धड़कनों को मुंजमिद और सोच की रगों को सुन्न कर दिया। एक नौजवान डॉक्टर… महज़ अट्ठाईस, तीस बरस की उम्र… तीन मासूम बच्चों की माँ… वही डॉक्टर जिसने कोरोना की तारीक-तरीन रातों में ख़ौफ़ के बजाय ख़िदमत का चराग़ जलाए रखा, जो मौत के साये में भी लोगों की ज़िंदगी बचाने के लिए दिन-रात अस्पतालों में खड़ी रही, जिसने अपने सुकून, अपनी नींद, अपनी राहत सब इंसानियत के नाम कर दिए— मगर शायद अपनी ही रूह की ख़ामोश थकन को कोई न देख सका। वो तालीम जो इंसान बना नहीं रही, सिर्फ़ मुक़ाबला पैदा कर रही है। हम बच्चों को याददाश्त ज़रूर दे रहे हैं मगर बसीरत नहीं। हम उन्हें नंबर्ज़ सिखा रहे हैं मगर सब्र नहीं। हम उन्हें Career दे रहे हैं मगर Character नहीं। आज एक तालिब-ए-इल्म किताब से ज़्यादा Comparison से ख़ौफ़ज़दा है। वो निसाब से कम और Expectations से ज़्यादा दबाव में है। उसे ये नहीं सिखाया गया कि नाकामी ज़िंदगी का इख़्तिताम नहीं, कम नंबर इंसान की क़ीमत का पैमाना नहीं, और एक इम्तिहान ख़ुदा का आख़िरी फ़ैसला नहीं। आज का नौजवान महज़ इम्तिहान नहीं दे रहा, वो वालिदैन की उम्मीदों का बोझ उठा रहा है, मुआशरे की दौड़ में अपनी शनाख़्त तलाश कर रहा है, डिजिटल दुनिया में अपनी हैसियत साबित करने की कोशिश कर रहा है, और ख़ामोशी से Anxiety, Depression और Emotional Burnout से लड़ रहा है। इस्लाम की नज़र में इंसान… नंबर नहीं, अमानत है इस्लाम इंसान को सिर्फ़ जिस्म नहीं बल्कि रूह, शऊर, जज़्बात और अमानत समझता है। “وَلَقَدْ كَرَّمْنَا بَنِي آدَمَ” (और यक़ीनन हमने औलाद-ए-आदम को इज़्ज़त बख़्शी) इस्लाम ने ख़ुदकुशी को हराम क़रार दिया क्योंकि ज़िंदगी इंसान की मिल्कियत नहीं बल्कि अल्लाह की अता-कर्दा अमानत है, “وَلَا تَقْتُلُوا أَنفُسَكُمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ كَانَ بِكُمْ رَحِيمًا” लेकिन इस्लाम सिर्फ़ हराम क़रार देकर ख़ामोश नहीं हो जाता बल्कि उस दर्द को भी समझता है। इस्लाम जानता है कि बाज़ औक़ात इंसान का ज़ेहन इस क़दर ज़ख़्मी हो जाता है कि उसकी सोचने, बर्दाश्त करने और फ़ैसला करने की सलाहियत मुतअस्सिर हो जाती है। इसी लिए किसी मरहूम के बारे में आख़िरी फ़ैसले सादिर करना दीन की रूह के ख़िलाफ़ है। इस्लाम का मिज़ाज नफ़रत नहीं, रहमत है। इंसान भी अगर चाहे तो दुनिया बदल सकता है, मगर शर्त ये है कि वो अपनी तवानाई को फ़ुज़ूल मशाग़िल से निकाले, अपनी रूह को मक़सद से जोड़े, और अपनी ज़ात को महज़ “Career” नहीं बल्कि “Mission” बनाए। लेकिन आज इंसान के पास वक़्त कम नहीं, इर्तिकाज़ कम है। मसअला ये नहीं कि नौजवान पढ़ना नहीं चाहते, मसअला ये है कि उनके ज़ेहन हज़ार टुकड़ों में तक़सीम हो चुके हैं। मुख़्तसर वीडियोज़, मुसलसल Notifications, ऑनलाइन गेमिंग, मसनूई शोहरत, Virtual Validation—ये सब नौजवान ज़ेहन को इस हद तक मुंतशिर कर रहे हैं कि गहरी सोच, मुतालआ, सब्र और यकसूई नापैद होती जा रही है। आज नौजवान, हज़ारों Followers रखते हैं मगर एक मुख़्लिस दोस्त नहीं, रोज़ाना घंटों Scroll करते हैं मगर ख़ुद को नहीं पढ़ते, हर चीज़ जानते हैं मगर ख़ुद को नहीं जानते। ये सिर्फ़ Attention Crisis नहीं, ये Identity Crisis है। इक़बाल का शाहीन और आज का नौजवान अल्लामा इक़बाल ने नौजवान को शाहीन से तश्बीह दी थी क्योंकि शाहीन, बुलंदी का आशिक़ होता है, मुर्दार पर नहीं जीता, आँधियों से घबराता नहीं, और तनहाई में अपनी क़ुव्वत पैदा करता है। नहीं है नाउम्मीद इक़बाल अपनी किश्त-ए-वीराँ सेज़रा नम हो तो ये मिट्टी बहुत ज़रख़ेज़ है साक़ी— अल्लामा इक़बाल इस्लाम मायूसी का मज़हब नहीं “لَا تَقْنَطُوا مِن رَّحْمَةِ اللَّهِ” (अल्लाह की रहमत से नाउम्मीद न हो) ज़िंदगी

नौजवान, ख़ुदकुशी और हमारी इज्तिमाई बे-हिस्सी का अलमिया Read More »