ख़ामोश इर्तिक़ा या डूबता हुआ मुस्तक़बिल… ख़लील-ए-वक़्त! तेरी ख़ामोशी देखी नहीं जाती

डॉक्टर असद अल्लाह ख़ान (मुंबई) — 09967893333

तालीम सिर्फ़ किताब, क्लासरूम और इम्तिहान का नाम नहीं; तालीम वो चराग़ है जिससे क़ौमें अपना रास्ता पहचानती हैं, वो आईना है जिसमें तहज़ीब अपना चेहरा देखती है, और वो तराज़ू है जिस पर मुआशरे के शऊर, किरदार और मुस्तक़बिल का वज़न किया जाता है।

इम्तिहानी नतायज महज़ नंबर नहीं होते, ये नस्लों की सम्त, घरों की तरजीहात, वालिदैन की फ़िक्र, बच्चों की नफ़सियात और समाज की ख़ामोश तब्दीलियों का ऐलान होते हैं। मार्कशीट एक काग़ज़ ज़रूर है, मगर कभी कभी यही काग़ज़ पूरी तहज़ीब का समाजी एक्सरे बन जाता है।

एक मानी-ख़ेज़ मंज़र — बेटियाँ आगे, बेटे कहाँ?

आज हिंदुस्तान के तालीमी उफ़ुक़ पर एक निहायत मानी-ख़ेज़ मंज़र उभर रहा है। हमारी बेटियाँ मुसलसल आगे बढ़ रही हैं, कामयाबी के ज़ीने तय कर रही हैं, बोर्ड इम्तिहानात में नुमायाँ मक़ाम हासिल कर रही हैं, और अपनी मेहनत, नज़्म-ओ-ज़ब्त, इस्तिक़ामत और ख़ुद-एतमादी से ये साबित कर रही हैं कि जब लड़की को मौक़ा मिलता है तो वो सिर्फ़ अपना नहीं, पूरे ख़ानदान और मुआशरे का मुस्तक़बिल रौशन कर सकती है।

लेकिन इसी रौशन मंज़र के पस-मंज़र में एक गहरा सवाल भी सर उठा रहा है: हमारे बेटे कहाँ जा रहे हैं? आदाद के पर्दे के पीछे एक और दास्तान भी लिखी जा रही है — एक ख़ामोश मगर मुसलसल बढ़ती हुई ख़लीज की दास्तान।

हर साल तालिबात, तलबा से आगे निकल रही हैं। कभी तीन फ़ीसद, कभी चार, कभी छह फ़ीसद। ये फ़र्क़ मामूली नहीं। ये महज़ इम्तिहानी बरतरी नहीं, बल्कि नफ़सियाती, समाजी, तहज़ीबी और फ़िक्री तब्दीली का इस्तिआरा है।

ये नतायज अपनी ज़बान-ए-हाल से पुकार पुकार कर कह रहे हैं कि हमारी बेटियाँ वक़्त की रफ़्तार को समझ चुकी हैं। वो जान चुकी हैं कि तालीम सिर्फ़ नंबर लेने का अमल नहीं बल्कि अपनी शनाख़्त, ख़ुदमुख़्तारी, इज़्ज़त और मुस्तक़बिल की जंग है। इसी लिए वो ख़ामोशी से मेहनत कर रही हैं, मुसलसल आगे बढ़ रही हैं, और हर साल कामयाबी के उफ़ुक़ पर अपना नाम और रौशन कर रही हैं।

और दूसरी तरफ़… हमारे बहुत से बेटे डिजिटल ख़लफ़शार, बे-मक़सद मसरूफ़ियात, फ़ौरी लज़्ज़तों और ज़ेहनी इंतिशार के ऐसे जंगल में भटक रहे हैं जहाँ रास्ते कम और सराब ज़्यादा हैं।

ये आदाद-ओ-शुमार हमें सिर्फ़ नतायज नहीं बता रहे, बल्कि हमें आईना दिखा रहे हैं। वो आईना जिसमें एक तरफ़ बेटियों की बेदार आँखें हैं, और दूसरी तरफ़ बेटों की बिखरती हुई तवज्जोह। ये ख़ामोश फ़र्क़ अगर इसी रफ़्तार से बढ़ता रहा तो आने वाले बरसों में एक नया समाजी असंतुलन पैदा हो सकता है।

लड़कियाँ तालीम को सिर्फ़ डिग्री नहीं समझतीं; वो इसे आज़ादी का रास्ता, इज़्ज़त का ज़रिया, माली ख़ुदमुख़्तारी का दरवाज़ा और समाजी वक़ार की ज़मानत समझती हैं। यही वजह है कि उनके अंदर एक गहरी अंदरूनी तहरीक पैदा होती है। वो जानती हैं कि किताब उनके हाथ में आए तो क़िस्मत बदल सकती है, क़लम उनके हाथ में आए तो नस्लें सँवर सकती हैं, और तालीम उनके हिस्से में आए तो घर, ख़ानदान और मुआशरा सब बदल सकते हैं।

बेटों का ख़ामोश इंख़ला

दूसरी तरफ़ हमारे बहुत से लड़के फ़ौरी मआशी फ़ायदे, ख़ानदानी कारोबार, जल्द रोज़गार, ऑनलाइन गेमिंग, सोशल मीडिया और डिजिटल फ़रारियत के भँवर में उलझते जा रहे हैं। वो लंबी तालीमी जद्दोजहद से उकता जाते हैं, फ़ौरी नतीजा चाहते हैं, मगर इल्म का सफ़र फ़ौरी तालियाँ नहीं देता; वो सब्र, मेहनत, तसलसुल और मक़सद माँगता है।

क्या हमने लड़कों को मक़सद दिया? क्या हमने उनके लिए मज़बूत तालीमी रोल मॉडल्स तैयार किए? क्या हमने उन्हें बताया कि मर्दानगी सिर्फ़ कमाने का नाम नहीं, बल्कि शऊर, किरदार, ज़िम्मेदारी और इल्म का नाम भी है?

आज लड़कियों की तालीमी तरक़्क़ी ख़ुश-आइंद है, क़ाबिल-ए-फ़ख़्र है, क़ाबिल-ए-तहसीन है। लेकिन अगर इसी के साथ लड़कों की इल्मी बेज़ारी बढ़ती रही तो ये एक अधूरा इंक़िलाब बनकर रह जाएगा।

बेटियों की तालीम — क़ौम की बक़ा की शर्त

हमें ये बात पूरी क़ुव्वत से माननी होगी कि लड़कियों की तालीम किसी क़ौम पर एहसान नहीं, बल्कि क़ौम की बक़ा की शर्त है। एक तालीमयाफ़्ता औरत सिर्फ़ ख़ुद नहीं सँवरती; वो घर सँवारती है, नस्ल सँवारती है, मुआशरा सँवारती है। एक बाशऊर माँ आने वाली नस्लों की पहली दर्सगाह होती है। अगर माँ तालीमयाफ़्ता हो तो घर का माहौल बदलता है, बच्चों की ज़बान बदलती है, सोच बदलती है, अख़्लाक़ बदलते हैं और मुस्तक़बिल बदलता है।

बेटियों को आगे बढ़ाना और बेटों को पीछे छोड़ देना तरक़्क़ी नहीं, अदम-तवाज़ुन है। क़ौमें तब मज़बूत होती हैं जब उनकी बेटियाँ भी तालीमयाफ़्ता हों और बेटे भी मक़सद-शनास हों। अगर बेटियाँ इल्म की बुलंदियों पर हों और बेटे बे-सम्ती, लत, बेज़ारी और कम-हौसलगी का शिकार हों तो ये तरक़्क़ी नहीं, एक अधूरा इंक़िलाब है।

आज की ज़रूरत — तवाज़ुन की हिकमत

आज ज़रूरत है कि हम लड़कियों की तालीम को और मज़बूत करें, उनके लिए महफ़ूज़ तालीमी माहौल बनाएँ, उन्हें आला तालीम और अमली ज़िंदगी में आगे बढ़ने के मवाक़े दें। साथ ही लड़कों के लिए Mentorship Programs, Vocational Integration, Digital Discipline और Purpose-based Education को तालीमी निज़ाम का लाज़िमी हिस्सा बनाएँ।

और अगर हमने क्लासरूम को इंसान-साज़ी का मरकज़ न बनाया तो कल डिग्रियाँ होंगी, मगर किरदार कमज़ोर होगा; नौकरियाँ होंगी, मगर मक़सद ग़ायब होगा; कामयाबी होगी, मगर सुकून नहीं होगा।

इसलिए हमें आज ही अहद करना होगा कि तालीम को सिर्फ़ इम्तिहान नहीं रहने देंगे, इसे तहरीक बनाएँगे; इसे सिर्फ़ रोज़गार नहीं रहने देंगे, इसे किरदार बनाएँगे; इसे सिर्फ़ डिग्री नहीं रहने देंगे, इसे तहज़ीब की तामीर का ज़रिया बनाएँगे।

क़ौमें उस वक़्त तरक़्क़ी करती हैं जब वो अपनी बेटियों को तालीम देती हैं, मगर तहज़ीबें उस वक़्त महफ़ूज़ रहती हैं जब वो अपने बेटों को भी गुम होने नहीं देतीं।

भारत का मुस्तक़बिल किसी दफ़्तर की फ़ाइल में नहीं, किसी पॉलिसी के सफ़े पर नहीं, किसी तक़रीर के नारे में नहीं; भारत का मुस्तक़बिल इसके क्लासरूम में बैठे बच्चों की आँखों में लिखा जा रहा है।

और ख़लील-ए-वक़्त! अगर हमने इस तहरीर को आज न पढ़ा, तो कल तारीख़ हमें मुआफ़ नहीं करेगी।

— डॉक्टर असद अल्लाह ख़ान, मुंबई

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *