ज़मीन की आह और इन्सान की बे-ख़बरी
क़ुदरत की तम्बीह, क़ुरआन की रहनुमाई और इन्सानियत के लिए एक सबक़
डॉक्टर असद उल्लाह ख़ान
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
﴿إِنَّ فِي خَلْقِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَاختِلَافِ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ لآيَاتٍ لِّأُولِي الْأَلْبَابِ﴾
“बेशक आसमानों और ज़मीन की तख़्लीक़, और रात दिन के बदलते रहने में अक़्ल वालों के लिए बहुत सी निशानियाँ हैं।” (सूरत आल-ए-इम्रान: 190)
﴿ظَهَرَ الْفَسَادُ فِي الْبَرِّ وَالْبَحْرِ بِمَا كَسَبَتْ أَيْدِي النَّاسِ لِيُذِيقَهُم بَعْضَ الَّذِي عَمِلُوا لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ﴾
“ख़ुश्की और समन्दर में फ़साद ज़ाहिर हो गया, उस सबब से जो लोगों के हाथों ने कमाया, ताकि अल्लाह उन्हें उनके बाअज़ आमाल का मज़ा चखाए, शायद वो बाज़ आ जाएँ।” (सूरत अर्-रूम: 41)
बे-बस इन्सान और आफ़ाक़ी सच्चाई
दुनिया रोज़ाना जागती है, लेकिन हर सुबह एक जैसी नहीं होती। बाअज़ सुबहें सूरज की रोशनी के साथ उम्मीद लेकर आती हैं, और बाअज़ सुबहें ज़मीन की लर्ज़िश के साथ इन्सान को उसकी असल हैसियत याद दिला जाती हैं। कहीं ज़िलज़ला आता है, कहीं सैलाब बस्तियों को निगल जाता है, कहीं आसमान आग बरसाता है, कहीं समन्दर अपनी हुदूद तोड़ देता है, और कहीं एक मामूली सा वायरस पूरी दुनिया की ताक़त, मआशियत और टेक्नॉलॉजी को घुटनों के बल ला खड़ा करता है। इन वाक़िआत को अगर सिर्फ़ “क़ुदरती आफ़ात” कह कर अख़बार के एक सफ़हे तक महदूद कर दिया जाए तो शायद हम बहुत बड़ी हक़ीक़त से आँखें चुरा रहे हैं। मोमिन के लिए ये सिर्फ़ ख़बरें नहीं होतीं, बल्कि अल्लाह तआला की निशानियाँ होती हैं। क़ुरआन उन्हें “आयात” कहता है; ऐसी निशानियाँ जो इन्सान को उसके रब, उसकी कमज़ोरी, उसकी ज़िम्मेदारी और उसके अन्जाम की याद दिलाती हैं।
आज का इन्सान चाँद पर बस्तियाँ बसाने के ख़्वाब देख रहा है, मसनूई ज़हानत को अपनी अक़्ल का जानशीन समझने लगा है, और चंद सेकेंड में दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक पैग़ाम पहुँचाने पर फ़ख़्र करता है। उसने फ़लकबोस इमारतें खड़ी कर लीं, समन्दर की तहों में उतर गया, पहाड़ों को चीर कर शाहराहें बना दीं, मगर वो अब भी एक ऐसे मामूली से ज़िलज़ले के सामने बे-बस है जो चंद लम्हों में उसकी बरसों की मेहनत, दौलत, मन्सूबे और ग़ुरूर को मिट्टी में मिला देता है। यही इन्सानी हक़ीक़त है जिसे क़ुरआन ने चौदह सौ साल पहले बयान कर दिया था।
﴿وَمَا قَدَرُوا اللَّهَ حَقَّ قَدْرِهِ وَالْأَرْضُ جَمِيعًا قَبْضَتُهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ﴾
“उन्होंने अल्लाह की क़द्र वैसी न पहचानी जैसी पहचानने का हक़ था, हालाँकि क़ियामत के दिन पूरी ज़मीन उसकी मुट्ठी में होगी।” (सूरत अज़्-ज़ुमर: 67)
दुनिया की तारीख़ गवाह है कि तहज़ीबें सिर्फ़ जंगों से नहीं मिटीं, बाअज़ औक़ात एक झटके ने पूरी सल्तनतों को क़िस्सा-ए-पारीना बना दिया। क़ौम-ए-आद अपनी ताक़त पर नाज़ करती थी, क़ौम-ए-समूद अपने पहाड़ तराश कर महलात बनाने पर फ़ख़्र करती थी, फ़िरऔन अपने इक़्तिदार को दाइमी समझता था, क़ारून अपनी दौलत पर अकड़ता था, मगर क़ुदरत ने सब को एक लम्हे में तारीख़ का सबक़ बना दिया। यही वजह है कि क़ुरआन बार बार इन्सान से सवाल करता है कि क्या तुमने अपने से पहले लोगों का अन्जाम नहीं देखा?
﴿أفَلَمْ يَسِيرُوا فِي الْأَرْضِ فَيَنظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ﴾
“क्या वो ज़मीन में चलते फिरे नहीं कि देखते उन लोगों का अन्जाम क्या हुआ जो उनसे पहले गुज़र चुके थे?” (सूरत यूसुफ़: 109)
ये सवाल सिर्फ़ तारीख़ पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि अपनी इस्लाह के लिए है।
सानिहात, अख़लाक़ी हिस और दिल का ज़िलज़ला
गुज़िश्ता दिनों दुनिया के एक ख़ित्ते में आने वाले शदीद ज़िलज़ले ने एक मरतबा फिर यही सबक़ दोहराया। चंद लम्हों में मज़बूत इमारतें मलबे में तब्दील हो गईं, हज़ारों ख़ानदान बे-घर हो गए, बच्चे अपने वालिदैन से बिछड़ गए, वालिदैन अपनी औलाद को ढूँढते रह गए, और वो लोग जो चंद मिनट पहले मामूल की ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे, अचानक मौत और ज़िन्दगी के दरमियान खड़े हो गए। ऐसे मनाज़िर हर हस्सास इन्सान की आँख नम कर देते हैं, लेकिन सवाल ये है कि क्या ये मनाज़िर हमारे दिल भी बदलते हैं? अफ़सोस ये है कि हमारा मुआशरा अब सानिहात को भी एक “वायरल वीडियो” की तरह देखने लगा है। चंद लम्हे अफ़सोस, चंद दुआएँ, चंद तबसिरे, और फिर अगली ख़बर; गोया इन्सानी जान की हुरमत भी ख़बरों की रफ़्तार के साथ कम होती जा रही है।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
«ارْحَمُوا مَنْ فِي الْأَرْضِ يَرْحَمْكُمْ مَنْ فِي السَّمَاءِ»
“ज़मीन वालों पर रहम करो, आसमान वाला तुम पर रहम फ़रमाएगा।” (जामे अत्-तिर्मिज़ी, हदीस: 1924)
इस्लाम ने हमें सिर्फ़ इबादत-गुज़ार नहीं बनाया बल्कि दर्द-ए-दिल रखने वाला इन्सान बनाया है। मोमिन वो है जो दूसरों के दुख को अपना दुख समझे, जो मुसीबत-ज़दा की मदद करे, जो भूखे को खाना खिलाए, यतीम के सर पर हाथ रखे, बे-घर के लिए पनाह बने और मुसीबत के वक़्त इन्सानियत का सहारा बने। रसूल-ए-अकरम ﷺ ने फ़रमाया:
«مَثَلُ الْمُؤْمِنِينَ فِي تَوَادِّهِمْ وَتَرَاحُمِهِمْ وَتَعَاطُفِهِمْ كَمَثَلِ الْجَسَدِ الْوَاحِدِ»
“मोमिन आपस की मुहब्बत, रहमत और हमदर्दी में एक जिस्म की मानिन्द हैं, जिसके एक उज़्व को तकलीफ़ हो तो पूरा जिस्म बे-चैन हो जाता है।” (सहीह बुख़ारी, हदीस: 6011; सहीह मुस्लिम, हदीस: 2586)
यही वो मेयार है जिस पर हमें अपने ईमान को परखना चाहिए। अगर दुनिया के किसी कोने में आने वाली आफ़त हमारे दिल को न हिलाए, अगर किसी माँ की आह हमारे ज़मीर को न जगाए, अगर किसी यतीम बच्चे के आँसू हमें बे-चैन न करें, तो हमें अपने ईमान की कैफ़ियत पर ज़रूर ग़ौर करना चाहिए। क़ुदरत की हर तम्बीह हमें दो सवालों के सामने ला खड़ा करती है: पहला सवाल ये कि अगर आज ये आज़माइश उन पर आई है तो क्या यक़ीन है कि कल हमारे दरवाज़े पर दस्तक नहीं देगी? और दूसरा, इससे भी ज़्यादा अहम सवाल, अगर आज हमारी ज़िन्दगी का ज़िलज़ला आ जाए, अगर मौत अचानक हमारे दरवाज़े पर आ खड़ी हो, तो क्या हम अपने रब से मुलाक़ात के लिए तैयार हैं? ये सवाल किसी जुग़राफ़िए, किसी क़ौम, किसी मज़हब या किसी ज़बान का नहीं; ये हर इन्सान का सवाल है। इसी लिए क़ुरआन एलान करता है:
﴿كُلُّ نَفْسٍ ذَائِقَةُ الْمَوْتِ وَنَبْلُوكُم بِالشَّرِّ وَالْخَيْرِ فِتْنَةً وَإِلَيْنَا تُرْجَعُونَ﴾
“हर जान ने मौत का मज़ा चखना है, और हम तुम्हें अच्छाई और बुराई दोनों से आज़माते हैं, फिर तुम हमारी ही तरफ़ लौटाए जाओगे।” (सूरत अल-अम्बिया: 35)
यही इस मज़मून की बुनियाद है। हमारा मक़सद किसी मख़सूस मुल्क के ज़िलज़ले की रिपोर्टिंग नहीं, बल्कि इस हक़ीक़त को समझना है कि जब ज़मीन लर्ज़ती है तो सिर्फ़ इमारतें नहीं गिरतीं, इन्सान के ग़ुरूर के बुत भी टूटते हैं, उसकी बे-ख़बरी बे-नक़ाब होती है, और अल्लाह तआला एक मरतबा फिर अपने बन्दों को पुकार कर फ़रमाता है: “लौट आओ, अभी वक़्त है।”
जब ज़मीन बोलती है, क़ुरआन क्या कहता है?
﴿إِذَا زُلْزِلَتِ الْأَرْضُ زِلْزَالَهَا وَأَخْرَجَتِ الْأَرْضُ أَثْقَالَهَا وَقَالَ الْإِنسَانُ مَا لَهَا﴾
“जब ज़मीन अपनी पूरी शिद्दत के साथ हिला दी जाएगी, और अपने सारे बोझ बाहर निकाल देगी, तो इन्सान हैरान हो कर कहेगा: इसे क्या हो गया?” (सूरत अज़्-ज़िल्ज़ाल: 1-3)
क़ुरआन मजीद का अन्दाज़-ए-बयान ये नहीं कि वो सिर्फ़ वाक़िआत सुनाए, बल्कि वो वाक़िआत के पस-ए-पर्दा हक़ीक़त को आशकार करता है। यही वजह है कि क़ुरआन ज़िलज़ले का ज़िक्र करता है तो सिर्फ़ ज़मीन की हरकत का तज़किरा नहीं करता बल्कि इन्सान के दिल की हरकत, उसके ज़मीर की बेदारी और उसके अन्जाम की याद-दहानी भी साथ करता है। आज साइंस हमें बताती है कि ज़मीन मुख़्तलिफ़ अर्ज़ियाती प्लेटों पर क़ायम है। कहीं दबाव बढ़ता है, कहीं दरार पैदा होती है, कहीं ज़ेर-ए-ज़मीन तवानाई जमा होती रहती है और फिर अचानक एक झटके की सूरत में ख़ारिज हो जाती है। ये साइंसी हक़ीक़त अपनी जगह दुरुस्त है, मगर एक मुसलमान का ईमान उसे इससे आगे ले जाता है। वो ये भी जानता है कि इन तमाम असबाब का ख़ालिक़ अल्लाह तआला है; उसकी मशियत के बग़ैर एक ज़र्रा भी हरकत नहीं करता। इसी हक़ीक़त को क़ुरआन ने बड़े मुख़्तसर मगर जामे अन्दाज़ में बयान फ़रमाया:
﴿مَا أَصَابَ مِن مُّصِيبَةٍ إِلَّا بِإِذْنِ اللَّهِ وَمَن يُؤْمِن بِاللَّهِ يَهْدِ قَلْبَهُ﴾
“कोई मुसीबत अल्लाह के हुक्म के बग़ैर नहीं आती, और जो अल्लाह पर ईमान रखता है, अल्लाह उसके दिल को हिदायत देता है।” (सूरत अत्-तग़ाबुन: 11)
ये आयत हमें दो अज़ीम सबक़ देती है। पहला ये कि दुनिया में होने वाला कोई वाक़िआ अल्लाह के इल्म और उसकी हिकमत से बाहर नहीं। दूसरा ये कि मुसीबत के वक़्त ईमान वाला शख़्स सिर्फ़ सवाल नहीं करता बल्कि अपने रब की तरफ़ रुजू करता है। आज का इन्सान हर हादसे के बाद सिर्फ़ ये पूछता है: “ये कैसे हुआ?” जबकि क़ुरआन उससे एक और सवाल पूछता है: “ये क्यों दिखाया गया?” यही फ़र्क़ है माद्दी फ़िक्र और ईमानी फ़िक्र में। क़ुरआन हमें बार बार काइनात को सिर्फ़ देखने का नहीं बल्कि उस पर ग़ौर करने का हुक्म देता है।
﴿قُلِ انظُرُوا مَاذَا فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ﴾
“कह दीजिए! ग़ौर से देखो कि आसमानों और ज़मीन में क्या क्या निशानियाँ हैं।” (सूरत यूनुस: 101)
बद-क़िस्मती से हमने देखना तो सीख लिया, मगर ग़ौर करना छोड़ दिया। हम ज़िलज़ले की वीडियोज़ देखते हैं, सैलाब की तस्वीरें देखते हैं, आतिश-ज़दगी के मनाज़िर देखते हैं, लेकिन अपने अन्दर झाँकने की फ़ुर्सत नहीं निकालते।
मुसीबत, अज़ाब या आज़माइश?
ये सवाल अक्सर लोगों के ज़हन में पैदा होता है कि क्या हर ज़िलज़ला अल्लाह का अज़ाब होता है? क़ुरआन व सुन्नत का मुन्सफ़ाना मुतालआ हमें एतिदाल की तालीम देता है। हर मुसीबत को किसी मख़सूस क़ौम पर अज़ाब क़रार देना दुरुस्त नहीं, क्योंकि अल्लाह तआला ने दुनिया को दारुल-इम्तिहान बनाया है, दारुल-जज़ा नहीं। इसी लिए फ़रमाया:
﴿وَلَنَبْلُوَنَّكُم بِشَيْءٍ مِّنَ الْخَوْفِ وَالْجُوعِ وَنَقْصٍ مِّنَ الْأَمْوَالِ وَالْأَنفُسِ وَالثَّمَرَاتِ وَبَشِّرِ الصَّابِرِينَ﴾
“और हम ज़रूर तुम्हें ख़ौफ़, भूक, माल, जान और फलों के नुक़्सान से आज़माएँगे, और सब्र करने वालों को ख़ुशख़बरी दे दो।” (सूरत अल-बक़रह: 155)
गोया बाअज़ मुसीबतें आज़माइश होती हैं, बाअज़ तम्बीह, बाअज़ गुनाहों का कफ़्फ़ारा, बाअज़ दरजात की बुलन्दी का ज़रिया और बाअज़ अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ। इसी लिए रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
«عَجَبًا لِأَمْرِ الْمُؤْمِنِ… إِنْ أَصَابَتْهُ ضَرَّاءُ صَبَرَ فَكَانَ خَيْرًا لَهُ»
“मोमिन का मामला बड़ा अजीब है… अगर उसे तकलीफ़ पहुँचती है तो सब्र करता है, और यही उसके हक़ में बेहतर होता है।” (सहीह मुस्लिम, हदीस: 2999)
यही ईमान की असल पहचान है। मुसीबत का आना ईमान की कमज़ोरी की दलील नहीं, बल्कि मुसीबत पर इन्सान का रवैय्या उसके ईमान की कैफ़ियत को ज़ाहिर करता है।
क्या ज़मीन भी अल्लाह की बन्दह है?
क़ुरआन का तसव्वुर-ए-काइनात निहायत हैरत-अंगेज़ है। हम ज़मीन को सिर्फ़ एक सय्यारा समझते हैं, लेकिन क़ुरआन उसे अल्लाह की एक मुतीअ मख़लूक़ के तौर पर पेश करता है।
﴿ثُمَّ اسْتَوَىٰ إِلَى السَّمَاءِ وَهِيَ دُخَانٌ فَقَالَ لَهَا وَلِلْأَرْضِ ائْتِيَا طَوْعًا أَوْ كَرْهًا قَالَتَا أَتَيْنَا طَائِعِينَ﴾
“फिर अल्लाह ने आसमान और ज़मीन से फ़रमाया: ख़ुशी से या मजबूरी से हाज़िर हो जाओ। दोनों ने अर्ज़ किया: हम ख़ुशी से हाज़िर हैं।” (सूरत फ़ुस्सिलत: 11)
ज़मीन अल्लाह की नाफ़रमान नहीं होती, नाफ़रमान सिर्फ़ इन्सान होता है। ज़मीन अपने रब के हुक्म पर गर्दिश करती है, हवा उसी के हुक्म से चलती है, समन्दर उसी के हुक्म से लहरें उठाता है, बारिश उसी के हुक्म से बरसती है, पहाड़ उसी के हुक्म से क़ायम हैं, और जब वही रब ज़मीन को हुक्म देता है कि “हिल जा”, तो ज़मीन एक लम्हा भी ताख़ीर नहीं करती। लेकिन इन्सान… जिसे अशरफ़-उल-मख़लूक़ात बनाया गया… वो अपने रब के हुक्म पर अमल करने में सारी ज़िन्दगी टालमटोल से काम लेता है।
मेरे नज़दीक ज़मीन का ज़िलज़ला उतना ख़तरनाक नहीं जितना इन्सान के दिल का ज़िलज़ला। आज दयानत लर्ज़ चुकी है, अमानत लर्ज़ चुकी है, हया लर्ज़ चुकी है, अख़लाक़ लर्ज़ चुके हैं और ख़ानदान लर्ज़ गए हैं। तालीम से किरदार निकल गया है, तरक़्क़ी से ख़ुदा का ख़ौफ़ निकल गया है, और ख़ुशहाली से शुक्र ख़त्म हो गया है। हमें इमारतों के गिरने का ख़ौफ़ है, लेकिन इन्सानियत के गिरने का एहसास नहीं। हम पुलों के टूटने पर मातम करते हैं, मगर रिश्तों के टूटने पर ख़ामोश रहते हैं। हम ज़िलज़लों के लिए इम्दादी फ़ंड क़ायम करते हैं, मगर अख़लाक़ी ज़वाल के इलाज के लिए कोई तहरीक नहीं चलाते। यही वो ज़िलज़ला है जिसकी शिद्दत रिक्टर स्केल से नहीं नापी जा सकती; ये वो ज़िलज़ला है जिसने पूरी तहज़ीब को हिला कर रख दिया है।
हज़रत उमर फ़ारूक़ رضی اللہ عنہ का तारीख़ी सबक़ और तामीरी रवैय्या
रिवायत में आता है कि हज़रत उमर बिन अल-ख़त्ताब رضی اللہ عنہ के ज़माने में मदीना मुनव्वरा में ज़मीन हिली। आपؓ ने लोगों को मुख़ातब करते हुए फ़रमाया: “अगर दोबारा ऐसा हुआ तो मैं तुम्हारे दरमियान नहीं रहूँगा।” उलमा ने इस वाक़िए से ये सबक़ अख़ज़ किया कि सालेह हुक्मरान भी ऐसे मवाक़े पर सिर्फ़ साइंसी तज्ज़िया नहीं करते थे बल्कि पूरी क़ौम को मुहासबा-ए-नफ़्स, इस्तिग़फ़ार और अल्लाह की तरफ़ रुजू की दावत देते थे।
यही इस्लामी रवैय्या है कि हम असबाब भी इख़्तियार करें, साइंसी तहक़ीक़ भी करें, महफ़ूज़ तामीरात भी बनाएँ और रेस्क्यू निज़ाम भी मज़बूत करें, लेकिन साथ ही अपने दिलों की तामीर भी करें; क्योंकि अगर दिल वीरान हों तो मज़बूत इमारतें भी इन्सान को सुकून नहीं दे सकतीं। यही वो मक़ाम है जहाँ क़ुरआन, साइंस और अक़्ल तीनों एक दूसरे से नहीं टकराते बल्कि एक दूसरे की तकमील करते हैं। साइंस हमें बताती है कि ज़मीन कैसे लर्ज़ती है, जबकि क़ुरआन हमें बताता है कि इस लर्ज़िश से हमें क्या सीखना चाहिए। और शायद यही वो सबक़ है जिसे आज का इन्सान सबसे ज़्यादा भूल चुका है। जब ज़मीन लर्ज़ती है तो सिर्फ़ इमारतें नहीं गिरतीं, इन्सान के ग़ुरूर के बुत भी टूटते हैं, उसकी बे-ख़बरी बे-नक़ाब होती है, और अल्लाह तआला एक मरतबा फिर अपने बन्दों को पुकार कर फ़रमाता है: “लौट आओ, अभी वक़्त है।”
जब इन्सान ख़ुदा को भूल जाता है, ज़मीन उसे याद दिलाती है
﴿وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْإِنسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ﴾
“मैंने जिन्नात और इन्सानों को सिर्फ़ अपनी इबादत के लिए पैदा किया है।” (सूरत अज़्-ज़ारियात: 56)
इन्सानी तारीख़ पर अगर एक ग़ैर-जानिबदार निगाह डाली जाए तो एक हक़ीक़त बिल्कुल वाज़ेह नज़र आती है कि जब भी इन्सान ने अपनी ताक़त को अपनी नजात समझ लिया, अपनी दौलत को अपनी बक़ा का ज़ामिन मान लिया और अपने इल्म को अपनी ख़ुद-मुख़्तारी का एलान बना लिया, क़ुदरत ने उसे एक ऐसा सबक़ दिया जिसने उसके तमाम दावों की हक़ीक़त खोल कर रख दी। फ़िरऔन के पास इक़्तिदार था, लेकिन एक मौज उसे ले गई। क़ारून के पास दौलत थी, लेकिन ज़मीन ने उसे निगल लिया। आद के पास ताक़त थी, लेकिन एक हवा ने उनका ग़ुरूर तोड़ दिया। समूद के पास संग-तराशी का फ़न था, मगर एक चीख़ ने उनकी बस्तियाँ ख़ामोश कर दीं। क़ुरआन इन तमाम वाक़िआत को तारीख़ के अबवाब के तौर पर नहीं बल्कि ज़िन्दा नसीहत के तौर पर बयान करता है।
﴿فَكُلًّا أَخَذْنَا بِذَنبِهِ﴾
“फिर हमने हर एक को उसके गुनाह के सबब पकड़ा।” (सूरत अल-अनकबूत: 40)
ये आयत सिर्फ़ गुज़िश्ता क़ौमों के लिए नहीं, बल्कि हर उस मुआशरे के लिए आईना है जो ये समझ बैठता है कि वो अल्लाह की गिरफ़्त से बे-नियाज़ है।
जदीद इन्सान का सबसे बड़ा वहम
आज के इन्सान ने अपनी तरक़्क़ी को अपना माबूद बना लिया है। उसे यक़ीन है कि मसनूई ज़हानत हर मसला हल कर देगी, रोबोट इन्सानी मेहनत की जगह ले लेंगे, ख़लाई बस्तियाँ मुस्तक़बिल बन जाएँगी, तिब्ब हर बीमारी का इलाज दरियाफ़्त कर लेगी और मआशियत हर ग़ुरबत ख़त्म कर देगी। लेकिन क़ुदरत कभी कभी सिर्फ़ चंद सेकेंड में ये याद दिला देती है कि इन्सान अभी भी उतना ही मुहताज है जितना हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के ज़माने में था। एक ज़िलज़ला, एक सैलाब, एक तूफ़ान, या एक मामूली सी वबा आती है और दुनिया की सबसे बड़ी ताक़तें भी बे-बसी की तस्वीर बन जाती हैं। कोई आतमी हथियार ज़मीन को लर्ज़ने से नहीं रोक सकता, कोई मसनूई ज़हानत मौत को चंद लम्हों के लिए भी मुअख़्ख़र नहीं कर सकती और कोई दौलत एक साँस ख़रीदने की ताक़त नहीं रखती। इसी लिए अल्लाह तआला फ़रमाते हैं:
﴿يَا أَيُّهَا النَّاسُ أَنتُمُ الْفُقَرَاءُ إِلَى اللَّهِ وَاللَّهُ هُوَ الْغَنِيُّ الْحَمِيدُ﴾
“ए लोगो! तुम सब अल्लाह के मुहताज हो, और सिर्फ़ अल्लाह ही बे-नियाज़ और हर तारीफ़ का मुस्तहिक़ है।” (सूरत फ़ातिर: 15)
ये आयत इन्सानी तहज़ीब के तमाम फ़लसफ़ों पर भारी है। इन्सान जितना भी तरक़्क़ी कर ले, वो अल्लाह से बे-नियाज़ कभी नहीं हो सकता।
ज़मीन क्यों नाराज़ दिखाई देती है? माद्दी व माहौलियाती शुऊर
ये सवाल सिर्फ़ माहिरीन-ए-अर्ज़ियात का नहीं, अहल-ए-फ़िक्र का भी है। गुज़िश्ता चंद दहाइयों में दुनिया ने मौसमी तग़य्युरात, शदीद गर्मी, ग़ैर-मामूली बारिशों, ख़ुश्क-साली, जंगलात की तबाही, समन्दरी आलूदगी और हयातियाती तनव्वुअ में ख़तरनाक कमी देखी है। साइंस इसकी मुख़्तलिफ़ वजूह बयान करती है, और उनमें बहुत सी बातें दुरुस्त हैं। लेकिन क़ुरआन इस हक़ीक़त का एक अख़लाक़ी और रूहानी पहलू भी सामने रखता है।
﴿ظَهَرَ الْفَسَادُ فِي الْبَرِّ وَالْبَحْرِ بِمَا كَسَبَتْ أَيْدِي النَّاسِ﴾
“ख़ुश्की और समन्दर में फ़साद फैल गया, उस सबब से जो इन्सानों के हाथों ने कमाया।” (सूरत अर्-रूम: 41)
ये आयत सिर्फ़ अख़लाक़ी फ़साद की नहीं, बल्कि इन्सानी रवैय्यों के उन नताइज की भी तरफ़ इशारा करती है जो पूरी ज़मीन पर असर-अन्दाज़ होते हैं। हमने दरख़्त काटे, नदियों को आलूदा किया, हवा को ज़हर-आलूद बनाया, ज़मीन के वसाइल को अमानत के बजाय लूट का माल समझा, जानवरों की नस्लें ख़त्म कीं, पानी को ज़ाए किया और फिर हैरान होते हैं कि मौसम क्यों बदल रहे हैं?
इस्लाम ने चौदह सौ साल पहले माहौलियात को इबादत का हिस्सा बना दिया था। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
«إِنْ قَامَتِ السَّاعَةُ وَفِي يَدِ أَحَدِكُمْ فَسِيلَةٌ، فَلْيَغْرِسْهَا»
“अगर क़ियामत क़ायम हो जाए और तुम्हारे हाथ में एक पौदा हो तो अगर मुमकिन हो तो उसे लगा दो।” (मुस्नद अहमद, हदीस: 12902)
ग़ौर कीजिए! जब दुनिया ख़त्म होने वाली हो तब भी दरख़्त लगाने की तालीम दी जा रही है; यही है इस्लाम का माहौलियाती शुऊर।
हम ज़मीन के मालिक नहीं, अमीन हैं: दिल का क़हत
आज का सबसे बड़ा मसला ये है कि इन्सान ख़ुद को ज़मीन का मालिक समझ बैठा है, हालाँकि क़ुरआन उसे ख़लीफ़ा कहता है, मालिक नहीं;
﴿إِنِّي جَاعِلٌ فِي الْأَرْضِ خَلِيفَةً﴾
“मैं ज़मीन में एक नाइब (ख़लीफ़ा) बनाने वाला हूँ।” (सूरत अल-बक़रह: 30)
ख़लीफ़ा वो होता है जो अमानत की हिफ़ाज़त करे, जो इन्साफ़ क़ायम करे, जो वसाइल को ज़ाए न करे, जो कमज़ोरों का हक़ न मारे और जो ज़मीन को आबाद करे, बर्बाद न करे। लेकिन हमने ख़िलाफ़त को हुकूमत समझ लिया, ज़िम्मेदारी नहीं; इसी लिए दुनिया के बहुत से मसाइल सिर्फ़ सियासी नहीं, अख़लाक़ी भी हैं।
मुझे अक्सर महसूस होता है कि दुनिया का सबसे बड़ा बुह्रान मआशी नहीं, अख़लाक़ी है। हमारी इमारतें पहले से ज़्यादा बुलन्द हैं, मगर हमारे किरदार पहले से ज़्यादा पस्त हैं। हमारी गाड़ियाँ पहले से ज़्यादा तेज़ हैं, मगर हमारे तअल्लुक़ात पहले से ज़्यादा कमज़ोर हैं। हमारे मोबाइल पहले से ज़्यादा स्मार्ट हैं, मगर हमारी गुफ़्तगू पहले से ज़्यादा बे-मानी हो गई है। हमारे घरों में आसाइश बढ़ गई, मगर सुकून कम हो गया। इल्म बढ़ा, मगर हिकमत कम हो गई; इत्तिलाआत बढ़ गईं, मगर बसीरत घट गई। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
لَيْسَ الْغِنَى عَنْ كَثْرَةِ الْعَرَضِ، وَلَكِنَّ الْغِنَى غِنَى النَّفْسِ
“असल दौलत माल की कसरत नहीं, बल्कि दिल का ग़नी होना है।” (सहीह बुख़ारी, हदीस: 6446; सहीह मुस्लिम, हदीस: 1051)
ये हदीस आज की पूरी सारफ़ियत-पसन्द (Consumerist) तहज़ीब पर तबसिरा है।
असल तामीर किसकी?
हम पुल बनाते हैं, लेकिन दिलों के दरमियान फ़ासले बढ़ जाते हैं। हम फ़लकबोस इमारतें खड़ी करते हैं, मगर ख़ानदान बिखर जाते हैं। हम शहरों को रोशन करते हैं, मगर ज़मीर तारीक हो जाते हैं। हम तरक़्क़ी की रफ़्तार नापते हैं, मगर इन्सानियत की गहराई भूल जाते हैं। यही वजह है कि जब ज़मीन हिलती है तो सिर्फ़ ईंटें नहीं गिरतीं, इन्सान के सारे मसनूई सहारे भी टूट जाते हैं और तब उसे एहसास होता है कि जिस रब को उसने अपनी मसरूफ़ियत में भुला दिया था, असल पनाह तो उसी के पास है। इसी लिए रसूलुल्लाह ﷺ की दुआ थी:
اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ زَوَالِ نِعْمَتِكَ، وَتَحَوُّلِ عَافِيَتِكَ، وَفُجَاءَةِ نِقْمَتِكَ، وَجَمِيعِ سَخَطِكَ
“ए अल्लाह! मैं तेरी नेमत के ज़ाइल होने, तेरी अता कर्दा आफ़ियत के बदल जाने, तेरे अचानक अज़ाब और तेरी हर नाराज़गी से तेरी पनाह माँगता हूँ।” (सहीह मुस्लिम, हदीस: 2739)
ये दुआ हमें याद दिलाती है कि अम्न, सेहत, घर, ख़ानदान, रोज़गार, सुकून और ज़िन्दगी—ये सब हमारी कमाई नहीं, अल्लाह की अता हैं और जब अता करने वाला चाहे तो एक लम्हे में इन्सान को उसकी असल हक़ीक़त दिखा सकता है। इसी लिए अक़्लमन्द वो नहीं जो सिर्फ़ मज़बूत घर बनाए, बल्कि वो है जो अपने रब के साथ मज़बूत तअल्लुक़ भी क़ायम करे, क्योंकि जब ज़मीन हिलती है तो सिर्फ़ वही सहारा बाक़ी रहता है जो कभी नहीं हिलता।
आज़माइश के वक़्त मुसलमान का किरदार: मुसीबत सिर्फ़ रोने का वक़्त नहीं, जागने का वक़्त है
﴿وَبَشِّرِ الصَّابِرِينَ الَّذِينَ إِذَا أَصَابَتْهُم مُّصِيبَةٌ قَالُوا إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ أُولَٰئِكَ عَلَيْهِمْ صَلَوَاتٌ مِّن رَّبِّهِمْ وَرَحْمَةٌ وَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُهْتَدُونَ﴾
“और सब्र करने वालों को ख़ुशख़बरी दे दीजिए, वो लोग कि जब उन पर कोई मुसीबत आती है तो कहते हैं: बेशक हम अल्लाह ही के हैं और उसी की तरफ़ लौट कर जाने वाले हैं। यही वो लोग हैं जिन पर उनके रब की रहमतें और नवाज़िशें हैं और यही हिदायत-याफ़्ता हैं।” (सूरत अल-बक़रह: 155-157)
इस्लाम मुसीबत से इन्कार नहीं करता, बल्कि मुसीबत का सामना करने का सलीक़ा सिखाता है। ये दुनिया जन्नत नहीं है कि यहाँ सिर्फ़ राहत ही राहत हो, और न ही ये जहन्नम है कि यहाँ सिर्फ़ तकलीफ़ ही तकलीफ़ हो। ये इम्तिहान-गाह है, जहाँ ख़ुशहाली भी आज़माइश है और तंगी भी आज़माइश। अफ़सोस ये है कि जब ख़ुशी मिलती है तो हम उसे अपनी क़ाबिलियत का नतीजा समझ लेते हैं, और जब मुसीबत आती है तो फ़ौरन अल्लाह से शिकवा करने लगते हैं, हालाँकि क़ुरआन ने दोनों कैफ़ियतों का मेयार मुतअय्यन कर दिया है: नेमत मिले तो शुक्र, मुसीबत आए तो सब्र, और दोनों सूरतों में रुजू-ए-इलल्लाह; यही मोमिन की पहचान है।
अक्सर लोग ये समझते हैं कि अगर कोई नेक इन्सान मुसीबत में मुब्तिला हो जाए तो शायद अल्लाह उससे नाराज़ है, ये तसव्वुर इस्लामी तालीमात के ख़िलाफ़ है। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
«أَشَدُّ النَّاسِ بَلَاءً الْأَنْبِيَاءُ، ثُمَّ الْأَمْثَلُ فَالْأَمْثَلُ»
“सबसे ज़्यादा आज़माइश अम्बिया पर आती है, फिर उन लोगों पर जो उनके बाद ज़्यादा नेक होते हैं, फिर उनके बाद।” (जामे अत्-तिर्मिज़ी, हदीस: 2398; सुनन इब्न माजह, हदीस: 4023)
सोचिए! हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम बीमारी में मुब्तिला हुए, हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम क़ैद में गए, हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम मछली के पेट में रहे, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम आग में डाले गए, हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने हिजरत की, और हमारे आक़ा हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ ने यतीमी, ग़ुर्बत, शेब-ए-अबी तालिब की भूक, ताइफ़ की संग-बारी, बद्र व उहुद के ज़ख़्म और अपने जिगर-गोशों की वफ़ात जैसे बेशुमार इम्तिहानात बर्दाश्त किए। अगर आज़माइश अल्लाह की नाराज़गी की दलील होती तो सबसे पहले अम्बिया-ए-किराम उससे महफ़ूज़ होते; इसलिए मुसीबत को अल्लाह से दूरी नहीं बल्कि अल्लाह के क़रीब आने का मायह-ए-नाज़ मौक़ा समझना चाहिए।
सबसे पहले ज़बान पर क्या आना चाहिए?
ज़िलज़ला आए, हादसा हो, किसी अज़ीज़ की वफ़ात हो या ज़िन्दगी का कोई और सानिहा… एक मुसलमान की ज़बान पर सबसे पहले यही कलिमात आने चाहिए, إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ ये सिर्फ़ एक ताज़ियती जुमला नहीं, बल्कि पूरा अक़ीदा है जिसका मतलब ये है कि हम अल्लाह के हैं, हमारा माल अल्लाह का है, हमारे बच्चे अल्लाह की अमानत हैं, हमारी जान भी अल्लाह की अमानत है और एक दिन सबको उसी की तरफ़ वापस जाना है। जब ये यक़ीन दिल में उतर जाता है तो इन्सान हादसात की ज़द में आ कर टूटता नहीं बल्कि सँभल जाता है।
मुसलमान सिर्फ़ दुआ नहीं करता, ख़िदमत भी करता है। इस्लाम सिर्फ़ आँसू बहाने का मज़हब नहीं बल्कि अमल का मज़हब है। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
«مَنْ كَانَ فِي حَاجَةِ أَخِيهِ، كَانَ اللَّهُ فِي حَاجَتِهِ»
“जो अपने भाई की ज़रूरत पूरी करता है, अल्लाह उसकी ज़रूरत पूरी फ़रमाता है।” (सहीह बुख़ारी, हदीस: 2442; सहीह मुस्लिम, हदीस: 2580)
आज अगर किसी ख़ित्ते में ज़िलज़ला आए, कहीं सैलाब आए, कहीं क़हत पड़ जाए, या कहीं जंग से लोग बे-घर हो जाएँ, तो एक मुसलमान का फ़र्ज़ सिर्फ़ ज़बानी अफ़सोस का इज़हार नहीं बल्कि उसका असल फ़र्ज़ ये है कि वो अपनी इस्तताअत के मुताबिक़ माल, वक़्त, महारत, दुआ और हौसला-अफ़ज़ाई से मुसीबत-ज़दगान की मदद करे, और अगर कुछ भी मुमकिन न हो तो कम-अज़-कम दिल से उनका दर्द महसूस करे।
उम्मत का तसव्वुर और तालीमी व ख़ानदानी ज़िम्मेदारी
आज दुनिया ने क़ौमियतों, सरहदों, ज़बानों और नस्लों की बुनियाद पर ख़ुद को तक़सीम कर लिया है, लेकिन इस्लाम ने चौदह सौ साल पहले इन्सानियत और उम्मत का ऐसा मुरब्बत तसव्वुर दिया जिसकी मिसाल तारीख़ में नहीं मिलती। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
«الْمُؤْمِنُ لِلْمُؤْمِنِ كَالْبُنْيَانِ، يَشُدُّ بَعْضُهُ بَعْضًا»
“एक मोमिन दूसरे मोमिन के लिए इमारत की मानिन्द है, जिसका एक हिस्सा दूसरे हिस्से को मज़बूत करता है।” फिर आपﷺ ने अपने दोनों हाथों की उँगलियाँ एक दूसरे में पैवस्त फ़रमा कर इसकी अमली तस्वीर पेश फ़रमाई। (सहीह बुख़ारी, हदीस: 481; सहीह मुस्लिम, हदीस: 2585)। यही वो मिसाली इस्लामी मुआशरा है जहाँ कोई भूखा सोए तो दूसरा बे-चैन हो जाए, जहाँ किसी का घर गिरे तो दूसरा उसके लिए छत बन जाए, और जहाँ किसी के बच्चे यतीम हों तो पूरा मुआशरा उनका कफ़ील बन जाए।
क़ुदरती आफ़ात सिर्फ़ हुकूमतों को नहीं, ख़ानदानों को भी आईना दिखाती हैं। हमने बच्चों को दुनिया की हर सहूलत देना सिखाया, लेकिन हर आज़माइश बर्दाश्त करना नहीं सिखाया। हमने उन्हें कामयाबी के ख़्वाब दिखाए, लेकिन नाकामी का हौसला नहीं दिया। हमने उन्हें बेहतरीन लिबास पहनाया, लेकिन बेहतरीन किरदार से महरूम रखा। हमने उन्हें जदीद आलात (Gadgets) का इस्तेमाल तो सिखाया, लेकिन मुसीबत में अल्लाह के सामने हाथ उठाना नहीं सिखाया। क्या हमारे बच्चे जानते हैं कि ज़िलज़ले के वक़्त कौन सी दुआ पढ़नी चाहिए? क्या उन्हें मालूम है कि मुसीबत के वक़्त इस्तिग़फ़ार क्यों ज़रूरी है? क्या वो जानते हैं कि सदक़ा बलाओं को टालता है? अगर नहीं, तो हमें अपनी ख़ानदानी तर्बियत पर नए सिरे से ग़ौर करना होगा।
असातिज़ा और हुक्मरानों के लिए पैग़ाम
एक मुअल्लिम की हैसियत से मैं समझता हूँ कि क़ुदरती आफ़ात सिर्फ़ जुग़राफ़िया (Geography) के ख़ुश्क असबाक़ नहीं होतीं, बल्कि ये अख़लाक़ियात के ज़िन्दा असबाक़ भी होती हैं। जब बच्चों को ज़िलज़ले के बारे में पढ़ाया जाए तो उन्हें सिर्फ़ रिक्टर स्केल न सिखाया जाए, बल्कि उन्हें ये भी बताया जाए कि मुसीबत-ज़दा इन्सानों की मदद क्यों ज़रूरी है, इन्सानी जान की क़द्र क्या है, क़ुदरत के वसाइल की हिफ़ाज़त क्यों लाज़िम है, और ये कि इल्म का असल मक़सद सिर्फ़ रोज़गार नहीं बल्कि बुलन्द किरदार है। तालीम अगर इन्सान को ज़्यादा रहम-दिल, ज़्यादा ज़िम्मेदार और ज़्यादा ख़ुदा-शनास न बना सके तो वो सिर्फ़ मालूमात (Information) है, हिकमत (Wisdom) नहीं।
इसी तरह इस्लामी तालीमात में हुकूमत का सबसे पहला फ़र्ज़ रअय्या की जान व माल की हिफ़ाज़त है। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
«كُلُّكُمْ رَاعٍ وَكُلُّكُمْ مَسْئُولٌ عَنْ رَعِيَّتِهِ»
“तुममें से हर शख़्स निगहबान है और हर शख़्स से उसकी रअय्यत के बारे में सवाल किया जाएगा।” (सहीह बुख़ारी, हदीस: 893; सहीह मुस्लिम, हदीस: 1829)
इस हदीस की रोशनी में आफ़ात से निपटने की क़ब्ल-अज़-वक़्त मन्सूबाबन्दी, महफ़ूज़ तामीरात, फ़ौरी इम्दादी रसाई, शफ़्फ़ाफ़ इन्तिज़ामिया और कमज़ोर तबक़ात की दाद-रसी महज़ इन्तिज़ामी उमूर नहीं बल्कि दीनी व ईमानी ज़िम्मेदारियाँ भी हैं।
सलफ़-ए-सालिहीन का मामूल था कि जब बारिश रुक जाती, क़हत आता, या कोई इज्तिमाई मुसीबत पेश आती तो वो सबसे पहले तौबा व इस्तिग़फ़ार करते थे। इसलिए नहीं कि वो हर आफ़त को किसी मख़सूस गुनाह का बिला-वासता नतीजा क़रार देते थे, बल्कि इसलिए कि मोमिन हर हाल में अपने नफ़्स का मुहासबा करता है। हज़रत हसन बसरी रहमहुल्लाह से जब मुख़्तलिफ़ लोगों ने अपने इन्फ़िरादी व इज्तिमाई मसाइल बयान किए तो आपने सबको बिल-उमूम इस्तिग़फ़ार ही की तल्क़ीन फ़रमाई; क्योंकि इस्तिग़फ़ार सिर्फ़ गुनाहों की माफ़ी नहीं बल्कि अल्लाह की रहमत के बंद दरवाज़े खोलने की कुंजी है। शायद आज हमारी दुनिया को जदीद-तरीन मशीनों से ज़्यादा तौबा करने वाले दिलों की ज़रूरत है और यही वो सबक़ है जिसे क़ुदरत हर ज़िलज़ले, हर सैलाब और हर तूफ़ान के ज़रिए हमें दोबारा पढ़ाना चाहती है।
ज़मीन की आह, आसमान की गवाही और इन्सान का अन्जाम
﴿يَوْمَئِذٍ تُحَدِّثُ أَخْبَارَهَا بِأَنَّ رَبَّكَ أَوْحَىٰ لَهَا﴾
“उस दिन ज़मीन अपनी तमाम ख़बरें बयान करेगी, क्योंकि तुम्हारे रब ने उसे हुक्म दिया होगा।” (सूरत अज़्-ज़िल्ज़ाल: 4-5)
जब मैं दुनिया में आने वाले ज़िलज़लों, सैलाबों, आतिश-ज़दगियों, क़हत-साली और दूसरी क़ुदरती आफ़ात की ख़बरें पढ़ता हूँ तो मेरे ज़हन में एक ही सवाल बार बार उभरता है कि क्या वाक़ई ज़मीन ख़ामोश है? नहीं, ज़मीन ख़ामोश नहीं है बल्कि वो मुसलसल बोल रही है। पहाड़ बोल रहे हैं, समन्दर बोल रहे हैं, हवाएँ, बारिशें, ख़ुश्क होते दरिया और कटते हुए जंगलात बोल रहे हैं, और कभी कभी एक शदीद ज़िलज़ला पूरी इन्सानियत से मुख़ातब हो कर कहता है: “ए इन्सान! तू आख़िर कब जागेगा?” लेकिन अफ़सोस कि हम क़ुदरत की इस पुकार को सिर्फ़ सनसनी-ख़ेज़ “ब्रेकिंग न्यूज़” समझ कर आगे बढ़ जाते हैं।
मेरी नज़र में दुनिया की सबसे बड़ी ग़फ़्लत ये नहीं कि इन्सान अल्लाह को मानता नहीं, बल्कि सबसे बड़ी ग़फ़्लत ये है कि इन्सान अल्लाह को मानते हुए भी उसे अमली ज़िन्दगी में भूल जाता है। वो नमाज़ भी पढ़ता है, कारोबार भी करता है, औलाद की तालीम का इन्तिज़ाम भी करता है और घर भी बनाता है, मगर उसे कभी ये ख़याल नहीं आता कि शायद उसकी ज़िन्दगी का घर उसके माद्दी मन्सूबों से पहले ही ख़त्म हो जाए! इन्सान पचास साल के मन्सूबे बनाता है, हालाँकि उसे अगले पाँच मिनट की भी ख़बर नहीं होती। क़ुरआन ने इसी ग़फ़्लत को बड़े बलीग़ अन्दाज़ में बयान किया है:
﴿وَمَا تَدْرِي نَفْسٌ مَّاذَا تَكْسِبُ غَدًا وَمَا تَدْرِي نَفْسٌ بِأَيِّ أَرْضٍ تَمُوتُ﴾
“कोई जान नहीं जानती कि वो कल क्या कमाएगी, और न ही कोई जान जानती है कि वो किस ज़मीन में मरेगी।” (सूरत लुक़मान: 34)
कितनी अजीब बात है कि इन्सान पूरी दुनिया ख़रीदने की तगो-दो करता है और आख़िरकार उसे क़नाअत के लिए सिर्फ़ दो गज़ ज़मीन मिलती है।
मौत: सबसे बड़ा ज़िलज़ला और असल कामयाबी
हम ज़मीन के आरज़ी ज़िलज़लों से डरते हैं, लेकिन अपनी मौत के दाइमी ज़िलज़ले को भूल जाते हैं। हक़ीक़त ये है कि हर इन्सान की इन्फ़िरादी क़ियामत उसकी मौत ही से शुरू हो जाती है। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
«مَنْ مَاتَ فَقَدْ قَامَتْ قِيَامَتُهُ»
“जिसकी मौत आ गई, उसकी क़ियामत क़ायम हो गई।” (ये मफ़हूम मुतअद्दिद आसार में मन्क़ूल है)
और एक दूसरी हदीस में आपﷺ ने हिदायत फ़रमाई:
«أَكْثِرُوا ذِكْرَ هَاذِمِ اللَّذَّاتِ»
“लज़्ज़तों को मिटा देने वाली चीज़ यानी मौत को कसरत से याद किया करो।” (जामे अत्-तिर्मिज़ी, हदीस: 2307; सुनन अन्-नसाई, हदीस: 1824)
जो इन्सान मौत को मुस्तहज़र रखता है, वो किसी का हक़ नहीं मारता, झूठ नहीं बोलता, तकब्बुर और ज़ुल्म से इज्तिनाब करता है; क्योंकि उसे मालूम होता है कि एक दिन उसे रब के हुज़ूर हर छोटे बड़े अमल का जवाब देना है।
आज की दुनिया कामयाबी को दौलत, शोहरत, इक़्तिदार और मनासिब से नापती है, लेकिन क़ुरआन का अबदी मेयार बिल्कुल अलग है:
﴿فَمَن زُحْزِحَ عَنِ النَّارِ وَأُدْخِلَ الْجَنَّةَ فَقَدْ فَازَ﴾
“जो शख़्स आग से बचा लिया गया और जन्नत में दाख़िल कर दिया गया, वही हक़ीक़त में कामयाब है।” (सूरत आल-ए-इम्रान: 185)
इस मुख़्तसर सी आयत ने इन्सानी ज़िन्दगी का पूरा फ़लसफ़ा समेट कर रख दिया है।
इन्सानियत का सबसे ख़ूबसूरत मनशूर
जब कहीं कोई आफ़त आती है तो मलबे के नीचे दबे हुए इन्सान का मज़हब, उसकी ज़बान, उसका मस्लक, उसकी क़ौम या उसकी नस्ल नहीं पूछी जाती; वो सिर्फ़ एक मुहताज इन्सान होता है और उसकी मदद करने वाला भी सबसे पहले एक दर्द-ए-दिल रखने वाला इन्सान होना चाहिए। इस्लाम ने चौदह सौ साल पहले इसी आफ़ाक़ी सच्चाई का एलान किया था:
﴿وَمَنْ أَحْيَاهَا فَكَأَنَّمَا أَحْيَا النَّاسَ جَمِيعًا﴾
“जिसने एक जान को बचाया गोया उसने पूरी इन्सानियत को बचा लिया।” (सूरत अल-माइदह: 32)
ये आयत सिर्फ़ मुसलमानों के लिए नहीं, बल्कि पूरी इन्सानियत के लिए एक अज़ीम-तरीन अख़लाक़ी मनशूर है।
अगर क़ुदरत की ये बेदार-कुन निशानियाँ भी हमें ग़फ़्लत से न जगा सकीं, तो फिर दुनिया की कोई दूसरी माद्दी तरग़ीब हमें नहीं जगा सकती। आज वक़्त की अहम ज़रूरत है कि हम अपने घरों में क़ुरआन की तिलावत और फ़हम को बढ़ाएँ, नमाज़ों की हिफ़ाज़त करें, तौबा व इस्तिग़फ़ार को अपना मुस्तक़िल मामूल बनाएँ, सदक़ा व ख़ैरात को ज़िन्दगी का हिस्सा बनाएँ, ज़्यादा से ज़्यादा शजरकारी करें, पानी और दीगर क़ुदरती वसाइल को ज़ाए होने से बचाएँ, ज़मीन को अल्लाह की अमानत समझें, यतीमों, मिस्कीनों और मुसीबत-ज़दा लोगों के काम आएँ, अपने बच्चों को सिर्फ़ डिग्री-याफ़्ता कामयाब इन्सान नहीं बल्कि एक सालेह व रहम-दिल इन्सान बनाएँ, अपने स्कूलों में सिर्फ़ साइंस ही नहीं बल्कि आला अख़लाक़ियात की भी आबियारी करें और अपनी मसाजिद व मुआशरे को ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ का मरकज़ बनाएँ।
हमें याद रखना चाहिए कि इन्सान की सबसे बड़ी डिग्री उसका किरदार है। उसकी सबसे बड़ी दौलत उसका ईमान है। उसकी सबसे बड़ी ताक़त उसकी दुआ है। उसकी सबसे बड़ी कामयाबी अल्लाह की रज़ा है। और उसका सबसे बड़ा सरमाया वो नेकियाँ हैं जो मरने के बाद भी उसके साथ क़ब्र के अँधेरे में उतरती हैं।
लिहाज़ा, जब भी ज़मीन लर्ज़े, तो सिर्फ़ ख़बरें मत देखिए बल्कि अपने दिल की कैफ़ियत को भी टटोलिए। जब भी किसी बस्ती पर कोई आफ़त आए, तो सिर्फ़ ज़बानी अफ़सोस न कीजिए बल्कि इम्दाद के लिए अपने हाथ आगे बढ़ाइए। जब भी किसी बे-बस माँ की चीख़ सुनाई दे, तो सिर्फ़ आरज़ी आँसू न बहाइए बल्कि उसके लिए गिड़गिड़ा कर दुआ कीजिए और अगर मुमकिन हो तो उसके ज़ख़्मों पर मरहम रखिए। याद रखिए, ज़िलज़ले जहाँ माद्दी इमारतें गिराते हैं, वहीं बाअज़ औक़ात वो इन्सान के अन्दर सदियों से सोई हुई इन्सानियत को भी जगा देते हैं। ख़ुश-नसीब है वो इन्सान जो दूसरों की बर्बादी और क़ुदरत के इशारे देख कर अपनी इस्लाह कर ले, इससे पहले कि ज़िन्दगी का आख़िरी और अचानक आने वाला ज़िलज़ला उसे हमेशा के लिए ख़ामोश कर दे।
﴿يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ وَلْتَنظُرْ نَفْسٌ مَّا قَدَّمَتْ لِغَدٍ وَاتَّقُوا اللَّهَ إِنَّ اللَّهَ خَبِيرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ﴾
“ए ईमान वालो! अल्लाह से डरो, और हर शख़्स ये देखे कि उसने आने वाले कल (आख़िरत) के लिए क्या भेजा है, और अल्लाह से डरते रहो।” (सूरत अल-हश्र: 18)
अल्लाह तआला हमें अपनी निशानियों से सच्चा सबक़ सीखने, अपनी नेमतों की दिल से क़द्र करने, मुसीबत-ज़दा इन्सानों का मज़बूत सहारा बनने और उस हौलनाक दिन की भरपूर तैयारी करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए जिस दिन न माल काम आएगा और न औलाद, बल्कि सिर्फ़ वही दिल नजात पाएगा जो अल्लाह के हुज़ूर इख़्लास और पाकीज़गी के साथ हाज़िर होगा।
﴿يَوْمَ لَا يَنفَعُ مَالٌ وَلَا بَنُونَ إِلَّا مَنْ أَتَى اللَّهَ بِقَلْبٍ سَلِيمٍ﴾
(सूरत अश्-शुअरा: 88-89)

