बच्चे हमारे अहद के चालाक हो गए!!!

जदीद समाजी ज़वाल, डिजिटल यल्ग़ार और मासूमियत का क़त्ल-ए-आम

डॉ. असदुल्लाह ख़ान

देहली पब्लिक स्कूल के उस पुराने एमएमएस स्कैंडल को गुज़रे बरसों बीत गए, जिसे कभी समाज ने एक ग़ैर-मुतवक़्क़े (अप्रत्याशित) ज़लज़ला समझा था। उस वक़्त लोग चौंके थे कि पानी सर से ऊँचा हो चुका है। लेकिन आज, सन 2026 ई. के इस महीब (भयानक) डिजिटल दौर में जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो वो पुराना वाक़िया महज़ एक मासूमना लग़ज़िश (भूल) महसूस होता है। आज पानी सर से ऊँचा नहीं हुआ, बल्कि पूरा मुआशरा (समाज) ही इख़लाक़ी (नैतिक) दिवालियेपन और बे-हंगम टेक्नोलॉजी के तूफ़ान में ग़र्क़ हो चुका है। अब चौंकने का वक़्त भी गुज़र गया, अब तो सिर्फ़ मातम का दौर है।

कल का बच्चा वक़्त से पहले बालिग़ हो रहा था, मगर आज का बच्चा वक़्त से पहले “चालबाज़” और मुजरिमाना ज़ेहनियत का हामिल (युक्त) हो रहा है। कल मासूमियत दाग़दार हुई थी, आज मासूमियत का बीज ही दज्जाली टेक्नोलॉजी की भट्टी में झुलसकर राख हो चुका है। आज हिंदुस्तान, बा-ख़ूसूस (विशेषकर) महाराष्ट्र और मुल्क के दीगर (अन्य) हिस्सों से रोज़ाना जो ख़बरें अख़बारात की सुर्खियाँ बनती हैं, वो रूह को कपकपा देने के लिए काफ़ी हैं। मुंबई और पुणे जैसे मेट्रो शहरों में नौवीं और दसवीं जमात (कक्षा) के मासूम नज़र आने वाले बच्चे इंस्टाग्राम और दीगर सोशल मीडिया ऐप्स पर जाली (फ़र्ज़ी) प्रोफ़ाइल्स बनाकर अपने ही हम-जमातों (सहपाठियों) या बड़ों को “हनी ट्रैप” कर रहे हैं और लाखों रुपये बटोर रहे हैं।

मसनूई ज़हानत (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के इस दौर में अब किसी कैमरे से चोरी-छिपे वीडियो बनाने की ज़रूरत भी नहीं रही। स्कूल के बच्चे अपने ही दोस्तों और असातिज़ा (शिक्षकों) की तस्वीरों को चंद सेकेंड्स में “डीपफेक” टेक्नोलॉजी के ज़रिए नाज़ेबा (आपत्तिजनक) तस्वीरों और वीडियोज़ में तब्दील करके वायरल करने की धमकियाँ दे रहे हैं। महाराष्ट्र साइबर सेल के रिकॉर्ड्स ऐसे ना-बालिग़ मुजरिमों की दास्तानों से भरे पड़े हैं।

बच्चों के बस्तों से अब सिर्फ़ मानए-हमल अद्वियात (गर्भनिरोधक दवाएँ) ही नहीं निकलतीं, बल्कि उनके मोबाइल वॉलेट्स में लाखों रुपये की डिजिटल करेंसी और ऑनलाइन सस्ते नशे सप्लाई करने वाले नेटवर्क्स के लिंक्स मिलते हैं, जिनका सुराग़ लगाना क़ानून के लिए भी दर्द-ए-सर बन चुका है। दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर या कोलकाता का कोई नाम-निहाद बा-वक़ार (प्रतिष्ठित) स्कूल अब इस वबा (महामारी) से महफ़ूज़ नहीं है।

कच्ची उम्र की “मारिया” अब गली के नुक्कड़ पर ‘रॉकी’ का इंतज़ार नहीं करती, वो डेटिंग ऐप्स के ख़ुफ़िया चैट रूम्स में रात भर वर्चुअल उरियानियत (अश्लीलता) का सौदा करती है। “पुष्पा” अब सिर्फ़ बस्ता लेकर घर से ग़ायब नहीं होती, वो ऑनलाइन घोटाले के ज़रिए सरहद पार बैठे मुजरिमों के चंगुल में फँसकर इंसानी स्मगलिंग का ईंधन बन जाती है।

उरियानियत का नया रूप: ओटीटी और प्राइवेट स्क्रीन्स

हमारी नस्ल ने जिस “इडियट बॉक्स” यानी टेलीविज़न का रोना रोया था, वो तो अब ड्रॉइंग रूम का एक बे-ज़रर (हानिरहित) शो-पीस बनकर रह गया है। अब असल फ़ित्ना (आफ़त) हर बच्चे की जेब में मौजूद “ज़ाती स्क्रीन” (पर्सनल स्क्रीन) है। ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स पर सेंसरशिप की धज्जियाँ उड़ाते हुए जो मवाद (कांटेंट) पिघलाकर बच्चों के ज़ेहन में उतारा जा रहा है, उसने हया और पाकीज़गी के मफ़ाहीम (मायने) ही बदल दिए हैं। इंस्टाग्राम रील्स पर चंद “लाइक्स” और “व्यूज़” के लिए बारह-चौदह साल की बच्चियों का नीम-बरहना (अर्ध-नग्न) रक़्स और लड़कों का गैंग्स्टर कल्चर को आइडियल बनाना अब एक आम चलन है। इंटरनेट अब मालूमात (जानकारी) का ज़रिया नहीं, शहवत (कामुकता), ख़ुशूनत (हिंसा) और ज़ेहनी गंदगी का वो समंदर है जिसका कोई किनारा नहीं।

नफ़्सियाती ज़वाल और ख़ुदकुशियों का सैलाब

जब एक कच्चा और ना-पुख़्ता ज़ेहन इस महीब दलदल में क़दम रखता है, तो वो इसके अंजाम से बे-ख़बर होता है। वो सिर्फ़ एक “तजुर्बा” करना चाहता है, लेकिन ये तजुर्बा उसे एक ऐसे अंधे कुएँ में धकेल देता है जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं होता। पहले झिझक मरती है, फिर हया रुख़्सत होती है, फिर अक़्ल का चिराग़ गुल होता है और आख़िरकार जब वो अमली इक़दाम (कदम उठाने) की ज़िल्लत में फँसता है, तो ब्लैकमेलिंग, बदनामी और ज़ेहनी दबाव (तनाव) उसे मौत के मुँह में धकेल देते हैं।

ये कोई फ़र्ज़ी कहानी नहीं है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के ताज़ा तरीन आदाद-ओ-शुमार (आँकड़े) गवाह हैं कि मुल्क में ना-बालिग़ बच्चों में ख़ुदकुशी की शरह (दर) में होल्नाक हद तक इज़ाफ़ा हुआ है। पिछली दहाई (दशक) के मुक़ाबले में नशा-आवर अश्या (मादक पदार्थों) का इस्तेमाल स्कूल के बच्चों में दुगना हो चुका है। कम-उम्र बच्चे अब जड़ाईम (अपराधों) की दुनिया का सिर्फ़ ईंधन नहीं हैं, बल्कि वो शूटर, सप्लायर और हैकर बनकर उभर रहे हैं।

समाज के दानिशवर (बुद्धिजीवी) अब भी वही पुराना राग अलाप रहे हैं: “सेक्स एजुकेशन।” मगर सवाल ये है कि क्या सेक्स एजुकेशन इस तूफ़ान को रोक सकती है? हमारे स्कूलों का निज़ाम, जहाँ असातिज़ा ख़ुद इख़लाक़ी ज़वाल का शिकार हैं या इस मौज़ू (विषय) की हस्सासियत (संवेदनशीलता) से ना-वाक़िफ़ हैं, वहाँ ये तालीम सिर्फ़ एक तमाशा बनकर रह जाती है। हुकूमतें निसाब (पाठ्यक्रम) बदलती हैं, क्लासें चलाती हैं, लेकिन नतीजा? मासूम ज़ेहनों को वक़्त से पहले वो सब कुछ पता चल जाता है जिसकी उन्हें ज़रूरत भी नहीं थी। ये इलाज नहीं, बल्कि कच्चे ज़ेहनों में जिंसी जरासीम (यौन कीटाणुओं) की दानिस्ता (जानबूझकर) पैवंदकारी (प्लांटेशन) है। काम बनने के बजाय मज़ीद (और) बिगड़ जाता है।

अभी हाल ही में महाराष्ट्र के दारुल-हुकूमत (राजधानी) मुंबई के एक इंतिहाई महँगे और नामवर इंटरनेशनल स्कूल का एक वाक़िया सामने आया, जिसने पुलिस और माहिरीन-ए-नफ़्सियात (मनोवैज्ञानिकों) दोनों को हिलाकर रख दिया। दसवीं जमात के तीन लड़कों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के टूल्स इस्तेमाल करके अपनी ही हम-जमात लड़कियों की तस्वीरों को नाज़ेबा और बरहना तस्वीरों में तब्दील कर दिया। बात यहाँ ख़त्म नहीं हुई। इन चौदह-पंद्रह साल के बच्चों ने इन तस्वीरों को सोशल मीडिया पर वायरल करने की धकमी देकर उन लड़कियों से लाखों रुपये और महँगे गैजेट्स का मुतालबा (माँग) किया। जब एक लड़की ने डिप्रेशन में आकर ख़ुदकुशी की कोशिश की, तब जाकर ये उक़्दा (राज़) खुला। ज़रा सोचिए, जिस उम्र में बच्चे खिलौनों और पढ़ाई के तनाव से गुज़रते थे, उस उम्र में वे साइबर क्राइम और ब्लैकमेलिंग के मास्टरमाइंड बन चुके हैं।

ना-बालिग़ों में नशाख़ोरी का चलन

महाराष्ट्र के शहर पुणे में पेश आने वाला बदनाम-ए-ज़माना पोर्श कार हादसा महज़ एक ट्रैफ़िक हादसा नहीं था, बल्कि ये उस अमीर और बिगड़े हुए तबक़े के बच्चों की ज़ेहनी हालत का नौहा (विलाप) था जो वक़्त से पहले हर हद पार कर चुके हैं। एक ना-बालिग़ लड़के ने शराब के नशे में धुत्त होकर करोड़ों की गाड़ी से दो बे-क़सूर इंजीनियर्स को कुचल दिया। तहक़ीक़ात (जाँच) में जो बात सामने आई वो मज़ीद होल्नाक थी: इस कच्ची उम्र के बच्चे को बचाने के लिए ख़ून के नमूने बदले गए, रिश्वतें दी गईं, और ये बात सामने आई कि इन नाम-निहाद “पॉश” स्कूलों के बच्चों के लिए नाइट क्लबों में जाना, शराब नोशी और ड्रग्स का इस्तेमाल एक आम “स्टेटस सिंबल” बन चुका है। ये बच्चे क़ानून, इख़लाक़ और इंसानी ज़िंदगी को अपने पैर की जूती समझते हैं।

डिजिटल हनी ट्रैप और ऑनलाइन गेमिंग का जाल

दिल्ली और उत्तर प्रदेश के सरहदी इलाक़ों से एक और दिल दहला देने वाला वाक़िया सामने आया जहाँ नौवीं जमात के एक तालिब-ए-इल्म (छात्र) ने ऑनलाइन गेमिंग के दौरान क़र्ज़ अदा करने के लिए इंस्टाग्राम पर एक लड़की के नाम से फ़र्ज़ी अकाउंट बनाया। उसने आवाज़ बदलने वाली ऐप का इस्तेमाल करके अपने ही स्कूल के एक सीनियर लड़के को प्यार के जाल में फँसाया, उससे नाज़ेबा वीडियोज़ हासिल कीं और फिर उसे ख़ुदकुशी के दहाने पर पहुँचाकर हज़ारों रुपये ऐंठ लिए। ये ब-ज़ाहिर मासूम दिखने वाले बच्चे अब मुजरिमाना नफ़्सियात के इस दर्जे पर हैं जहाँ वो जानते हैं कि क़ानून की आँखों में धूल किस तरह झोंकनी है।

समाजी माहिरीन जब इन वाक़यात का तज़्सिया (विश्लेषण) करते हैं तो चंद सनसनीख़ेज़ हक़ाइक़ (तथ्य) सामने आते हैं। पुराने समाज में बच्चा ग़लती करने के बाद शर्मिंदगी और ख़ौफ़ महसूस करता था। आज का बच्चा पकड़े जाने पर शर्मिंदा होने के बजाय सबूत मिटाने और क़ानून से बचने की तदबीरें (उपाय) करता है। पहले टीवी, फ़िल्में या बुरी सोहबत (संगति) मुहर्रिक-ए-गुनाह (गुनाह के लिए उकसाने वाली) थीं, और वो भी महदूद (सीमित)। आज ज़ाती स्क्रीनों, इंटरनेट, डार्क वेब और ऐसी ऐप्स ने जगह ले ली है जो वालिदैर (माता-पिता) की नज़रों से छुपी रहती हैं। पुराने दौर का बदतर अंजाम पढ़ाई का हर्ज या घर से भाग जाना होता था, आज इसका अंजाम ब्लैकमेलिंग, क़त्ल, साइबर फ़्रॉड और कम-उम्री में ख़ुदकुशी है।

हमें ये समझना होगा कि ये बच्चे पैदाइशी मुजिरिम नहीं हैं। ये उस माहौल की पैदावार हैं जो हमने उन्हें दिया है। जब एक बारह साल का बच्चा रात के अंधेरे में अपने कमरे का दरवाज़ा बंद करके स्मार्टफ़ोन पर ऐसी चीज़ें देखता है जो तीस साल के बालिग़ मर्द के लिए भी ज़ेहनी तनाव का बाइस (कारण) बन सकती हैं, तो उसका नर्म और नाज़ुक आसाबी निज़ाम (नर्वस सिस्टम) मफ़लूज (पंगु) हो जाता है।

नफ़्सियाती हक़ीक़त ये है कि कच्ची उम्र में जिंसी और मुजरिमाना मवाद की कसरत बच्चों के दिमाग़ में “डोपामाइन” की सतह (लेवल) को इस हद तक बढ़ा देती है कि उन्हें आम ज़िंदगी, पढ़ाई और माँ-बाप का प्यार बिल्कुल फीका लगने लगता है। उन्हें हर वक़्त एक नया “थ्रिल” चाहिए होता है, और यही सनसनी उन्हें जुर्म की तरफ़ ले जाती है। जब अंजाम सामने आता है तो इन कच्चे ज़ेहनों में इस ज़िल्लत को सहने की ताक़त नहीं होती। यही वजह है कि आज का बच्चा या तो इंतिहाई जारिहाना (आक्रामक) होकर किसी का मर्डर कर बैठता है — जैसे गुरुग्राम के स्कूल में एक बच्चे ने महज़ इम्तिहान टालने के लिए अपने ही जूनियर का क़त्ल कर दिया था — या फिर वो ख़ुदकुशी कर लेता है।

मादर-ए-वतन के इस सिसकते और दम तोड़ते मुआशरे को अगर कोई बचा सकता है, तो वो अब सिर्फ़ और सिर्फ़ “ख़ानदान का इदारा” (परिवार की संस्था) और “वालिदैन” हैं। ऐ माओं और बापों! होश के नाख़ून लो। अपने बच्चों को स्मार्टफ़ोन और महँगी आसाइशें (सुविधाएँ) देकर अपनी ज़िम्मेदारियों से सुबुक-दोश (मुक्त) होने वाले वालिदैन दरअसल अपने हाथों से अपने लख़्त-ए-जिगर (संतान) का गला घोंट रहे हैं।

सबसे पहले अपने घर के माहौल को इस डिजिटल ग़लाज़त (गंदगी) से पाक कीजिए। अपने घरों में इख़लाक़ी, तहज़ीबी और दीनी क़दरों (मूल्यों) को दोबारा ज़िंदा कीजिए। बच्चों को सिर्फ़ डॉक्टर, इंजीनियर या आईएएस बनाने की दौड़ में शामिल न करें, उन्हें सबसे पहले एक “बा-इज़्ज़त और बा-हया इंसान” बनाएँ। उन्हें हलाल व हराम का फ़र्क़ सिखाएँ, उन्हें ख़ौफ़-ए-आख़िरत (परलोक का डर) और ज़मीर की बेदारी का सबक़ दें।

ये सब कुछ डंडे के ज़ोर पर या जब्र (ज़बरदस्ती) से नहीं होगा। इसके लिए आपको अपने बच्चों का “दोस्त” बनना होगा। उन्हें घर के अंदर वो मोहब्बत, वो तवज्जो (ध्यान) और वो मग़नातीसियत (आकर्षण) देनी होगी कि वो बाहर की आलूदगियों (गंदगियों) की तरफ़ नज़र उठाकर भी न देखें। अगर आज भी हम डिजिटल नशे की नींद से बेदार (जागना) न हुए, तो याद रखिए, आने वाली नस्लें हमें कभी माफ़ नहीं करेंगी और तारीख़ हमारे इस इख़लाक़ी ज़वाल पर ख़ून के आँसू रोएगी।

इस महीब और होल्नाक सूरत-ए-हाल के बाद, सबसे अहम् सवाल ये पैदा होता है कि आख़िर इस दलदल से निकलने का रास्ता क्या है? महज़ मसाइल (समस्याओं) का रोना रोने से इलाज मुमकिन नहीं। चूूँकि आज का बच्चा डिजिटल तौर पर हद से ज़्यादा चालाक हो चुका है, इसलिए रिवायती (पारंपरिक) और पुराने तरीक़े — जैसे मार-पीट या मोबाइल छीन लेना — अब कारगर नहीं रहे, बल्कि वो बच्चों को मज़ीद बाग़ी बना देते हैं। आज के दौर में हमें “स्मार्ट पेरेंटिंग” और अमली हिकमत-ए-अमली (व्यावहारिक रणनीति) की ज़रूरत है।

डिजिटल निगरानी और स्क्रीन टाइम का कंट्रोल

हम बच्चों से टेक्नोलॉजी मुकम्मल तौर पर छीन नहीं सकते, लेकिन इस पर पहरा ज़रूर लगा सकते हैं। हर वालिदैन को अपने बच्चों के फ़ोन और लैपटॉप में Google Family Link, Bark या Kaspersky Safe Kids जैसी पैरेंटल कंट्रोल ऐप्स इंस्टॉल करनी चाहिए जो नाज़ेबा वेबसाइट्स को ख़ुद-ब-ख़ुद ब्लॉक कर देती हैं और आपको मालूम रहता है कि बच्चा इंटरनेट पर क्या देख रहा है। घर में ये असूल (नियम) बनाएँ कि रात नौ या दस बजे के बाद कोई भी बच्चा — और ख़ुद वालिदैन भी — अपने बेडरूम में मोबाइल या स्क्रीन नहीं ले जाएगा। तमाम आलात (डिवाइसेज) ड्रॉइंग रूम में एक मुश्तरका (कॉमन) चार्जिंग पॉइंट पर रखे जाएँ। रात की तन्हाई ही इंटरनेट पर गुनाह और ब्लैकमेलिंग की सबसे बड़ी वजह है। घर का कंप्यूटर या स्मार्ट टीवी ऐसी जगह होना चाहिए जहाँ आते-जाते सब की नज़र पड़ सके। तन्हाई के कमरों में कंप्यूटर रखने की इजाज़त हरगिज़ न दें।

जिस्मानी सरगर्मियों और तख़्लीक़ी मशाग़िल में मसरूफ़ियत

जब तक आप बच्चे के हाथ से मोबाइल लेकर उसे कोई बेहतर मुतबादिल (विकल्प) नहीं देंगे, वो दोबारा मोबाइल की तरफ़ ही भागेगा। बच्चों को शाम के वक़्त मार्शल आर्ट्स, क्रिकेट, फ़ुटबॉल, तैराकी या किसी भी जिस्मानी खेल में लाज़मी मसरूफ़ (व्यस्त) करें। जब बच्चा जिस्मानी तौर पर थकेगा तो उसके अंदर तामीरी (सकारात्मक) हार्मोन्स पैदा होंगे और वो रात को सुकून की नींद सोएगा। उन्हें किताबें पढ़ने की आदत डालें, ख़त्ताती (कैलीग्राफी), पेंटिंग या रोबोटिक्स जैसे तख़्लीक़ी मशाग़िल (रचनात्मक शौक) में लगाएँ ताकि उनकी ज़ेहनी सलाहियतें मुसब्त (सकारात्मक) सिम्त (दिशा) में काम करें।

बच्चों से मुकाल्मा और एतमाद का रिश्ता

आज का बच्चा बाहर इसलिए मुँह मारता है क्योंकि घर में उसे सुनने वाला कोई नहीं है। वालिदैन काम-काज में इतने मसरूफ़ हैं कि बच्चों को सिर्फ़ पैसा और गैजेट्स दे देते हैं, वक़्त नहीं देते। रोज़ाना रात के खाने पर या उसके बाद कम से कम आधा घंटा अपने बच्चों के साथ बग़ैर किसी मोबाइल के बैठें। उनसे उनके स्कूल, दोस्तों, परेशानियों और पसंदीदा मौज़ूआत (विषयों) पर बात करें। उनके दोस्त बनें ताकि अगर कोई उन्हें ऑनलाइन ब्लैकमेल करने की कोशिश करे तो वो डरने के बजाय सबसे पहले आपको बताएँ। बच्चों को ये एहसास दिलाएँ कि “अगर तुमसे कोई ग़लती हो भी जाए, तो हम तुम्हारे साथ खड़े हैं।” ये जुमला बच्चों को डिप्रेशन और ख़ुदकुशी से बचा लेता है।

हलाल व हराम और इख़लाक़ी इक़दार की अमली तरबियत

मज़हबी और इख़लाक़ी रंग सिर्फ़ बातों से नहीं चढ़ता, इसके लिए घर का माहौल बदलना होगा। अगर बाप ख़ुद रात भर रील्स देख रहा है या माँ ख़ुद सोशल मीडिया पर मसरूफ़ है, तो बच्चा कभी आपकी बात नहीं मानेगा। वालिदैन को ख़ुद हया, सादगी और इख़लाक़ का नमूना बनना होगा। बच्चों को कहानियाँ सुनाएँ, उन्हें ये सिखाएँ कि “कोई देखे न देखे, अल्लाह ज़रूर देख रहा है।” जब बच्चे के अंदर का ज़मीर जाग जाएगा तो वो तन्हाई में भी बुराई से ख़ुद को रोक लेगा। उन्हें महरम और ना-महरम की हुदूद (सीमाओं), और हलाल व हराम की तमीज़ बचपन से सिखाएँ।

स्कूल और असातिज़ा का किरदार

वालिदैन को स्कूलों की इंतिज़ामिया (प्रबंधन) पर भी दबाव डालना चाहिए। स्कूलों में सिर्फ़ किताबी सेक्स एजुकेशन के बजाय “साइबर क्राइम और डिजिटल सेफ़्टी” पर बा-क़ायदा वर्कशॉप्स होनी चाहिए, जहाँ बच्चों को बताया जाए कि इंटरनेट पर किसी को अपनी तस्वीर भेजना या किसी की तस्वीर बदलना कितना बड़ा जुर्म है और इसकी सज़ा क्या है। स्कूल के निसाब (पाठ्यक्रम) में इख़लाक़ियात (नैतिकता) और इक़दार की तालीम को लाज़मी और नंबरों का हिस्सा बनाया जाए।

बच्चा अगर चालाक हो चुका है, तो वालिदैन को हिकमत (बुद्धि) वाला बनना पड़ेगा। टेक्नोलॉजी से लड़ने के बजाय टेक्नोलॉजी को मॉनिटर करना सीखिए। अपने बच्चों को क़ीमती फ़ोन देने के बजाय अपना क़ीमती वक़्त दीजिए। याद रखिए, आपकी छोटी सी ग़फ़्लत (लापरवाही) आपके जिगर-गोशे को किसी बड़े हादसे का शिकार बना सकती है। हमारी नस्ल का वो ख़ौफ़ आज एक महीब हक़ीक़त बनकर हमारे सामने खड़ा है, और इसका इलाज सिर्फ़ और सिर्फ़ ख़ुलूस (निष्ठा), मोहब्बत और सख़्त इख़लाक़ी तरबियत में पिन्हाँ (छिपा) है। आज ही से अपने घर में ये अमली तब्दीलियाँ नाफ़िज़ (लागू) कीजिए, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।

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