डॉ. असदुल्लाह ख़ान
मकसद, जिम्मेदारी और समाधान की तलाश
एक पुराना रोना, एक नया ज़ख़्म
मेयार-ए-तालीम का रोना कोई नया तो है नहीं, मनमोहन सिंह भी रो चुके और कपिल सिब्बल भी, लेकिन अभी फ़र्क़ नहीं पड़ा। शायद इसी लिए अब यह कहा जाने लगा है कि मौक़ा बह मौक़ा इस उनवान पर मातम ज़रूरी हो जाता है। बात ख़ुदा लगती है — हमारे उर्दू स्कूलों का इन्तिज़ामिया हो कि असातिज़ा, बस इसी ज़ेम में जिए जा रहे हैं कि अपने यहाँ तो सब ठीक ठाक है।
मेयार के झंझट में कौन पड़े? हमारे तो सभी स्कूल मेयारी हैं। जब कि आलम यह है कि मेयारी स्कूल की कसौटी पर परखे जाएँ तो चंद एक को छोड़ कर बेशतर स्कूल किसी शुमार क़तार में ही नहीं। और हद तो यह है कि उन्हें ख़बर भी नहीं कि अच्छे स्कूल के लिए पैमाने क्या हैं — और जानने की कोई तड़प भी नहीं।
शहर के मशहूर अंग्रेज़ी अख़बार में छपी इस ख़बर ने ज़ी शऊर और बेदार शहरियों को झंझोड़ कर रख दिया: रवाँ तालीमी साल में मुंबई के स्कूलों की सालाना जाँच में एक तिहाई से ज़ाइद स्कूल नाकाम रहे। महाराष्ट्र स्टेट बोर्ड की जानिब से ३२२८ स्कूलों में से सिर्फ़ ३८९ स्कूल ही दर्जा A से कामयाब क़रार दिए गए — यानी महज़ १३ फ़ीसद। यह अदाद-ओ-शुमार कोई मामूली तशवीश नहीं, यह हमारे पूरे तालीमी ढाँचे पर एक फ़र्द-ए-जुर्म है।
अफ़सोस कि उर्दू हल्क़ों में इस ख़बर की बाज़गश्त भी नहीं सुनी गई। हमें तो एह्तिसाब करते रहने की पुरानी बीमारी है। इसी लिए आईना पोंछने के बजाए हम अपने चेहरे के धब्बों की ख़बर लेने में दिलचस्पी रखते हैं।
२००९ء से २०२६ء तक — क्या बदला, क्या नहीं बदला?
वक़्त गुज़रा, साल बदले, हुकूमतें आईं और गईं… मगर स्कूल के दरवाज़े पर वही पुराना सवाल खड़ा है
जब २००९ء में यह ख़बर शाइअ हुई कि मुंबई के ३२२८ स्कूलों में से सिर्फ़ ३८९ यानी महज़ १३ फ़ीसद स्कूल A ग्रेड से कामयाब हुए, तो यह एक धचका था — एक तकलीफ़देह आईना जिस में हम ने अपना चेहरा देखने से मुँह मोड़ लिया। उस वक़्त सोचा गया कि शायद एक नस्ल में हालात बदल जाएँगे। अब पंद्रह साल बाद, २०२६ء में, आईए देखते हैं कि क्या वाक़ई कोई बुनियादी तब्दीली आई — या बस काग़ज़ात पर अदाद बदले?
पंद्रह साल बाद UDISE+ 2024-25 और ASER 2024 की रिपोर्टें हमारे सामने हैं। आईए आठ अहम पैमानों पर ईमानदारी से देखते हैं — क्या बदला, क्या वही रहा, और क्या अब भी बुह्रान है।
१. स्कूलों का मेयार — निज़ाम-ए-जाँच बदला ज़रूर है लेकिन तालीमी मेयार का बुह्रान अपनी जगह बरक़रार है!!!
२००९ء में महाराष्ट्र स्टेट बोर्ड की इस जाँच ने मुंबई के स्कूलों की दर्जाबंदी की थी — और नतीजा सब के सामने था: सिर्फ़ १३ फ़ीसद स्कूल A ग्रेड के क़ाबिल। यह अदाद एक निज़ाम की नाकामी का एतिराफ़ थे।
अब २०२४-२५ء में सूरतहाल यह है कि वह पुराना A/B/C/D/E दर्जाबंदी का निज़ाम अब मौजूद नहीं — UDISE+ ने स्कूलों की जाँच का पूरा तरीक़ा-ए-कार बदल दिया है। अब स्कूलों को उन के इन्फ़्रा इस्ट्रक्चर, दाख़िले, असातिज़ा की तादाद और डिजिटल सहूलियात की बुनियाद पर Online Report Card मिलता है। बज़ाहिर यह तब्दीली बेहतरी की अलामत है — मगर सवाल वही है कि क्या निज़ाम बदलने से हक़ीक़त बदली?
दुख की बात यह है कि ASER 2024 की रिपोर्ट, जो लाखों बच्चों पर ज़मीनी सर्वे के बाद बनाई गई, बताती है कि बच्चों की सीखने की सलाहियत अभी भी एक बड़ा मसला है। तीसरी जमाअत के ७६.६ फ़ीसद बच्चे दूसरी जमाअत का मतन नहीं पढ़ सकते। यानी स्कूल का कार्ड बदल गया — बच्चे का नतीजा नहीं बदला।
२. बैत-उल-ख़ला की दस्तयाबी में कुछ बेहतरी हुई मगर वह नामुकम्मल है — सफ़ाई का सवाल जोंका तोंका मुँह पहाड़े खड़ा है।
२००९ء में मुल्क के स्कूलों में बैत-उल-ख़ला की दस्तयाबी ६३ फ़ीसद से भी कम थी — और जो थे वह अक्सर नाक़ाबिल-ए-इस्तेमाल। यह वह वक़्त था जब लड़कियाँ सिर्फ़ इस लिए स्कूल छोड़ देती थीं कि बुलूग़त के बाद उन की बुनियादी ज़रूरत का कोई इन्तिज़ाम न था।
अब UDISE+ 2024-25 के मुताबिक़ ९८.६ फ़ीसद स्कूलों में बैत-उल-ख़ला मौजूद है — यह वाक़ई एक क़ाबिल-ए-ज़िक्र पेशरफ़्त है। मगर अदाद की तह में उतरते हैं तो पता चलता है कि “मौजूद होना” और “क़ाबिल-ए-इस्तेमाल होना” दो अलग चीज़ें हैं। ASER 2024 बताती है कि २०२४ء में सिर्फ़ ७२ फ़ीसद स्कूलों में लड़कियों के लिए काम करने वाला और साफ़ बैत-उल-ख़ला मौजूद था — यानी २६ फ़ीसद में बैत-उल-ख़ला था ही नहीं या बंद पड़ा था। दीवार और दरवाज़ा लग गया — सफ़ाई और देखभाल नहीं आई।
और सब से अहम बात: Swachh Bharat Mission के तहत अरब रुपए ख़र्च हुए — मगर वह लड़कियाँ जो आज भी नाक़ाबिल-ए-इस्तेमाल बैत-उल-ख़ला की वजह से परेशान होती हैं, उन्हें काग़ज़ी अदाद से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। बेहतरी अधूरी है मगर सफ़ाई और देखभाल का मसला अब भी बाक़ी है।
३. कहीं कहीं नल मौजूद लेकिन पीने का पानी नदारद है।
२००९ء में पीने के साफ़ पानी की सहूलियत स्कूलों में बड़े पैमाने पर ग़ैर मौजूद थी। बच्चे घर से पानी लाते थे, गर्मियों में प्यासे रहते थे, और बेहोशी के वाक़यात कोई नादर बात न थे।
अब UDISE+ 2024-25 का दावा है कि ९९ फ़ीसद स्कूलों में पीने का पानी दस्तयाब है — यह अदाद काग़ज़ों पर इन्क़िलाब है। मगर यहाँ भी वही सवाल: “दस्तयाब” की तारीफ़ क्या है? क्या पानी साफ़ है? क्या रोज़ाना मिलता है? क्या बर्तन साफ़ हैं? बहुत से स्कूलों में नल लगा है मगर पानी नहीं आता, या आता है तो आलूदा आता है।
ASER 2024 ने पीने के पानी की दस्तयाबी ७७.७ फ़ीसद दर्ज की — यानी काग़ज़ों के ९९ फ़ीसद और ज़मीनी हक़ीक़त के ७७.७ फ़ीसद के दरमियान २१ फ़ीसद का फ़र्क़ है। यह फ़र्क़ ही असल कहानी है। यह ज़ाहिरी बेहतरी है मगर काग़ज़ और ज़मीन के दरमियान का फ़र्क़ ख़तरनाक है।
४. स्कूलों में कंप्यूटर और इंटरनेट के मामले में बड़ी पेशरफ़्त हुई है — लेकिन तस्वीर अब भी नामुकम्मल है।
२००९ء में कंप्यूटर का तसव्वुर हमारे अक्सर स्कूलों में ख़्वाब था। जिन स्कूलों में कंप्यूटर थे वहाँ भी बिजली नहीं थी, या कंप्यूटर हफ़्तों बंद रहते थे। कंप्यूटर एजूकेशन के नाम पर इज़ाफ़ी फ़ीस ली जाती थी मगर बच्चे महीने में बमुश्किल एक दो घंटे इस्क्रीन का मुँह देख पाते थे।
अब UDISE+ 2024-25 के मुताबिक़ ६४.७ फ़ीसद स्कूलों में कंप्यूटर मौजूद हैं और ६३.५ फ़ीसद स्कूलों में इंटरनेट कनेक्शन है — २०२३-२४ء के मुक़ाबले में यह नुमायाँ इज़ाफ़ा है। यह Digital India Mission की एक हक़ीक़ी कामयाबी है।
मगर एक तकलीफ़देह बारीकी देखें कि जिन ६४.७ फ़ीसद स्कूलों में कंप्यूटर हैं, उन में से सिर्फ़ ५८ फ़ीसद काम कर रहे हैं — यानी तक़रीबन ७ फ़ीसद स्कूलों में कंप्यूटर मौजूद है मगर बंद पड़ा है। और हुकूमती व नजी स्कूलों के दरमियान फ़र्क़ भी वाज़ेह है: सरकारी स्कूलों में ५८.६ फ़ीसद इंटरनेट कनेक्शन है जब कि नजी स्कूलों में ७७.१ फ़ीसद — यानी ग़रीब बच्चों का डिजिटल ख़सारा अभी भी जारी है। और यह भी याद रहे कि २५,०००से ज़्यादा स्कूलों में अभी बिजली ही नहीं। बड़ी पेशरफ़्त हुई है — मगर सरकारी व नजी स्कूलों के दरमियान डिजिटल तफ़ावुत तशवीशनाक है।
५. सिंगल टीचर स्कूल — मामूली बेहतरी, बुह्रान अब भी ज़िंदा है — एक अकेला उस्ताद, पाँच जमाअतें, सौ बच्चे।
२००९ء में यह हमारे देहाती तालीमी निज़ाम की सब से तकलीफ़देह हक़ीक़त थी। लाखों ऐसे स्कूल थे जहाँ एक इन्सान के कंधों पर पूरे स्कूल का बोझ था।
पंद्रह साल बाद UDISE+ 2024-25 बताती है कि अभी भी एक लाख बारह हज़ार से ज़्यादा सिंगल टीचर स्कूल मौजूद हैं — हाँ २०२३-२४ء के मुक़ाबले में ६ फ़ीसद कमी आई है — मगर यह कमी इस बुह्रान के मुक़ाबले में एक क़तरा है।
सोचिए कि एक लाख बारह हज़ार स्कूलों में एक उस्ताद। अगर हर स्कूल में औसतन ५० बच्चे भी हों तो ५६ लाख बच्चे आज भी ऐसे निज़ाम में तालीम पा रहे हैं जहाँ इन्फ़िरादी तवज्जो मुहाल है, मज़ामीन का एहाता नामुमकिन है, और उस्ताद रोज़ाना एक इन्सानी करतब दिखाता है — इल्म नहीं देता। यह तालीम नहीं — यह एक थके हुए इन्सान की लाचारी का नाम है। एक लाख बारह हज़ार स्कूलों में एक उस्ताद — यह निज़ाम-ए-तालीम नहीं — यह एक अल्मिया है — ५६ लाख बच्चों का बुह्रान ख़त्म होने का नाम नहीं ले रहा।
६. पाँचवीं जमाअत की पढ़ने की सलाहियत का बुनियादी बुह्रान ख़त्म नहीं हुआ है — कोविड का ज़हर बाक़ी है।
यह वह पैमाना है जो सब से ज़्यादा दिल दहलाता है — और यही वह पैमाना है जो बताता है कि स्कूल असल में काम कर रहा है या नहीं। २००९ء में इस मौज़ू पर मुनज़्ज़म क़ौमी सर्वे मौजूद नहीं था — मगर जो इशारे मिलते थे वह बताते थे कि बुह्रान शुरू हो चुका है।
अब ASER 2024 की रिपोर्ट — जो ६०५ देहाती अज़्ला और सवा छह लाख बच्चों के बराहे रास्त सर्वे की बुनियाद पर तैयार हुई — बताती है: तीसरी जमाअत के ७६.६ फ़ीसद बच्चे दूसरी जमाअत का मतन नहीं पढ़ सकते। तीसरी जमाअत के ६६.३ फ़ीसद बच्चे सादा घटाना नहीं जानते। पाँचवीं जमाअत के ७० फ़ीसद बच्चे दो हिंदसों की तक़सीम नहीं जानते।
यह अदाद पंद्रह साल की “तरक़्क़ी” के बाद के अदाद हैं। हम ने बच्चों को स्कूल भेजा — मगर स्कूल ने उन्हें सीखना नहीं सिखाया। कोविड के दो सालों ने जो सीखने का तसलसुल तोड़ा, उस का नुक़सान अभी तक नहीं भरा। पाँचवीं और आठवीं जमाअत के बेशतर रियासतों के बच्चे अभी तक २०१८ء की सतह पर नहीं पहुँचे — यानी सात साल की महनत कोविड के दो साल निगल गए — और वह ख़ला अभी भी ख़ाली है।
स्कूल गया, पास हुआ, सनद मिली — मगर पढ़ना नहीं आया — यह बुनियादी बुह्रान न सिर्फ़ बरक़रार बल्कि कोविड के बाद मज़ीद गहरा हुआ है।
७. सेकंडरी तालीम में दाख़िला — बेहतरी हुई, मगर हर तीन में एक बच्चा अब भी स्कूल से बाहर है।
२००९ء में सेकंडरी तालीम की GER (Gross Enrolment Ratio) तक़रीबन ५२ फ़ीसद या उस से भी कम थी — यानी हर दो में से एक बच्चा नौवीं और दसवीं जमाअत तक पहुँचने से पहले ही निज़ाम-ए-तालीम की दुनिया से बाहर हो जाता था।
अब UDISE+ 2024-25 के मुताबिक़ सेकंडरी GER ६८.५ फ़ीसद हो गई है — यानी पंद्रह सालों में सोलह फ़ीसद का इज़ाफ़ा। यह बेशक एक मुसबत पेशरफ़्त है — ज़्यादा बच्चे स्कूल में हैं, ज़्यादा बच्चे आगे बढ़ रहे हैं।
मगर इस कामयाबी के साथ एक तल्ख़ हक़ीक़त भी है: अभी भी हर सौ में से ३१ बच्चे सेकंडरी स्कूल तक नहीं पहुँचते। GER 68.5 फ़ीसद कामयाबी भी है और नाकामी भी — यह समझना ज़रूरी है कि बेहतरी है मगर हर तीसरा बच्चा अभी भी सेकंडरी तालीम से महरूम है।
८. महाराष्ट्र में उस्ताद-तालिब-ए-इल्म तनासुब में कोई बेहतरी नहीं, बल्कि…
२००९ء में हम ने लिखा था कि जमाअतों में ७० ता ८० बच्चे ठूँसे जाते हैं। सरकारी ज़ाब्ता ४५ बच्चे फ़ी जमाअत कहता था — मगर ज़मीनी हक़ीक़त इस से दुगुनी थी। RTE 2009ء ने क़ानूनन ३०:१ का तनासुब मुक़र्रर किया। हम ने सोचा शायद अब बदलेगा।
मगर UDISE+ 2024-25 का डेटा बताता है कि महाराष्ट्र में आला जमाअतों (Secondary) का PTR यानी Pupil-Teacher Ratio ३७:१ है — जो RTE के क़ानूनी मेयार ३०:१ से भी बदतर है और NEP 2020 की सिफ़ारिश २०-२५:१ से तो कहीं दूर। सिर्फ़ महाराष्ट्र नहीं — झारखंड में यह तनासुब ४७:१ तक पहुँचता है। यानी एक उस्ताद के सामने सैंतालीस बच्चे — यह क्लासरूम है या भीड़?
जब एक उस्ताद के सामने ३७ से ४७ बच्चे हों तो इन्फ़िरादी तवज्जो मुमकिन ही नहीं। जो बच्चा समझ नहीं पा रहा, वह भीड़ में गुम हो जाता है। जो बच्चा ज़हीन है उसे आगे बढ़ने का मौक़ा नहीं मिलता। और उस्ताद — जो पहले ही ग़ैर-तदरीसी कामों के बोझ तले दबा है — इस भीड़ में महज़ “हाज़िरी लगाने वाला” बन कर रह जाता है। यह सूरतहाल २००९ء से अब तक नहीं बदली — बल्कि बाज़ रियासतों में बदतर हुई है।
जाइज़े के बाद जो तस्वीर सामने आती है
जो बेहतरी आई वह बेशतर “ढाँचे” में आई — बैत-उल-ख़ला लगे, नल लगे, कंप्यूटर आए, दाख़िले बढ़े। यह सब ख़ुशआइंद है और उन का एतिराफ़ ज़रूरी है। मगर जो नहीं बदला वह असल है — बच्चा सीख नहीं रहा, उस्ताद पढ़ा नहीं पा रहा, क्लास भरी हुई है, सिंगल टीचर स्कूल अभी भी लाखों में हैं।
हम ने इमारत बनाई — मगर रूह नहीं डाली। हम ने नल लगाया — मगर पानी नहीं भरा। हम ने कंप्यूटर रखा — मगर ज़हन नहीं बनाया। हम ने बच्चों को दाख़िल किया — मगर उन्हें सीखने का माहौल नहीं दिया। अब सवाल यह नहीं कि स्कूल है या नहीं — अब सवाल यह है कि स्कूल में सीखना हो रहा है या नहीं। और जब तक इस सवाल का जवाब “हाँ” नहीं होता, हर रिपोर्ट — चाहे २००९ء की हो या २०२६ء की — हमारे ज़मीर पर एक और दाग़ है।
ASER 2024 की रिपोर्ट — जो प्रथम फ़ाउंडेशन ने ६०५ देहाती अज़्ला के ६ लाख से ज़्यादा बच्चों के सर्वे के बाद जारी की — बताती है कि तीसरी जमाअत के ७६.६ फ़ीसद बच्चे अभी भी दूसरी जमाअत का मतन रवानी से नहीं पढ़ सकते। तीसरी जमाअत के ६६.३ फ़ीसद बच्चे सादा हिसाब नहीं कर सकते। पाँचवीं जमाअत में ७० फ़ीसद बच्चे बुनियादी तक़सीम नहीं जानते। यानी स्कूल की इमारत मज़बूत हुई — मगर इल्म की बुनियाद कमज़ोर है।
कोविड का ज़हर — जो अभी तक नहीं निकला
२०२०ء और २१ء के कोविड के दो सालों ने जो तालीमी नुक़सान किया, उस के ज़ख़्म अभी तक ताज़ा हैं। ASER 2024 बताती है कि पाँचवीं और आठवीं जमाअत के बेशतर बच्चे अभी तक २०१८ء की सतह पर नहीं पहुँचे — यानी वबा ने पाँच छह साल की महनत को वापस ले लिया। स्कूल खुल गए, बच्चे आ गए — मगर जो सीखना छूटा, वह वापस नहीं आया। और जिन स्कूलों में डिजिटल ढाँचा था वहाँ ऑनलाइन तालीम हुई — मगर मुंबरा, कोसा, धारावी के वह बच्चे जिन के घर में न स्मार्टफ़ोन था न इंटरनेट, वह पूरी पूरी जमाअतें गुम कर बैठे।
अगर २००९ء और २०२६ء का मोवाज़ना ईमानदारी से किया जाए तो जवाब यह है कि ढाँचे में बेहतरी आई, बुनियादी सहूलियात बढ़ीं, दाख़िले बढ़े — यह अच्छा हुआ। मगर तालीम का असल मक़सद — सीखना, सोचना, समझना — इस में बुनियादी तब्दीली नहीं आई। हम ने स्कूल की दीवारें पक्की कर लीं — मगर बच्चे के ज़हन की दीवार अभी भी कच्ची है।
कितने साल और दरकार हैं ऐ अहल-ए-वतन,
बच्चे स्कूल जाएँ और कुछ सीख कर लौटें।
स्कूल की दो मुतवाज़ी दुनियाएँ
हमारे शहरों और क़स्बों में स्कूलों की दो मुतवाज़ी दुनियाएँ आबाद हैं। एक वह जो सरकारी काग़ज़ों में दर्ज है, दूसरी वह जो किसी सड़क के मोड़ पर, किसी ख़स्ता-हाल इमारत की तीसरी मंज़िल पर, या किसी वीरान गोदाम में साँस ले रही है — और उन्हें “स्कूल” का नाम दे दिया गया है।
नेशनल इन्स्टिट्यूट ऑफ़ एजूकेशनल प्लानिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन (NIEPA) की रिपोर्ट के मुताबिक़ मुल्क भर में लाखों ऐसे नजी स्कूल चल रहे हैं जिन के पास न तो बाक़ायदा तसलीमशुदगी है, न बुनियादी ढाँचा, और न ही तरबियत-याफ़्ता असातिज़ा। सिर्फ़ महाराष्ट्र में ऐसे ग़ैर-क़ानूनी स्कूलों की तादाद हज़ारों में है जिन्हें बार बार नोटिस के बावजूद बंद नहीं किया जाता — क्योंकि यह स्कूल मक़ामी सियासत, किराया-दारी के कारोबार और “तालीमी माफ़िया” की आँखों का तारा बने हुए हैं।
इन ग़ैर-क़ानूनी स्कूलों का तरियाक़ यह है कि यह अक्सर अंग्रेज़ी मीडियम के नाम पर खुलते हैं, भारी दाख़िला फ़ीस वसूल करते हैं, चंद कमरों में सौ सौ बच्चे ठूँस देते हैं और किसी भी हादसे की सूरत में ज़िम्मेदार कोई नहीं होता। सितम यह कि ग़रीब वालदैन यह समझ कर बच्चों को यहाँ भेजते हैं कि कॉन्वेंट में पढ़ा रहे हैं — हालाँकि यह “कॉन्वेंट” महज़ एक लफ़्ज़ है, इमारत के दरवाज़े पर लटकी हुई बेमानी तख़्ती।
यह कॉन्वेंट नहीं — तालीम के नाम पर एक मुनज़्ज़म फ़रेब है जो ग़रीब वालदैन की ख़्वाहिशों को कैश करता है।
सरकारी स्कूलों की नाकाफ़ी तादाद
जिन इलाक़ों में सरकारी स्कूल हैं भी, वहाँ उन की तादाद आबादी के तनासुब से इतनी कम है कि दाख़िला मिलना भाग्य की बात हो जाती है। ASER (Annual Status of Education Report) 2023 के मुताबिक़ देहाती इलाक़ों में तक़रीबन २८ फ़ीसद बच्चे आज भी या तो स्कूल से बाहर हैं या दरमियान में छोड़ देते हैं। शहरों के कच्ची आबादी वाले इलाक़ों — मुंबई के धारावी, कुर्ला, मुंबरा, मानखुर्द — में हर एक सरकारी स्कूल पर हज़ारों बच्चों का बोझ है।
पराइमरी स्कूलों का हाल तो और भी दर्दनाक है। RTE (हक़-ए-तालीम क़ानून २००९) ने हर एक किलोमीटर के फ़ासले पर पराइमरी स्कूल और तीन किलोमीटर के दाइरे में अपर पराइमरी स्कूल का हक़ दिया, मगर ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि कसीर आबादी वाले इलाक़ों में आज भी बच्चों को पाँच पाँच किलोमीटर पैदल चल कर स्कूल जाना पड़ता है — और यह वह फ़ासला है जो लड़कियों को दरमियान में ही पढ़ाई छड़वाने पर मजबूर कर देता है।
मुंबई मज़ाफ़ाती इलाक़े में तक़रीबन पैंतालीस लाख से ज़ाइद आबादी के मुक़ाबले में सरकारी पराइमरी स्कूलों की तादाद ११०० से भी कम है। मुंबरा और कोसा का हाल इस से भी ज़्यादा तकलीफ़देह है, जहाँ सरकारी रिकार्ड के मुताबिक़ आठ लाख से ज़्यादा आबादी के लिए ६० से भी कम सरकारी स्कूल हैं। धारावी जैसे गुंजान आबाद इलाक़े में, जहाँ दस लाख से ज़ाइद लोग रहते हैं, सरकारी स्कूल सिर्फ़ उँगलियों पर गिने जा सकते हैं।
स्कूल के जिस्म के एक एक उज़्व की हालत
स्कूल सिर्फ़ चहारदीवारी और इमारत का नाम नहीं — यह एक जीते जागते जिस्म-ओ-जाँ का नाम है। मगर आईए आज इस जिस्म के एक एक उज़्व की हालत देखें — और फिर ख़ुद फ़ैसला करें कि यह ज़िंदा है या मर रहा है।
मुल्क के कई अहम शहरों में स्कूली इमारतों की हालत इन्सानी वक़ार से गिरी हुई है। बिहार, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के देहाती ज़िलों में ऐसे स्कूल आज भी मौजूद हैं जहाँ टूटी छतें, दरिया का रुख़ करती दीवारें और फाटक के नाम पर बाँस का डंडा है। मानसून में क्लासरूम तालाब बन जाते हैं, और “स्कूल छुट्टी” का मतलब होता है — बारिश।
बैत-उल-ख़ला — तालीम का सब से ज़्यादा नज़रअंदाज़ मसला!!!
यह बात सुनते हुए शायद आप का माथा ठनके मगर यह सच है: बैत-उल-ख़ला की अदम-दस्तयाबी हिंदुस्तान में लड़कियों की स्कूल छोड़ने की सब से बड़ी वजह है। UNICEF की २०२२ء की रिपोर्ट के मुताबिक़ हिंदुस्तान में ३७ फ़ीसद सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग बैत-उल-ख़ला नहीं। और जहाँ हैं, वहाँ सफ़ाई का आलम यह है कि इस्तेमाल से ज़्यादा नफ़सियाती तकलीफ़ होती है।
खेल के मैदान — जहाँ इमारतों ने डेरे जमाए हैं!!!
बच्चों की जिस्मानी, ज़हनी और समाजी नशो-ओ-नुमा में खेल का किरदार किसी भी निसाब से कम नहीं। मगर शहरी स्कूलों में खेल के मैदान वह पहली क़ुर्बानी हैं जो “तरक़्क़ी” की भेंट चढ़ते हैं। मुंबई, पुणे, नागपुर और औरंगाबाद के दर्जनों नजी स्कूलों में जहाँ पहले मैदान था, वहाँ अब एक और इमारत का फ़र्श है — जिस पर इन्तिज़ामिया के दफ़ातिर, इज़ाफ़ी क्लासरूम या कैंटीन चल रही है। Physical Training का घंटा? वह छत पर होता है — या कभी होता ही नहीं।
जिस स्कूल में खेल का मैदान न हो, वह बच्चों की रूह को क़ैद कर रहा है।
लाइब्रेरी — किताबों का क़ब्रिस्तान!!!
अगर स्कूल की लाइब्रेरी में किताबें हैं तो वह धूल में दफ़न हैं। अगर लाइब्रेरियन है तो वह दफ़्तरी काम कर रहा है। और अगर बच्चे आते हैं तो “अहम सवालात” ढूँढने — इम्तिहानी ज़हनियत की पैदावार। हमें वह दिन याद हैं जब लाइब्रेरी के वक़्फ़े में कहानियों की किताबें, साइंटिफ़िक इन्कशाफ़ात और सफ़रनामे बच्चों के हाथों में पहुँचते थे और उस्ताद किसी एक किताब का ख़ुलासा सुना कर ऐसा शौक़ जगाता कि बच्चे घर जाना भूल जाते। आज वह लाइब्रेरी बंद पड़ी है, किताबें अँधेरे में हैं और बच्चों की तख़य्युल की खिड़की भी बंद है।
साइंस लैब और कंप्यूटर — नुमाइशी साज़-ओ-सामान
साइंस की तजरबागाहें “मुआइने” के दिन खुलती हैं और बाक़ी साल बंद रहती हैं। पुरानी टेस्ट ट्यूबें, ज़ंग-आलूद औज़ार और ख़ाली डिब्बे — यह है “लैब”। कंप्यूटर एजूकेशन के नाम पर इज़ाफ़ी फ़ीस वसूल होती है मगर हफ़्ते में बमुश्किल एक घंटा किसी पुराने सिस्टम पर उँगलियाँ फेरना नसीब हो जाए तो ग़नीमत। जब कि दुनिया Virtual Reality लैब्ज़, Coding से Robotics तक पहुँच गई है।
उस्ताद — तालीमी निज़ाम की रीढ़ की हड्डी जो ख़म खा चुकी
स्कूल का असल जुज़ उस्ताद होता है — इसी लिए उसे स्कूली ढाँचे की रीढ़ की हड्डी कहा जाता है। मगर आज इस रीढ़ की हड्डी में तपेदिक़ लग चुकी है। माहिर, मुख्लिस और जज़्बे से भरपूर उस्ताद अनक़ा होते जा रहे हैं। वजूहात क्या हैं?
तक़र्रुरी में बे-ज़ाब्तगी और अक़रबा-परवरी
बेशुमार नजी स्कूलों में असातिज़ा की तक़र्रुरी न क़ाबिलियत पर होती है न तजर्बे पर — बस पहचान और कमीशन पर होती है। B.Ed. या D.El.Ed की सनद रखना शायद ज़रूरी नहीं — बस इन्तिज़ामिया से तअल्लुक़ ज़रूरी है। सरकारी स्कूलों में TET/NET पास असातिज़ा सालों से ठेके पर हैं और बाक़ायदगी का इन्तिज़ार कर रहे हैं — इस बे-यक़ीनी में न वह सुकून से पढ़ा सकते हैं, न अपनी पेशावराना तरक़्क़ी पर तवज्जो दे सकते हैं।
ग़ैर-तदरीसी बोझ — उस्ताद का क़ातिल
आज का उस्ताद पढ़ाने से ज़्यादा सरकारी स्कीमें चलाने का आला बन गया है। मिड-डे-मील का हिसाब, UDISE+ पर Data Entry, जनगणना, इन्तिख़ाबात, आधार कार्ड कैंप, सर्वे, टीकाकारी मुहिम — यह सब काम “उस्ताद” करता है। RTE फ़ोरम इंडिया के मुताबिक़ एक सरकारी इब्तिदाई स्कूल के उस्ताद का औसतन ४० से ५० फ़ीसद वक़्त ग़ैर-तदरीसी कामों में सर्फ़ होता है। फिर बच्चे क्या पढ़ेंगे?
ज़िला भर में एक ही उस्ताद — “सिंगल टीचर स्कूल” का अल्मिया
UDISE+ 2022-23 के मुताबिक़ मुल्क में अभी भी १.१२ लाख से ज़्यादा “सिंगल टीचर स्कूल” हैं — जहाँ एक उस्ताद पहली जमाअत से पाँचवीं जमाअत तक के तमाम मज़ामीन अकेले पढ़ाता है, दफ़्तरी काम करता है, हाज़िरी लगाता है और मिड-डे-मील की निगरानी भी करता है।
जब उस्ताद की रूह मुर्दा हो तो पढ़ाना महज़ आवाज़ है — इल्म नहीं।
जमाअतों में भीड़ — बच्चों का गला घोंटता हुआ निज़ाम
सरकारी उसूल कहता है एक जमाअत में ४५ बच्चे काफ़ी हैं। मगर हक़ीक़त यह है कि मुंबई, पुणे और दीगर बड़े शहरों के कई स्कूलों में ७० ता १०० बच्चे एक कमरे में बंद हैं। इन्फ़िरादी तवज्जो का सवाल ही नहीं उठता — बच्चा तो महज़ शोर का एक हिस्सा है। ग़रीब बच्चे के पास ट्यूशन का पैसा नहीं, घर पर कोई पढ़ाने वाला नहीं — स्कूल उस की आख़िरी उम्मीद था, मगर इस उम्मीद को भी भीड़ में दफ़न कर दिया गया।
घर, समाज और इन्तिज़ामिया — तीन मुजरिम एक कटहरे में
वालदैन की ग़ैर-हाज़िरी
हमारे बेशतर वालदैन — ख़ास तौर पर कम आमदनी वाले तबक़ों में — माशी जद्द-ओ-जहद में इस क़दर मगन हैं कि बच्चे की तालीमी तरक़्क़ी पर तवज्जो देने का वक़्त ही नहीं। PTM (वालदैन और उस्ताद मुलाक़ात) में ३० में से बमुश्किल ८ वालदैन आते हैं। कुछ वालदैन का ख़याल है कि “बच्चे को स्कूल भेज दिया — बस हमारा फ़र्ज़ ख़त्म।” यह सोच बच्चों की तालीमी बुनियाद को खोखला कर रही है।
समाज की बे-एतनाई
किसी ज़माने में महल्ले का हर बड़ा बच्चों की तालीम-ओ-तर्बियत में दिलचस्पी रखता था। आज समाज ने आँखें फेर ली हैं। स्कूल कमेटियाँ, महल्ला कौंसिलें, मसजिद के इमाम, मदरसे के मौलवी — सब ने स्कूल की ख़बरगीरी तर्क कर दी। यह समाजी इन्ख़िला स्कूल को “एक इदारा” नहीं, “एक अलग जज़ीरा” बना देता है।
इन्तिज़ामिया की तिजारती ज़हनियत
बहुत से नजी स्कूलों में इन्तिज़ामिया का सारा ध्यान आमद-ओ-ख़र्च के हिसाब-किताब तक महदूद है। स्कूल की तालीमी ज़रूरियात, असातिज़ा की ख़बरगीरी, बच्चों की तालीमी हालत — इन से कोई लेना देना नहीं। इन्तिज़ामिया एयर कंडीशंड कमरों में बैठ कर “ब्रैंड” बनाता रहता है और बच्चे पसीने की बदबू से भरे कमरों में घुटते रहते हैं।
असल कहानियाँ — जो अदाद-ओ-शुमार नहीं बताते
कहानी १ — मुंबरा का अहमद
अहमद की उम्र बारह साल थी। वालिद रिक्शा चलाते थे। अहमद एक ग़ैर-मंज़ूरशुदा “कॉन्वेंट स्कूल” में पढ़ता था जिस की फ़ीस चार सौ रुपए माहाना थी — वालिद के लिए ख़तीर रक़म। जब इस स्कूल को बंद करने का नोटिस मिला तो अहमद दरमियान-ए-साल स्कूल से बाहर था। न ट्रांसफ़र सर्टिफ़िकेट मिला, न कोई मुतबादिल स्कूल क़रीब था। अहमद आज एक गैरेज में काम करता है — तालीम का ख़्वाब वहीं दफ़न हो गया जहाँ स्कूल की तख़्ती उखड़ी थी।
कहानी २ — औरंगाबाद का “सिंगल टीचर स्कूल”
ज़िला औरंगाबाद के एक देहाती स्कूल में अकेले उस्ताद साहब ने पाँच जमाअतें सँभाल रखी थीं। वह पहली जमाअत को हुरूफ़-ए-तहज्जी सिखा रहे होते तो तीसरी जमाअत ख़ुदबख़ुद खेल रही होती और पाँचवीं जमाअत का बच्चा सहन में सो जाता। जब बारिश होती तो छत टपकती। जब इम्तिहान होते तो उस्ताद साइकिल पर शहर जा कर पर्चे लाते। यह “तालीम” थी या एक लाचार इन्सान की अकेली मुज़ाहमत?
कहानी ३ — दिल्ली के एक सरकारी स्कूल की तब्दीली
मगर हर कहानी मायूसकुन नहीं। दिल्ली हुकूमत के “स्कूल ऑफ़ एक्सेलेंस” प्रोग्राम ने साबित किया कि सियासी अज़्म हो तो सरकारी स्कूल भी सितारों को छू सकता है। २०१५ء के बाद सरकारी स्कूलों में अंदरूनी ख़ूबसूरती, उस्ताद की तर्बियत, स्मार्ट क्लासरूम और “हैपीनेस करिकुलम” ने न सिर्फ़ दाख़िलों की तादाद बढ़ाई बल्कि दरमियान में छोड़ने की शरह को १६ फ़ीसद तक घटा दिया। यह एक उम्मीद की किरन है — मगर सिर्फ़ एक रियासत में।
नतायज — जो नस्लें भुगत रही हैं
जब स्कूल का ढाँचा कमज़ोर हो, जब उस्ताद बेहौसला हो, जब निज़ाम बेहिस हो — तो इस का असर सिर्फ़ रज़ल्ट कार्ड पर नहीं पड़ता। यह असर कहीं गहरा, कहीं दूर तक और कहीं बहुत ख़ामोशी से उतरता है — बच्चे की रूह में, उस के मुस्तक़बिल में, और पूरी क़ौम के ज़मीर में।
१. कमज़ोर बुनियादी तालीम — बच्चा पढ़ नहीं पाता, अमली ज़िंदगी नाकाम हो जाती है
जब किसी बच्चे को पहली, दूसरी और तीसरी जमाअत में वह बुनियादी महारतें न मिलें जो उसे मिलनी चाहिएँ — हुरूफ़ की पहचान, अल्फ़ाज़ का मफ़हूम, जमा-तफ़रीक़ की समझ — तो यह ख़ला आगे चल कर पहाड़ बन जाता है। ASER 2023 की रिपोर्ट चीख़ चीख़ कर बताती है कि पाँचवीं जमाअत के पचास फ़ीसद से ज़्यादा बच्चे दूसरी जमाअत की किताब रवानी से नहीं पढ़ सकते।
२. खेल का मैदान नहीं — जिस्मानी नशो-ओ-नुमा रुक जाती है, ज़हनी सेहत के मसायल जन्म लेते हैं
खेल कोई वक़्त ज़ाया करने का ज़रिया नहीं — यह बच्चे की शख़सियत की तामीर का सब से फ़ितरी रास्ता है। जब बच्चा दौड़ता है तो सिर्फ़ टाँगें नहीं चलतीं — दिमाग़ के वह हिस्से भी जागते हैं जो तावुन, क़ियादत, हार मानने का हौसला और जीतने का जज़्बा सिखाते हैं। WHO का वाज़ेह बयान है कि बच्चों में रोज़ाना कम अज़ कम एक घंटे की जिस्मानी सरगर्मी ज़रूरी है।
३. लाइब्रेरी नहीं — तख़य्युल और तजस्सुस मर जाता है, तख़्लीक़ी सलाहियत सिफ़र हो जाती है
एक किताब बच्चे को वह सफ़र कराती है जो सैकड़ों लेक्चर नहीं करा सकते। लाइब्रेरी सिर्फ़ किताबों का ज़ख़ीरा नहीं — यह बच्चे की तख़य्युल की उड़ान का हवाई अड्डा है। जहाँ बच्चा सवालात पूछना सीखता है, जहाँ वह नई दुनियाओं से आशना होता है, जहाँ उस के अंदर का लिखाड़ी, साइंसदाँ और मुफ़क्किर जागता है।
४. ग़ैर-तरबियत-याफ़्ता उस्ताद — ग़लत तसव्वुरात पुख़्ता हो जाते हैं, पूरी नस्ल मुतास्सिर होती है
एक ग़लत उस्ताद उस बाग़बान की तरह है जो पौदे को पानी देने की जगह ज़हर दे — और पौदे को ख़बर भी न हो। जब उस्ताद ख़ुद किसी मज़मून को दुरुस्त नहीं समझता, जब उसे तदरीस के तरीक़ों की तर्बियत नहीं मिली, जब वह सवाल पूछने वाले बच्चे को “शरीर” समझता है और ख़ामोश बैठने वाले को “ज़हीन” — तो जमाअत में जो इल्म फैलता है वह इल्म नहीं, एक मुनज़्ज़म ग़लतफ़हमी है।
५. बैत-उल-ख़ला नहीं — लड़कियाँ स्कूल छोड़ती हैं, ख़वातीन तालीम में ख़सारा
यह मसला सुनने में शायद मामूली लगे मगर इस के पीछे लाखों लड़कियों की टूटी हुई उम्मीदें हैं। UNICEF की २०२२ء की रिपोर्ट बताती है कि हिंदुस्तान में ३७ फ़ीसद सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग और साफ़ बैत-उल-ख़ला का इन्तिज़ाम नहीं। यह सिर्फ़ सफ़ाई का मसला नहीं — यह इज़्ज़त का मसला है, तहफ़्फ़ुज़ का मसला है।
६. भीड़ भरी क्लास — इन्फ़िरादी तवज्जो सिफ़र, ज़हीन बच्चा भी पीछे रह जाता है
तसव्वुर कीजिए एक डाक्टर जिस के एक दिन में दो सौ मरीज़ हों — वह हर मरीज़ को सिर्फ़ दो मिनट दे सकेगा। क्या ऐसे डाक्टर से इलाज होगा? हमारे स्कूलों में यही सूरतहाल है। एक कमरे में सत्तर अस्सी बच्चे, एक उस्ताद, एक तख़्ता सियाह — और पूरी जमाअत से तवक़्क़ो कि सब बराबर सीखें।
७. ग़ैर-क़ानूनी स्कूल — सनद बेकार, रिकार्ड नहीं, मुस्तक़बिल के दरवाज़े बंद
हमारे शहरों और क़स्बों में हज़ारों ऐसे स्कूल हैं जिन के पास न सरकारी मंज़ूरी है, न तसलीमशुदगी, न बाक़ायदा रिकार्ड। यह “स्कूल” उमूमन किसी अपार्टमेंट की मंज़िल पर, किसी गोदाम में या नाक़ाबिल-ए-रिहाइश इमारत में चलते हैं — “इंग्लिश मीडियम कॉन्वेंट” की चमकदार तख़्ती के साथ।
कुछ ज़ख़्म — एक लाश
हम ने सात ख़राबियाँ गिनाईं — मगर यह सिर्फ़ फ़हरिस्त नहीं है। यह हमारी इज्तिमाई ग़फ़लत का चेहरा है। जब बुनियादी तालीम कमज़ोर हो तो बच्चा अमली ज़िंदगी में लड़खड़ाता है। जब खेल का मैदान न हो तो बच्चे की रूह घुटती है। जब लाइब्रेरी बंद हो तो तख़य्युल मर जाता है। जब उस्ताद नाअहल हो तो ग़लतियाँ नस्लों में उतरती हैं। जब बैत-उल-ख़ला न हो तो लड़कियाँ तालीम से महरूम हो जाती हैं। जब क्लास भरी हो तो हर बच्चा भीड़ का हिस्सा बन जाता है। और जब स्कूल ग़ैर-क़ानूनी हो तो बच्चे का पूरा मुस्तक़बिल दाँव पर लग जाता है।
वक़्त आ गया है कि यह ख़ामोशी टूटे। सवाल उठाए जाएँ। जवाब माँगे जाएँ।
ऐ अहल-ए-वतन, दर्सगाहों की ख़बर लो — यह बच्चे हमारा मुस्तक़बिल हैं — उन की पुकार सुनो!
हल और सिफ़ारिशात — अगर वाक़ई इरादा हो!!!
२०२३ का यह इन्कशाफ़ दिल दहला देने वाला है: पाँचवीं जमाअत के ५० फ़ीसद से ज़्यादा बच्चे दूसरी जमाअत की किताब रवानी से नहीं पढ़ पाते। तीसरी जमाअत के ७० फ़ीसद बच्चे दो हिंदसों की तक़सीम नहीं कर पाते। यह तालीम का बुह्रान नहीं — यह क़ौमी सलामती का मसला है।
हुकूमत के लिए — क़ानून बनाना काफ़ी नहीं, नाफ़िज़ करना ज़रूरी है
अव्वल: तमाम ग़ैर-क़ानूनी स्कूलों की फ़ौरी फ़हरिस्त बनाई जाए और बंद किए बग़ैर मुतबादिल दाख़िला यक़ीनी बनाया जाए ताकि बच्चे बेघर न हों।
दोम: RTE के तहत हर महल्ले में पराइमरी स्कूल की ज़मानत को ज़मीनी सतह पर नाफ़िज़ किया जाए — ख़ास तौर पर शहरी कच्ची आबादियों और देहाती दूरदराज़ इलाक़ों में।
सोम: सिंगल टीचर स्कूलों को ख़त्म किया जाए — ज़म किया जाए या ज़िलाई सतह पर टीचिंग पूल बनाया जाए।
चहारम: स्कूल की इमारत, बैत-उल-ख़ला, लाइब्रेरी और लैब के लिए सालाना बजट मुख़तस हो और ख़र्च का ऑडिट शफ़्फ़ाफ़ हो।
पंजुम: असातिज़ा पर ग़ैर-तदरीसी बोझ फ़ौरी कम किया जाए — एक अलग “Data Worker” का निज़ाम बनाया जाए ताकि उस्ताद सिर्फ़ पढ़ाने पर तवज्जो दे।
स्कूल इन्तिज़ामिया के लिए — तिजारत नहीं, अमानत समझें
हर नजी स्कूल की लाज़िमी अवामी ऑडिट रिपोर्ट शाइअ हो — दाख़िला, फ़ीस, असातिज़ा की क़ाबिलियत, बुनियादी सहूलियात। इसे “शफ़्फ़ाफ़ियत का चार्टर” कहते हैं। इन्तिज़ामिया समझे कि बच्चा सारिफ़ नहीं — अमानत है।
असातिज़ा के लिए — पेशा नहीं — मिशन
पेशावराना तरक़्क़ी को ज़ाती ज़िम्मेदारी समझें। हर साल कम अज़ कम दो तर्बियती प्रोग्रामात में शिरकत करें। लाइब्रेरी को ज़िंदा करें — ख़ुद पढ़ें, बच्चों को पढ़ने का शौक़ दें। याद रखें: उस्ताद जब सीखना छोड़ देता है तो पढ़ाना भी मर जाता है।
वालदैन और समाज के लिए — स्कूल सिर्फ़ स्कूल का काम नहीं
वालदैन महीने में कम अज़ कम एक बार स्कूल जाएँ — सिर्फ़ रज़ल्ट लेने नहीं, बल्कि बच्चे की तालीमी हालत जानने। महल्ले की मसजिद कमेटी, समाजी तन्ज़ीमें और मक़ामी कौंसलर स्कूल की निगरानी में शरीक हों। समाज जब स्कूल को अपना मानता है तो स्कूल भी मेयारी बन जाता है।
मीडिया और सिविल सोसाइटी के लिए — आवाज़ उठाएँ
उर्दू अख़बारात, YouTube चैनल्ज़ और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट स्कूल की हालत को मुसलसल एजेंडे पर रखें। एह्तिजाज करें। RTI फ़ाइल करें। अदाद-ओ-शुमार जमा करें और अवाम में फैलाएँ। तालीम का मेयार तभी बेहतर होगा जब समाज मुतालबा करेगा।
हल-ओ-सिफ़ारिशात — अगर वाक़ई इरादा हो तो रास्ता निकलता है
मसायल का बयान कर देना काफ़ी नहीं। कहना आसान है कि तालीम बर्बाद हो रही है — मुश्किल यह है कि इस बर्बादी को रोका जाए। सवाल यह नहीं कि मसायल क्या हैं — सवाल यह है कि कौन ज़िम्मेदार है, क्या करना है और कब तक करना है।
इक़दाम १ — ग़ैर-क़ानूनी स्कूल बंद करें और बच्चों का मुतबादिल यक़ीनी बनाएँ
ग़ैर-क़ानूनी स्कूल एक ऐसा नासूर है जो बाहर से तालीम का चेहरा दिखाता है और अंदर से बच्चों का मुस्तक़बिल खा रहा है। इन स्कूलों को बंद करना ज़रूरी है — मगर यह काम इस तरह नहीं होना चाहिए कि एक दिन नोटिस आए और अगले दिन ताला लग जाए। दुरुस्त तरीक़ा यह है कि पहले हर ग़ैर-क़ानूनी स्कूल की बाक़ायदा फ़हरिस्त बनाई जाए — ज़िला-वार, महल्ला-वार। फिर इन स्कूलों के बच्चों के लिए क़रीबी सरकारी या मंज़ूरशुदा स्कूलों में नशिस्तें फ़ौरी मुख़तस की जाएँ।
इक़दाम २ — सिंगल टीचर स्कूल का अल्मिया ख़त्म करें
एक अकेला उस्ताद, पाँच जमाअतें, सौ बच्चे, एक कमरा — यह तालीम नहीं, यह एक इन्सान का इस्तिहसाल है। UDISE+ 2022-23 के मुताबिक़ मुल्क में एक लाख बारह हज़ार से ज़्यादा ऐसे स्कूल हैं। रियासती हुकूमत के लिए तजवीज़ यह है कि ऐसे स्कूलों को क़रीबी बड़े स्कूलों में ज़म किया जाए — साथ ही बच्चों के लिए मुफ़्त ट्रांसपोर्ट का इन्तिज़ाम किया जाए।
इक़दाम ३ — बैत-उल-ख़ला और पानी — एमर्जेंसी इक़दाम, अभी और फ़ौरी
वह मसला जिसे हम शर्म से नहीं पूछते — मगर जिस की वजह से लाखों बच्चियाँ तालीम छोड़ देती हैं। UNICEF 2022ء की रिपोर्ट के मुताबिक़ हिंदुस्तान के ३७ फ़ीसद सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग, साफ़ और बंद दरवाज़े वाला बैत-उल-ख़ला का इन्तिज़ाम नहीं। राजस्थान के चूरू ज़िले में एक तजरुबा किया गया: जिन स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग बैत-उल-ख़ला बनाए गए, उन में लड़कियों की हाज़िरी छह महीने में औसतन १८ फ़ीसद बढ़ गई।
इक़दाम ४ — असातिज़ा का ग़ैर-तदरीसी बोझ कम करें — फ़ौरी पॉलिसी की ज़रूरत
आज का सरकारी उस्ताद उस्ताद नहीं रहा — वह एक सरकारी मुलाज़िम है जो इत्तिफ़ाक़ से क्लासरूम में भी चला जाता है। मिड-डे-मील का हिसाब, UDISE+ पर Data Entry, जनगणना, आधार कैंप, इन्तिख़ाबी ड्यूटी, टीकाकारी मुहिमात — यह सब काम “उस्ताद” के ज़िम्मे हैं। फ़िनलैंड में उस्ताद का वाहिद काम पढ़ाना है — इसी लिए फ़िनलैंड के बच्चे दुनिया में सब से आगे हैं।
इक़दाम ५ — लाइब्रेरी और लैब को फ़अआल करें — एक सेशन से आग़ाज़
लाइब्रेरी और साइंस लैब को फ़अआल करने के लिए हुकूमत का इन्तिज़ार ज़रूरी नहीं — यह स्कूल इन्तिज़ामिया और असातिज़ा की ख़ुद-इरादी से अभी और यहाँ शुरू हो सकता है। लाइब्रेरी के लिए पहला क़दम यह है: हफ़्ते में एक बार “लाइब्रेरी पीरियड” लाज़िमी क़रार दिया जाए। कोई इम्तिहान नहीं, कोई “अहम सवाल” नहीं — बस बच्चा कोई किताब उठाए, पढ़े, सोचे।
इक़दाम ६ — वालदैन की माहाना मीटिंग — स्कूल और घर का पुल
तालीम सिर्फ़ स्कूल की ज़िम्मेदारी नहीं — यह एक मुश्तरक सफ़र है जिस में उस्ताद, वालदैन और समाज सब शरीक हैं। मगर आज यह रिश्ता टूटा हुआ है। PTM (वालदैन और उस्ताद मुलाक़ात) में तीस में से बमुश्किल आठ वालदैन आते हैं। तहक़ीक़ बताती है कि जिन बच्चों के वालदैन तालीमी अमल में शरीक होते हैं, उन का तालीमी मेयार औसतन तीस से चालीस फ़ीसद बेहतर होता है।
आज हम ने जो देखा — एक आख़िरी बात
आज हम ने जो देखा वह कोई फ़र्ज़ी कहानी नहीं — यह हमारे अपने स्कूलों का आईना है। इमारतें टूटी हैं, कमरे भरे हैं, मैदान ख़त्म हैं, लाइब्रेरी ख़ामोश है, लैब बंद है, उस्ताद थका हुआ है और इन्तिज़ामिया हिसाब में मगन है। इस सब के बावजूद अगर हम ने ख़ुद से यह कहना नहीं छोड़ा कि “हमारे यहाँ सब ठीक है” — तो फिर न कोई स्कूल बदलेगा और न कोई नस्ल।
ग़ैर-क़ानूनी स्कूलों का ख़ात्मा, सिंगल टीचर स्कूल का हल, बैत-उल-ख़ला और पानी की फ़ौरी फ़राहमी, असातिज़ा का ग़ैर-तदरीसी बोझ कम करना, लाइब्रेरी और लैब को ज़िंदा करना, और वालदैन को तालीमी अमल में शरीक करना — यह छह क़दम अगर आज उठाए जाएँ तो एक नस्ल बाद हमारे स्कूल वह नहीं होंगे जो आज हैं — वह कहीं बेहतर होंगे।
हम ने फ़िनलैंड की मिसाल देखी, केरला की कामयाबी देखी, दिल्ली के स्कूल ऑफ़ एक्सेलेंस का मोजिज़ा देखा। यह कोई जादू नहीं था — यह सियासी अज़्म, समाजी शिरकत और तालीमी विज़न का इत्तिहाद था। हमारे पास भी वह अज़्म हो सकता है — बस आग़ाज़ इन छह क़दमों से करें।
वक़्त है कि हर उस्ताद अपनी क्लास को बेहतर करे,
हर वालदैन स्कूल से रिश्ता जोड़े,
हर समाजी रहनुमा तालीम को अपनी तरजीह बनाए,
और हर हुकूमत स्कूल को सिर्फ़ “ख़ाना-पूरी” का इदारा नहीं
बल्कि क़ौम-साज़ी का कारख़ाना समझे।
स्कूल क़ौम की नर्सरी है — जब नर्सरी बीमार हो तो फूल नहीं खिलते।
उठो — दर्सगाहें सँवारो। यह बच्चे ही कल का सूरज हैं — उन्हें रोशन करो।
क्या कभी होगा वह दिन जब स्कूल का दर खुले,
और बच्चा लौटे घर… आँखों में रोशनी लिए!!!

