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दाग़ दाग़ उजाला — पर्चों की नीलामी, दियानत का जनाज़ा

ये तहरीर उस मुआशरे के नाम है जो अपने बच्चों से मुस्तक़बिल तो माँगता है, मगर उन्हें इंसाफ़ नहीं देता। कभी कभी क़ौमें जंगों से तबाह नहीं होतीं, बल्कि इम्तिहान-गाहों में ख़ामोशी से मर जाती हैं। एक कमरा। एक मेज़। एक एडमिट कार्ड। पानी की बोतल के साथ रखा हुआ ख़्वाब। और सामने बैठा एक अठारह साला नौजवान — जिसकी आँखों में डॉक्टर बनने की ज़िद है, माँ की उम्मीद है, बाप के क़र्ज़ की नमी है, और मुआशरे के ताने का ख़ौफ़ है। फिर अचानक उसे मालूम होता है कि उसके दो साला जिहाद को किसी व्हाट्सऐप ग्रुप ने “फ़ॉरवर्ड” कर दिया था। और रियासत कहती है “सिस्टम आलूदा पाया गया।” क्या ख़ूब लफ़्ज़ है — आलूदा। गोया ये कोई दरिया था जिसमें ग़लती से गंदगी आ गई। हालाँकि हक़ीक़त ये है कि ये दरिया नहीं, पूरा निज़ाम ही एक सीवरेज लाइन में तब्दील हो चुका है। हमारा निज़ाम जो इम्तिहान नहीं लेता, आसाब निचोड़ता है। हिंदुस्तान में तालीम अब इल्म का सफ़र नहीं रही, ये एक नफ़सियाती शिकंजा बन चुकी है। यहाँ तालिब-ए-इल्म किताब नहीं पढ़ता, बल्कि अपनी ज़ेहनी क़ब्र खोदता है। सुबह के कोचिंग टेस्ट। रात के MCQs। यूट्यूब लेक्चर्स। रिवीज़न शीट्स। और इन सबके दरमियान एक नौजवान की आहिस्ता आहिस्ता मरती हुई शख़्सियत। ज़रूर, मगर नज़्म-ओ-ज़ब्त बेहतरीन था। जब इदारे जवाबदेह न रहें, तो क़ौमें बीमार हो जाती हैं। तक़रीबन हर बोहरान के बाद यही एक ड्रामा दोहराया जाता है — CBI तहक़ीक़ात करेगी। कमेटी बनेगी। सख़्त कार्रवाई होगी। ज़ीरो टॉलरेंस होगा। सिस्टम मज़बूत होगा। और फिर ढाक के तीन पात, फिर अगले साल एक नया लीक सामने आ जाता है। ये महज़ इंतिज़ामी नाकामी नहीं बल्कि अख़्लाक़ी दिवालियापन है। क़ौमें उस वक़्त ज़वालपज़ीर नहीं होतीं जब उनके पुल टूटते हैं बल्कि उस वक़्त जब उनके इदारे सच बोलना छोड़ देते हैं। क्या हमारे मुल्क ये पहली बार हुआ? जी नहीं। व्यापम स्कैंडल तो याद है ना? जहाँ इम्तिहान नहीं, ज़िंदगियाँ लीक हो गई थीं। और AIPMT याद है? या REET याद है? रियासती भर्तियों के लीक्स याद हैं? ये हादसात नहीं। ये एक तसलसुल है। ये ऐसा ही है जैसे हर साल एक इमारत गिर जाए और इंजीनियर कहे कि हमें अफ़सोस है, मगर तामीराती मेयार पर हमारा मुकम्मल एतमाद है। और मुल्क की कोचिंग इंडस्ट्री वो तो ख़्वाबों का ऐसा बाज़ार है जिसने ज़ेहनी ग़ुलामी की फ़ैक्ट्री खोल रखी है, जहाँ तालीम अब इबादत नहीं रही बल्कि सरमायाकारी बन चुकी है। किसी ग़रीब बाप से पूछिए जो अपनी बेटी को कोचिंग भेजने के लिए मोटर अंदर से गलना शुरू हो जाती हैं। किसी ने कहा कंप्यूटराइज़्ड इम्तिहान हो? साहब, वायरस मशीन में नहीं, ज़मीर में है। अब नई बहस ये है कि इम्तिहान CBT होगा या Pen-Paper। कितनी दिलचस्प बात है। गोया मसअला दरवाज़े के ताले का है, चोर के इरादे का नहीं। जब नीयतें फ़रोख़्त हो जाएँ, तो सर्वर भी बिकता है, सिस्टम भी बिकता है, और मुस्तक़बिल भी। आप Artificial Intelligence ला सकते हैं, लेकिन Character Intelligence कहाँ से लाएँगे? आज हमारे तलबा, इंसान नहीं रह गए बल्कि क़ौमी तजरबा-गाह के चूहे बन गए हैं? ये नस्ल अजीब दौर में पैदा हुई है। इसे बचपन में कहा गया कि मेहनत करो, कामयाब हो जाओगे। फिर जवानी में बताया गया कि मुआफ़ करना, पेपर लीक हो गया था। हमारा नौजवान अब किताबों से नहीं थका लेकिन नाइंसाफ़ी से थक चुका है। वो सवालों से नहीं डरता लेकिन सिस्टम से डरता है। आज इस मुल्क का सबसे बड़ा अलमिया नाख़्वांदगी नहीं, बल्कि तालीमयाफ़्ता नौजवानों का इंसाफ़ से मायूस हो जाना है। सबसे ख़तरनाक चीज़ करप्शन नहीं होती। सबसे ख़तरनाक चीज़ मामूल बन चुकी करप्शन होती है। अब हमें हैरत नहीं होती। अब लीक यानी पर्चों का क़ब्ल-अज़-वक़्त अफ़शाँ हो जाना ख़बर नहीं, रिवायत बन चुका है। यही ज़वाल की आख़िरी अलामत — एक इम्तिहान नहीं, बल्कि ये एक तहज़ीबी मुक़द्दमा है। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ने कहा: “सिस्टम आलूदा था।” नहीं साहब। आलूदा सिर्फ़ इम्तिहान नहीं। आलूदा तरजीहात हैं। आलूदा एहतिसाब है। आलूदा सियासत है। आलूदा वो ख़ामोशी है जिसने करप्शन को मामूल बनने दिया। याद रखिए, तहज़ीबें हमलों से कम, और अंदरूनी बेईमानी से ज़्यादा तबाह होती हैं। आज हिंदुस्तान के लाखों नौजवान सिर्फ़ दोबारा इम्तिहान नहीं दे रहे, वो अपने एतमाद का पोस्टमॉर्टम कर रहे हैं — और अगर अब भी इस मुल्क ने इदारा-जाती दियानत, शफ़्फ़ाफ़ियत, और अख़्लाक़ी एहतिसाब की बुनियाद दोबारा तामीर न की तो आने वाली नस्लें किताबों में सिर्फ़ ये नहीं पढ़ेंगी कि NEET का पेपर लीक हुआ था बल्कि वो ये पढ़ेंगी कि एक मुल्क ने और उसके निज़ाम ने अपने बच्चों की मेहनत को व्हाट्सऐप फ़ॉरवर्ड में तब्दील होने दिया था। रोको सूरज को ख़ुदकुशी से — असदुल्लाह ख़ान, ठाणे Asadullahkhanschoolasadullahkhanschool.org

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जब ज़बान सिर्फ़ सियासत नहीं, क़ौमों के मुस्तक़बिल का सवाल बन जाए!!!

महाराष्ट्र के एस एस सी नताइज, मराठी की बहस, और हमारी लिसानी ज़िम्मेदारियों का मुहासबा डॉक्टर असद उल्लाह ख़ान आदाद-ओ-शुमार बज़ाहिर ख़ामोश होते हैं मगर उनकी ख़ामोशी में पूरे मुआशरों की कहानियाँ बोलती हैं। हर फ़ीसद के पीछे हज़ारों ख़्वाब होते हैं, हर नतीजे के पीछे बरसों की तालीमी जद्द-ओ-जहद, और हर तालीमी रिपोर्ट के पस-मंज़र में एक क़ौम की फ़िक्री तरजीहात पोशीदा होती हैं। एक मुहक़्क़िक़ के लिए आदाद सिर्फ़ रियाज़ियाती हक़ीक़त नहीं होते, बल्कि वो मुआशरे के ज़हनी रुजहानात, तहज़ीबी वाबस्तगियों और तालीमी सिम्तों को समझने की कुंजियाँ होते हैं। इसी लिए बाज़ इम्तिहानी नताइज महज़ कामयाबी और नाकामी की ख़बर नहीं देते, बल्कि वो ये भी बताते हैं कि क़ौमें अपनी ज़बानों, अपनी किताबों, अपने तालीमी इदारों और अपनी आने वाली नस्लों के साथ किस नौईयत का तअल्लुक़ उस्तवार कर रही हैं। महाराष्ट्र के एस एस सी इम्तिहान 2026 के नताइज को भी इसी वसी तनाज़ुर में देखने की ज़रूरत है, क्योंकि यहाँ बहस सिर्फ़ नंबरों की नहीं, ज़बान, तहज़ीब, तालीम और शनाख़्त के बाहमी रिश्ते की है। महाराष्ट्र स्टेट बोर्ड के एस एस सी इम्तिहान 2026 के नताइज ने भी ऐसा ही एक मुकालमा छेड़ दिया है। एक तरफ़ उर्दू बहैसियत पहली ज़बान 95.47 फ़ीसद कामयाबी के साथ नुमायाँ रही, जबकि दूसरी जानिब मराठी बहैसियत पहली ज़बान 92.57 फ़ीसद नताइज के साथ रियासत भर में बहस-ओ-मुबाहसे का मौज़ू बन गई। ज़ाहिरी तौर पर ये फ़र्क़ सिर्फ़ चंद फ़ीसद का मालूम होता है, लेकिन दरहक़ीक़त इसके पस-मंज़र में ज़बान, तालीम, तहज़ीब, शनाख़्त, सियासत और मुस्तक़बिल के कई अहम सवालात पोशीदा हैं। ये सवाल सिर्फ़ उर्दू या मराठी का नहीं, बल्कि ये सवाल हर उस ज़बान का है जिसके सहारे कोई क़ौम सोचती, महसूस करती, ख़्वाब देखती और अपनी शनाख़्त क़ायम रखती है। आज सवाल ये नहीं कि किस ज़बान ने ज़्यादा नंबर हासिल किए। असल सवाल ये है कि क्या हमारी नई नस्ल ज़बानों से अपना रिश्ता खो रही है? क्या किताब की जगह स्क्रीन ने ले ली है? क्या मुतालिए की जगह महज़ मालूमात ने ले ली है? और क्या ज़बान अब तहज़ीब के बजाय सिर्फ़ इम्तिहान का एक मज़मून बनकर रह गई है? मराठी के नताइज ने एक अजीब रियासती बेचैनी को जन्म दिया। एस एस सी के नताइज के बाद महाराष्ट्र के मुतअद्दिद अख़बारात, इदारियों और टी वी मुबाहसों में एक सवाल बार-बार सुनाई दिया कि आख़िर वो ज़बान जो महाराष्ट्र की सरकारी, तारीख़ी और तहज़ीबी ज़बान है, उसके नताइज मुसलसल तशवीश का बाइस क्यों बन रहे हैं? दस लाख से ज़ाइद तलबा ने मराठी बहैसियत पहली ज़बान इम्तिहान दिया, लेकिन हज़ारों तलबा इस मज़मून में कामयाब न हो सके। ये महज़ एक तालीमी मसला नहीं था। ये एक तहज़ीबी इज़्तिराब था। अख़बारात ने इसकी मुख़्तलिफ़ वुजूहात बयान कीं। किसी ने मुतालिए के ज़वाल को ज़िम्मेदार क़रार दिया। किसी ने मोबाइल कल्चर और मुख़्तसर वीडियोज़ की यलग़ार को। किसी ने अंग्रेज़ी मीडियम के बढ़ते हुए रुजहान को मौरिद-ए-इल्ज़ाम ठहराया और कुछ माहिरीन-ए-तालीम ने निसाब, तदरीसी हिक्मत-ए-अमली और असातिज़ा की तरबियत पर संजीदा सवालात उठाए। लेकिन शायद असल मसला इन तमाम अवामिल से कहीं ज़्यादा गहरा है। ज़बानें उस वक़्त कमज़ोर नहीं होतीं जब उनके बोलने वाले कम हो जाएँ, ज़बानें उस वक़्त कमज़ोर होती हैं जब उनके पढ़ने वाले कम हो जाएँ। इसी दौरान उर्दू के नताइज ने भी तालीम-दोस्त हल्क़ों की तवज्जोह अपनी तरफ़ मबज़ूल कराई। उर्दू को पहली ज़बान के तौर पर मुंतख़ब करने वाले तलबा की तादाद मराठी के मुक़ाबले में बहुत कम है, लेकिन कामयाबी का तनासुब नुमायाँ तौर पर बुलंद रहा। ये यक़ीनन उर्दू असातिज़ा, वालिदैन और तलबा की मेहनत का एतिराफ़ है। लेकिन इस कामयाबी के पीछे एक और हक़ीक़त भी पोशीदा है। उर्दू अभी तक महज़ निसाबी ज़बान नहीं बनी। वो आज भी घरों की गुफ़्तगू में ज़िंदा है। मस्जिदों के ख़ुत्बात में ज़िंदा है। अदबी महफ़िलों में ज़िंदा है। अख़बारात और रसाइल में ज़िंदा है। शायरी, नात, अफ़साने और दीनी लिटरेचर में ज़िंदा है। इसी लिए शायद उर्दू के नताइज हमें एक अहम सबक़ देते हैं। जब ज़बान सिर्फ़ इम्तिहान का मज़मून बन जाए तो नंबर कम होने लगते हैं, और जब ज़बान तहज़ीब, मुतालिआ और शनाख़्त बन जाए तो नताइज ख़ुद बुलंद होने लगते हैं। लेकिन उर्दू वालों के लिए भी ये वक़्त जश्न से ज़्यादा एहतिसाब का है। क्या हमारे बच्चे वाक़ई उर्दू पढ़ रहे हैं? क्या उनके घरों में किताबें मौजूद हैं? क्या वो उर्दू अख़बारात से वाक़िफ़ हैं? क्या वो ग़ालिब, इक़बाल, हाली, शिबली, फ़ैज़, फ़िराक़ और मंटो के नाम जानते हैं? अगर इन सवालात का जवाब नफ़ी में है तो फिर सिर्फ़ इम्तिहानी कामयाबी हमारी मंज़िल नहीं हो सकती। एस एस सी नताइज के साथ ही महाराष्ट्र में एक और ज़बान से मुतअल्लिक़ बहस ज़ोर पकड़ गई। रिक्शा और टैक्सी ड्राइवरों के लिए बुनियादी मराठी ज़बान जानने की शर्त। इस मौज़ू ने अख़बारात, सियासी जमाअतों, समाजी तंज़ीमों और अवामी हल्क़ों में शदीद रद्द-ए-अमल पैदा किया। हामियों का कहना था कि अवामी ख़िदमात फ़राहम करने वालों को रियासत की ज़बान आनी चाहिए। मुख़ालिफ़ीन का इस्तिदलाल था कि रोज़गार को ज़बान से मशरूत करना मुनासिब नहीं। दोनों तरफ़ दलाइल मौजूद थे। दोनों तरफ़ जज़्बात भी थे। इस पूरे मुबाहसे में सबसे अहम बात ये है कि तक़रीबन तमाम संजीदा माहिरीन-ए-तालीम, अदबी शख़्सियात और पॉलिसी साज़ एक बुनियादी नुक्ते पर मुत्तफ़िक़ नज़र आते हैं कि ज़बान का मसला महज़ सियासत का मसला नहीं बल्कि तालीम, मुतालिआ और तहज़ीब का मसला है। कोई ज़बान सिर्फ़ क़ानून के ज़ोर पर ज़िंदा नहीं रह सकती और न ही सिर्फ़ जज़्बाती नारों से तरक़्क़ी कर सकती है। दादा भुसे ने मराठी तालीम को मज़बूत बनाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया, लक्ष्मीकांत देशमुख ने मादरी ज़बान की बुनियाद को अहम क़रार दिया, एकनाथ शिंदे ने किताब और लाइब्रेरी कल्चर की हिमायत की, जबकि राज ठाकरे ने लिसानी शनाख़्त के तहफ़्फ़ुज़ को ज़रूरी बताया। इन मुख़्तलिफ़ आरा का मुश्तरका पैग़ाम यही है कि ज़बानों की बक़ा का रास्ता तालीमी मेयार, मुतालिए की आदत, अदबी शुऊर और मुआशरती वाबस्तगी से होकर गुज़रता है, न कि सिर्फ़ क़ानूनी जब्र या सियासी नारों से। लेकिन शायद इस बहस का सबसे मुतवाज़िन और तामीरी नुक़्ता-ए-नज़र ये है कि ज़बान का एहतिराम ज़रूरी है,

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तालीम की गुमशुदा रूह???

हिन्दुस्तान के तालीमी बोहरान का फ़िक्री मुहासबा डॉक्टर असद उल्लाह ख़ान आजकल हिन्दुस्तान के तालीमी निज़ाम की जिन ख़राबियों पर बहस की जा रही है, वो बिलाशुबा अहम हैं। पेपर लीक, इम्तिहानी बदउनवानी, रट्टा सिस्टम, नाक़िस स्कूल इंफ़्रास्ट्रक्चर, कमज़ोर तदरीसी मेयार और रोज़गार से महरूम ग्रेजुएट्स — ये सब तल्ख़ हक़ीक़तें हैं। लेकिन बतौर एक मुअल्लिम और चालीस बरस से ज़ाइद अरसा तालीम के मैदान में दश्त-नवर्दी करने वाले शख़्स के तौर पर जो कुछ हमने देखा है या समझा है, उनसे इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि मसला इन तमाम ख़राबियों से भी ज़्यादा गहरा है। हमारा असल बोहरान तालीमी नहीं, फ़िक्री बोहरान है। हमने तालीम को इम्तिहान समझ लिया है। हमने स्कूल को इमारत समझ लिया है। हमने उस्ताद को मुलाज़िम समझ लिया है, और हमने तालिब-ए-इल्म को रोल नंबर बना दिया है। नतीजा ये है कि पूरा निज़ाम अपनी रूह खो चुका है। एक ज़माना था जब तालीम का मक़सद इंसान बनाना था। आज तालीम का मक़सद नंबर बन गया है। एक ज़माना था जब स्कूल शख़्सियत-साज़ी के मराकिज़ होते थे। आज वो कोचिंग सेंटरों के तौसीई दफ़्तर बनते जा रहे हैं। एक ज़माना था जब उस्ताद ज़हनों को रोशन करता था। आज उससे नतीजे पैदा करने वाली मशीन बनने की तवक़्क़ो की जाती है। तालीम सिर्फ़ मालूमात की मुंतक़ली का नाम नहीं है। अगर मालूमात ही तालीम होतीं तो गूगल दुनिया का सबसे बड़ा उस्ताद होता। अगर याददाश्त ही ज़हानत होती तो कंप्यूटर सबसे बड़े मुफ़क्किर होते। तालीम दरअसल सोचने की सलाहियत पैदा करने का नाम है। सवाल पूछने का हौसला पैदा करने का नाम है। किरदार-साज़ी का नाम है। अख़्लाक़ी शुऊर पैदा करने का नाम है। मुआशरती ज़िम्मेदारी का एहसास बेदार करने का नाम है। अफ़सोस कि हमारा पूरा तालीमी निज़ाम अभी तक उन्नीसवीं सदी के इम्तिहानी मॉडल पर खड़ा है, जबकि दुनिया इक्कीसवीं सदी की मस्नूई ज़हानत के दौर में दाख़िल हो चुकी है। आज का बच्चा ChatGPT, मस्नूई ज़हानत, रोबोटिक्स, डिजिटल मईशत और आलमी मुसाबक़त की दुनिया में दाख़िल हो रहा है। लेकिन हम अब भी उससे पूछ रहे हैं — तारीफ़ लिखिए।फ़र्क़ लिखिए।ख़ाली जगह पुर कीजिए।सही जवाब पर निशान लगाइए। ये सवालात मुस्तक़बिल नहीं बनाते। ये सिर्फ़ इम्तिहानी कॉपियाँ भरने में मदद देते हैं। असल सवाल ये है कि क्या हमारा तालिब-ए-इल्म सोच सकता है? क्या वो मसला हल कर सकता है? क्या वो इख़्तिलाफ़-ए-राय को बर्दाश्त कर सकता है? क्या वो टीम के साथ काम कर सकता है? क्या वो अख़्लाक़ी फ़ैसले ले सकता है? क्या वो अपनी बात मुअस्सर अंदाज़ में पेश कर सकता है? अगर इन सवालात का जवाब नफ़ी में है तो फिर चाहे वो 95 फ़ीसद नंबर ले आए, तालीमी निज़ाम नाकाम है। हमने देहाती इलाक़ों से लेकर शहरी बस्तियों तक हज़ारों तलबा को देखा है। हम ऐसे बच्चे से मिल चुके हैं जो वसाइल से महरूम हैं लेकिन ज़हानत से मालामाल हैं। हमने ऐसे इदारे भी देखे हैं जिनके पास इमारतें हैं मगर तालीमी रूह नहीं। इसी लिए मैं हमेशा कहता हूँ कि तालीम की पहली इस्लाह निसाब से नहीं बल्कि उस्ताद से शुरू होनी चाहिए। एक बेहतरीन उस्ताद एक कमज़ोर इमारत में भी मोजज़ा पैदा कर सकता है। लेकिन एक ग़ैर-तरबियत-याफ़्ता उस्ताद जदीदतरीन कैंपस को भी नाकाम बना सकता है। इसलिए क़ौमी सतह पर असातिज़ा की तरबियत को सबसे बड़ी तरजीह बनाना होगा। दूसरी ज़रूरत स्कूलों को सियासी और बयूरोक्रेटिक मुदाख़लत से आज़ाद करना है। तालीम को फ़ाइलों के ज़रिए नहीं, तालीमी माहिरीन के ज़रिए चलाया जाना चाहिए। तीसरी ज़रूरत तालीम को किरदार, अक़दार और क़ौम-साज़ी के साथ जोड़ने की है। सिर्फ़ STEM काफ़ी नहीं। सिर्फ़ AI काफ़ी नहीं। सिर्फ़ Coding काफ़ी नहीं। अगर इंसानियत, अख़्लाक़, दयानतदारी, ज़िम्मेदारी और समाजी शुऊर पैदा न हो तो टेक्नोलॉजी भी तबाही का ज़रिया बन सकती है। आज हिन्दुस्तान के सामने सबसे बड़ा सवाल ये नहीं कि कितने बच्चे इम्तिहान पास कर रहे हैं। असल सवाल ये है कि हम किस क़िस्म के इंसान पैदा कर रहे हैं। अगर हमने इस सवाल का सही जवाब तलाश कर लिया तो पेपर लीक, नक़ल, बदउनवानी और बेरोज़गारी जैसे मसाइल ख़ुद-ब-ख़ुद कम होने लगेंगे। तालीम की हक़ीक़ी कामयाबी डिग्रियों की तादाद में नहीं बल्कि ऐसे इंसानों की तादाद में होती है जो मुआशरे को बेहतर बना सकें — क्योंकि क़ौमों का मुस्तक़बिल पार्लियामेंटों में नहीं बनता, वो ख़ामोश क्लासरूमों में बनता है। वो उस्ताद के हाथों में बनता है। वो तालिब-ए-इल्म के ज़हन में बनता है, और वो उस तालीमी फ़लसफ़े में बनता है जो इंसान को सिर्फ़ कामयाब नहीं बल्कि बाकिरदार बनाता है। आज हिन्दुस्तान को तालीमी इस्लाहात से ज़्यादा तालीमी बेदारी की ज़रूरत है, वरना हम इम्तिहानात तो लेते रहेंगे, लेकिन मुस्तक़बिल खोते रहेंगे। लेकिन सवाल ये है कि हम इस मक़ाम तक पहुँचे कैसे? ये बोहरान किसी एक वज़ीर, किसी एक हुकूमत, किसी एक बोर्ड या किसी एक पॉलिसी की पैदावार नहीं है। ये कई दहाइयों पर मुहीत उन ग़लत तरजीहात का नतीजा है जिनमें इमारतों को तालीम समझ लिया गया, निसाब को इल्म समझ लिया गया और इम्तिहानात को क़ाबिलियत का पैमाना क़रार दे दिया गया। हमने स्कूल तो बनाए लेकिन तालीमी सक़ाफ़त पैदा न कर सके। हमने निसाब तो मुरत्तब किए लेकिन तजस्सुस पैदा न कर सके। हमने इम्तिहानात तो मुनअक़िद किए लेकिन फ़िक्र पैदा न कर सके। हमने डिग्रियाँ तो तक़सीम कीं लेकिन बसीरत पैदा न कर सके। आज हमारे तालीमी इदारों में दाख़िल होने वाला बच्चा सवाल पूछने के फ़ितरी जज़्बे के साथ आता है, मगर निज़ाम उसे जवाब रटने की मशीन बनाकर बाहर निकालता है। वो बच्चा जो आसमान को देखकर पूछता है कि सितारे क्यों चमकते हैं, चंद साल बाद सिर्फ़ इतना जानता है कि इम्तिहान में कितने नंबर हासिल करने हैं। वो बच्चा जो तितली के रंगों पर हैरान होता है, उसे चंद बरसों में सिर्फ़ सही ऑप्शन पर टिक लगाना सिखा दिया जाता है। ये तालीमी नाकामी नहीं, इंसानी सलाहियतों का क़त्ल है। दुनिया की बड़ी अक़वाम ने अपनी तरक़्क़ी का सफ़र उस वक़्त शुरू किया जब उन्होंने तालीम को महज़ रोज़गार का ज़रिया नहीं बल्कि क़ौम-साज़ी का सबसे मुअस्सर हथियार समझा। जापान की तामीर फ़ैक्ट्रियों में शुरू नहीं हुई थी, कमरा-ए-जमाअतों में हुई थी। जर्मनी की ताक़त सिर्फ़ उसकी

तालीम की गुमशुदा रूह??? Read More »