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मेहनत करे इंसाँ तो क्या हो नहीं सकता!!

जे ई ई एडवांस्ड 2026 के नताइज और नौजवान नस्ल के लिए कामयाबी का मंशूर डॉ. असदुल्लाह ख़ान कुछ नताइज ऐसे होते हैं जो सिर्फ़ चंद तलबा की कामयाबी की दास्तान नहीं सुनाते बल्कि पूरी नौजवान नस्ल के लिए पैग़ाम बन जाते हैं। वह बताते हैं कि ख़्वाब कैसे पूरे होते हैं, मंज़िलें कैसे हासिल की जाती हैं और किन कमज़ोरियों से बचकर इंसान अपनी ज़िंदगी बदल सकता है। वह सिर्फ़ यह नहीं बताते कि कौन कामयाब हुआ, बल्कि यह भी वाज़ेह करते हैं कि कामयाबी तक पहुँचने वालों ने कौन-सी आदतें अपनाईं, किन मुश्किलात का सामना किया और किस तरह अपनी कमज़ोरियों पर क़ाबू पाया। हाल ही में जे ई ई एडवांस्ड 2026 के नताइज का ऐलान हुआ। एक लाख उनासी हज़ार से ज़्यादा तलबा इस इम्तिहान में शरीक हुए। उनमें से तक़रीबन सत्तावन हज़ार तलबा कामयाब क़रार पाए। लेकिन पूरे मुल्क की तवज्जोह तीन नौजवानों पर मर्कूज़ हो गई। शुभम कुमार (AIR-1), कबीर छल्लर (AIR-2) और जातन चाहर (AIR-3)। जब हम उनकी कामयाबियों के पीछे झाँकते हैं तो एक हैरतअंगेज़ हक़ीक़त सामने आती है। उनमें से किसी ने कामयाबी का राज़ ग़ैर-मामूली ज़ेहानत को क़रार नहीं दिया। किसी ने यह नहीं कहा कि वह चौबीस घंटे पढ़ते थे। किसी ने शॉर्टकट, जादुई फ़ॉर्मूला या किसी ख़ुफ़िया तकनीक का ज़िक्र नहीं किया। बल्कि तीनों की ज़बान पर तक़रीबन एक ही पैग़ाम था, Dedication, Discipline and Consistency यानी वाबस्तगी, नज़्म-ओ-ज़ब्त और मुस्तक़िल-मिज़ाजी। यही कामयाबी का अस्ल नुस्ख़ा है। बिहार के एक आम घराने से ताल्लुक़ रखने वाले शुभम कुमार ने 360 में से 330 नंबर हासिल करके पूरे हिंदुस्तान में पहली पोज़िशन हासिल की। उनके वालिद हार्डवेयर की एक छोटी-सी दुकान चलाते हैं। उनके ख़ानदान में इंजीनियर बनने का ख़्वाब अभी पहली नस्ल का ख़्वाब था। शुभम ने एक ऐसी बात कही जो हर तालिबे-इल्म को ज़िंदगी भर याद रखनी चाहिए कि कामयाबी लंबे वक़्त तक पढ़ने में नहीं बल्कि मुस्तक़िल-मिज़ाजी और सीखने के अमल पर एतमाद में है। यह जुमला हमारे पूरे तालीमी निज़ाम के लिए आईना है। कबीर छल्लर ने 329 नंबर हासिल किए। वह सिर्फ़ एक नंबर से पहली पोज़िशन से पीछे रह गए, लेकिन उनकी सोच उन्हें लाखों तलबा से आगे ले गई। उन्होंने कभी नंबरों के पीछे दौड़ने की कोशिश नहीं की। वह Concepts को समझने पर तवज्जोह देते रहे। हर इम्तिहान के बाद अपनी ग़लतियों का तजज़िया करते, कमज़ोरियों की फ़ेहरिस्त बनाते और फिर उन्हें दूर करने पर काम करते। उन्होंने साबित किया कि कामयाब तलबा ग़लतियाँ नहीं छुपाते, बल्कि ग़लतियों से सीखते हैं। जातन चाहर ने सातवीं जमाअत से अपनी इल्मी बुनियादें मज़बूत करना शुरू कर दी थीं। उन्होंने ओलंपियाड्स में हिस्सा लिया। साइंस, फ़लकियात, केमिस्ट्री और दीगर इल्मी सरगर्मियों में ख़ुद को मसरूफ़ रखा। फिर एक मरहले पर वह टाइफ़ॉयड का शिकार हो गए। इम्तिहान छूट गए। क्लासें मुतास्सिर हुईं। मगर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। ख़ानदान और असातिज़ा की हौसला-अफ़ज़ाई के साथ दोबारा खड़े हुए और पूरे हिंदुस्तान में तीसरी पोज़िशन हासिल की। जातन ने बताया कि नाकामी, बीमारी या मुश्किलात कामयाबी की राह बंद नहीं करतीं, हिम्मत हार देना कामयाबी की राह बंद करता है। हमारे तलबा इम्तिहानात में क्यों पीछे रह जाते हैं? बतौर मुअल्लिम चालीस साल से ज़्यादा अरसे के तजुर्बे के बाद मैं पूरे यक़ीन से कह सकता हूँ कि आज के तलबा की सबसे बड़ी कमज़ोरी कम ज़ेहानत नहीं है। बल्कि बे-मक़सद मोबाइल इस्तेमाल, सोशल मीडिया की लत, ग़ैर-मुनज़्ज़म मुतालआ, वक़्त का ज़ियाँ, रट्टे पर इनहिसार, कमज़ोर मुतालआ आदात, नींद की कमी, ख़ुद-एहतिसाबी का फ़ुक़दान और जल्द नताइज हासिल करने की ख़्वाहिश — यह वह ख़ामियाँ हैं जो ज़हीन-तरीन तलबा को भी नाकामी की तरफ़ ले जाती हैं। अब सवाल यह है कि अगर हम वाक़ई अपनी ज़िंदगी बदलना चाहते हैं, बड़ी कामयाबी हासिल करना चाहते हैं तो हम क्या करें? इन टॉपर्स की बातें सुनने के बाद यह समझ में आता है कि हमें कामयाबी के लिए एक लाइह-ए-अमल बनाना होगा। कुछ उसूलों को अपनी ज़िंदगी में इख़्तियार करना होगा, मसलन— १. रोज़ाना के अहदाफ़ मुक़र्रर करें। बिना हदफ़ के पढ़ाई, बिना नक़्शे के सफ़र की तरह है। २. मोबाइल का वक़्त महदूद करें। मुतालआ के दौरान मोबाइल मुकम्मल बंद रखें। ३. ग़लतियों की डायरी बनाएँ। हर इम्तिहान के बाद अपनी ग़लतियाँ लिखें। टॉपर्स यही करते हैं। ४. तमाम Concepts समझें। रट्टा वक़्ती नंबर दिला सकता है, फ़हम ज़िंदगी भर कामयाबी देता है। ५. रोज़ाना Revision करें। पढ़ना ज़रूरी है, मगर दोहराना उससे ज़्यादा ज़रूरी है। ६. अच्छी नींद लें। नींद ज़ाया करना मेहनत नहीं बल्कि नुक़सान है। ७. हल्की जिस्मानी वर्ज़िश करें। सेहतमंद जिस्म ही तवील इल्मी सफ़र बर्दाश्त कर सकता है। ८. असातिज़ा से सवाल पूछें। जो तालिबे-इल्म सवाल पूछने से डरता है, वह सीखने से भी महरूम रह जाता है। ९. मुस्तक़िल-मिज़ाजी अपनाएँ। रोज़ाना दो घंटे की मुस्तक़िल पढ़ाई, दस घंटे की ग़ैर-मुस्तक़िल पढ़ाई से बेहतर है। १०. ख़ुद पर यक़ीन रखें। दुनिया आप पर यक़ीन करे या न करे, आपको ख़ुद पर यक़ीन होना चाहिए। इस मौक़े पर वालिदैन से यह गुज़ारिश करना चाहूँगा कि अपने बच्चों पर सिर्फ़ नंबरों का दबाव न डालें। उनके अंदर सीखने की मुहब्बत पैदा करें। उनका मुक़ाबला दूसरों से न करें। उनकी मेहनत को सराहें। उनकी ग़लतियों पर रहनुमाई करें। उनकी कामयाबी के सफ़र में उनके साथी बनें, जज नहीं। वहीं असातिज़ा से यह इल्तिजा है कि आप सिर्फ़ निसाब मुकम्मल न करें बल्कि तलबा के अंदर ख़्वाब भी पैदा करें। एतमाद पैदा करें। सोचने की सलाहियत पैदा करें। क्योंकि तारीख़ ने साबित किया है कि एक अज़ीम उस्ताद हज़ारों ज़िंदगियाँ बदल सकता है। मेरे अज़ीज़ तलबा! याद रखो! शुभम, कबीर और जातन किसी दूसरे सैयारे से नहीं आए थे। वह भी तुम्हारी तरह आम बच्चे थे। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना था कि उन्होंने अपनी आदतों को ग़ैर-मामूली बना लिया। उन्होंने वक़्त की क़द्र की। उन्होंने मुस्तक़िल-मिज़ाजी इख़्तियार की। उन्होंने अपनी ग़लतियों से सीखा। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और यही चीज़ उन्हें लाखों तलबा से मुमताज़ बना गई। आज अगर तुम मोबाइल के इस्तेमाल को क़ाबू में ले लो, अपनी तवज्जोह को महफ़ूज़ कर लो, अपने वक़्त की हिफ़ाज़त कर लो और रोज़ाना थोड़ा-सा बेहतर बनने का अहद कर लो तो यक़ीन जानो आने वाला हिंदुस्तान

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زمین کی آہ اور انسان کی بے خبری

زمین کی آہ اور انسان کی بے خبری قدرت کی تنبیہ، قرآن کی رہنمائی اور انسانیت کے لیے ایک سبق ڈاکٹر اسد اللہ خان بسم اللہ الرحمٰن الرحیم ﴿إِنَّ فِي خَلْقِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَاختِلَافِ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ لآيَاتٍ لِّأُولِي الْأَلْبَابِ﴾ “بے شک آسمانوں اور زمین کی تخلیق، اور رات دن کے بدلتے رہنے میں عقل والوں کے لیے بہت سی نشانیاں ہیں۔” (سورۃ آل عمران: 190) ﴿ظَهَرَ الْفَسَادُ فِي الْبَرِّ وَالْبَحْرِ بِمَا كَسَبَتْ أَيْدِي النَّاسِ لِيُذِيقَهُم بَعْضَ الَّذِي عَمِلُوا لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ﴾ “خشکی اور سمندر میں فساد ظاہر ہو گیا، اس سبب سے جو لوگوں کے ہاتھوں نے کمایا، تاکہ اللہ انہیں ان کے بعض اعمال کا مزہ چکھائے، شاید وہ باز آ جائیں۔” (سورۃ الروم: 41) بے بس انسان اور آفاقی سچائی دنیا روزانہ جاگتی ہے، لیکن ہر صبح ایک جیسی نہیں ہوتی۔ بعض صبحیں سورج کی روشنی کے ساتھ امید لے کر آتی ہیں، اور بعض صبحیں زمین کی لرزش کے ساتھ انسان کو اس کی اصل حیثیت یاد دلا جاتی ہیں۔ کہیں زلزلہ آتا ہے، کہیں سیلاب بستیوں کو نگل جاتا ہے، کہیں آسمان آگ برساتا ہے، کہیں سمندر اپنی حدود توڑ دیتا ہے، اور کہیں ایک معمولی سا وائرس پوری دنیا کی طاقت، معیشت اور ٹیکنالوجی کو گھٹنوں کے بل لا کھڑا کرتا ہے۔ ان واقعات کو اگر صرف “قدرتی آفات” کہہ کر اخبار کے ایک صفحے تک محدود کر دیا جائے تو شاید ہم بہت بڑی حقیقت سے آنکھیں چرا رہے ہیں۔ مومن کے لیے یہ صرف خبریں نہیں ہوتییں، بلکہ اللہ تعالیٰ کی نشانیاں ہوتی ہیں۔ قرآن انہیں “آیات” کہتا ہے؛ ایسی نشانیاں جو انسان کو اس کے رب، اس کی کمزوری، اس کی ذمہ داری اور اس کے انجام کی یاد دلاتی ہیں۔ آج کا انسان چاند پر بستیاں بسانے کے خواب دیکھ رہا ہے، مصنوعی ذہانت کو اپنی عقل کا جانشین سمجھنے لگا ہے، اور چند سیکنڈ میں دنیا کے ایک کونے سے دوسرے کونے تک پیغام پہنچانے پر فخر کرتا ہے۔ اس نے فلک بوس عمارتیں کھڑی کر لیں، سمندر کی تہوں میں اتر گیا، پہاڑوں کو چیر کر شاہراہیں بنا دیں، مگر وہ اب بھی ایک ایسے معمولی سے زلزلے کے سامنے بے بس ہے جو چند لمحوں میں اس کی برسوں کی محنت، دولت، منصوبے اور غرور کو مٹی میں ملا دیتا ہے۔ یہی انسانی حقیقت ہے جسے قرآن نے چودہ سو سال پہلے بیان کر دیا تھا۔ ﴿وَمَا قَدَرُوا اللَّهَ حَقَّ قَدْرِهِ وَالْأَرْضُ جَمِيعًا قَبْضَتُهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ﴾ “انہوں نے اللہ کی قدر ویسی نہ پہچانی جیسی پہچاننے کا حق تھا، حالانکہ قیامت کے دن پوری زمین اس کی مٹھی میں ہوگی۔” (سورۃ الزمر: 67) دنیا کی تاریخ گواہ ہے کہ تہذیبیں صرف جنگوں سے نہیں مٹیں، بعض اوقات ایک جھٹکے نے پوری سلطنتوں کو قصۂ پارینہ بنا دیا۔ قومِ عاد اپنی طاقت پر ناز کرتی تھی، قومِ ثمود اپنے پہاڑ تراش کر محلات بنانے پر فخر کرتی تھی، فرعون اپنے اقتدار کو دائمی سمجھتا تھا، قارون اپنی دولت پر اکڑتا تھا، مگر قدرت نے سب کو ایک لمحے میں تاریخ کا سبق بنا دیا۔ یہی وجہ ہے کہ قرآن بار بار انسان سے سوال کرتا ہے کہ کیا تم نے اپنے سے پہلے لوگوں کا انجام نہیں دیکھا؟ ﴿أفَلَمْ يَسِيرُوا فِي الْأَرْضِ فَيَنظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ﴾ “کیا وہ زمین میں چلتے پھرے نہیں کہ دیکھتے ان لوگوں کا انجام کیا ہوا جو ان سے پہلے گزر چکے تھے؟” (سورۃ یوسف: 109) یہ سوال صرف تاریخ پڑھنے کے لیے نہیں، بلکہ اپنی اصلاح کے لیے ہے۔ سانحات، اخلاقی حس اور دل کا زلزلہ گزشتہ دنوں دنیا کے ایک خطے میں آنے والے شدید زلزلے نے ایک مرتبہ پھر یہی سبق دہرایا۔ چند لمحوں میں مضبوط عمارتیں ملبے میں تبدیل ہو گئیں، ہزاروں خاندان بے گھر ہو گئے، بچے اپنے والدین سے بچھڑ گئے، والدین اپنی اولاد کو ڈھونڈتے رہ گئے، اور وہ لوگ جو چند منٹ پہلے معمول کی زندگی گزار رہے تھے، اچانک موت اور زندگی کے درمیان کھڑے ہو گئے۔ ایسے مناظر ہر حساس انسان کی آنکھ نم کر دیتے ہیں، لیکن سوال یہ ہے کہ کیا یہ مناظر ہمارے دل بھی بدلتے ہیں؟ افسوس یہ ہے کہ ہمارا معاشرہ اب سانحات کو بھی ایک “وائرل ویڈیو” کی طرح دیکھنے لگا ہے۔ چند لمحے افسوس، چند دعائیں، چند تبصرے، اور پھر اگلی خبر؛ گویا انسانی جان کی حرمت بھی خبروں کی رفتار کے ساتھ کم ہوتی جا رہی ہے۔ رسول اللہ ﷺ نے فرمایا: «ارْحَمُوا مَنْ فِي الْأَرْضِ يَرْحَمْكُمْ مَنْ فِي السَّمَاءِ» “زمین والوں پر رحم کرو، آسمان والا تم پر رحم فرمائے گا۔” (جامع الترمذی، حدیث: 1924) اسلام نے ہمیں صرف عبادت گزار نہیں بنایا بلکہ دردِ دل رکھنے والا انسان بنایا ہے۔ مومن وہ ہے جو دوسروں کے دکھ کو اپنا دکھ سمجھے، جو مصیبت زدہ کی مدد کرے، جو بھوکے کو کھانا کھلائے، یتیم کے سر پر ہاتھ رکھے، بے گھر کے لیے پناہ بنے اور مصیبت کے وقت انسانیت کا سہارا بنے۔ رسول اکرم ﷺ نے فرمایا: «مَثَلُ الْمُؤْمِنِينَ فِي تَوَادِّهِمْ وَتَرَاحُمِهِمْ وَتَعَاطُفِهِمْ كَمَثَلِ الْجَسَدِ الْوَاحِدِ» “مومن آپس کی محبت، رحمت اور ہمدردی میں ایک جسم کی مانند ہیں، جس کے ایک عضو کو تکلیف ہو تو پورا جسم بے چین ہو جاتا ہے۔” (صحیح بخاری، حدیث: 6011؛ صحیح مسلم، حدیث: 2586) یہی وہ معیار ہے جس پر ہمیں اپنے ایمان کو پرکھنا چاہیے۔ اگر دنیا کے کسی کونے میں آنے والی آفت ہمارے دل کو نہ ہلائے، اگر کسی ماں کی آہ ہمارے ضمیر کو نہ جگائے، اگر کسی یتیم بچے کے آنسو ہمیں بے چین نہ کریں، تو ہمیں اپنے ایمان کی کیفیت پر ضرور غور کرنا چاہیے۔ قدرت کی ہر تنبیہ ہمیں دو سوالوں کے سامنے لا کھڑا کرتی ہے: پہلا سوال یہ کہ اگر آج یہ آزمائش ان پر آئی ہے تو کیا یقین ہے کہ کل ہمارے دروازے پر دستک نہیں دے گی؟ اور دوسرا، اس سے بھی زیادہ اہم سوال، اگر آج ہماری زندگی کا زلزلہ آ جائے، اگر موت اچانک ہمارے دروازے پر آ کھڑی ہو، تو کیا ہم اپنے رب سے ملاقات کے لیے تیار ہیں؟ یہ سوال کسی جغرافیے، کسی قوم، کسی مذہب یا کسی زبان کا نہیں؛ یہ ہر انسان کا

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چلو اسکول، ناکامی سیکھیں!

جب تعلیم کا پہلا دروازہ ہی احساسِ محرومی میں کھلنے لگے داخلوں کی دوڑ، بچپن کی پہلی شکست اور تعلیم کے بدلتے ہوئے چہرے کی داستان ڈاکٹر اسد اللہ خان وہ صبح، جس دن ایک بچہ پہلی بار ہار گیا صبح کے سات بج رہے تھے۔ بارش ابھی تھمی ہی تھی اور کھڑکی کے شیشوں پر بارش کے چند قطرے اب بھی ایسے ٹھہرے ہوئے تھے جیسے کسی نے وقت کو چند لمحوں کے لیے روک دیا ہو۔ گلی میں اسکول بس کے ہارن کی آواز گونجی تو چار سالہ ساجد اچانک بستر سے اچھل کر اٹھ بیٹھا۔ اس نے دوڑتے ہوئے اپنی ننھی سی پانی کی بوتل اٹھائی، الماری سے نیلے رنگ کا ننھا سا بیگ نکالا، اسے اپنی پشت پر لٹکایا اور آئینے کے سامنے جا کھڑا ہوا۔ وہ خود کو بار بار دیکھ رہا تھا؛ کبھی بیگ سیدھا کرتا، کبھی اپنے بالوں پر ہاتھ پھیرتا، اور کبھی تصور ہی تصور میں کسی ٹیچر کو “گڈ مارننگ میم” کہہ کر مسکرا دیتا۔ اسے یقین تھا کہ آج وہ بھی دوسرے بچوں کی طرح اسکول جائے گا۔ وہ نہیں جانتا تھا کہ اسکول جانے کے لیے صرف معصومیت کافی نہیں رہی، اب اس کے لیے ایک ایسا امتحان ضروری ہے جس کی نہ اسے خبر ہے، نہ اس کے معنی معلوم ہیں، اور نہ اس کے نتائج۔ وہ تو صرف اتنا جانتا ہے کہ اسکول میں دوست ملتے ہیں، رنگ برنگی کتابیں ہوتی ہیں، جھولے ہوتے ہیں، اور شاید ایک ایسی ٹیچر بھی جو ماں کی طرح پیار کرتی ہوگی۔ لیکن اسی وقت گھر کے دوسرے کمرے میں ایک اور منظر چل رہا تھا۔ کھانے کی میز پر داخلہ فارم، آدھار کارڈ کی فوٹو کاپیاں، پیدائش کا سرٹیفکیٹ، بجلی کا بل، بینک اسٹیٹمنٹ، پاسپورٹ سائز تصاویر، پین کارڈ، اور نہ جانے کتنے کاغذات بکھرے ہوئے تھے۔ ساجد کی ماں بار بار ایک فائل کھول کر بند کر رہی تھی۔ باپ خاموش بیٹھا تھا—ایک ایسی خاموشی جس کے اندر کئی طوفان تھے۔ وہ بار بار گھڑی دیکھتا، پھر فائل دیکھتا، پھر اپنے بیٹے کو اور پھر نہ جانے کیوں اپنی ذات کو تکنے لگتا۔ آج امتحان ساجد کا نہیں، بلکہ اس کے والدین کا تھا۔ ان کی زبان، انگریزی، ملازمت، آمدنی، رہن سہن، لباس، شخصیت اور شاید ان کے سماجی مرتبے کا بھی امتحان تھا۔ یہ وہ امتحان تھا جس کا نصاب کسی کتاب میں نہیں ملتا اور جس کی تیاری کسی استاد کے پاس نہیں ہوتی۔ اس کا نتیجہ صرف “داخلہ ملا” یا “داخلہ نہیں ملا” نہیں ہوتا، بلکہ بعض اوقات ایک ننھے سے دل میں یہ پہلا احساس بھی چھوڑ جاتا ہے کہ شاید وہ دوسروں سے کم تر ہے۔ شاید یہی وہ لمحہ ہوتا ہے جب بچپن پہلی بار زندگی کے سامنے ہارنے لگتا ہے۔ داخلے کا موسم یا والدین کا امتحان؟ ہم نے تعلیم کو ہمیشہ روشنی، امید اور مساوات کی علامت سمجھا ہے۔ اسکول وہ جگہ تھی جہاں معاشرے کے ہر طبقے کا بچہ ایک ہی بینچ پر بیٹھ کر یہ سیکھتا تھا کہ علم انسانوں کے درمیان فرق نہیں کرتا۔ استاد وہ شخصیت تھا جو نام، نسب یا آمدنی نہیں پوچھتا تھا، بلکہ صرف یہ دیکھتا تھا کہ سامنے بیٹھا بچہ سیکھنا چاہتا ہے یا نہیں۔ لیکن وقت نے تعلیم کا چہرہ بدل دیا ہے۔ آج بہت سے شہروں میں اسکول کا دروازہ علم سے پہلے سماجی شناخت کو دیکھنے لگا ہے۔ داخلہ فارم اب صرف بچے کی معلومات نہیں مانگتے، بلکہ والدین کی معاشی حیثیت، پیشہ، زبان، تعلیمی قابلیت اور طرزِ زندگی تک جاننے کی کوشش کرتے ہیں۔ یہاں سوال یہ ہے کہ کیا ایک چار سالہ بچے کی قسمت کا فیصلہ واقعی اس کے والدین کی تنخواہ، انگریزی لہجے یا ڈرائنگ روم کے سائز سے ہونا چاہیے؟ ہندوستان میں ہر سال جون کا مہینہ صرف تعلیمی سال کے آغاز کی خبر نہیں لاتا، بلکہ لاکھوں گھروں میں امید اور مایوسی کی ایک نئی داستان رقم کرتا ہے۔ دہلی، ممبئی، بنگلورو، حیدرآباد، پونے، چنئی اور کولکاتا جیسے بڑے شہروں میں ہر سال داخلوں کے موسم میں یہی بے چینی دیکھنے کو ملتی ہے۔ اخبارات میں رات بھر لگنے والی قطاروں، محدود نشستوں اور نرسری داخلوں کے لیے قائم خصوصی کوچنگ سینٹرز پر مسلسل خبریں شائع ہوتی ہیں۔ عدالتوں، ماہرینِ تعلیم اور پالیسی سازوں کے درمیان یہ بحث جاری ہے کہ ابتدائی تعلیم کے دروازے پر انصاف کو کیسے یقینی بنایا جائے۔ لیکن یہ سب کچھ دیکھنے کے باوجود سب سے زیادہ خاموش وہ بچہ ہوتا ہے جس کے نام پر یہ پوری جنگ لڑی جا رہی ہوتی ہے۔ بچپن کی سب سے خوبصورت بات یہ ہے کہ وہ کامیابی اور ناکامی کی لغت سے بے خبر ہوتا ہے۔ چار سال کا بچہ نہ میرٹ جانتا ہے، نہ ویٹنگ لسٹ۔ وہ صرف اتنا جانتا ہے کہ سامنے والے گھر کا علی آج اسکول گیا ہے، لہٰذا وہ بھی جانا چاہتا ہے۔ لیکن جب بڑوں کی دنیا اس کی راہ میں اپنی شرطیں اور دیواریں کھڑی کر دیتی ہے، تو وہ کچھ نہیں سمجھتا۔ وہ صرف اتنا پوچھتا ہے: “ابو… میرا اسکول کب شروع ہوگا؟” یہ سوال بظاہر چھوٹا ہے، مگر ایک حساس باپ کے لیے اس کا جواب پوری زندگی کے مشکل ترین سوالوں میں سے ایک بن جاتا ہے۔ میرے ایک دوست ہیں، نام بدل کر انہیں راشد کہہ لیتے ہیں۔ پیشہ صحافت، کتابوں سے محبت، سچ بولنے کی عادت اور اپنے چار سالہ بیٹے ساجد سے بے پناہ عشق۔ جس دن شہر کے ایک معروف اسکول میں انٹرویو تھا، اس دن راشد نے اپنی بہترین قمیص پہنی اور بیوی نے فائل ترتیب دی۔ ہر کاغذ اپنی جگہ موجود تھا، مگر ایک چیز کہیں درج نہیں تھی: اپنے بچے کے لیے ایک باپ کی محبت، کیونکہ اس محبت کا کوئی خانہ فارم میں موجود نہیں تھا۔ ہمارے معاشرے کا شاید ہی کوئی اور امتحان ہو جس کی تیاری تین سالہ بچہ کم اور اس کے والدین زیادہ کرتے ہوں۔ گھر میں روزانہ مشق ہوتی؛ “گڈ مارننگ”، “تھینک یو”، “ایپل، بال، کیٹ”۔ ماں تصویریں دکھاتی، باپ رنگ یاد کراتا، دادا دعائیں دیتا اور دادی نظر اتارتی۔ انٹرویو شروع ہوا تو راشد کے مطابق چند رسمی سوالات کے بعد گفتگو کا رخ اچانک بدل

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محنت کرے انسان تو کیا ہو نہیں سکتا!

ڈاکٹر اسد اللہ خان آج کے دور میں اعلیٰ تعلیم حاصل کر لینے کے باوجود نوکری پا لینا گویا جوئے شیر لانے سے کم نہیں۔ آپ میں سینکڑوں صلاحیتیں ہوں، مگر اگر ایک بھی “کمی” نظر آ جائے — کوئی جسمانی معذوری، کوئی کمزوری، کوئی “داغ” — تو پورا چراغ نظر انداز کر دیا جاتا ہے۔ کام ناممکن نہیں ہوتا، مگر مشکل ضرور ہو جاتا ہے۔ مجھے ایک ایسے ہی ہونہار نوجوان کا قصہ یاد آتا ہے۔ ملک کے ایک ممتاز انجینئرنگ ادارے سے فارغ التحصیل، تعلیمی ریکارڈ اِس قدر شاندار کہ کاغذات دیکھتے ہی ایک بڑی کمپنی نے اُسے ہاتھوں ہاتھ لینے کا ارادہ کر لیا۔ مگر جب انٹرویو میں یہ کھلا کہ وہ نوجوان قوتِ سماعت کی ایک بیماری میں مبتلا ہے، تو وہی کمپنی — جو ابھی ابھی اُس کی ذہانت پر فریفتہ تھی — چپ چاپ قدم پیچھے کھینچ لائی۔ ڈگری، محنت اور قابلیت — سب ایک “طبی رپورٹ” کے سامنے ہار گئے۔ مگر کہانی یہیں ختم نہیں ہوتی، اور نہ ہونی چاہیے۔ کیونکہ معذوری جسم کی ہوتی ہے، حوصلے کی نہیں۔ تاریخ گواہ ہے کہ جن لوگوں نے دنیا بدلی، اُن میں سے بیشتر نے “کمی” کو “طاقت” میں بدلا۔ آئیے آج ایسے ہی دس روشن چراغوں کی داستانیں سنتے ہیں — جن کی لَو آندھیوں میں بھی بجھی نہیں، بلکہ اور تیز ہوئی۔ عظمت اور ہمت کی روشن مثالیں انسان اگر سچے دل سے کچھ کرنے کا ارادہ کر لے تو جسمانی اعضاء کی محرومی اس کے خوابوں کے آڑے کبھی نہیں آ سکتی۔ تاریخ اور حال کے افق پر ایسے کئی درخشندہ ستارے چمک رہے ہیں جنہوں نے اپنی ہمت کے بلبوتے پر طوفانوں کا رخ موڑ دیا۔ شری کانت بولا (Srikanth Bolla): پیدائشی طور پر مکمل نابینا شری کانت بولا کو بچپن ہی سے انتہائی غربت اور سماجی تعصب کا سامنا کرنا پڑا۔ حد تو یہ ہوئی کہ جب انہوں نے دسویں جماعت کے بعد سائنس پڑھنے کی خواہش ظاہر کی، تو بھارتی نظامِ تعلیم نے ان کے نابینا ہونے کا بہانہ بنا کر صاف انکار کر دیا۔ انہوں نے اس ناانصافی کے آگے سر تسلیم خم کرنے کے بجائے عدالت کا دروازہ کھٹکھٹایا اور چھ ماہ کی طویل قانونی جدوجہد کے بعد کامیابی حاصل کی، جس کے بعد انہوں نے گیارہویں جماعت میں ۹۸ فیصد نمبر لے کر سب کو حیران کر دیا۔ جب ملک کے مایہ ناز ادارے آئی آئی ٹی (IIT) نے بھی انہیں داخلہ دینے سے انکار کیا، تو انہوں نے ہمت ہارنے کے بجائے امریکہ کی مشہور یونیورسٹی ایم آئی ٹی (MIT) کا رخ کیا اور وہاں داخلہ پانے والے پہلے بین الاقوامی نابینا طالب علم بن گئے۔ بھارت واپس آ کر انہوں نے “بولانٹ انڈسٹریز” (Bollant Industries) قائم کی جو ماحول دوست مصنوعات بناتی ہے اور جہاں سیکڑوں معذور افراد کو روزگار فراہم کیا گیا ہے۔ آج شری کانت کروڑوں روپے کی کمپنی کے مالک اور دنیا بھر کے نوجوانوں کے لیے ایک عالمی رول ماڈل ہیں۔ سدھا چندرن (Sudha Chandran): محض ۱۶ سال کی عمر میں ایک خوفناک سڑک حادثے اور ڈاکٹروں کی مجرمانہ غفلت کی وجہ سے سدھا چندرن کی دائیں ٹانگ کاٹنی پڑی۔ ایک کلاسیکل رقاصہ کے لیے یہ مصیبت کسی موت سے کم نہ تھی کیونکہ ان کا پورا کیریئر پاؤں کی تھرکنے سے وابستہ تھا۔ مگر سدھا نے بیساکھیوں کے سہارے جینے کو ٹھکرا دیا اور “جائپور فٹ” (مصنوعی ٹانگ) لگوا کر انتہائی شدید تکلیف کے باوجود دوبارہ رقص سیکھنا شروع کیا۔ مشق کے دوران اکثر ان کے زخموں سے خون بہہ نکلتا تھا، مگر ان کا عزم متزلزل نہ ہوا۔ انہوں نے مصنوعی ٹانگ کے ساتھ اسٹیج پر واپسی کی اور ایسا شاندار رقص پیش کیا کہ پوری دنیا دنگ رہ گئی۔ آج وہ نہ صرف ایک عالمی شہرت یافتہ رقاصہ ہیں بلکہ بھارتی فلم و ٹیلی ویژن کی ایک مانی ہوئی اور کامیاب اداکارہ بھی بن چکی ہیں۔ ایرا سنگھل (Ira Singhal): ریڑھ کی ہڈی کی ایک نایاب بیماری “اسکولیوسس” (Scoliosis) کی وجہ سے ایرا سنگھل کے دونوں بازوؤں کی حرکت انتہائی محدود تھی۔ انہوں نے اپنی اس کمزوری کو پڑھائی کے آڑے نہیں آنے دیا اور ۲۰۱۰ میں ملک کا سب سے مشکل امتحان یو پی ایس سی (UPSC) پاس کیا، مگر انتطامیہ نے ان کی جسمانی حالت کا بہانہ بنا کر انہیں سرکاری ملازمت دینے سے انکار کر دیا۔ ایرا نے اس امتیازی سلوک کو چپ چاپ قبول کرنے کے بجائے سینٹرل ایڈمنسٹریٹو ٹریبونل (CAT) میں کیس دائر کیا اور چار سال تک ایک صبر آزما قانونی جنگ لڑ کر اپنا حق جیتا۔ انہوں نے ۲۰۱۴ میں دوبارہ امتحان دیا اور اس بار نہ صرف کامیاب ہوئیں بلکہ پورے ملک میں پہلی پوزیشن (Rank 1) حاصل کر کے جنرل کیٹیگری میں ٹاپ کیا۔ آج وہ ایک بہترین اور نڈر سول سروسز آفیسر کے طور پر ملک کی خدمت کر رہی ہیں۔ ارونیما سنہا (Arunima Sinha): قومی سطح کی والی بال کھلاڑی ارونیما سنہا کی زندگی میں ۲۰۱۱ میں اس وقت اندھیرا چھا گیا جب کچھ چوروں نے انہیں چلتی ٹرین سے نیچے پھینک دیا، جس کے باعث ان کی ایک ٹانگ کاٹنی پڑی۔ ہسپتال کے بستر پر جہاں لوگ ان پر ترس کھا رہے تھے اور انہیں “بے چاری” سمجھ رہے تھے، انہوں نے وہیں لیٹے لیٹے دنیا کی بلند ترین چوٹی سر کرنے کا ناقابل یقین فیصلہ کیا۔ ہسپتال سے ڈسچارج ہوتے ہی انہوں نے پہلی بھارتی خاتون ایورسٹ فاتح بچیندری پال سے سخت ٹریننگ شروع کی۔ سرپھرے عزم کی بدولت ۲۰۱۳ میں وہ مصنوعی ٹانگ کے ساتھ ماؤنٹ ایورسٹ سر کرنے والی دنیا کی پہلی معذور خاتون بنیں اور اس کے بعد انہوں نے دنیا کے تمام ۷ براعظموں کی بلند ترین چوٹیوں پر کامیابی سے اپنے ملک کا ترنگا لہرایا۔ تاریخ کے مزید روشن ستارے نک وجیسک (Nick Vujicic): آسٹریلیا میں ۱۹۸۲ میں پیدا ہونے والے نک وجیسک کی جسمانی حالت دیکھ کر لوگ کانپ اٹھتے تھے کیونکہ وہ بغیر بازوؤں اور ٹانگوں کے پیدا ہوئے تھے۔ بچپن میں ہم جماعتوں کی ایذا رسانی اور شدید ذہنی اذیت سے تنگ آ کر محض ۱۰ سال کی عمر میں انہوں نے خودکشی کی کوشش کی اور روتے ہوئے اپنی ماں سے پوچھا تھا کہ

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تعلیم کے ذریعے ۔۔۔ تعمیر یا تخریب ؟ ۔۔۔

ڈاکٹر اسد اللہ خان بچوں کو آپ اسکول کیوں بھیجتے ہیں؟ یہ سوال سننے میں جتنا سادہ لگتا ہے، اپنے باطن میں اتنا ہی طوفان سموئے ہوئے ہے۔ یہ ایک سوال نہیں، ایک تہذیب کا احتساب ہے۔ ایک تڑپتے ہوئے باپ کا، ایک فکرمند ماں کا اور ایک بکھرتی ہوئی قوم کا وہ مقدمہ ہے جو آج اپنے ہی ہاتھوں اپنی نسل کو کٹہرے میں کھڑا کر رہی ہے اور اسے خبر بھی نہیں! جب بھی کسی باپ کی آنکھوں میں جھانک کر یہ پوچھا جائے تو جواب ایک ہی لے میں، ایک ہی بے فکری سے آتا ہے: ”بچے پڑھ لکھ کر کچھ بن جائیں۔” لیکن کبھی تنہائی میں بیٹھ کر سوچیے کہ اس ”کچھ بننے” کا خواب کب کا سکڑ کر محض چند ہزار یا چند لاکھ کی کمائی کا ہدف بن چکا ہے؟ شخصیت کی تعمیر، کردار کی پرورش، ذہن کی روشنی — یہ الفاظ اب صرف اسکولوں کے چمکدار بروشروں میں خوبصورت فونٹ میں چھپتے ہیں، کسی کے دل میں نہیں اترتے۔ والدین بچوں کو اسکول ایسے بھیجتے ہیں جیسے خط کو لفافے میں بند کر کے پوسٹ باکس میں ڈال دیا جائے — کہ اب آگے کا ذمہ ڈاکخانے کا ہے، ہمارا کام ختم ہوا۔ سال ۲۰۲۶ء کا یہ وہ لحظہ ہے جب اس سوال کی گہرائی ہماری برداشت سے باہر ہو چکی ہے۔ مصنوعی ذہانت کا طوفان اب دروازے پر دستک نہیں دے رہا، وہ تو ہمارے بیڈرومز اور کلاس رومز کے اندر آ بیٹھا ہے۔ ChatGPT اور Gemini اب ہر چوتھی جماعت کے بچے کی جیب میں ہیں، ہر اسمارٹ فون کے اندر موجود ہیں۔ وہ ہر سوال کا جواب چند سیکنڈ میں اگل دیتے ہیں۔ اب سوال یہ نہیں رہا کہ آپ کے بچے کا حافظہ کتنا تیز ہے اور وہ کتنے جواب جانتا ہے — اب رونے کا مقام یہ ہے کہ کیا وہ سوچنا بھی جانتا ہے؟ کیا ہم ہڈ ماس کے انسان بنا رہے ہیں یا مائیکرو چپس سے چلنے والے بے جان آلے؟ اسکول کی چہار دیواری: درسگاہ یا عقوبت خانہ؟ جس اسکول میں دیر سے آنے کی سزا یہ ہو کہ آٹھ دس کلو کا بستہ کاندھوں پر لاد کر میدان کے دس چکر لگوائے جائیں — وہاں بچے کے قدم اسکول کی طرف شوق سے بڑھیں گے یا خوف سے؟ جس کلاس میں ایک کی غلطی پر پچاس بچوں کے معصوم ہاتھوں پر بید مار کر لال کر دیا جائے، وہاں محبت کا کون سا پھول اگے گا؟ وہاں صرف اور صرف انتقام کا کانٹا پروان چڑھے گا۔ یہ جسمانی اور ذہنی تشدد اب صرف ماضی کا قصہ نہیں رہا، بلکہ آج ہمارے آس پاس روز کا معمول بن چکا ہے۔ ملک کے الگ الگ کونوں سے آنے والی حالیہ خبریں پڑھ کر روح کانپ اٹھتی ہے اور دل خون کے آنسو روتا ہے: بنگلورو کا وحشیانہ واقعہ: ابھی حال ہی میں بنگلورو کے ایک نجی اسکول میں محض دو دن غیر حاضر رہنے پر پانچویں جماعت کے ایک معصوم ۹ سالہ بچے کو اسکول کے انتظامیا نے پلاسٹک کے پائپ سے اس بے رحمی سے پیٹا کہ اس کے پورے جسم پر نیل پڑ گئے، اور حد تو یہ ہے کہ اسے کئی گھنٹوں تک ایک اندھیرے کمرے میں اکیلا بند کر کے تڑپنے کے لیے چھوڑ دیا گیا۔ جب دکھی والدین نے جواب مانگا، تو انہوں نے ڈھٹائی سے کہا: “ہمارے ہاں ڈسپلن سکھانے کا یہی طریقہ ہے!” آندھرا پردیش میں معصومیت پر وار: چتور کے ایک اسکول میں چھٹی جماعت کی ۱۱ سالہ بچی کلاس میں کسی سے بات کر رہی تھی۔ تیش میں آکر استاد نے اس کی طرف اسکول کا بھاری بستہ اٹھا کر پھینکا۔ بستے کے اندر موجود اسٹیل کا لنچ باکس بچی کے سر پر اتنی زور سے لگا کہ وہ وہیں چکرا کر گر گئی۔ بعد میں جب درد نہ رکا تو ہسپتال کے اسکین میں معلوم ہوا کہ اس معصوم بچی کے سر کی ہڈی (Skull) میں فریکچر آچکا ہے۔ کرناٹک کی بربریت: ایک اور دل سوز لہر اس وقت دوڑی جب ایک رہائشی اسکول (Residential School) کے استاد نے ۹ سال کے ایک چھوٹے سے بچے کو صرف اس لیے زمین پر گرا کر بے رحمی سے لاتوں اور تھپڑوں سے پیٹا کیونکہ اس نے ہاسٹل سے اپنے گھر فون کرنے کی “جسارت” کی تھی۔ وہ معصوم بچہ استاد کے پیروں میں گر کر روتے ہوئے معافیاں مانگ رہا تھا، لیکن اس جلاد کا دل نہیں پگھلا۔ یہ چند مثالیں تو وہ ہیں جو میڈیا کی نظر چڑھیں اور ایف آئی آر تک پہنچیں، ورنہ روزانہ ہزاروں معصوم روحیں ان چہار دیواریوں کے پیچھے سسکتی ہیں اور کسی کو خبر تک نہیں ہوتی۔ ہم ڈسپلن کے نام پر بچوں کو تہذیب نہیں سکھا رہے، بلکہ ان کے اندر کے انسان کو قتل کر رہے ہیں۔ یہ تو وہ جسمانی وحشت ہے جو نظر آ جاتی ہے، لیکن اب جو نئی ڈیجیٹل بربریت آئی ہے، اس نے روحوں کو ایسے زخم دیے ہیں جن کا کوئی ایکسرے نہیں ہو سکتا۔ ممبرا، کلیان اور بھیونڈی کے بعض انگریزی اسکولوں میں اب بچوں کے ہوم ورک کا ‘آن لائن ریکارڈ’ رکھا جاتا ہے۔ بچہ رات کو تھک کر سو گیا، ہوم ورک ادھورا رہ گیا۔ صبح کلاس واٹس ایپ گروپ میں، جہاں پچاس دیگر والدین موجود ہیں، بچے کا نام سرخ حروف میں ڈال دیا جاتا ہے جیسے وہ کوئی مجرم ہو۔ ستر سال پہلے اسکولوں میں سزا کے طور پر بچے کے گلے میں تختی لٹکائی جاتی تھی جس پر لکھا ہوتا تھا: ‘I am Donkey’۔ آج وہ تختی ڈیجیٹل ہو گئی ہے — اسکول ایپ پر ریڈ الرٹ، پیرنٹ پورٹل پر نام، ڈیش بورڈ پر رسوائی! ذریعہ بدل گیا، اساتذہ کی وحشیانہ ذہنیت نہیں بدلی۔ کیا یہ تعلیم ہے؟ یا کسی نازک، معصوم آئینے پر پتھر مار مار کر اسے چکنا چور کرنا اور پھر اس کے ملبے کو پالش کر کے کہنا کہ دیکھو ہم نے کتنا چمکدار شیشہ بنایا ہے؟ انگریزی کا بت اور والدین کا سجدہ ہماری قوم نے انگریزی زبان کے ساتھ جو رشتہ جوڑا ہے، وہ اب زبان کا رشتہ نہیں رہا، وہ اندھی پوجا بن چکا ہے۔ ایک ایسا بت

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محنت کرے انسان تو کیا ہو نہیں سکتا!

محنت کرے انسا ن تو کیا ہو نہیں سکتا! ڈاکٹر اسد اللہ خان آج کے دور میں اعلیٰ تعلیم حاصل کر لینے کے باوجود نوکری پا لینا گویا جوئے شیر لانے سے کم نہیں۔ آپ میں سینکڑوں صلاحیتیں ہوں، مگر اگر ایک بھی ‘کمی’ نظر آ جائے — کوئی جسمانی معذوری، کوئی کمزوری، کوئی ‘داغ’ — تو پورا چراغ نظر انداز کر دیا جاتا ہے۔ کام ناممکن نہیں ہوتا، مگر مشکل ضرور ہو جاتا ہے۔ مجھے ایک ایسے ہی ہونہار نوجوان کا قصہ یاد آتا ہے۔ ملک کے ایک ممتاز انجینئرنگ ادارے سے فارغ التحصیل، تعلیمی ریکارڈ اِس قدر شاندار کہ کاغذات دیکھتے ہی ایک بڑی کمپنی نے اُسے ہاتھوں ہاتھ لینے کا ارادہ کر لیا۔ مگر جب انٹرویو میں یہ کھلا کہ وہ نوجوان قوتِ سماعت کی ایک بیماری میں مبتلا ہے، تو وہی کمپنی — جو ابھی ابھی اُس کی ذہانت پر فریفتہ تھی — چپ چاپ قدم پیچھے کھینچ لائی۔ ڈگری، محنت اور قابلیت — سب ایک ‘طبی رپورٹ’ کے سامنے ہار گئے۔ مگر کہانی یہیں ختم نہیں ہوتی، اور نہ ہونی چاہیے۔ کیونکہ معذوری جسم کی ہوتی ہے، حوصلے کی نہیں۔ تاریخ گواہ ہے کہ جن لوگوں نے دنیا بدلی، اُن میں سے بیشتر نے ‘کمی’ کو ‘طاقت’ میں بدلا۔ آئیے آج ایسے ہی دس روشن چراغوں کی داستانیں سنتے ہیں — جن کی لَو آندھیوں میں بھی بجھی نہیں، بلکہ اور تیز ہوئی۔ عظمت اور ہمت کی روشن مثالیں انسان اگر سچے دل سے کچھ کرنے کا ارادہ کر لے تو جسمانی اعضاء کی محرومی اس کے خوابوں کے آڑے کبھی نہیں آ سکتی۔ تاریخ اور حال کے افق پر ایسے کئی درخشندہ ستارے چمک رہے ہیں جنہوں نے اپنی ہمت کے بلبوتے پر طوفانوں کا رخ موڑ دیا۔ شری کانت بولا (Srikanth Bolla): پیدائشی طور پر مکمل نابینا شری کانت بولا کو بچپن ہی سے انتہائی غربت اور سماجی تعصب کا سامنا کرنا پڑا۔ حد تو یہ ہوئی کہ جب انہوں نے دسویں جماعت کے بعد سائنس پڑھنے کی خواہش ظاہر کی، تو بھارتی نظامِ تعلیم نے ان کے نابینا ہونے کا بہانہ بنا کر صاف انکار کر دیا۔ انہوں نے اس ناانصافی کے آگے سر تسلیم خم کرنے کے بجائے عدالت کا دروازہ کھٹکھٹایا اور چھ ماہ کی طویل قانونی جدوجہد کے بعد کامیابی حاصل کی، جس کے بعد انہوں نے گیارہویں جماعت میں ۹۸ فیصد نمبر لے کر سب کو حیران کر دیا۔ جب ملک کے مایہ ناز ادارے آئی آئی ٹی (IIT) نے بھی انہیں داخلہ دینے سے انکار کیا، تو انہوں نے ہمت ہارنے کے بجائے امریکہ کی مشہور یونیورسٹی ایم آئی ٹی (MIT) کا رخ کیا اور وہاں داخلہ پانے والے پہلے بین الاقوامی نابینا طالب علم بن گئے۔ بھارت واپس آ کر انہوں نے ‘بولانٹ انڈسٹریز’ (Bollant Industries) قائم کی جو ماحول دوست مصنوعات بناتی ہے اور جہاں سیکڑوں معذور افراد کو روزگار فراہم کیا گیا ہے۔ آج شری کانت کروڑوں روپے کی کمپنی کے مالک اور دنیا بھر کے نوجوانوں کے لیے ایک عالمی رول ماڈل ہیں۔ سدھا چندرن (Sudha Chandran): محض ۱۶ سال کی عمر میں ایک خوفناک سڑک حادثے اور ڈاکٹروں کی مجرمانہ غفلت کی وجہ سے سدھا چندرن کی دائیں ٹانگ کاٹنی پڑی۔ ایک کلاسیکل رقاصہ کے لیے یہ مصیبت کسی موت سے کم نہ تھی کیونکہ ان کا پورا کیریئر پاؤں کی تھرکنے سے وابستہ تھا۔ مگر سدھا نے بیساکھیوں کے سہارے جینے کو ٹھکرا دیا اور ‘جائپور فٹ’ (مصنوعی ٹانگ) لگوا کر انتہائی شدید تکلیف کے باوجود دوبارہ رقص سیکھنا شروع کیا۔ مشق کے دوران اکثر ان کے زخموں سے خون بہہ نکلتا تھا، مگر ان کا عزم متزلزل نہ ہوا۔ انہوں نے مصنوعی ٹانگ کے ساتھ اسٹیج پر واپسی کی اور ایسا شاندار رقص پیش کیا کہ پوری دنیا دنگ رہ گئی۔ آج وہ نہ صرف ایک عالمی شہرت یافتہ رقاصہ ہیں بلکہ بھارتی فلم و ٹیلی ویژن کی ایک مانی ہوئی اور کامیاب اداکارہ بھی بن چکی ہیں۔ ایرا سنگھل (Ira Singhal): ریڑھ کی ہڈی کی ایک نایاب بیماری ‘اسکولیوسس’ (Scoliosis) کی وجہ سے ایرا سنگھل کے دونوں بازوؤں کی حرکت انتہائی محدود تھی۔ انہوں نے اپنی اس کمزوری کو پڑھائی کے آڑے نہیں آنے دیا اور ۲۰۱۰ میں ملک کا سب سے مشکل امتحان یو پی ایس سی (UPSC) پاس کیا، مگر انتطامیہ نے ان کی جسمانی حالت کا بہانہ بنا کر انہیں سرکاری ملازمت دینے سے انکار کر دیا۔ ایرا نے اس امتیازی سلوک کو چپ چاپ قبول کرنے کے بجائے سینٹرل ایڈمنسٹریٹو ٹریبونل (CAT) میں کیس دائر کیا اور چار سال تک ایک صبر آزما قانونی جنگ لڑ کر اپنا حق جیتا۔ انہوں نے ۲۰۱۴ میں دوبارہ امتحان دیا اور اس بار نہ صرف کامیاب ہوئیں بلکہ پورے ملک میں پہلی پوزیشن (Rank 1) حاصل کر کے جنرل کیٹیگری میں ٹاپ کیا۔ آج وہ ایک بہترین اور نڈر سول سروسز آفیسر کے طور پر ملک کی خدمت کر رہی ہیں۔ ارونیما سنہا (Arunima Sinha): قومی سطح کی والی بال کھلاڑی ارونیما سنہا کی زندگی میں ۲۰۱۱ میں اس وقت اندھیرا چھا گیا جب کچھ چوروں نے انہیں چلتی ٹرین سے نیچے پھینک دیا، جس کے باعث ان کی ایک ٹانگ کاٹنی پڑی۔ ہسپتال کے بستر پر جہاں لوگ ان پر ترس کھا رہے تھے اور انہیں ‘بے چاری’ سمجھ رہے تھے، انہوں نے وہیں لیٹے لیٹے دنیا کی بلند ترین چوٹی سر کرنے کا ناقابل یقین فیصلہ کیا۔ ہسپتال سے ڈسچارج ہوتے ہی انہوں نے پہلی بھارتی خاتون ایورسٹ فاتح بچیندری پال سے سخت ٹریننگ شروع کی۔ سرپھرے عزم کی بدولت ۲۰۱۳ میں وہ مصنوعی ٹانگ کے ساتھ ماؤنٹ ایورسٹ سر کرنے والی دنیا کی پہلی معذور خاتون بنیں اور اس کے بعد انہوں نے دنیا کے تمام ۷ براعظموں کی بلند ترین چوٹیوں پر کامیابی سے اپنے ملک کا ترنگا لہرایا۔ تاریخ کے مزید روشن ستارے نک وجیسک (Nick Vujicic): آسٹریلیا میں ۱۹۸۲ میں پیدا ہونے والے نک وجیسک کی جسمانی حالت دیکھ کر لوگ کانپ اٹھتے تھے کیونکہ وہ بغیر بازوؤں اور ٹانگوں کے پیدا ہوئے تھے۔ بچپن میں ہم جماعتوں کی ایذا رسانی اور شدید ذہنی اذیت سے تنگ آ کر محض ۱۰ سال کی عمر میں انہوں نے خودکشی کی کوشش کی

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ज़मीन की आह और इन्सान की बे-ख़बरी

ज़मीन की आह और इन्सान की बे-ख़बरी क़ुदरत की तम्बीह, क़ुरआन की रहनुमाई और इन्सानियत के लिए एक सबक़ डॉक्टर असद उल्लाह ख़ान बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम ﴿إِنَّ فِي خَلْقِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَاختِلَافِ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ لآيَاتٍ لِّأُولِي الْأَلْبَابِ﴾ “बेशक आसमानों और ज़मीन की तख़्लीक़, और रात दिन के बदलते रहने में अक़्ल वालों के लिए बहुत सी निशानियाँ हैं।” (सूरत आल-ए-इम्रान: 190) ﴿ظَهَرَ الْفَسَادُ فِي الْبَرِّ وَالْبَحْرِ بِمَا كَسَبَتْ أَيْدِي النَّاسِ لِيُذِيقَهُم بَعْضَ الَّذِي عَمِلُوا لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ﴾ “ख़ुश्की और समन्दर में फ़साद ज़ाहिर हो गया, उस सबब से जो लोगों के हाथों ने कमाया, ताकि अल्लाह उन्हें उनके बाअज़ आमाल का मज़ा चखाए, शायद वो बाज़ आ जाएँ।” (सूरत अर्-रूम: 41) बे-बस इन्सान और आफ़ाक़ी सच्चाई दुनिया रोज़ाना जागती है, लेकिन हर सुबह एक जैसी नहीं होती। बाअज़ सुबहें सूरज की रोशनी के साथ उम्मीद लेकर आती हैं, और बाअज़ सुबहें ज़मीन की लर्ज़िश के साथ इन्सान को उसकी असल हैसियत याद दिला जाती हैं। कहीं ज़िलज़ला आता है, कहीं सैलाब बस्तियों को निगल जाता है, कहीं आसमान आग बरसाता है, कहीं समन्दर अपनी हुदूद तोड़ देता है, और कहीं एक मामूली सा वायरस पूरी दुनिया की ताक़त, मआशियत और टेक्नॉलॉजी को घुटनों के बल ला खड़ा करता है। इन वाक़िआत को अगर सिर्फ़ “क़ुदरती आफ़ात” कह कर अख़बार के एक सफ़हे तक महदूद कर दिया जाए तो शायद हम बहुत बड़ी हक़ीक़त से आँखें चुरा रहे हैं। मोमिन के लिए ये सिर्फ़ ख़बरें नहीं होतीं, बल्कि अल्लाह तआला की निशानियाँ होती हैं। क़ुरआन उन्हें “आयात” कहता है; ऐसी निशानियाँ जो इन्सान को उसके रब, उसकी कमज़ोरी, उसकी ज़िम्मेदारी और उसके अन्जाम की याद दिलाती हैं। आज का इन्सान चाँद पर बस्तियाँ बसाने के ख़्वाब देख रहा है, मसनूई ज़हानत को अपनी अक़्ल का जानशीन समझने लगा है, और चंद सेकेंड में दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक पैग़ाम पहुँचाने पर फ़ख़्र करता है। उसने फ़लकबोस इमारतें खड़ी कर लीं, समन्दर की तहों में उतर गया, पहाड़ों को चीर कर शाहराहें बना दीं, मगर वो अब भी एक ऐसे मामूली से ज़िलज़ले के सामने बे-बस है जो चंद लम्हों में उसकी बरसों की मेहनत, दौलत, मन्सूबे और ग़ुरूर को मिट्टी में मिला देता है। यही इन्सानी हक़ीक़त है जिसे क़ुरआन ने चौदह सौ साल पहले बयान कर दिया था। ﴿وَمَا قَدَرُوا اللَّهَ حَقَّ قَدْرِهِ وَالْأَرْضُ جَمِيعًا قَبْضَتُهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ﴾ “उन्होंने अल्लाह की क़द्र वैसी न पहचानी जैसी पहचानने का हक़ था, हालाँकि क़ियामत के दिन पूरी ज़मीन उसकी मुट्ठी में होगी।” (सूरत अज़्-ज़ुमर: 67) दुनिया की तारीख़ गवाह है कि तहज़ीबें सिर्फ़ जंगों से नहीं मिटीं, बाअज़ औक़ात एक झटके ने पूरी सल्तनतों को क़िस्सा-ए-पारीना बना दिया। क़ौम-ए-आद अपनी ताक़त पर नाज़ करती थी, क़ौम-ए-समूद अपने पहाड़ तराश कर महलात बनाने पर फ़ख़्र करती थी, फ़िरऔन अपने इक़्तिदार को दाइमी समझता था, क़ारून अपनी दौलत पर अकड़ता था, मगर क़ुदरत ने सब को एक लम्हे में तारीख़ का सबक़ बना दिया। यही वजह है कि क़ुरआन बार बार इन्सान से सवाल करता है कि क्या तुमने अपने से पहले लोगों का अन्जाम नहीं देखा? ﴿أفَلَمْ يَسِيرُوا فِي الْأَرْضِ فَيَنظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ﴾ “क्या वो ज़मीन में चलते फिरे नहीं कि देखते उन लोगों का अन्जाम क्या हुआ जो उनसे पहले गुज़र चुके थे?” (सूरत यूसुफ़: 109) ये सवाल सिर्फ़ तारीख़ पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि अपनी इस्लाह के लिए है। सानिहात, अख़लाक़ी हिस और दिल का ज़िलज़ला गुज़िश्ता दिनों दुनिया के एक ख़ित्ते में आने वाले शदीद ज़िलज़ले ने एक मरतबा फिर यही सबक़ दोहराया। चंद लम्हों में मज़बूत इमारतें मलबे में तब्दील हो गईं, हज़ारों ख़ानदान बे-घर हो गए, बच्चे अपने वालिदैन से बिछड़ गए, वालिदैन अपनी औलाद को ढूँढते रह गए, और वो लोग जो चंद मिनट पहले मामूल की ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे, अचानक मौत और ज़िन्दगी के दरमियान खड़े हो गए। ऐसे मनाज़िर हर हस्सास इन्सान की आँख नम कर देते हैं, लेकिन सवाल ये है कि क्या ये मनाज़िर हमारे दिल भी बदलते हैं? अफ़सोस ये है कि हमारा मुआशरा अब सानिहात को भी एक “वायरल वीडियो” की तरह देखने लगा है। चंद लम्हे अफ़सोस, चंद दुआएँ, चंद तबसिरे, और फिर अगली ख़बर; गोया इन्सानी जान की हुरमत भी ख़बरों की रफ़्तार के साथ कम होती जा रही है। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: «ارْحَمُوا مَنْ فِي الْأَرْضِ يَرْحَمْكُمْ مَنْ فِي السَّمَاءِ» “ज़मीन वालों पर रहम करो, आसमान वाला तुम पर रहम फ़रमाएगा।” (जामे अत्-तिर्मिज़ी, हदीस: 1924) इस्लाम ने हमें सिर्फ़ इबादत-गुज़ार नहीं बनाया बल्कि दर्द-ए-दिल रखने वाला इन्सान बनाया है। मोमिन वो है जो दूसरों के दुख को अपना दुख समझे, जो मुसीबत-ज़दा की मदद करे, जो भूखे को खाना खिलाए, यतीम के सर पर हाथ रखे, बे-घर के लिए पनाह बने और मुसीबत के वक़्त इन्सानियत का सहारा बने। रसूल-ए-अकरम ﷺ ने फ़रमाया: «مَثَلُ الْمُؤْمِنِينَ فِي تَوَادِّهِمْ وَتَرَاحُمِهِمْ وَتَعَاطُفِهِمْ كَمَثَلِ الْجَسَدِ الْوَاحِدِ» “मोमिन आपस की मुहब्बत, रहमत और हमदर्दी में एक जिस्म की मानिन्द हैं, जिसके एक उज़्व को तकलीफ़ हो तो पूरा जिस्म बे-चैन हो जाता है।” (सहीह बुख़ारी, हदीस: 6011; सहीह मुस्लिम, हदीस: 2586) यही वो मेयार है जिस पर हमें अपने ईमान को परखना चाहिए। अगर दुनिया के किसी कोने में आने वाली आफ़त हमारे दिल को न हिलाए, अगर किसी माँ की आह हमारे ज़मीर को न जगाए, अगर किसी यतीम बच्चे के आँसू हमें बे-चैन न करें, तो हमें अपने ईमान की कैफ़ियत पर ज़रूर ग़ौर करना चाहिए। क़ुदरत की हर तम्बीह हमें दो सवालों के सामने ला खड़ा करती है: पहला सवाल ये कि अगर आज ये आज़माइश उन पर आई है तो क्या यक़ीन है कि कल हमारे दरवाज़े पर दस्तक नहीं देगी? और दूसरा, इससे भी ज़्यादा अहम सवाल, अगर आज हमारी ज़िन्दगी का ज़िलज़ला आ जाए, अगर मौत अचानक हमारे दरवाज़े पर आ खड़ी हो, तो क्या हम अपने रब से मुलाक़ात के लिए तैयार हैं? ये सवाल किसी जुग़राफ़िए, किसी क़ौम, किसी मज़हब या किसी ज़बान का नहीं; ये हर इन्सान का सवाल है। इसी लिए क़ुरआन एलान करता है: ﴿كُلُّ نَفْسٍ ذَائِقَةُ الْمَوْتِ وَنَبْلُوكُم بِالشَّرِّ وَالْخَيْرِ فِتْنَةً وَإِلَيْنَا تُرْجَعُونَ﴾ “हर जान ने मौत का मज़ा चखना है, और हम तुम्हें अच्छाई और बुराई दोनों से आज़माते हैं, फिर तुम हमारी

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زمین کی آہ اور انسان کی بے خبری

زمین کی آہ اور انسان کی بے خبری قدرت کی تنبیہ، قرآن کی رہنمائی اور انسانیت کے لیے ایک سبق ڈاکٹر اسد اللہ خان بسم اللہ الرحمٰن الرحیم ﴿إِنَّ فِي خَلْقِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَاختِلَافِ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ لآيَاتٍ لِّأُولِي الْأَلْبَابِ﴾ “بے شک آسمانوں اور زمین کی تخلیق، اور رات دن کے بدلتے رہنے میں عقل والوں کے لیے بہت سی نشانیاں ہیں۔” (سورۃ آل عمران: 190) ﴿ظَهَرَ الْفَسَادُ فِي الْبَرِّ وَالْبَحْرِ بِمَا كَسَبَتْ أَيْدِي النَّاسِ لِيُذِيقَهُم بَعْضَ الَّذِي عَمِلُوا لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ﴾ “خشکی اور سمندر میں فساد ظاہر ہو گیا، اس سبب سے جو لوگوں کے ہاتھوں نے کمایا، تاکہ اللہ انہیں ان کے بعض اعمال کا مزہ چکھائے، شاید وہ باز آ جائیں۔” (سورۃ الروم: 41) بے بس انسان اور آفاقی سچائی دنیا روزانہ جاگتی ہے، لیکن ہر صبح ایک جیسی نہیں ہوتی۔ بعض صبحیں سورج کی روشنی کے ساتھ امید لے کر آتی ہیں، اور بعض صبحیں زمین کی لرزش کے ساتھ انسان کو اس کی اصل حیثیت یاد دلا جاتی ہیں۔ کہیں زلزلہ آتا ہے، کہیں سیلاب بستیوں کو نگل جاتا ہے، کہیں آسمان آگ برساتا ہے، کہیں سمندر اپنی حدود توڑ دیتا ہے، اور کہیں ایک معمولی سا وائرس پوری دنیا کی طاقت، معیشت اور ٹیکنالوجی کو گھٹنوں کے بل لا کھڑا کرتا ہے۔ ان واقعات کو اگر صرف “قدرتی آفات” کہہ کر اخبار کے ایک صفحے تک محدود کر دیا جائے تو شاید ہم بہت بڑی حقیقت سے آنکھیں چرا رہے ہیں۔ مومن کے لیے یہ صرف خبریں نہیں ہوتییں، بلکہ اللہ تعالیٰ کی نشانیاں ہوتی ہیں۔ قرآن انہیں “آیات” کہتا ہے؛ ایسی نشانیاں جو انسان کو اس کے رب، اس کی کمزوری، اس کی ذمہ داری اور اس کے انجام کی یاد دلاتی ہیں۔ آج کا انسان چاند پر بستیاں بسانے کے خواب دیکھ رہا ہے، مصنوعی ذہانت کو اپنی عقل کا جانشین سمجھنے لگا ہے، اور چند سیکنڈ میں دنیا کے ایک کونے سے دوسرے کونے تک پیغام پہنچانے پر فخر کرتا ہے۔ اس نے فلک بوس عمارتیں کھڑی کر لیں، سمندر کی تہوں میں اتر گیا، پہاڑوں کو چیر کر شاہراہیں بنا دیں، مگر وہ اب بھی ایک ایسے معمولی سے زلزلے کے سامنے بے بس ہے جو چند لمحوں میں اس کی برسوں کی محنت، دولت، منصوبے اور غرور کو مٹی میں ملا دیتا ہے۔ یہی انسانی حقیقت ہے جسے قرآن نے چودہ سو سال پہلے بیان کر دیا تھا۔ ﴿وَمَا قَدَرُوا اللَّهَ حَقَّ قَدْرِهِ وَالْأَرْضُ جَمِيعًا قَبْضَتُهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ﴾ “انہوں نے اللہ کی قدر ویسی نہ پہچانی جیسی پہچاننے کا حق تھا، حالانکہ قیامت کے دن پوری زمین اس کی مٹھی میں ہوگی۔” (سورۃ الزمر: 67) دنیا کی تاریخ گواہ ہے کہ تہذیبیں صرف جنگوں سے نہیں مٹیں، بعض اوقات ایک جھٹکے نے پوری سلطنتوں کو قصۂ پارینہ بنا دیا۔ قومِ عاد اپنی طاقت پر ناز کرتی تھی، قومِ ثمود اپنے پہاڑ تراش کر محلات بنانے پر فخر کرتی تھی، فرعون اپنے اقتدار کو دائمی سمجھتا تھا، قارون اپنی دولت پر اکڑتا تھا، مگر قدرت نے سب کو ایک لمحے میں تاریخ کا سبق بنا دیا۔ یہی وجہ ہے کہ قرآن بار بار انسان سے سوال کرتا ہے کہ کیا تم نے اپنے سے پہلے لوگوں کا انجام نہیں دیکھا؟ ﴿أفَلَمْ يَسِيرُوا فِي الْأَرْضِ فَيَنظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ﴾ “کیا وہ زمین میں چلتے پھرے نہیں کہ دیکھتے ان لوگوں کا انجام کیا ہوا جو ان سے پہلے گزر چکے تھے؟” (سورۃ یوسف: 109) یہ سوال صرف تاریخ پڑھنے کے لیے نہیں، بلکہ اپنی اصلاح کے لیے ہے۔ سانحات، اخلاقی حس اور دل کا زلزلہ گزشتہ دنوں دنیا کے ایک خطے میں آنے والے شدید زلزلے نے ایک مرتبہ پھر یہی سبق دہرایا۔ چند لمحوں میں مضبوط عمارتیں ملبے میں تبدیل ہو گئیں، ہزاروں خاندان بے گھر ہو گئے، بچے اپنے والدین سے بچھڑ گئے، والدین اپنی اولاد کو ڈھونڈتے رہ گئے، اور وہ لوگ جو چند منٹ پہلے معمول کی زندگی گزار رہے تھے، اچانک موت اور زندگی کے درمیان کھڑے ہو گئے۔ ایسے مناظر ہر حساس انسان کی آنکھ نم کر دیتے ہیں، لیکن سوال یہ ہے کہ کیا یہ مناظر ہمارے دل بھی بدلتے ہیں؟ افسوس یہ ہے کہ ہمارا معاشرہ اب سانحات کو بھی ایک “وائرل ویڈیو” کی طرح دیکھنے لگا ہے۔ چند لمحے افسوس، چند دعائیں، چند تبصرے، اور پھر اگلی خبر؛ گویا انسانی جان کی حرمت بھی خبروں کی رفتار کے ساتھ کم ہوتی جا رہی ہے۔ رسول اللہ ﷺ نے فرمایا: «ارْحَمُوا مَنْ فِي الْأَرْضِ يَرْحَمْكُمْ مَنْ فِي السَّمَاءِ» “زمین والوں پر رحم کرو، آسمان والا تم پر رحم فرمائے گا۔” (جامع الترمذی، حدیث: 1924) اسلام نے ہمیں صرف عبادت گزار نہیں بنایا بلکہ دردِ دل رکھنے والا انسان بنایا ہے۔ مومن وہ ہے جو دوسروں کے دکھ کو اپنا دکھ سمجھے، جو مصیبت زدہ کی مدد کرے، جو بھوکے کو کھانا کھلائے، یتیم کے سر پر ہاتھ رکھے، بے گھر کے لیے پناہ بنے اور مصیبت کے وقت انسانیت کا سہارا بنے۔ رسول اکرم ﷺ نے فرمایا: «مَثَلُ الْمُؤْمِنِينَ فِي تَوَادِّهِمْ وَتَرَاحُمِهِمْ وَتَعَاطُفِهِمْ كَمَثَلِ الْجَسَدِ الْوَاحِدِ» “مومن آپس کی محبت، رحمت اور ہمدردی میں ایک جسم کی مانند ہیں، جس کے ایک عضو کو تکلیف ہو تو پورا جسم بے چین ہو جاتا ہے۔” (صحیح بخاری، حدیث: 6011؛ صحیح مسلم، حدیث: 2586) یہی وہ معیار ہے جس پر ہمیں اپنے ایمان کو پرکھنا چاہیے۔ اگر دنیا کے کسی کونے میں آنے والی آفت ہمارے دل کو نہ ہلائے، اگر کسی ماں کی آہ ہمارے ضمیر کو نہ جگائے، اگر کسی یتیم بچے کے آنسو ہمیں بے چین نہ کریں، تو ہمیں اپنے ایمان کی کیفیت پر ضرور غور کرنا چاہیے۔ قدرت کی ہر تنبیہ ہمیں دو سوالوں کے سامنے لا کھڑا کرتی ہے: پہلا سوال یہ کہ اگر آج یہ آزمائش ان پر آئی ہے تو کیا یقین ہے کہ کل ہمارے دروازے پر دستک نہیں دے گی؟ اور دوسرا، اس سے بھی زیادہ اہم سوال، اگر آج ہماری زندگی کا زلزلہ آ جائے، اگر موت اچانک ہمارے دروازے پر آ کھڑی ہو، تو کیا ہم اپنے رب سے ملاقات کے لیے تیار ہیں؟ یہ سوال کسی جغرافیے، کسی قوم، کسی مذہب یا کسی زبان کا نہیں؛ یہ ہر انسان کا

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جب معمارِ قوم کا خواب سرِ بازار نیلام ہوا!

(مہاراشٹرا ٹی ای ٹی امتحان: امتحانی نظام کی ارتھی پر ایک ادبی نوحہ) ڈاکٹر اسد اللہ خان تاریخ کے صفحات جب بھی کسی قوم کی تنزلی کی داستان رقم کرتے ہیں، تو سب سے پہلی ضرب اس کے نظامِ تعلیم پر لگاتے ہیں۔ یہ ایک انتہائی نازک اور دردناک خبر ہے۔ ایک ایسے معاشرے کے لیے جہاں استاد کو “معمارِ قوم” مانا جاتا ہے، وہاں استاد بننے کے امتحان (TET) کی حرمت کا سرِ بازار نیلام ہو جانا کسی المیے سے کم نہیں۔ آج ریاستِ مہاراشٹرا کے ضلع تھانے سے آنے والی خبر محض ایک امتحان کی منسوخی کی اطلاع نہیں ہے، بلکہ یہ اس دھرتی کے لاکھوں ہونہار، محنتی اور بے گناہ نوجوانوں کے خوابوں کا قتلِ عام ہے۔ یہ استاد کی عظمت، علم کی حرمت اور عدل و انصاف کے جنازے کی وہ شہ سرخیاں ہیں، جنہیں دیکھ کر قلم خون کے آنسو روتا ہے اور زبان گنگ رہ جاتی ہے۔ علم کی منڈی اور ضمیر کے سوداگر کتنی ستم ظریفی ہے کہ جس امتحان کا مقصد معاشرے کو “صالح اور ایماندار معمار” فراہم کرنا تھا، اسی امتحان کا پرچہ امتحانی مراکز تک پہنچنے سے پہلے ہی چند ٹکوں کے عوض ضمیر کے سوداگروں کی تجوریوں کی زینت بن گیا۔ پولیس کا تھانے میں چھاپہ مارنا، سوالیہ پرچوں کا ضبط ہونا اور چند کالی بھیڑوں کا حراست میں لیا جانا—یہ اس گلے سڑے نظام کی وہ بدبو ہے جو اب پورے معاشرے کا دم گھونٹ رہی ہے۔ تعلیم جو روشنی کا مینار تھی، آج اسے ہوس اور بدعنوانی کے اندھیروں نے اپنی لپیٹ میں لے لیا ہے۔ جب رہزن ہی پاسبان بن جائیں، تو قافلے کا لٹ جانا حیرت انگیز نہیں رہتا۔ ان امتحانی پرچوں کو بیچنے والوں نے صرف کاغذ کے چند ٹکڑے نہیں بیچے، انہوں نے اس ٹیچر طالب علم کی راتوں کی نیندیں بیچی ہیں جو مٹی کے تیل کے دیے کی مدہم روشنی میں کتابیں چاٹ رہا تھا۔ انہوں نے اس بوڑھے باپ کی پونجی بیچی ہے جس نے اپنے بچے کو ‘شکشک’ (استاد) بنانے کے لیے اپنی کمر سیدھی نہیں ہونے دی۔ امتحانی نظام کا تاریک ماضیِ:تھانے کا یہ حالیہ واقعہ کوئی پہلی لغزش نہیں ہے، بلکہ یہ اس طویل اور گہرے کینسر کی ایک نئی علامت ہے جو مہاراشٹرا اسٹیٹ کونسل آف ایگزامینیشنز (MSCE) کو اندر سے کھوکھلا کر چکا ہے۔ اگر ہم ماضی کے اوراق الٹیں، تو TET امتحانات کی تاریخ بدعنوانی اور گھوٹالوں کی سیاہی سے لت پت نظر آتی ہے۔تھانے کا یہ حالیہ سانحہ کوئی اچانک پیش آنے والا واقعہ نہیں ہے، بلکہ یہ اس گہرے کینسر کی ایک ہولناک کڑی ہے جو مہاراشٹرا اسٹیٹ کونسل آف ایگزامینیشنز کی رگوں میں برسوں سے سرایت کیے ہوئے ہے۔ مہاراشٹرا کا امتحانی نظام خصوصاً اس وقت رہنِ ستم ہوا جب پونے سائبر پولیس نے ماضی کے امتحانات میں ہونے والی ایسی سنسنی خیز دھاندلیوں کا پردہ فاش کیا جس نے پورے تعلیمی ڈھانچے کو ہلا کر رکھ دیا۔ یہ انکشافات محض سرسری بے ضابطگیاں نہیں تھیں، بلکہ میرٹ کے مقتل میں قابلیت کا باقاعدہ اور منظم قتلِ عام تھا، جہاں عہدیداروں اور دلالوں کے گٹھ جوڑ نے ہر بار کامیابی کے نئے طریقے ایجاد کیے۔ اس گھوٹالے کی جڑیں اتنی گہری تھیں کہ امتحانی بورڈ کے اعلیٰ عہدیدار ہی رشوت خوری کے بازار میں سب سے بڑے خریدار نکلے۔ اس منظم لوٹ مار کا ایک بدترین باب سال 2018 کے ٹی ای ٹی امتحان میں رقم کیا گیا۔ اس دوران ضمیر کے سوداگروں نے چوری چھپے امتحانی نظام کے دل یعنی او ایم آر (OMR) شیٹس کے ساتھ مجرمانہ ہیر پھیر کی۔ وہ امیدوار جو قابلیت کی دوڑ میں بری طرح ناکام (فیل) ہو چکے تھے، راتوں رات ان کے کھوٹے سکوں کو کھرے نوٹوں کے عوض کامیابی کے تمغوں میں بدل دیا گیا۔ جب پولیس نے اس گھناونے کھیل کی تہیں اکھاڑیں، تو قانون کی آنکھیں بھی کھلی کی کھلی رہ گئیں؛ تحقیقات کے بعد 1,663 ایسے فرضی امیدواروں کا بھیانک چہرہ بے نقاب ہوا جنہوں نے رشوت کے بلبوتے پر کامیابی کی سند خریدی تھی، جس کے بعد ان پر تاحیات امتحانی پابندی عائد کر دی گئی۔ ابھی اس زخم کی سیاہی چھٹی بھی نہ تھی کہ سال 2019 کا ٹی ای ٹی امتحان اس تعلیمی تاریخ کا سب سے بڑا اور ہولناک دھچکا ثابت ہوا۔ اس بار سازش کاروں نے دستی ہیر پھیر کے بجائے براہِ راست ڈیجیٹل نظام پر شب خون مارا اور کمپیوٹرائزڈ رزلٹ ڈیٹا بیس کے اندر گھس کر نمبروں کے ہندسے بدل دیے۔ یہ بدعنوانی کا وہ طوفان تھا جس نے قابلیت کی ہر دیوار کو منہدم کر دیا۔ اس سازش کے نتیجے میں 7,880 نااہل امیدواروں کو غیر قانونی طور پر ‘کامیاب’ قرار دے کر اسناد بانٹ دی گئیں، جنہیں بعد میں سنگین تحقیقات کے بعد منسوخ کرنا پڑا۔ اس پورے ریکیٹ کا سب سے لرزہ خیز اور حیرت انگیز پہلو وہ گرفتاریاں تھیں جنہوں نے یہ ثابت کر دیا کہ باڑھ ہی کھیت کو کھا رہی ہے۔ جب قانون کا شکنجہ کسا، تو اس نظام کے سب سے بڑے پاسبان ہی رہزن نکلے۔ امتحانی بورڈ کے سابق کمشنر سکھدیو ڈیرے، پونے کے اسسٹنٹ کمشنر، اور امتحانات کا انتظام سنبھالنے والی ‘جی اے سافٹ ویئر کمپنی’ کے اعلیٰ ڈائریکٹرز ایک ایک کر کے سلاخوں کے پیچھے پہنچ گئے۔ ان مقتدر کرسیوں پر بیٹھے لوگوں کی گرفتاری نے یہ مہرِ تصدیق ثبت کر دی کہ امتحانی نظام پر سے اب طلبہ کا اعتماد سو فیصد اٹھ چکا ہے، اور جس محکمے کو قوم کا مستقبل سنوارنا تھا، اس کی اپنی ساکھ اب تاریخ کے سب سے گہرے ملبے کے نیچے دفن ہو چکی ہے۔ ان پچھلے گھوٹالوں کے دوران لگ بھگ 9,500 سے زائد ایسے اساتذہ کی فہرست جاری کی گئی تھی جنہوں نے لاکھوں روپے کی رشوت دے کر فرضی اسناد حاصل کیں اور ریاست کے اسکولوں میں نوکریاں حاصل کر لیں۔ یہ اعداد و شمار گواہ ہیں کہ جب امتحانی نظام کے چوکیدار ہی چور بن جائیں، تو قابلیت اور میرٹ کی موت یقینی ہو جاتی ہے۔ ذرا تصور کیجیے طلبہ کی مایوسی کے اس منظر کا!مہینوں کی ریاضت، دن رات کی بیداری، کتابوں سے عشق اور آنکھوں میں ایک روشن

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जब मेमार-ए-क़ौम का ख़्वाब सर-ए-बाज़ार नीलाम हुआ!

(महाराष्ट्र टी ई टी इम्तिहान: इम्तिहानी निज़ाम की अर्थी पर एक अदबी नौहा) डॉ. असदुल्लाह ख़ान तारीख़ के सफ़्हात जब भी किसी क़ौम की तनज़्ज़ुली की दास्तान रक़म करते हैं, तो सबसे पहली ज़र्ब उसके निज़ाम-ए-तालीम पर लगाते हैं। यह एक इंतिहाई नाज़ुक और दर्दनाक ख़बर है। एक ऐसे मुआशरे के लिए जहाँ उस्ताद को “मेमार-ए-क़ौम” माना जाता है, वहाँ उस्ताद बनने के इम्तिहान (TET) की हुरमत का सर-ए-बाज़ार नीलाम हो जाना किसी आलमिये से कम नहीं। आज रियासत-ए-महाराष्ट्र के ज़िला ठाणे से आने वाली ख़बर महज़ एक इम्तिहान की मंसूखी की इत्तिला नहीं है, बल्कि यह इस धरती के लाखों होनहार, मेहनती और बेगुनाह नौजवानों के ख़्वाबों का क़त्ल-ए-आम है। यह उस्ताद की अज़मत, इल्म की हुरमत और अद्ल-ओ-इंसाफ़ के जनाज़े की वह सुर्ख़ियाँ हैं, जिन्हें देखकर क़लम ख़ून के आँसू रोता है और ज़बान गूंगी रह जाती है। इल्म की मंडी और ज़मीर के सौदागर कितनी सितम-ज़रीफ़ी है कि जिस इम्तिहान का मक़सद मुआशरे को “सालिह और ईमानदार मेमार” फ़राहम करना था, उसी इम्तिहान का परचा इम्तिहानी मराकिज़ तक पहुँचने से पहले ही चंद टकों के एवज़ ज़मीर के सौदागरों की तिजोरियों की ज़ीनत बन गया। पुलिस का ठाणे में छापा मारना, सवालिया परचों का ज़ब्त होना और चंद काली भेड़ों का हिरासत में लिया जाना—यह उस गले-सड़े निज़ाम की वह बदबू है जो अब पूरे मुआशरे का दम घोंट रही है। तालीम जो रौशनी का मीनार थी, आज उसे हवस और बदउनवानी के अंधेरों ने अपनी लपेट में ले लिया है। जब रहज़न ही पासबान बन जाएँ, तो क़ाफ़िले का लुट जाना हैरत-अंगेज़ नहीं रहता। इन इम्तिहानी परचों को बेचने वालों ने सिर्फ़ काग़ज़ के चंद टुकड़े नहीं बेचे, उन्होंने उस टीचर तालिब-ए-इल्म की रातों की नींदें बेची हैं जो मिट्टी के तेल के दीए की मदहम रौशनी में किताबें चाट रहा था। उन्होंने उस बूढ़े बाप की पूँजी बेची है जिसने अपने बच्चे को ‘शिक्षक’ (उस्ताद) बनाने के लिए अपनी कमर सीधी नहीं होने दी। इम्तिहानी निज़ाम का तारीखी सिलसिला-ए-घोटाले यह पहली बार नहीं हुआ! ठाणे का यह हालिया वाक़िआ कोई पहली लग़्ज़िश नहीं है, बल्कि यह उस तवील और गहरे कैंसर की एक नई अलामत है जो महाराष्ट्र स्टेट काउंसिल ऑफ़ एग्ज़ामिनेशन्स (MSCE) को अंदर से खोखला कर चुका है। अगर हम माज़ी के औराक़ उलटें, तो TET इम्तिहानों की तारीख़ बदउनवानी और घोटालों की सियाही से लथपथ नज़र आती है। ठाणे का यह हालिया सानिहा कोई अचानक पेश आने वाला वाक़िआ नहीं है, बल्कि यह उस गहरे कैंसर की एक हौलनाक कड़ी है जो महाराष्ट्र स्टेट काउंसिल ऑफ़ एग्ज़ामिनेशन्स की रगों में बरसों से सरायत किए हुए है। महाराष्ट्र का इम्तिहानी निज़ाम ख़ुसूसन उस वक़्त रहन-ए-सितम हुआ जब पुणे साइबर पुलिस ने माज़ी के इम्तिहानों में होने वाली ऐसी सनसनीख़ेज़ धांधलियों का पर्दा फ़ाश किया जिसने पूरे तालीमी ढाँचे को हिला कर रख दिया। यह इन्किशाफ़ात महज़ सरसरी बे-ज़ाब्तगियाँ नहीं थीं, बल्कि मेरिट के मक़्तल में क़ाबिलियत का बाक़ायदा और मुनज़्ज़म क़त्ल-ए-आम था, जहाँ ओहदेदारों और दलालों के गठजोड़ ने हर बार कामयाबी के नए तरीक़े ईजाद किए। इस घोटाले की जड़ें इतनी गहरी थीं कि इम्तिहानी बोर्ड के आला ओहदेदार ही रिश्वतख़ोरी के बाज़ार में सबसे बड़े ख़रीदार निकले। इस मुनज़्ज़म लूट-मार का एक बदतरीन बाब साल 2018 के टी ई टी इम्तिहान में रक़म किया गया। इस दौरान ज़मीर के सौदागरों ने चोरी-छिपे इम्तिहानी निज़ाम के दिल यानी ओ एम आर (OMR) शीट्स के साथ मुजरिमाना हेर-फेर की। वह उम्मीदवार जो क़ाबिलियत की दौड़ में बुरी तरह नाकाम (फ़ेल) हो चुके थे, रातों-रात उनके खोटे सिक्कों को खरे नोटों के एवज़ कामयाबी के तमग़ों में बदल दिया गया। जब पुलिस ने इस घिनौने खेल की तहें उखाड़ीं, तो क़ानून की आँखें भी खुली की खुली रह गईं; तहक़ीक़ात के बाद 1,663 ऐसे फ़र्ज़ी उम्मीदवारों का भीयानक चेहरा बेनक़ाब हुआ जिन्होंने रिश्वत के बलबूते पर कामयाबी की सनद ख़रीदी थी, जिसके बाद उन पर ताहयात इम्तिहानी पाबंदी आइद कर दी गई। अभी इस ज़ख़्म की सियाही छूटी भी न थी कि साल 2019 का टी ई टी इम्तिहान इस तालीमी तारीख़ का सबसे बड़ा और हौलनाक धक्का साबित हुआ। इस बार साज़िशकारों ने दस्ती हेर-फेर के बजाय बराह-ए-रास्त डिजिटल निज़ाम पर शबख़ून मारा और कम्प्यूटरीकृत रिज़ल्ट डेटाबेस के अंदर घुसकर नंबरों के हिंदसे बदल दिए। यह बदउनवानी का वह तूफ़ान था जिसने क़ाबिलियत की हर दीवार को मुन्हदिम कर दिया। इस साज़िश के नतीजे में 7,880 नाअहल उम्मीदवारों को ग़ैर-क़ानूनी तौर पर ‘कामयाब’ क़रार देकर असनाद बाँट दी गईं, जिन्हें बाद में संगीन तहक़ीक़ात के बाद मंसूख़ करना पड़ा। इस पूरे रैकेट का सबसे लरज़ा-ख़ेज़ और हैरत-अंगेज़ पहलू वह गिरफ़्तारियाँ थीं जिन्होंने यह साबित कर दिया कि बाड़ ही खेत को खा रही है। जब क़ानून का शिकंजा कसा, तो इस निज़ाम के सबसे बड़े पासबान ही रहज़न निकले। इम्तिहानी बोर्ड के साबिक़ कमिश्नर सुखदेव डेरे, पुणे के असिस्टेंट कमिश्नर, और इम्तिहानों का इंतिज़ाम सँभालने वाली ‘जी ए सॉफ़्टवेयर कम्पनी’ के आला डायरेक्टर्स एक-एक करके सलाख़ों के पीछे पहुँच गए। इन मुक़्तदर कुर्सियों पर बैठे लोगों की गिरफ़्तारी ने यह मुहर-ए-तस्दीक़ सब्त कर दी कि इम्तिहानी निज़ाम पर से अब तलबा का एतमाद सौ फ़ीसद उठ चुका है, और जिस महकमे को क़ौम का मुस्तक़बिल सँवारना था, उसकी अपनी साख़ अब तारीख़ के सबसे गहरे मलबे के नीचे दफ़्न हो चुकी है। इन पिछले घोटालों के दौरान लगभग 9,500 से ज़्यादा ऐसे असातिज़ा की फ़ेहरिस्त जारी की गई थी जिन्होंने लाखों रुपये की रिश्वत देकर फ़र्ज़ी असनाद हासिल कीं और रियासत के स्कूलों में नौकरियाँ हासिल कर लीं। यह अअदाद-ओ-शुमार गवाह हैं कि जब इम्तिहानी निज़ाम के चौकीदार ही चोर बन जाएँ, तो क़ाबिलियत और मेरिट की मौत यक़ीनी हो जाती है। ज़रा तसव्वुर कीजिए तलबा की मायूसी के उस मंज़र का! महीनों की रियाज़त, दिन-रात की बेदारी, किताबों से इश्क़ और आँखों में एक रौशन मुस्तक़बिल का ख़्वाब लिए जब हज़ारों तलबा इम्तिहानगाह की तरफ़ क़दम बढ़ा रहे हों, और अचानक उनके कानों में यह आवाज़ गूँजे: “इम्तिहान मंसूख़ कर दिया गया है क्योंकि परचा पहले ही बिक चुका था!” यह सुनकर उन मासूम दिलों पर क्या गुज़री होगी? जब एक ग़रीब और क़ाबिल उम्मीदवार पिछले घोटालों के उन 9,543 फ़र्ज़ी

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