Asadullahkhanschool

चलो स्कूल, नाकामी सीखें!

जब तालीम का पहला दरवाज़ा ही एहसास-ए-महरूमी में खुलने लगे दाख़िलों की दौड़, बचपन की पहली शिकस्त और तालीम के बदलते हुए चेहरे की दास्तान डॉ. असदुल्लाह ख़ान वह सुबह, जिस दिन एक बच्चा पहली बार हार गया सुबह के सात बज रहे थे। बारिश अभी थमी ही थी और खिड़की के शीशों पर बारिश के चंद क़तरे अब भी ऐसे ठहरे हुए थे जैसे किसी ने वक़्त को चंद लम्हों के लिए रोक दिया हो। गली में स्कूल बस के हार्न की आवाज़ गूंजी तो चार साला साजिद अचानक बिस्तर से उछल कर उठ बैठा। उसने दौड़ते हुए अपनी नन्ही सी पानी की बोतल उठाई, अलमारी से नीले रंग का नन्हा सा बैग निकाला, उसे अपनी पुश्त पर लटकाया और आईने के सामने जा खड़ा हुआ। वह ख़ुद को बार-बार देख रहा था; कभी बैग सीधा करता, कभी अपने बालों पर हाथ फेरता, और कभी तसव्वुर ही तसव्वुर में किसी टीचर को “गुड मॉर्निंग मैम” कह कर मुस्कुरा देता। उसे यक़ीन था कि आज वह भी दूसरे बच्चों की तरह स्कूल जाएगा। वह नहीं जानता था कि स्कूल जाने के लिए सिर्फ़ मासूमियत काफ़ी नहीं रही, अब इसके लिए एक ऐसा इम्तिहान ज़रूरी है जिसकी न उसे ख़बर है, न इसके मायने मालूम हैं, और न इसके नताइज (परिणाम)। वह तो सिर्फ़ इतना जानता है कि स्कूल में दोस्त मिलते हैं, रंग-बिरंगी किताबें होती हैं, झूले होते हैं, और शायद एक ऐसी टीचर भी जो मां की तरह प्यार करती होगी। लेकिन इसी वक़्त घर के दूसरे कमरे में एक और मंज़र चल रहा था। खाने की मेज़ पर दाख़िला फ़ॉर्म, आधार कार्ड की फ़ोटो कॉपियां, पैदाइश का सर्टिफ़िकेट, बिजली का बिल, बैंक स्टेटमेंट, पासपोर्ट साइज़ तस्वीरें, पैन कार्ड, और न जाने कितने काग़ज़ात बिखरे हुए थे। साजिद की मां बार-बार एक फ़ाइल खोल कर बंद कर रही थी। बाप ख़ामोश बैठा था—एक ऐसी ख़ामोशी जिसके अंदर कई तूफ़ान थे। वह बार-बार घड़ी देखता, फिर फ़ाइल देखता, फिर अपने बेटे को और फिर न जाने क्यों अपनी ज़ात को तकने लगता। आज इम्तिहान साजिद का नहीं, बल्कि उसके वालिदैन (माता-पिता) का था। उनकी ज़बान, अंग्रेज़ी, मुलाज़मत, आमदनी, रहन-सहन, लिबास, शख़्सियत और शायद उनके समाजी मर्तबे का भी इम्तिहान था। यह वह इम्तिहान था जिसका निसाब (पाठ्यक्रम) किसी किताब में नहीं मिलता और जिसकी तैयारी किसी उस्ताद के पास नहीं होती। इसका नतीजा सिर्फ़ “दाख़िला मिला” या “दाख़िला नहीं मिला” नहीं होता, बल्कि बाज़ औक़ात एक नन्हें से दिल में यह पहला एहसास भी छोड़ जाता है कि शायद वह दूसरों से कमतर है। शायद यही वह लम्हा होता है जब बचपन पहली बार ज़िंदगी के सामने हारने लगता है। दाख़िले का मौसम या वालिदैन का इम्तिहान? हमने तालीम को हमेशा रोशनी, उम्मीद और मसावात (समानता) की अलामत समझा है। स्कूल वह जगह थी जहां मुआशरे (समाज) के हर तबक़े का बच्चा एक ही बेंच पर बैठ कर यह सीखता था कि इल्म इंसानों के दरमियान फ़र्क़ नहीं करता। उस्ताद वह शख़्सियत था जो नाम, नसब या आमदनी नहीं पूछता था, बल्कि सिर्फ़ यह देखता था कि सामने बैठा बच्चा सीखना चाहता है या नहीं। लेकिन वक़्त ने तालीम का चेहरा बदल दिया है। आज बहुत से शहरों में स्कूल का दरवाज़ा इल्म से पहले समाजी शिनाख़्त को देखने लगा है। दाख़िला फ़ॉर्म अब सिर्फ़ बच्चे की मालूमात नहीं मांगते, बल्कि वालिदैन की माशी हैसियत, पेशा, ज़बान, तालीमी क़ाबलियत और तर्ज़-ए-ज़िंदगी तक जानने की कोशिश करते हैं। यहां सवाल यह है कि क्या एक चार साला बच्चे की क़िस्मत का फ़ैसला वाक़ई उसके वालिदैन की तनख़्वाह, अंग्रेज़ी लहजे या ड्राइंग रूम के साइज़ से होना चाहिए? हिंदुस्तान में हर साल जून का महीना सिर्फ़ तालीमी साल के आग़ाज़ की ख़बर नहीं लाता, बल्कि लाखों घरों में उम्मीद और मायूसी की एक नई दास्तान रक़म करता है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, चेन्नई और कोलकाता जैसे बड़े शहरों में हर साल दाख़िलों के मौसम में यही बेचैनी देखने को मिलती है। अख़बारात में रात भर लगने वाली क़तारों, महदूद (सीमित) नशस्तों (सीटों) और नर्सरी दाख़िलों के लिए क़ायम ख़ुसूसी कोचिंग सेंटर्स पर मुसलसल ख़बरें शाया होती हैं। अदालतों, माहिरीन-ए-तालीम और पॉलिसी साज़ों के दरमियान यह बहस जारी है कि इब्तिदाई (प्राथमिक) तालीम के दरवाज़े पर इंसाफ़ को कैसे यक़ीनी बनाया जाए। लेकिन यह सब कुछ देखने के बावजूद सबसे ज़्यादा ख़ामोश वह बच्चा होता है जिसके नाम पर यह पूरी जंग लड़ी जा रही होती है। बचपन की सबसे ख़ूबसूरत बात यह है कि वह कामयाबी और नाकामी की लुग़त (शब्दकोश) से बेख़बर होता है। चार साल का बच्चा न मेरिट जानता है, न वेटिंग लिस्ट। वह सिर्फ़ इतना जानता है कि सामने वाले घर का अली आज स्कूल गया है, लिहाज़ा वह भी जाना चाहता है। लेकिन जब बड़ों की दुनिया उसकी राह में अपनी शर्तें और दीवारें खड़ी कर देती है, तो वह कुछ नहीं समझता। वह सिर्फ़ इतना पूछता है: “अब्बू… मेरा स्कूल कब शुरू होगा?” यह सवाल बज़ाहिर छोटा है, मगर एक हस्सास (संवेदनशील) बाप के लिए इसका जवाब पूरी ज़िंदगी के मुश्किल तरीन सवालों में से एक बन जाता है। मेरे एक दोस्त हैं, नाम बदल कर उन्हें राशिद कह लेते हैं। पेशा सहाफ़त (पत्रकारिता), किताबों से मोहब्बत, सच बोलने की आदत और अपने चार साला बेटे साजिद से बेपनाह इश्क़। जिस दिन शहर के एक मारूफ़ (प्रसिद्ध) स्कूल में इंटरव्यू था, उस दिन राशिद ने अपनी बेहतरीन क़मीज़ पहनी और बीवी ने फ़ाइल तरतीब दी। हर काग़ज़ अपनी जगह मौजूद था, मगर एक चीज़ कहीं दर्ज नहीं थी: अपने बच्चे के लिए एक बाप की मोहब्बत, क्योंकि इस मोहब्बत का कोई ख़ाना फ़ॉर्म में मौजूद नहीं था। हमारे मुआशरे का शायद ही कोई और इम्तिहान हो जिसकी तैयारी तीन साला बच्चा कम और उसके वालिदैन ज़्यादा करते हों। घर में रोज़ाना मश्क़ होती; “गुड मॉर्निंग”, “थैंक यू”, “एप्पल, बॉल, कैट”। मां तस्वीरें दिखाती, बाप रंग याद कराता, दादा दुआएं देता और दादी नज़र उतारती। इंटरव्यू शुरू हुआ तो राशिद के मुताबिक़ चंद रस्मी सवालात के बाद गुफ़्तगू का रुख़ अचानक बदल गया। “आप क्या करते हैं? माहना आमदनी कितनी है? घर अपना है या किराए का? कितने कमरों का फ़्लैट है? घर में कौन

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तालीम के ज़रिए۔۔۔ तामीर या तख़रीब ? ۔۔۔

डॉ. असदुल्लाह ख़ान बच्चों को आप स्कूल क्यों भेजते हैं? यह सवाल सुनने में जितना सादा लगता है, अपने बातिन (अंदर) में उतना ही तूफ़ान समोए हुए है। यह एक सवाल नहीं, एक तहज़ीब का एहतसाब (आत्म-मूल्यांकन) है। एक तड़पते हुए बाप का, एक फ़िक्रमंद मां का और एक बिखरती हुई क़ौम का वह मुक़दमा है जो आज अपने ही हाथों अपनी नस्ल को कटहरे में खड़ा कर रही है और इसे ख़बर भी नहीं! जब भी किसी बाप की आंखों में झांक कर यह पूछा जाए तो जवाब एक ही लय में, एक ही बेफ़िक्री से आता है: ”बच्चे पढ़ लिख कर कुछ बन जाएं।” लेकिन कभी तन्हाई में बैठकर सोचिए कि इस ”कुछ बनने” का ख़वाब कब का सुकड़ कर महज़ चंद हज़ार या चंद लाख की कमाई का हदफ़ (लक्ष्य) बन चुका है? शख़्सियत की तामीर, किरदार की परवरिश, ज़ेहन की रोशनी — यह अलफ़ाज़ अब सिर्फ़ स्कूलों के चमकदार ब्रोशरों में ख़ूबसूरत फ़ॉन्ट में छपते हैं, किसी के दिल में नहीं उतरते। वालिदैन बच्चों को स्कूल ऐसे भेजते हैं जैसे ख़त को लिफ़ाफ़े में बंद करके पोस्ट बॉक्स में डाल दिया जाए — कि अब आगे का ज़िम्मा डाकख़ाने का है, हमारा काम ख़त्म हुआ। साल २०२६ء का यह वह लमहा है जब इस सवाल की गहराई हमारी बर्दाश्त से बाहर हो चुकी है। मसनूई ज़हानत (Artificial Intelligence) का तूफ़ान अब दरवाज़े पर दस्तक नहीं दे रहा, वह तो हमारे बेडरूम्स और क्लास रूम्स के अंदर आ बैठा है। ChatGPT और Gemini अब हर चौथी जमात के बच्चे की जेब में हैं, हर स्मार्टफ़ोन के अंदर मौजूद हैं। वह हर सवाल का जवाब चंद सेकंड में उगल देते हैं। अब सवाल यह नहीं रहा कि आपके बच्चे का हाफ़िज़ा (याददाश्त) कितना तेज़ है और वह कितने जवाब जानता है — अब रोने का मुक़ाम यह है कि क्या वह सोचना भी जानता है? क्या हम हाड़-मांस के इंसान बना रहे हैं या माइक्रोचिप्स से चलने वाले बेजान आले (यंत्र)? स्कूल की चहार दीवारी: दरसगाह या उक़ूबत ख़ाना? जिस स्कूल में देर से आने की सज़ा यह हो कि आठ-दस किलो का बस्ता कांधों पर लाद कर मैदान के दस चक्कर लगवाए जाएं — वहां बच्चे के क़दम स्कूल की तरफ़ शौक़ से बढ़ेंगे या ख़ौफ़ से? जिस क्लास में एक की ग़लती पर पचास बच्चों के मासूम हाथों पर बेद मार कर लाल कर दिया जाए, वहां मोहब्बत का कौन सा फूल उगेगा? वहां सिर्फ़ इंतक़ाम (बदले) का कांटा परवान चढ़ेगा। यह जिस्मानी और ज़ेहनी तशद्दुद (हिंसा) अब सिर्फ़ माज़ी (भूतकाल) का क़िस्सा नहीं रहा, बल्कि आज हमारे आस-पास रोज़ का मामूल बन चुका है। मुल्क के अलग-अलग कोनों से आने वाली हालिया ख़बरें पढ़ कर रूह कांप उठती है और दिल ख़ून के आंसू रोता है: बेंगलुरु का वहशियाना वाक़िया: अभी हाल ही में बेंगलुरु के एक निजी स्कूल में महज़ दो दिन ग़ैर-हाज़िर रहने पर पांचवीं जमात के एक मासूम ९ साल के बच्चे को स्कूल के इंतिज़ामिया (प्रबंधन) ने प्लास्टिक के पाइप से इस बेरहमी से पीटा कि उसके पूरे जिस्म पर नील पड़ गए, और हद तो यह है कि उसे कई घंटों तक एक अंधेरे कमरे में अकेला बंद करके तड़पने के लिए छोड़ दिया गया। जब दुखी वालिदैन ने जवाब मांगा, तो उन्होंने ढिटाई से कहा: “हमारे यहां डिसिप्लिन सिखाने का यही तरीक़ा है!” आंध्र प्रदेश में मासूमियत पर वार: चित्तूर के एक स्कूल में छठी जमात की ११ साल की बच्ची क्लास में किसी से बात कर रही थी। तैश में आकर उस्ताद ने उसकी तरफ़ स्कूल का भारी बस्ता उठा कर फेंका। बस्ते के अंदर मौजूद स्टील का लंच बॉक्स बच्ची के सर पर इतनी ज़ोर से लगा कि वह वहीं चकरा कर गिर गई। बाद में जब दर्द न रुका तो हस्पताल के स्कैन में मालूम हुआ कि इस मासूम बच्ची के सर की हड्डी (Skull) में फ्रैक्चर आ चुका है। कर्नाटक की बर्बरीय्यत: एक और दिलसोज़ लहर उस वक़्त दौड़ी जब एक रिहायशी स्कूल (Residential School) के उस्ताद ने ९ साल के एक छोटे से बच्चे को सिर्फ़ इसलिए ज़मीन पर गिरा कर बेरहमी से लातों और थप्पड़ों से पीटा क्योंकि उसने हॉस्टल से अपने घर फ़ोन करने की “जसारत” (हिमाकत) की थी। वह मासूम बच्चा उस्ताद के पैरों में गिर कर रोते हुए माफ़ियां मांग रहा था, लेकिन उस जल्लाद का दिल नहीं पिघला। यह चंद मिसालें तो वह हैं जो मीडिया की नज़र चढ़ीं और एफ़आईआर तक पहुंचीं, वरना रोज़ाना ज़्यादातर मासूम रूहें इन चहार दीवारों के पीछे सिसकती हैं और किसी को ख़बर तक नहीं होती। हम डिसिप्लिन के नाम पर बच्चों को तहज़ीब नहीं सिखा रहे, बल्कि उनके अंदर के इंसान को क़त्ल कर रहे हैं। यह तो वह जिस्मानी वहशत है जो नज़र आ जाती है, लेकिन अब जो नई डिजिटल बर्बरीय्यत आई है, उसने रूहों को ऐसे ज़ख़्म दिए हैं जिनका कोई एक्स-रे नहीं हो सकता। मुंब्रा, कल्यान और भिवंडी के बाज़ अंग्रेज़ी स्कूलों में अब बच्चों के होमवर्क का ‘ऑनलाइन रिकॉर्ड’ रखा जाता है। बच्चा रात को थक कर सो गया, होमवर्क अधूरा रह गया। सुबह क्लास व्हाट्सऐप ग्रुप में, जहां पचास दीगर वालिदैन मौजूद हैं, बच्चे का नाम सुर्ख़ (लाल) हुरूफ़ में डाल दिया जाता है जैसे वह कोई मुजरिम हो। सत्तर साल पहले स्कूलों में सज़ा के तौर पर बच्चे के गले में तख़्ती लटकाई जाती थी जिस पर लिखा होता था: ‘I am Donkey’। आज वह तख़्ती डिजिटल हो गई है — स्कूल ऐप पर रेड अलर्ट, पैरेंट पोर्टल पर नाम, डैशबोर्ड पर रुसवाई! ज़रिया बदल गया, असातिज़ा (शिक्षकों) की वहशियाना ज़ेहनियत नहीं बदली। क्या यह तालीम है? या किसी नाज़ुक, मासूम आईने पर पत्थर मार-मार कर उसे चकनाचूर करना और फिर उसके मलबे को पॉलिश करके कहना कि देखो हमने कितना चमकदार शीशा बनाया है? अंग्रेज़ी का बुत और वालिदैन का सजदा हमारी क़ौम ने अंग्रेज़ी ज़बान के साथ जो रिश्ता जोड़ा है, वह अब ज़बान का रिश्ता नहीं रहा, वह अंधी पूजा बन चुका है। एक ऐसा बुत जिसके सामने हम अपनी ग़ैरत, अपनी तहज़ीब, और अपना सकून क़ुर्बान कर रहे हैं। एक ग़रीब बाप को देखिए, जो बारह-बारह घंटे ओवरटाइम करता है,

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मेहनत करे इंसान तो क्या हो नहीं सकता!

डॉ. असदुल्लाह ख़ान आज के दौर में आला तालीम हासिल कर लेने के बावजूद नौकरी पा लेना गोया जूए-शेर लाने से कम नहीं। आप में सैकड़ों सलाहियतें हों, मगर अगर एक भी ‘कमी’ नज़र आ जाए — कोई जिस्मानी माज़ूरी, कोई कमज़ोरी, कोई ‘दाग़’ — तो पूरा चराग़ नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। काम नामुमकिन नहीं होता, मगर मुश्किल ज़रूर हो जाता है। मुझे एक ऐसे ही होनहार नौजवान का क़िस्सा याद आता है। मुल्क के एक मुमताज़ इंजीनियरिंग इदारे से फ़ारिग़ुत्तहसील, तालीमी रिकॉर्ड इस क़दर शानदार कि काग़ज़ात देखते ही एक बड़ी कंपनी ने उसे हाथों-हाथ लेने का इरादा कर लिया। मगर जब इंटरव्यू में यह खुला कि वह नौजवान क़ुव्वत-ए-समाअत की एक बीमारी में मुब्तला है, तो वही कंपनी — जो अभी-अभी उसकी ज़ेहानत पर फ़रेफ़्ता थी — चुपचाप क़दम पीछे खींच लाई। डिग्री, मेहनत और क़ाबिलियत — सब एक ‘तिब्बी रिपोर्ट’ के सामने हार गए। मगर कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती, और न होनी चाहिए। क्योंकि माज़ूरी जिस्म की होती है, हौसले की नहीं। तारीख़ गवाह है कि जिन लोगों ने दुनिया बदली, उनमें से बेश्तर ने ‘कमी’ को ‘ताक़त’ में बदला। आइए आज ऐसे ही दस रोशन चराग़ों की दास्तानें सुनते हैं — जिनकी लौ आँधियों में भी बुझी नहीं, बल्कि और तेज़ हुई। अज़मत और हिम्मत की रोशन मिसालें इंसान अगर सच्चे दिल से कुछ करने का इरादा कर ले तो जिस्मानी आज़ा की महरूमी उसके ख़्वाबों के आड़े कभी नहीं आ सकती। तारीख़ और हाल के उफ़ुक़ पर ऐसे कई दरख़्शंदा सितारे चमक रहे हैं जिन्होंने अपनी हिम्मत के बलबूते पर तूफ़ानों का रुख़ मोड़ दिया। श्रीकांत बोल्ला (Srikanth Bolla): पैदाइशी तौर पर मुकम्मल नाबीना श्रीकांत बोल्ला को बचपन ही से इंतिहाई ग़ुर्बत और समाजी तअस्सुब का सामना करना पड़ा। हद तो यह हुई कि जब उन्होंने दसवीं जमाअत के बाद साइंस पढ़ने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की, तो भारतीय निज़ाम-ए-तालीम ने उनके नाबीना होने का बहाना बनाकर साफ़ इनकार कर दिया। उन्होंने इस नाइंसाफ़ी के आगे सर-ए-तस्लीम ख़म करने के बजाय अदालत का दरवाज़ा खटखटाया और छह माह की तवील क़ानूनी जद्दोजहद के बाद कामयाबी हासिल की, जिसके बाद उन्होंने ग्यारहवीं जमाअत में ९८ प्रतिशत नंबर लेकर सबको हैरान कर दिया। जब मुल्क के मायानाज़ इदारे आई आई टी (IIT) ने भी उन्हें दाख़िला देने से इनकार किया, तो उन्होंने हिम्मत हारने के बजाय अमरीका की मशहूर यूनिवर्सिटी एम आई टी (MIT) का रुख़ किया और वहाँ दाख़िला पाने वाले पहले बैनुल-अक़्वामी नाबीना तालिबे-इल्म बन गए। भारत वापस आकर उन्होंने ‘बोलान्ट इंडस्ट्रीज़’ (Bollant Industries) क़ायम की, जो माहौल-दोस्त मस्नूआत बनाती है और जहाँ सैकड़ों माज़ूर अफ़राद को रोज़गार फ़राहम किया गया है। आज श्रीकांत करोड़ों रुपये की कंपनी के मालिक और दुनिया भर के नौजवानों के लिए एक आलमी रोल मॉडल हैं। सुधा चंद्रन (Sudha Chandran): महज़ १६ साल की उम्र में एक ख़ौफ़नाक सड़क हादिसे और डॉक्टरों की मुजरिमाना ग़फ़लत की वजह से सुधा चंद्रन की दाहिनी टांग काटनी पड़ी। एक क्लासिकल रक़्क़ासा के लिए यह मुसीबत किसी मौत से कम न थी क्योंकि उनका पूरा करियर पाँव की थिरकन से वाबस्ता था। मगर सुधा ने बैसाखियों के सहारे जीने को ठुकरा दिया और ‘जयपुर फ़ुट’ (मसनूई टांग) लगवाकर इंतिहाई शदीद तकलीफ़ के बावजूद दोबारा रक़्स सीखना शुरू किया। मश्क़ के दौरान अक्सर उनके ज़ख़्मों से ख़ून बह निकलता था, मगर उनका अज़्म मुतज़लज़िल न हुआ। उन्होंने मसनूई टांग के साथ स्टेज पर वापसी की और ऐसा शानदार रक़्स पेश किया कि पूरी दुनिया दंग रह गई। आज वह न सिर्फ़ एक आलमी शोहरत-याफ़्ता रक़्क़ासा हैं बल्कि भारतीय फ़िल्म व टेलीविज़न की एक मानी हुई और कामयाब अदाकारा भी बन चुकी हैं। इरा सिंघल (Ira Singhal): रीढ़ की हड्डी की एक नायाब बीमारी ‘स्कोलियोसिस’ (Scoliosis) की वजह से इरा सिंघल के दोनों बाज़ुओं की हरकत इंतिहाई महदूद थी। उन्होंने अपनी इस कमज़ोरी को पढ़ाई के आड़े नहीं आने दिया और २०१० में मुल्क का सबसे मुश्किल इम्तिहान यू पी एस सी (UPSC) पास किया, मगर इंतिज़ामिया ने उनकी जिस्मानी हालत का बहाना बनाकर उन्हें सरकारी मुलाज़मत देने से इनकार कर दिया। इरा ने इस इम्तियाज़ी सुलूक़ को चुपचाप क़बूल करने के बजाय सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) में केस दायर किया और चार साल तक एक सब्र-आज़मा क़ानूनी जंग लड़कर अपना हक़ जीता। उन्होंने २०१४ में दोबारा इम्तिहान दिया और इस बार न सिर्फ़ कामयाब हुईं बल्कि पूरे मुल्क में पहली पोज़िशन (Rank 1) हासिल करके जनरल कैटेगरी में टॉप किया। आज वह एक बेहतरीन और निडर सिविल सर्विसेज़ ऑफ़िसर के तौर पर मुल्क की ख़िदमत कर रही हैं। अरुणिमा सिन्हा (Arunima Sinha): क़ौमी सतह की वॉलीबॉल खिलाड़ी अरुणिमा सिन्हा की ज़िंदगी में २०११ में उस वक़्त अँधेरा छा गया जब कुछ चोरों ने उन्हें चलती ट्रेन से नीचे फेंक दिया, जिसके बाइस उनकी एक टांग काटनी पड़ी। अस्पताल के बिस्तर पर जहाँ लोग उन पर तरस खा रहे थे और उन्हें ‘बेचारी’ समझ रहे थे, उन्होंने वहीं लेटे-लेटे दुनिया की बुलंद-तरीन चोटी सर करने का नाक़ाबिल-ए-यक़ीन फ़ैसला किया। अस्पताल से डिस्चार्ज होते ही उन्होंने पहली भारतीय ख़ातून एवरेस्ट फ़ातेह बचेंद्री पाल से सख़्त ट्रेनिंग शुरू की। सरफिरे अज़्म की बदौलत २०१३ में वह मसनूई टांग के साथ माउंट एवरेस्ट सर करने वाली दुनिया की पहली माज़ूर ख़ातून बनीं और उसके बाद उन्होंने दुनिया के तमाम ७ बर्र-ए-आज़मों की बुलंद-तरीन चोटियों पर कामयाबी से अपने मुल्क का तिरंगा लहराया। सातोशी ताजीरी (Satoshi Tajiri): जापान में पैदा होने वाले सातोशी ताजीरी को बचपन ही में ‘ऑटिज़्म’ (Autism) की तश्ख़ीस हुई, जो कि एक ऐसी ज़ेहनी हालत है जिसमें इंसान के लिए समाजी ताल्लुक़ात क़ायम करना और आम लोगों की तरह बात-चीत करना इंतिहाई मुश्किल हो जाता है। स्कूल में उनका कोई दोस्त नहीं बनता था और वह अकेले जंगलों में कीड़े-मकोड़े पकड़ते रहते थे, जिसकी वजह से लड़के उन्हें ‘पागल’ कहकर चिढ़ाते थे। मगर सातोशी के वालिदैन ने उनका यह शौक़ छुड़वाने के बजाय उनका हौसला बढ़ाया। सातोशी ने अपनी इसी तन्हाई और कीड़े-मकोड़े जमा करने के शौक़ को एक मुनफ़रिद आइडिया में बदला और सोचा कि काश बच्चे एक ही जगह ऐसी मुख़्तलिफ़ ख़याली मख़लूक़ात जमा कर सकें और आपस में शेयर कर सकें। उन्होंने निन्टेन्डो (Nintendo) कंपनी को एक गेम का आइडिया

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बे-बसीरत नस्ल-ए-नौ माँगे ज़िंदगी की ज़मानत

जेन ज़ी, तालीमी निज़ाम और मुस्तक़बिल के ख़ौफ़ की नफ़्सियात डॉ. असदुल्लाह ख़ान कभी-कभी मुआशरों में आने वाली तब्दीलियाँ शोर मचाकर नहीं आतीं। वह ख़ामोशी से नस्लों के रवैयों में उतरती हैं। फिर एक दिन हमें महसूस होता है कि दुनिया बदल चुकी है। आज दुनिया भर में एक अजीब मंज़र दिखाई देता है। इंजीनियर कारोबार सीख रहा है, डॉक्टर यूट्यूब चैनल चला रहा है, उस्ताद ऑनलाइन कोर्स बेच रहा है, तालिबे-इल्म शेयर मार्केट समझ रहा है, और यूनिवर्सिटी से फ़ारिग़ होने वाला नौजवान मुलाज़मत ढूँढ़ने से पहले “Passive Income” के तरीक़े तलाश कर रहा है। सवाल यह नहीं कि ऐसा क्यों हो रहा है, अस्ल सवाल यह है कि आख़िर ऐसी कौन-सी तब्दीली रूनुमा हुई है कि एक पूरी नस्ल नौकरी से पहले “Exit Plan” तैयार कर रही है? ऐसा क्यों है कि आज का नौजवान किसी कंपनी में दाख़िल होने से पहले उस दिन के बारे में सोच रहा है जब वह कंपनी उसे निकाल देगी? आख़िर वह कौन-सा ख़ौफ़ है जो इस नस्ल के ला-शऊर में बैठ गया है? पिछली नस्लों का ख़्वाब सादा था। पढ़ो, अच्छी डिग्री हासिल करो, अच्छी नौकरी हासिल करो, घर बनाओ, बच्चों को पढ़ाओ और रिटायर हो जाओ। यही कामयाबी थी, यही इस्तिहकाम था, यही ज़िंदगी का नक़्शा था। लेकिन आज का नौजवान इस नक़्शे पर यक़ीन नहीं रखता। क्यों? इसलिए कि उसने अपनी आँखों से देखा है कि बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ बेरोज़गारी की ज़मानत बन सकती हैं। उसने देखा कि कोरोना की एक लहर ने करोड़ों मुलाज़मतें ख़त्म कर दीं। उसने देखा कि मसनूई ज़ेहानत चंद सेकंड में वह काम कर रही है जो कभी हज़ारों अफ़राद किया करते थे। उसने देखा कि कई बरसों की वफ़ादारी के बाद भी एक ईमेल इंसान को बेरोज़गार बना सकती है। चुनाँचे इस नस्ल ने एक नया सबक़ सीख लिया: “किसी एक चीज़ पर इनहिसार ख़तरनाक है।” लेकिन यहाँ एक और सवाल जन्म लेता है। क्या वाक़ई मसअला सिर्फ़ रोज़गार का है, या मसअला इससे कहीं ज़्यादा गहरा है? मेरा ख़याल है कि यह सिर्फ़ मआशी बुहरान नहीं बल्कि तालीमी बुहरान भी है। क्योंकि हमारी पूरी तालीमी मशीनरी अब भी बीसवीं सदी के लिए बच्चों को तैयार कर रही है जबकि दुनिया इक्कीसवीं सदी के तीसरे अशरे में दाख़िल हो चुकी है। हम अब भी बच्चों से पूछते हैं: “बड़े होकर क्या बनोगे? डॉक्टर? इंजीनियर? पायलट? उस्ताद? अफ़सर?” मगर शायद अब सवाल बदलने का वक़्त आ गया है। आज का सवाल यह होना चाहिए: “तुम कौन-सी सलाहियतें पैदा करोगे जो हर दौर में तुम्हें ज़िंदा रख सकें?” यहाँ हमारी तालीम की एक बुनियादी कमज़ोरी सामने आती है। हम बच्चों को इम्तिहान पास करना सिखाते हैं, मसाइल हल करना नहीं। हम उन्हें मालूमात देते हैं, बसीरत नहीं देते। हम उन्हें नौकरी हासिल करना सिखाते हैं, मौक़े पैदा करना नहीं सिखाते। हम उन्हें याददाश्त देते हैं, तख़्लीक़ नहीं देते। आज का नौजवान एक अहम सवाल पूछ रहा है। शायद वह अल्फ़ाज़ में बयान न कर सके लेकिन उसके अंदर यह सवाल मुसलसल मौजूद है: “अगर मेरी डिग्री मुझे तहफ़्फ़ुज़ नहीं दे सकती तो फिर मुझे क्या चीज़ महफ़ूज़ बना सकती है?” इस सवाल का जवाब सिर्फ़ मुलाज़मत नहीं, सिर्फ़ कारोबार नहीं, सिर्फ़ सरमायाकारी नहीं, बल्कि सलाहियतों का ऐसा मजमूआ है जो इंसान को हर दौर में कारआमद बना दे। Communication Skills, Critical Thinking, Problem Solving, Leadership, Digital Literacy, Entrepreneurship, Character Building और सबसे बढ़कर Learning Agility यानी मुसलसल सीखते रहने की सलाहियत। बदक़िस्मती से हमारे बहुत से तालीमी इदारे अब भी सिर्फ़ निसाब मुकम्मल करने को तालीम समझते हैं। जबकि आने वाली दुनिया में निसाब से ज़्यादा अहम “क़ाबिलियत” होगी, इम्तिहान से ज़्यादा अहम “महारत” होगी और डिग्री से ज़्यादा अहम “Value Creation” होगी। यह भी एक दिलचस्प अलमिया है कि Gen Z को Work-Life Balance की नस्ल कहा जाता है, मगर हक़ीक़त यह है कि शायद यह नस्ल अपने वालिदैन से ज़्यादा काम कर रही है। दिन में नौकरी, रात में फ़्री-लांसिंग, हफ़्तावार कंटेंट क्रिएशन, सोशल मीडिया नेटवर्किंग और साथ में नई महारतें सीखने की कोशिश। यह सब क्यों? क्योंकि उन्हें काम से नफ़रत नहीं, उन्हें ग़ैर-यक़ीनी मुस्तक़बिल से ख़ौफ़ है। एक मुअल्लिम की हैसियत से मुझे सबसे ज़्यादा फ़िक्र इस बात की है कि कहीं हम नौजवानों को सिर्फ़ आमदनी पैदा करने वाली मशीनें न बना दें। क्योंकि ज़िंदगी सिर्फ़ माली आज़ादी का नाम नहीं, ज़िंदगी मक़सद का नाम भी है, अख़्लाक़ का नाम भी है, ख़िदमत का नाम भी है, किरदार का नाम भी है, मुआशरे की तामीर का नाम भी है। अगर तालीम सिर्फ़ पैसा कमाना सिखाए और इंसान बनना न सिखाए तो वह तालीम नहीं, महज़ तर्बियत-ए-मआश है। आने वाले ज़माने का सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होगा कि कौन-सी मुलाज़मत बाक़ी रहेगी, बल्कि यह होगा कि कौन-सा इंसान हर तब्दीली के बावजूद अपनी अफ़ादियत बरक़रार रख सकेगा। और यही वह मक़ाम है जहाँ तालीमी इदारों को अपना पूरा फ़लसफ़ा अज़सर-ए-नौ तरतीब देना होगा। हमारा मक़सद सिर्फ़ डॉक्टर, इंजीनियर, अफ़सर या ताजिर पैदा करना नहीं होना चाहिए बल्कि ऐसे इंसान पैदा करना होना चाहिए जो हालात के ग़ुलाम न हों बल्कि हालात को बदलने की सलाहियत रखते हों। शायद इसी लिए मैं समझता हूँ कि Gen Z नौकरीयों को मुस्तरद नहीं कर रही। वह काम से फ़रार नहीं चाहती, मेहनत से भी नहीं भाग रही। वह दरअसल एक ऐसी दुनिया में ज़िंदा रहने का रास्ता तलाश कर रही है जहाँ कोई चीज़ मुस्तक़िल नहीं रही। और शायद इस पूरी कहानी का सबसे अहम सबक़ यही है कि मुस्तक़बिल उन लोगों का नहीं होगा जिनके पास सिर्फ़ डिग्रियाँ होंगी, बल्कि उनका होगा जिनके पास सीखने, बदलने और नए रास्ते बनाने की सलाहियत होगी। और यही वह मक़ाम है जहाँ तालीम का अस्ल सफ़र शुरू होता है। “ज़माना बदलने से पहले अगर तालीम न बदले, तो फिर ज़माना तालीम को बे-मानी बना देता है।” Asadullahkhanschoolasadullahkhanschool.org

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तालीम की हक़ीक़ी रूह की तलाश!!!

डॉ. असदुल्लाह ख़ान अस्र-ए-हाज़िर का हिन्दुस्तान एक ऐसे फ़िक्री व तहज़ीबी मोड़ पर खड़ा है जहाँ मादी तरक़्क़ी की चकाचौंध तो उरूज पर है, मगर हमारी अख़्लाक़ी और तालीमी बुनियादें अंदर से खोखली होती जा रही हैं। आज जब हम अपने तालीमी गुलिस्तान पर नज़र डालते हैं, तो वहाँ इल्म की ख़ुशबू के बजाय इम्तिहानात का धुआँ और मुक़ाबलों का शोर सुनाई देता है। तालीम की हक़ीक़ी रूह जो इम्तिहानी परचों और मेरिट लिस्टों के नीचे दब कर दम तोड़ चुकी है, आज उसकी बाज़याफ़्त की पुकार ने बेचैन कर दिया है। इंसानी तारीख़ के औराक़ को पलट कर देखें तो कायनात के सबसे बड़े मुअल्लिम-ए-आज़म पर नाज़िल होने वाला पहला इल्हामी हुक्म “इम्तिहान दो” नहीं था। लौह-ए-महफ़ूज़ से इंसानियत के नाम जो पहला अबदी पैग़ाम उतरा, वह था— اِقْرَاْ بِاسْمِ رَبِّكَ الَّذِیْ خَلَقَ हुक्म हुआ— पढ़िए अपने रब के नाम से जिसने पैदा किया। इस पहले आसमानी सबक़ का मक़सद नम्बरात की दौड़ नहीं बल्कि शऊर की बेदारी था। उसका अव्वलीन हासिल कोई दुनियावी मुलाज़मत नहीं बल्कि ख़ालिक़ व मख़लूक़ की मारिफ़त था। इस्लाम की पूरी इल्मी तारीख़ इसी महवर के गिर्द घूमती है। जब तक तालीम एक इबादत थी, बग़दाद, क़ुर्तुबा, ग़रनाता, समरक़ंद, बुख़ारा और दिल्ली के मदारिस से ऐसे नाबिग़ा-ए-रोज़गार इंसान पैदा होते थे जो महज़ डिग्री-याफ़्ता मुलाज़िम नहीं, बल्कि कायनात के असरार व रुमूज़ को बेनक़ाब करने वाले फ़िलासफ़र, मोजिद और मुहक़्क़िक़ थे। इमाम ग़ज़ालीؒ, इब्न रुश्दؒ, इब्न ख़ल्दूनؒ, शाह वलीउल्लाहؒ और सर सैयद अहमद ख़ानؒ की इल्मी व फ़िक्री अज़मत का राज़ मालूमात के अम्बार में नहीं, बल्कि उनकी फ़िक्र की उस वुसअत में था जो ज़िंदगी और कायनात को अपने दामन में समेट लेती थी। मगर अफ़सोस! सदियों के इस सफ़र में हमने इस अस्ल-ए-असासा को कहीं खो दिया। आज का अलमिया यह है कि गूगल हमारी जेबों में तो मौजूद है लेकिन हिकमत हमारे दिलों से रुख़्सत हो चुकी है। हमारे पास मालूमात के अम्बार हैं मगर फ़िक्री गहराई का क़हत है। हमने ज़ेहनों को अंधा-धुंध मालूमात से भरना तो सीख लिया, मगर शख़्सियतों को तराशना और किरदार को तामीर करना यकसर भुला दिया। आज का हिन्दुस्तान तालीमी निज़ाम के नाम पर एक ऐसी कारगाह में तब्दील हो चुका है जहाँ इंसान नहीं, बल्कि “इम्तिहानी जंगजू” (Exam Warriors) तैयार किए जा रहे हैं। हालिया बरसों में NEET, JEE, CUET, SSC और HSC जैसे क़ौमी सतह के इम्तिहानात के गिर्द पैदा होने वाले पेपर लीक, इम्तिहानी माफ़िया, रिश्वत-स्तानी और संगीन बदउनवानियों के तनाज़आत ने पूरे मुल्क को हिला कर रख दिया है। लेकिन अलमिया देखिए कि हमारा समाज और पॉलिसी साज़ सिर्फ़ इस निज़ाम की ज़ाहिरी शाख़ों पर कुल्हाड़ी चला रहे हैं, कोई भी इस नासूर की अस्ल जड़ तक पहुँचने की ज़हमत नहीं कर रहा। असल बुहरान पेपर लीक होना नहीं है, बल्कि असल बुहरान यह है कि हमारा पूरा तालीमी ढाँचा अपनी रूह से महरूम हो चुका है। हमने तालीम को महज़ “मालूमात की मुन्तक़िली” (Information Transfer) का नाम दे दिया है, जबकि तालीम तो बुनियादी तौर पर “इंसान-साज़ी” (Human Making) का एक मुक़द्दस अमल था। आज एक मासूम बच्चे का पाँच साल की उम्र में स्कूल की दहलीज़ पर क़दम रखते ही बचपन का दायरा तंग कर दिया जाता है। उसके नातवाँ कंधों पर किताबों का भारी बस्ता लाद कर उसे एक ऐसी लामतनाही और अंधी दौड़ में धकेल दिया जाता है जहाँ हर अगला मोड़ पिछले से ज़्यादा बेरहम होता है— प्री-प्राइमरी से प्राइमरी की दौड़, प्राइमरी से सेकेंडरी की मशक़्क़त, सेकेंडरी से जूनियर कॉलेज का तनाव, जूनियर कॉलेज से एंट्रेंस इम्तिहानात के अज़ाब तक और आख़िर में रोज़गार की मंडी में ख़ुद को बेचने का मुक़ाबला। इस पूरी तग़-ओ-दौ में और इस तवील मसाफ़त के किसी भी मोड़ पर कोई हमदर्द उस्ताद या निज़ाम-ए-तालीम इस बच्चे से यह नहीं पूछता कि तुम क्या सोचते हो? तुम्हारे दिल के जज़्बात क्या हैं? तुम्हारे इन्फ़िरादी ख़्वाब क्या हैं? और तुम एक इंसान के तौर पर कैसे बन रहे हो? पूरा निज़ाम-ए-हुकूमत, स्कूल और वालिदैन सिर्फ़ एक ही रट लगाए बैठे हैं कि तुम्हारे परसेंटाइल कितने आए? मेरिट लिस्ट में तुम्हारा रैंक क्या है? यही वह तारीक लम्हा है जहाँ तालीम सिसक-सिसक कर दम तोड़ देती है और “इम्तिहान” एक जल्लाद की तरह ज़िंदा हो जाता है। यही वजह है कि फ़िक्रमंद अज़हान इन इम्तिहानात को समाजी कंट्रोल का हथियार क़रार देते हैं। यह एक ऐसा हथियार है जो लाखों नौजवानों की ज़िंदगी के सबसे ख़ूबसूरत, तख़्लीक़ी और सुनहरे सालों को तीन घंटे के एक बेजान परचे में क़ैद कर देता है। इस इम्तिहानी जुनून का नतीजा यह निकला है कि मुल्क में “कोचिंग इंडस्ट्री” के नाम से एक मुतवाज़ी और ज़ालिमाना तालीमी सल्तनत क़ायम हो चुकी है। करोड़ों रुपये के इस कारोबार में मासूम बच्चों का बचपन फ़रोख़्त हो रहा है, नौजवानों की सलाहियतें गिरवी रखी जा रही हैं, और उनके अछूते ख़्वाब इस मंडी में कौड़ियों के दाम नीलाम हो रहे हैं। फिर जब कोटा (Kota) जैसे तालीमी मराकिज़ से मासूम बच्चों की ख़ुदकुशियों की ख़बरें आती हैं, जब नौजवान नस्ल शदीद डिप्रेशन और ज़ेहनी तनाव का शिकार होकर मौत को गले लगाती है, तो यह समाज हैरत का इज़हार करता है! हम यह क्यों भूल जाते हैं कि हमने उन्हें जीना सिखाया ही कब था? हमने तो उन्हें सिर्फ़ मुक़ाबला करना सिखाया था। हमने उन्हें कामयाबी के तरीक़े तो रटाए, मगर ज़िंदगी का हक़ीक़ी मतलब नहीं बताया। हमने उन्हें नौकरी के लिए तो तैयार किया, मगर एक ज़िम्मेदार शहरी और बाक़िरदार इंसान बनने का गुर नहीं सिखाया। अगर हम ग़ौर व फ़िक्र की आँखों से देखें तो कायनात की कोई भी अज़ीम तब्दीली रट्टे-बाज़ी से नहीं आई। क़ुरआन करीम की आयात-ए-बय्यिनात का एक बड़ा हिस्सा इंसान को बार-बार तदब्बुर, तफ़क्कुर और तअक़्क़ुल की दावत देता है। कलाम-ए-इलाही पुकार-पुकार कर कहता है कि क़ुरआन का तालिब-ए-इल्म वह है जो अंधी तक़लीद नहीं करता, बल्कि कायनात का मुशाहदा करता है, अपने नफ़्स को पढ़ता है, तारीख़ की नब्ज़ पर हाथ रखता है और सवाल पूछता है। अगर तालीम सिर्फ़ तयशुदा निसाब को रट लेने का नाम होती तो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को फ़िरऔन के महल जैसे मुतज़ाद माहौल से इल्म और हिकमत न मिलती। अगर तालीम महज़ तयशुदा मालूमात तक

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मेहनत करे इंसाँ तो क्या हो नहीं सकता!!

जे ई ई एडवांस्ड 2026 के नताइज और नौजवान नस्ल के लिए कामयाबी का मंशूर डॉ. असदुल्लाह ख़ान कुछ नताइज ऐसे होते हैं जो सिर्फ़ चंद तलबा की कामयाबी की दास्तान नहीं सुनाते बल्कि पूरी नौजवान नस्ल के लिए पैग़ाम बन जाते हैं। वह बताते हैं कि ख़्वाब कैसे पूरे होते हैं, मंज़िलें कैसे हासिल की जाती हैं और किन कमज़ोरियों से बचकर इंसान अपनी ज़िंदगी बदल सकता है। वह सिर्फ़ यह नहीं बताते कि कौन कामयाब हुआ, बल्कि यह भी वाज़ेह करते हैं कि कामयाबी तक पहुँचने वालों ने कौन-सी आदतें अपनाईं, किन मुश्किलात का सामना किया और किस तरह अपनी कमज़ोरियों पर क़ाबू पाया। हाल ही में जे ई ई एडवांस्ड 2026 के नताइज का ऐलान हुआ। एक लाख उनासी हज़ार से ज़्यादा तलबा इस इम्तिहान में शरीक हुए। उनमें से तक़रीबन सत्तावन हज़ार तलबा कामयाब क़रार पाए। लेकिन पूरे मुल्क की तवज्जोह तीन नौजवानों पर मर्कूज़ हो गई। शुभम कुमार (AIR-1), कबीर छल्लर (AIR-2) और जातन चाहर (AIR-3)। जब हम उनकी कामयाबियों के पीछे झाँकते हैं तो एक हैरतअंगेज़ हक़ीक़त सामने आती है। उनमें से किसी ने कामयाबी का राज़ ग़ैर-मामूली ज़ेहानत को क़रार नहीं दिया। किसी ने यह नहीं कहा कि वह चौबीस घंटे पढ़ते थे। किसी ने शॉर्टकट, जादुई फ़ॉर्मूला या किसी ख़ुफ़िया तकनीक का ज़िक्र नहीं किया। बल्कि तीनों की ज़बान पर तक़रीबन एक ही पैग़ाम था, Dedication, Discipline and Consistency यानी वाबस्तगी, नज़्म-ओ-ज़ब्त और मुस्तक़िल-मिज़ाजी। यही कामयाबी का अस्ल नुस्ख़ा है। बिहार के एक आम घराने से ताल्लुक़ रखने वाले शुभम कुमार ने 360 में से 330 नंबर हासिल करके पूरे हिंदुस्तान में पहली पोज़िशन हासिल की। उनके वालिद हार्डवेयर की एक छोटी-सी दुकान चलाते हैं। उनके ख़ानदान में इंजीनियर बनने का ख़्वाब अभी पहली नस्ल का ख़्वाब था। शुभम ने एक ऐसी बात कही जो हर तालिबे-इल्म को ज़िंदगी भर याद रखनी चाहिए कि कामयाबी लंबे वक़्त तक पढ़ने में नहीं बल्कि मुस्तक़िल-मिज़ाजी और सीखने के अमल पर एतमाद में है। यह जुमला हमारे पूरे तालीमी निज़ाम के लिए आईना है। कबीर छल्लर ने 329 नंबर हासिल किए। वह सिर्फ़ एक नंबर से पहली पोज़िशन से पीछे रह गए, लेकिन उनकी सोच उन्हें लाखों तलबा से आगे ले गई। उन्होंने कभी नंबरों के पीछे दौड़ने की कोशिश नहीं की। वह Concepts को समझने पर तवज्जोह देते रहे। हर इम्तिहान के बाद अपनी ग़लतियों का तजज़िया करते, कमज़ोरियों की फ़ेहरिस्त बनाते और फिर उन्हें दूर करने पर काम करते। उन्होंने साबित किया कि कामयाब तलबा ग़लतियाँ नहीं छुपाते, बल्कि ग़लतियों से सीखते हैं। जातन चाहर ने सातवीं जमाअत से अपनी इल्मी बुनियादें मज़बूत करना शुरू कर दी थीं। उन्होंने ओलंपियाड्स में हिस्सा लिया। साइंस, फ़लकियात, केमिस्ट्री और दीगर इल्मी सरगर्मियों में ख़ुद को मसरूफ़ रखा। फिर एक मरहले पर वह टाइफ़ॉयड का शिकार हो गए। इम्तिहान छूट गए। क्लासें मुतास्सिर हुईं। मगर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। ख़ानदान और असातिज़ा की हौसला-अफ़ज़ाई के साथ दोबारा खड़े हुए और पूरे हिंदुस्तान में तीसरी पोज़िशन हासिल की। जातन ने बताया कि नाकामी, बीमारी या मुश्किलात कामयाबी की राह बंद नहीं करतीं, हिम्मत हार देना कामयाबी की राह बंद करता है। हमारे तलबा इम्तिहानात में क्यों पीछे रह जाते हैं? बतौर मुअल्लिम चालीस साल से ज़्यादा अरसे के तजुर्बे के बाद मैं पूरे यक़ीन से कह सकता हूँ कि आज के तलबा की सबसे बड़ी कमज़ोरी कम ज़ेहानत नहीं है। बल्कि बे-मक़सद मोबाइल इस्तेमाल, सोशल मीडिया की लत, ग़ैर-मुनज़्ज़म मुतालआ, वक़्त का ज़ियाँ, रट्टे पर इनहिसार, कमज़ोर मुतालआ आदात, नींद की कमी, ख़ुद-एहतिसाबी का फ़ुक़दान और जल्द नताइज हासिल करने की ख़्वाहिश — यह वह ख़ामियाँ हैं जो ज़हीन-तरीन तलबा को भी नाकामी की तरफ़ ले जाती हैं। अब सवाल यह है कि अगर हम वाक़ई अपनी ज़िंदगी बदलना चाहते हैं, बड़ी कामयाबी हासिल करना चाहते हैं तो हम क्या करें? इन टॉपर्स की बातें सुनने के बाद यह समझ में आता है कि हमें कामयाबी के लिए एक लाइह-ए-अमल बनाना होगा। कुछ उसूलों को अपनी ज़िंदगी में इख़्तियार करना होगा, मसलन— १. रोज़ाना के अहदाफ़ मुक़र्रर करें। बिना हदफ़ के पढ़ाई, बिना नक़्शे के सफ़र की तरह है। २. मोबाइल का वक़्त महदूद करें। मुतालआ के दौरान मोबाइल मुकम्मल बंद रखें। ३. ग़लतियों की डायरी बनाएँ। हर इम्तिहान के बाद अपनी ग़लतियाँ लिखें। टॉपर्स यही करते हैं। ४. तमाम Concepts समझें। रट्टा वक़्ती नंबर दिला सकता है, फ़हम ज़िंदगी भर कामयाबी देता है। ५. रोज़ाना Revision करें। पढ़ना ज़रूरी है, मगर दोहराना उससे ज़्यादा ज़रूरी है। ६. अच्छी नींद लें। नींद ज़ाया करना मेहनत नहीं बल्कि नुक़सान है। ७. हल्की जिस्मानी वर्ज़िश करें। सेहतमंद जिस्म ही तवील इल्मी सफ़र बर्दाश्त कर सकता है। ८. असातिज़ा से सवाल पूछें। जो तालिबे-इल्म सवाल पूछने से डरता है, वह सीखने से भी महरूम रह जाता है। ९. मुस्तक़िल-मिज़ाजी अपनाएँ। रोज़ाना दो घंटे की मुस्तक़िल पढ़ाई, दस घंटे की ग़ैर-मुस्तक़िल पढ़ाई से बेहतर है। १०. ख़ुद पर यक़ीन रखें। दुनिया आप पर यक़ीन करे या न करे, आपको ख़ुद पर यक़ीन होना चाहिए। इस मौक़े पर वालिदैन से यह गुज़ारिश करना चाहूँगा कि अपने बच्चों पर सिर्फ़ नंबरों का दबाव न डालें। उनके अंदर सीखने की मुहब्बत पैदा करें। उनका मुक़ाबला दूसरों से न करें। उनकी मेहनत को सराहें। उनकी ग़लतियों पर रहनुमाई करें। उनकी कामयाबी के सफ़र में उनके साथी बनें, जज नहीं। वहीं असातिज़ा से यह इल्तिजा है कि आप सिर्फ़ निसाब मुकम्मल न करें बल्कि तलबा के अंदर ख़्वाब भी पैदा करें। एतमाद पैदा करें। सोचने की सलाहियत पैदा करें। क्योंकि तारीख़ ने साबित किया है कि एक अज़ीम उस्ताद हज़ारों ज़िंदगियाँ बदल सकता है। मेरे अज़ीज़ तलबा! याद रखो! शुभम, कबीर और जातन किसी दूसरे सैयारे से नहीं आए थे। वह भी तुम्हारी तरह आम बच्चे थे। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना था कि उन्होंने अपनी आदतों को ग़ैर-मामूली बना लिया। उन्होंने वक़्त की क़द्र की। उन्होंने मुस्तक़िल-मिज़ाजी इख़्तियार की। उन्होंने अपनी ग़लतियों से सीखा। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और यही चीज़ उन्हें लाखों तलबा से मुमताज़ बना गई। आज अगर तुम मोबाइल के इस्तेमाल को क़ाबू में ले लो, अपनी तवज्जोह को महफ़ूज़ कर लो, अपने वक़्त की हिफ़ाज़त कर लो और रोज़ाना थोड़ा-सा बेहतर बनने का अहद कर लो तो यक़ीन जानो आने वाला हिंदुस्तान

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زمین کی آہ اور انسان کی بے خبری

زمین کی آہ اور انسان کی بے خبری قدرت کی تنبیہ، قرآن کی رہنمائی اور انسانیت کے لیے ایک سبق ڈاکٹر اسد اللہ خان بسم اللہ الرحمٰن الرحیم ﴿إِنَّ فِي خَلْقِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَاختِلَافِ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ لآيَاتٍ لِّأُولِي الْأَلْبَابِ﴾ “بے شک آسمانوں اور زمین کی تخلیق، اور رات دن کے بدلتے رہنے میں عقل والوں کے لیے بہت سی نشانیاں ہیں۔” (سورۃ آل عمران: 190) ﴿ظَهَرَ الْفَسَادُ فِي الْبَرِّ وَالْبَحْرِ بِمَا كَسَبَتْ أَيْدِي النَّاسِ لِيُذِيقَهُم بَعْضَ الَّذِي عَمِلُوا لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ﴾ “خشکی اور سمندر میں فساد ظاہر ہو گیا، اس سبب سے جو لوگوں کے ہاتھوں نے کمایا، تاکہ اللہ انہیں ان کے بعض اعمال کا مزہ چکھائے، شاید وہ باز آ جائیں۔” (سورۃ الروم: 41) بے بس انسان اور آفاقی سچائی دنیا روزانہ جاگتی ہے، لیکن ہر صبح ایک جیسی نہیں ہوتی۔ بعض صبحیں سورج کی روشنی کے ساتھ امید لے کر آتی ہیں، اور بعض صبحیں زمین کی لرزش کے ساتھ انسان کو اس کی اصل حیثیت یاد دلا جاتی ہیں۔ کہیں زلزلہ آتا ہے، کہیں سیلاب بستیوں کو نگل جاتا ہے، کہیں آسمان آگ برساتا ہے، کہیں سمندر اپنی حدود توڑ دیتا ہے، اور کہیں ایک معمولی سا وائرس پوری دنیا کی طاقت، معیشت اور ٹیکنالوجی کو گھٹنوں کے بل لا کھڑا کرتا ہے۔ ان واقعات کو اگر صرف “قدرتی آفات” کہہ کر اخبار کے ایک صفحے تک محدود کر دیا جائے تو شاید ہم بہت بڑی حقیقت سے آنکھیں چرا رہے ہیں۔ مومن کے لیے یہ صرف خبریں نہیں ہوتییں، بلکہ اللہ تعالیٰ کی نشانیاں ہوتی ہیں۔ قرآن انہیں “آیات” کہتا ہے؛ ایسی نشانیاں جو انسان کو اس کے رب، اس کی کمزوری، اس کی ذمہ داری اور اس کے انجام کی یاد دلاتی ہیں۔ آج کا انسان چاند پر بستیاں بسانے کے خواب دیکھ رہا ہے، مصنوعی ذہانت کو اپنی عقل کا جانشین سمجھنے لگا ہے، اور چند سیکنڈ میں دنیا کے ایک کونے سے دوسرے کونے تک پیغام پہنچانے پر فخر کرتا ہے۔ اس نے فلک بوس عمارتیں کھڑی کر لیں، سمندر کی تہوں میں اتر گیا، پہاڑوں کو چیر کر شاہراہیں بنا دیں، مگر وہ اب بھی ایک ایسے معمولی سے زلزلے کے سامنے بے بس ہے جو چند لمحوں میں اس کی برسوں کی محنت، دولت، منصوبے اور غرور کو مٹی میں ملا دیتا ہے۔ یہی انسانی حقیقت ہے جسے قرآن نے چودہ سو سال پہلے بیان کر دیا تھا۔ ﴿وَمَا قَدَرُوا اللَّهَ حَقَّ قَدْرِهِ وَالْأَرْضُ جَمِيعًا قَبْضَتُهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ﴾ “انہوں نے اللہ کی قدر ویسی نہ پہچانی جیسی پہچاننے کا حق تھا، حالانکہ قیامت کے دن پوری زمین اس کی مٹھی میں ہوگی۔” (سورۃ الزمر: 67) دنیا کی تاریخ گواہ ہے کہ تہذیبیں صرف جنگوں سے نہیں مٹیں، بعض اوقات ایک جھٹکے نے پوری سلطنتوں کو قصۂ پارینہ بنا دیا۔ قومِ عاد اپنی طاقت پر ناز کرتی تھی، قومِ ثمود اپنے پہاڑ تراش کر محلات بنانے پر فخر کرتی تھی، فرعون اپنے اقتدار کو دائمی سمجھتا تھا، قارون اپنی دولت پر اکڑتا تھا، مگر قدرت نے سب کو ایک لمحے میں تاریخ کا سبق بنا دیا۔ یہی وجہ ہے کہ قرآن بار بار انسان سے سوال کرتا ہے کہ کیا تم نے اپنے سے پہلے لوگوں کا انجام نہیں دیکھا؟ ﴿أفَلَمْ يَسِيرُوا فِي الْأَرْضِ فَيَنظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ﴾ “کیا وہ زمین میں چلتے پھرے نہیں کہ دیکھتے ان لوگوں کا انجام کیا ہوا جو ان سے پہلے گزر چکے تھے؟” (سورۃ یوسف: 109) یہ سوال صرف تاریخ پڑھنے کے لیے نہیں، بلکہ اپنی اصلاح کے لیے ہے۔ سانحات، اخلاقی حس اور دل کا زلزلہ گزشتہ دنوں دنیا کے ایک خطے میں آنے والے شدید زلزلے نے ایک مرتبہ پھر یہی سبق دہرایا۔ چند لمحوں میں مضبوط عمارتیں ملبے میں تبدیل ہو گئیں، ہزاروں خاندان بے گھر ہو گئے، بچے اپنے والدین سے بچھڑ گئے، والدین اپنی اولاد کو ڈھونڈتے رہ گئے، اور وہ لوگ جو چند منٹ پہلے معمول کی زندگی گزار رہے تھے، اچانک موت اور زندگی کے درمیان کھڑے ہو گئے۔ ایسے مناظر ہر حساس انسان کی آنکھ نم کر دیتے ہیں، لیکن سوال یہ ہے کہ کیا یہ مناظر ہمارے دل بھی بدلتے ہیں؟ افسوس یہ ہے کہ ہمارا معاشرہ اب سانحات کو بھی ایک “وائرل ویڈیو” کی طرح دیکھنے لگا ہے۔ چند لمحے افسوس، چند دعائیں، چند تبصرے، اور پھر اگلی خبر؛ گویا انسانی جان کی حرمت بھی خبروں کی رفتار کے ساتھ کم ہوتی جا رہی ہے۔ رسول اللہ ﷺ نے فرمایا: «ارْحَمُوا مَنْ فِي الْأَرْضِ يَرْحَمْكُمْ مَنْ فِي السَّمَاءِ» “زمین والوں پر رحم کرو، آسمان والا تم پر رحم فرمائے گا۔” (جامع الترمذی، حدیث: 1924) اسلام نے ہمیں صرف عبادت گزار نہیں بنایا بلکہ دردِ دل رکھنے والا انسان بنایا ہے۔ مومن وہ ہے جو دوسروں کے دکھ کو اپنا دکھ سمجھے، جو مصیبت زدہ کی مدد کرے، جو بھوکے کو کھانا کھلائے، یتیم کے سر پر ہاتھ رکھے، بے گھر کے لیے پناہ بنے اور مصیبت کے وقت انسانیت کا سہارا بنے۔ رسول اکرم ﷺ نے فرمایا: «مَثَلُ الْمُؤْمِنِينَ فِي تَوَادِّهِمْ وَتَرَاحُمِهِمْ وَتَعَاطُفِهِمْ كَمَثَلِ الْجَسَدِ الْوَاحِدِ» “مومن آپس کی محبت، رحمت اور ہمدردی میں ایک جسم کی مانند ہیں، جس کے ایک عضو کو تکلیف ہو تو پورا جسم بے چین ہو جاتا ہے۔” (صحیح بخاری، حدیث: 6011؛ صحیح مسلم، حدیث: 2586) یہی وہ معیار ہے جس پر ہمیں اپنے ایمان کو پرکھنا چاہیے۔ اگر دنیا کے کسی کونے میں آنے والی آفت ہمارے دل کو نہ ہلائے، اگر کسی ماں کی آہ ہمارے ضمیر کو نہ جگائے، اگر کسی یتیم بچے کے آنسو ہمیں بے چین نہ کریں، تو ہمیں اپنے ایمان کی کیفیت پر ضرور غور کرنا چاہیے۔ قدرت کی ہر تنبیہ ہمیں دو سوالوں کے سامنے لا کھڑا کرتی ہے: پہلا سوال یہ کہ اگر آج یہ آزمائش ان پر آئی ہے تو کیا یقین ہے کہ کل ہمارے دروازے پر دستک نہیں دے گی؟ اور دوسرا، اس سے بھی زیادہ اہم سوال، اگر آج ہماری زندگی کا زلزلہ آ جائے، اگر موت اچانک ہمارے دروازے پر آ کھڑی ہو، تو کیا ہم اپنے رب سے ملاقات کے لیے تیار ہیں؟ یہ سوال کسی جغرافیے، کسی قوم، کسی مذہب یا کسی زبان کا نہیں؛ یہ ہر انسان کا

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چلو اسکول، ناکامی سیکھیں!

جب تعلیم کا پہلا دروازہ ہی احساسِ محرومی میں کھلنے لگے داخلوں کی دوڑ، بچپن کی پہلی شکست اور تعلیم کے بدلتے ہوئے چہرے کی داستان ڈاکٹر اسد اللہ خان وہ صبح، جس دن ایک بچہ پہلی بار ہار گیا صبح کے سات بج رہے تھے۔ بارش ابھی تھمی ہی تھی اور کھڑکی کے شیشوں پر بارش کے چند قطرے اب بھی ایسے ٹھہرے ہوئے تھے جیسے کسی نے وقت کو چند لمحوں کے لیے روک دیا ہو۔ گلی میں اسکول بس کے ہارن کی آواز گونجی تو چار سالہ ساجد اچانک بستر سے اچھل کر اٹھ بیٹھا۔ اس نے دوڑتے ہوئے اپنی ننھی سی پانی کی بوتل اٹھائی، الماری سے نیلے رنگ کا ننھا سا بیگ نکالا، اسے اپنی پشت پر لٹکایا اور آئینے کے سامنے جا کھڑا ہوا۔ وہ خود کو بار بار دیکھ رہا تھا؛ کبھی بیگ سیدھا کرتا، کبھی اپنے بالوں پر ہاتھ پھیرتا، اور کبھی تصور ہی تصور میں کسی ٹیچر کو “گڈ مارننگ میم” کہہ کر مسکرا دیتا۔ اسے یقین تھا کہ آج وہ بھی دوسرے بچوں کی طرح اسکول جائے گا۔ وہ نہیں جانتا تھا کہ اسکول جانے کے لیے صرف معصومیت کافی نہیں رہی، اب اس کے لیے ایک ایسا امتحان ضروری ہے جس کی نہ اسے خبر ہے، نہ اس کے معنی معلوم ہیں، اور نہ اس کے نتائج۔ وہ تو صرف اتنا جانتا ہے کہ اسکول میں دوست ملتے ہیں، رنگ برنگی کتابیں ہوتی ہیں، جھولے ہوتے ہیں، اور شاید ایک ایسی ٹیچر بھی جو ماں کی طرح پیار کرتی ہوگی۔ لیکن اسی وقت گھر کے دوسرے کمرے میں ایک اور منظر چل رہا تھا۔ کھانے کی میز پر داخلہ فارم، آدھار کارڈ کی فوٹو کاپیاں، پیدائش کا سرٹیفکیٹ، بجلی کا بل، بینک اسٹیٹمنٹ، پاسپورٹ سائز تصاویر، پین کارڈ، اور نہ جانے کتنے کاغذات بکھرے ہوئے تھے۔ ساجد کی ماں بار بار ایک فائل کھول کر بند کر رہی تھی۔ باپ خاموش بیٹھا تھا—ایک ایسی خاموشی جس کے اندر کئی طوفان تھے۔ وہ بار بار گھڑی دیکھتا، پھر فائل دیکھتا، پھر اپنے بیٹے کو اور پھر نہ جانے کیوں اپنی ذات کو تکنے لگتا۔ آج امتحان ساجد کا نہیں، بلکہ اس کے والدین کا تھا۔ ان کی زبان، انگریزی، ملازمت، آمدنی، رہن سہن، لباس، شخصیت اور شاید ان کے سماجی مرتبے کا بھی امتحان تھا۔ یہ وہ امتحان تھا جس کا نصاب کسی کتاب میں نہیں ملتا اور جس کی تیاری کسی استاد کے پاس نہیں ہوتی۔ اس کا نتیجہ صرف “داخلہ ملا” یا “داخلہ نہیں ملا” نہیں ہوتا، بلکہ بعض اوقات ایک ننھے سے دل میں یہ پہلا احساس بھی چھوڑ جاتا ہے کہ شاید وہ دوسروں سے کم تر ہے۔ شاید یہی وہ لمحہ ہوتا ہے جب بچپن پہلی بار زندگی کے سامنے ہارنے لگتا ہے۔ داخلے کا موسم یا والدین کا امتحان؟ ہم نے تعلیم کو ہمیشہ روشنی، امید اور مساوات کی علامت سمجھا ہے۔ اسکول وہ جگہ تھی جہاں معاشرے کے ہر طبقے کا بچہ ایک ہی بینچ پر بیٹھ کر یہ سیکھتا تھا کہ علم انسانوں کے درمیان فرق نہیں کرتا۔ استاد وہ شخصیت تھا جو نام، نسب یا آمدنی نہیں پوچھتا تھا، بلکہ صرف یہ دیکھتا تھا کہ سامنے بیٹھا بچہ سیکھنا چاہتا ہے یا نہیں۔ لیکن وقت نے تعلیم کا چہرہ بدل دیا ہے۔ آج بہت سے شہروں میں اسکول کا دروازہ علم سے پہلے سماجی شناخت کو دیکھنے لگا ہے۔ داخلہ فارم اب صرف بچے کی معلومات نہیں مانگتے، بلکہ والدین کی معاشی حیثیت، پیشہ، زبان، تعلیمی قابلیت اور طرزِ زندگی تک جاننے کی کوشش کرتے ہیں۔ یہاں سوال یہ ہے کہ کیا ایک چار سالہ بچے کی قسمت کا فیصلہ واقعی اس کے والدین کی تنخواہ، انگریزی لہجے یا ڈرائنگ روم کے سائز سے ہونا چاہیے؟ ہندوستان میں ہر سال جون کا مہینہ صرف تعلیمی سال کے آغاز کی خبر نہیں لاتا، بلکہ لاکھوں گھروں میں امید اور مایوسی کی ایک نئی داستان رقم کرتا ہے۔ دہلی، ممبئی، بنگلورو، حیدرآباد، پونے، چنئی اور کولکاتا جیسے بڑے شہروں میں ہر سال داخلوں کے موسم میں یہی بے چینی دیکھنے کو ملتی ہے۔ اخبارات میں رات بھر لگنے والی قطاروں، محدود نشستوں اور نرسری داخلوں کے لیے قائم خصوصی کوچنگ سینٹرز پر مسلسل خبریں شائع ہوتی ہیں۔ عدالتوں، ماہرینِ تعلیم اور پالیسی سازوں کے درمیان یہ بحث جاری ہے کہ ابتدائی تعلیم کے دروازے پر انصاف کو کیسے یقینی بنایا جائے۔ لیکن یہ سب کچھ دیکھنے کے باوجود سب سے زیادہ خاموش وہ بچہ ہوتا ہے جس کے نام پر یہ پوری جنگ لڑی جا رہی ہوتی ہے۔ بچپن کی سب سے خوبصورت بات یہ ہے کہ وہ کامیابی اور ناکامی کی لغت سے بے خبر ہوتا ہے۔ چار سال کا بچہ نہ میرٹ جانتا ہے، نہ ویٹنگ لسٹ۔ وہ صرف اتنا جانتا ہے کہ سامنے والے گھر کا علی آج اسکول گیا ہے، لہٰذا وہ بھی جانا چاہتا ہے۔ لیکن جب بڑوں کی دنیا اس کی راہ میں اپنی شرطیں اور دیواریں کھڑی کر دیتی ہے، تو وہ کچھ نہیں سمجھتا۔ وہ صرف اتنا پوچھتا ہے: “ابو… میرا اسکول کب شروع ہوگا؟” یہ سوال بظاہر چھوٹا ہے، مگر ایک حساس باپ کے لیے اس کا جواب پوری زندگی کے مشکل ترین سوالوں میں سے ایک بن جاتا ہے۔ میرے ایک دوست ہیں، نام بدل کر انہیں راشد کہہ لیتے ہیں۔ پیشہ صحافت، کتابوں سے محبت، سچ بولنے کی عادت اور اپنے چار سالہ بیٹے ساجد سے بے پناہ عشق۔ جس دن شہر کے ایک معروف اسکول میں انٹرویو تھا، اس دن راشد نے اپنی بہترین قمیص پہنی اور بیوی نے فائل ترتیب دی۔ ہر کاغذ اپنی جگہ موجود تھا، مگر ایک چیز کہیں درج نہیں تھی: اپنے بچے کے لیے ایک باپ کی محبت، کیونکہ اس محبت کا کوئی خانہ فارم میں موجود نہیں تھا۔ ہمارے معاشرے کا شاید ہی کوئی اور امتحان ہو جس کی تیاری تین سالہ بچہ کم اور اس کے والدین زیادہ کرتے ہوں۔ گھر میں روزانہ مشق ہوتی؛ “گڈ مارننگ”، “تھینک یو”، “ایپل، بال، کیٹ”۔ ماں تصویریں دکھاتی، باپ رنگ یاد کراتا، دادا دعائیں دیتا اور دادی نظر اتارتی۔ انٹرویو شروع ہوا تو راشد کے مطابق چند رسمی سوالات کے بعد گفتگو کا رخ اچانک بدل

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محنت کرے انسان تو کیا ہو نہیں سکتا!

ڈاکٹر اسد اللہ خان آج کے دور میں اعلیٰ تعلیم حاصل کر لینے کے باوجود نوکری پا لینا گویا جوئے شیر لانے سے کم نہیں۔ آپ میں سینکڑوں صلاحیتیں ہوں، مگر اگر ایک بھی “کمی” نظر آ جائے — کوئی جسمانی معذوری، کوئی کمزوری، کوئی “داغ” — تو پورا چراغ نظر انداز کر دیا جاتا ہے۔ کام ناممکن نہیں ہوتا، مگر مشکل ضرور ہو جاتا ہے۔ مجھے ایک ایسے ہی ہونہار نوجوان کا قصہ یاد آتا ہے۔ ملک کے ایک ممتاز انجینئرنگ ادارے سے فارغ التحصیل، تعلیمی ریکارڈ اِس قدر شاندار کہ کاغذات دیکھتے ہی ایک بڑی کمپنی نے اُسے ہاتھوں ہاتھ لینے کا ارادہ کر لیا۔ مگر جب انٹرویو میں یہ کھلا کہ وہ نوجوان قوتِ سماعت کی ایک بیماری میں مبتلا ہے، تو وہی کمپنی — جو ابھی ابھی اُس کی ذہانت پر فریفتہ تھی — چپ چاپ قدم پیچھے کھینچ لائی۔ ڈگری، محنت اور قابلیت — سب ایک “طبی رپورٹ” کے سامنے ہار گئے۔ مگر کہانی یہیں ختم نہیں ہوتی، اور نہ ہونی چاہیے۔ کیونکہ معذوری جسم کی ہوتی ہے، حوصلے کی نہیں۔ تاریخ گواہ ہے کہ جن لوگوں نے دنیا بدلی، اُن میں سے بیشتر نے “کمی” کو “طاقت” میں بدلا۔ آئیے آج ایسے ہی دس روشن چراغوں کی داستانیں سنتے ہیں — جن کی لَو آندھیوں میں بھی بجھی نہیں، بلکہ اور تیز ہوئی۔ عظمت اور ہمت کی روشن مثالیں انسان اگر سچے دل سے کچھ کرنے کا ارادہ کر لے تو جسمانی اعضاء کی محرومی اس کے خوابوں کے آڑے کبھی نہیں آ سکتی۔ تاریخ اور حال کے افق پر ایسے کئی درخشندہ ستارے چمک رہے ہیں جنہوں نے اپنی ہمت کے بلبوتے پر طوفانوں کا رخ موڑ دیا۔ شری کانت بولا (Srikanth Bolla): پیدائشی طور پر مکمل نابینا شری کانت بولا کو بچپن ہی سے انتہائی غربت اور سماجی تعصب کا سامنا کرنا پڑا۔ حد تو یہ ہوئی کہ جب انہوں نے دسویں جماعت کے بعد سائنس پڑھنے کی خواہش ظاہر کی، تو بھارتی نظامِ تعلیم نے ان کے نابینا ہونے کا بہانہ بنا کر صاف انکار کر دیا۔ انہوں نے اس ناانصافی کے آگے سر تسلیم خم کرنے کے بجائے عدالت کا دروازہ کھٹکھٹایا اور چھ ماہ کی طویل قانونی جدوجہد کے بعد کامیابی حاصل کی، جس کے بعد انہوں نے گیارہویں جماعت میں ۹۸ فیصد نمبر لے کر سب کو حیران کر دیا۔ جب ملک کے مایہ ناز ادارے آئی آئی ٹی (IIT) نے بھی انہیں داخلہ دینے سے انکار کیا، تو انہوں نے ہمت ہارنے کے بجائے امریکہ کی مشہور یونیورسٹی ایم آئی ٹی (MIT) کا رخ کیا اور وہاں داخلہ پانے والے پہلے بین الاقوامی نابینا طالب علم بن گئے۔ بھارت واپس آ کر انہوں نے “بولانٹ انڈسٹریز” (Bollant Industries) قائم کی جو ماحول دوست مصنوعات بناتی ہے اور جہاں سیکڑوں معذور افراد کو روزگار فراہم کیا گیا ہے۔ آج شری کانت کروڑوں روپے کی کمپنی کے مالک اور دنیا بھر کے نوجوانوں کے لیے ایک عالمی رول ماڈل ہیں۔ سدھا چندرن (Sudha Chandran): محض ۱۶ سال کی عمر میں ایک خوفناک سڑک حادثے اور ڈاکٹروں کی مجرمانہ غفلت کی وجہ سے سدھا چندرن کی دائیں ٹانگ کاٹنی پڑی۔ ایک کلاسیکل رقاصہ کے لیے یہ مصیبت کسی موت سے کم نہ تھی کیونکہ ان کا پورا کیریئر پاؤں کی تھرکنے سے وابستہ تھا۔ مگر سدھا نے بیساکھیوں کے سہارے جینے کو ٹھکرا دیا اور “جائپور فٹ” (مصنوعی ٹانگ) لگوا کر انتہائی شدید تکلیف کے باوجود دوبارہ رقص سیکھنا شروع کیا۔ مشق کے دوران اکثر ان کے زخموں سے خون بہہ نکلتا تھا، مگر ان کا عزم متزلزل نہ ہوا۔ انہوں نے مصنوعی ٹانگ کے ساتھ اسٹیج پر واپسی کی اور ایسا شاندار رقص پیش کیا کہ پوری دنیا دنگ رہ گئی۔ آج وہ نہ صرف ایک عالمی شہرت یافتہ رقاصہ ہیں بلکہ بھارتی فلم و ٹیلی ویژن کی ایک مانی ہوئی اور کامیاب اداکارہ بھی بن چکی ہیں۔ ایرا سنگھل (Ira Singhal): ریڑھ کی ہڈی کی ایک نایاب بیماری “اسکولیوسس” (Scoliosis) کی وجہ سے ایرا سنگھل کے دونوں بازوؤں کی حرکت انتہائی محدود تھی۔ انہوں نے اپنی اس کمزوری کو پڑھائی کے آڑے نہیں آنے دیا اور ۲۰۱۰ میں ملک کا سب سے مشکل امتحان یو پی ایس سی (UPSC) پاس کیا، مگر انتطامیہ نے ان کی جسمانی حالت کا بہانہ بنا کر انہیں سرکاری ملازمت دینے سے انکار کر دیا۔ ایرا نے اس امتیازی سلوک کو چپ چاپ قبول کرنے کے بجائے سینٹرل ایڈمنسٹریٹو ٹریبونل (CAT) میں کیس دائر کیا اور چار سال تک ایک صبر آزما قانونی جنگ لڑ کر اپنا حق جیتا۔ انہوں نے ۲۰۱۴ میں دوبارہ امتحان دیا اور اس بار نہ صرف کامیاب ہوئیں بلکہ پورے ملک میں پہلی پوزیشن (Rank 1) حاصل کر کے جنرل کیٹیگری میں ٹاپ کیا۔ آج وہ ایک بہترین اور نڈر سول سروسز آفیسر کے طور پر ملک کی خدمت کر رہی ہیں۔ ارونیما سنہا (Arunima Sinha): قومی سطح کی والی بال کھلاڑی ارونیما سنہا کی زندگی میں ۲۰۱۱ میں اس وقت اندھیرا چھا گیا جب کچھ چوروں نے انہیں چلتی ٹرین سے نیچے پھینک دیا، جس کے باعث ان کی ایک ٹانگ کاٹنی پڑی۔ ہسپتال کے بستر پر جہاں لوگ ان پر ترس کھا رہے تھے اور انہیں “بے چاری” سمجھ رہے تھے، انہوں نے وہیں لیٹے لیٹے دنیا کی بلند ترین چوٹی سر کرنے کا ناقابل یقین فیصلہ کیا۔ ہسپتال سے ڈسچارج ہوتے ہی انہوں نے پہلی بھارتی خاتون ایورسٹ فاتح بچیندری پال سے سخت ٹریننگ شروع کی۔ سرپھرے عزم کی بدولت ۲۰۱۳ میں وہ مصنوعی ٹانگ کے ساتھ ماؤنٹ ایورسٹ سر کرنے والی دنیا کی پہلی معذور خاتون بنیں اور اس کے بعد انہوں نے دنیا کے تمام ۷ براعظموں کی بلند ترین چوٹیوں پر کامیابی سے اپنے ملک کا ترنگا لہرایا۔ تاریخ کے مزید روشن ستارے نک وجیسک (Nick Vujicic): آسٹریلیا میں ۱۹۸۲ میں پیدا ہونے والے نک وجیسک کی جسمانی حالت دیکھ کر لوگ کانپ اٹھتے تھے کیونکہ وہ بغیر بازوؤں اور ٹانگوں کے پیدا ہوئے تھے۔ بچپن میں ہم جماعتوں کی ایذا رسانی اور شدید ذہنی اذیت سے تنگ آ کر محض ۱۰ سال کی عمر میں انہوں نے خودکشی کی کوشش کی اور روتے ہوئے اپنی ماں سے پوچھا تھا کہ

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تعلیم کے ذریعے ۔۔۔ تعمیر یا تخریب ؟ ۔۔۔

ڈاکٹر اسد اللہ خان بچوں کو آپ اسکول کیوں بھیجتے ہیں؟ یہ سوال سننے میں جتنا سادہ لگتا ہے، اپنے باطن میں اتنا ہی طوفان سموئے ہوئے ہے۔ یہ ایک سوال نہیں، ایک تہذیب کا احتساب ہے۔ ایک تڑپتے ہوئے باپ کا، ایک فکرمند ماں کا اور ایک بکھرتی ہوئی قوم کا وہ مقدمہ ہے جو آج اپنے ہی ہاتھوں اپنی نسل کو کٹہرے میں کھڑا کر رہی ہے اور اسے خبر بھی نہیں! جب بھی کسی باپ کی آنکھوں میں جھانک کر یہ پوچھا جائے تو جواب ایک ہی لے میں، ایک ہی بے فکری سے آتا ہے: ”بچے پڑھ لکھ کر کچھ بن جائیں۔” لیکن کبھی تنہائی میں بیٹھ کر سوچیے کہ اس ”کچھ بننے” کا خواب کب کا سکڑ کر محض چند ہزار یا چند لاکھ کی کمائی کا ہدف بن چکا ہے؟ شخصیت کی تعمیر، کردار کی پرورش، ذہن کی روشنی — یہ الفاظ اب صرف اسکولوں کے چمکدار بروشروں میں خوبصورت فونٹ میں چھپتے ہیں، کسی کے دل میں نہیں اترتے۔ والدین بچوں کو اسکول ایسے بھیجتے ہیں جیسے خط کو لفافے میں بند کر کے پوسٹ باکس میں ڈال دیا جائے — کہ اب آگے کا ذمہ ڈاکخانے کا ہے، ہمارا کام ختم ہوا۔ سال ۲۰۲۶ء کا یہ وہ لحظہ ہے جب اس سوال کی گہرائی ہماری برداشت سے باہر ہو چکی ہے۔ مصنوعی ذہانت کا طوفان اب دروازے پر دستک نہیں دے رہا، وہ تو ہمارے بیڈرومز اور کلاس رومز کے اندر آ بیٹھا ہے۔ ChatGPT اور Gemini اب ہر چوتھی جماعت کے بچے کی جیب میں ہیں، ہر اسمارٹ فون کے اندر موجود ہیں۔ وہ ہر سوال کا جواب چند سیکنڈ میں اگل دیتے ہیں۔ اب سوال یہ نہیں رہا کہ آپ کے بچے کا حافظہ کتنا تیز ہے اور وہ کتنے جواب جانتا ہے — اب رونے کا مقام یہ ہے کہ کیا وہ سوچنا بھی جانتا ہے؟ کیا ہم ہڈ ماس کے انسان بنا رہے ہیں یا مائیکرو چپس سے چلنے والے بے جان آلے؟ اسکول کی چہار دیواری: درسگاہ یا عقوبت خانہ؟ جس اسکول میں دیر سے آنے کی سزا یہ ہو کہ آٹھ دس کلو کا بستہ کاندھوں پر لاد کر میدان کے دس چکر لگوائے جائیں — وہاں بچے کے قدم اسکول کی طرف شوق سے بڑھیں گے یا خوف سے؟ جس کلاس میں ایک کی غلطی پر پچاس بچوں کے معصوم ہاتھوں پر بید مار کر لال کر دیا جائے، وہاں محبت کا کون سا پھول اگے گا؟ وہاں صرف اور صرف انتقام کا کانٹا پروان چڑھے گا۔ یہ جسمانی اور ذہنی تشدد اب صرف ماضی کا قصہ نہیں رہا، بلکہ آج ہمارے آس پاس روز کا معمول بن چکا ہے۔ ملک کے الگ الگ کونوں سے آنے والی حالیہ خبریں پڑھ کر روح کانپ اٹھتی ہے اور دل خون کے آنسو روتا ہے: بنگلورو کا وحشیانہ واقعہ: ابھی حال ہی میں بنگلورو کے ایک نجی اسکول میں محض دو دن غیر حاضر رہنے پر پانچویں جماعت کے ایک معصوم ۹ سالہ بچے کو اسکول کے انتظامیا نے پلاسٹک کے پائپ سے اس بے رحمی سے پیٹا کہ اس کے پورے جسم پر نیل پڑ گئے، اور حد تو یہ ہے کہ اسے کئی گھنٹوں تک ایک اندھیرے کمرے میں اکیلا بند کر کے تڑپنے کے لیے چھوڑ دیا گیا۔ جب دکھی والدین نے جواب مانگا، تو انہوں نے ڈھٹائی سے کہا: “ہمارے ہاں ڈسپلن سکھانے کا یہی طریقہ ہے!” آندھرا پردیش میں معصومیت پر وار: چتور کے ایک اسکول میں چھٹی جماعت کی ۱۱ سالہ بچی کلاس میں کسی سے بات کر رہی تھی۔ تیش میں آکر استاد نے اس کی طرف اسکول کا بھاری بستہ اٹھا کر پھینکا۔ بستے کے اندر موجود اسٹیل کا لنچ باکس بچی کے سر پر اتنی زور سے لگا کہ وہ وہیں چکرا کر گر گئی۔ بعد میں جب درد نہ رکا تو ہسپتال کے اسکین میں معلوم ہوا کہ اس معصوم بچی کے سر کی ہڈی (Skull) میں فریکچر آچکا ہے۔ کرناٹک کی بربریت: ایک اور دل سوز لہر اس وقت دوڑی جب ایک رہائشی اسکول (Residential School) کے استاد نے ۹ سال کے ایک چھوٹے سے بچے کو صرف اس لیے زمین پر گرا کر بے رحمی سے لاتوں اور تھپڑوں سے پیٹا کیونکہ اس نے ہاسٹل سے اپنے گھر فون کرنے کی “جسارت” کی تھی۔ وہ معصوم بچہ استاد کے پیروں میں گر کر روتے ہوئے معافیاں مانگ رہا تھا، لیکن اس جلاد کا دل نہیں پگھلا۔ یہ چند مثالیں تو وہ ہیں جو میڈیا کی نظر چڑھیں اور ایف آئی آر تک پہنچیں، ورنہ روزانہ ہزاروں معصوم روحیں ان چہار دیواریوں کے پیچھے سسکتی ہیں اور کسی کو خبر تک نہیں ہوتی۔ ہم ڈسپلن کے نام پر بچوں کو تہذیب نہیں سکھا رہے، بلکہ ان کے اندر کے انسان کو قتل کر رہے ہیں۔ یہ تو وہ جسمانی وحشت ہے جو نظر آ جاتی ہے، لیکن اب جو نئی ڈیجیٹل بربریت آئی ہے، اس نے روحوں کو ایسے زخم دیے ہیں جن کا کوئی ایکسرے نہیں ہو سکتا۔ ممبرا، کلیان اور بھیونڈی کے بعض انگریزی اسکولوں میں اب بچوں کے ہوم ورک کا ‘آن لائن ریکارڈ’ رکھا جاتا ہے۔ بچہ رات کو تھک کر سو گیا، ہوم ورک ادھورا رہ گیا۔ صبح کلاس واٹس ایپ گروپ میں، جہاں پچاس دیگر والدین موجود ہیں، بچے کا نام سرخ حروف میں ڈال دیا جاتا ہے جیسے وہ کوئی مجرم ہو۔ ستر سال پہلے اسکولوں میں سزا کے طور پر بچے کے گلے میں تختی لٹکائی جاتی تھی جس پر لکھا ہوتا تھا: ‘I am Donkey’۔ آج وہ تختی ڈیجیٹل ہو گئی ہے — اسکول ایپ پر ریڈ الرٹ، پیرنٹ پورٹل پر نام، ڈیش بورڈ پر رسوائی! ذریعہ بدل گیا، اساتذہ کی وحشیانہ ذہنیت نہیں بدلی۔ کیا یہ تعلیم ہے؟ یا کسی نازک، معصوم آئینے پر پتھر مار مار کر اسے چکنا چور کرنا اور پھر اس کے ملبے کو پالش کر کے کہنا کہ دیکھو ہم نے کتنا چمکدار شیشہ بنایا ہے؟ انگریزی کا بت اور والدین کا سجدہ ہماری قوم نے انگریزی زبان کے ساتھ جو رشتہ جوڑا ہے، وہ اب زبان کا رشتہ نہیں رہا، وہ اندھی پوجا بن چکا ہے۔ ایک ایسا بت

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