चलो स्कूल, नाकामी सीखें!
जब तालीम का पहला दरवाज़ा ही एहसास-ए-महरूमी में खुलने लगे दाख़िलों की दौड़, बचपन की पहली शिकस्त और तालीम के बदलते हुए चेहरे की दास्तान डॉ. असदुल्लाह ख़ान वह सुबह, जिस दिन एक बच्चा पहली बार हार गया सुबह के सात बज रहे थे। बारिश अभी थमी ही थी और खिड़की के शीशों पर बारिश के चंद क़तरे अब भी ऐसे ठहरे हुए थे जैसे किसी ने वक़्त को चंद लम्हों के लिए रोक दिया हो। गली में स्कूल बस के हार्न की आवाज़ गूंजी तो चार साला साजिद अचानक बिस्तर से उछल कर उठ बैठा। उसने दौड़ते हुए अपनी नन्ही सी पानी की बोतल उठाई, अलमारी से नीले रंग का नन्हा सा बैग निकाला, उसे अपनी पुश्त पर लटकाया और आईने के सामने जा खड़ा हुआ। वह ख़ुद को बार-बार देख रहा था; कभी बैग सीधा करता, कभी अपने बालों पर हाथ फेरता, और कभी तसव्वुर ही तसव्वुर में किसी टीचर को “गुड मॉर्निंग मैम” कह कर मुस्कुरा देता। उसे यक़ीन था कि आज वह भी दूसरे बच्चों की तरह स्कूल जाएगा। वह नहीं जानता था कि स्कूल जाने के लिए सिर्फ़ मासूमियत काफ़ी नहीं रही, अब इसके लिए एक ऐसा इम्तिहान ज़रूरी है जिसकी न उसे ख़बर है, न इसके मायने मालूम हैं, और न इसके नताइज (परिणाम)। वह तो सिर्फ़ इतना जानता है कि स्कूल में दोस्त मिलते हैं, रंग-बिरंगी किताबें होती हैं, झूले होते हैं, और शायद एक ऐसी टीचर भी जो मां की तरह प्यार करती होगी। लेकिन इसी वक़्त घर के दूसरे कमरे में एक और मंज़र चल रहा था। खाने की मेज़ पर दाख़िला फ़ॉर्म, आधार कार्ड की फ़ोटो कॉपियां, पैदाइश का सर्टिफ़िकेट, बिजली का बिल, बैंक स्टेटमेंट, पासपोर्ट साइज़ तस्वीरें, पैन कार्ड, और न जाने कितने काग़ज़ात बिखरे हुए थे। साजिद की मां बार-बार एक फ़ाइल खोल कर बंद कर रही थी। बाप ख़ामोश बैठा था—एक ऐसी ख़ामोशी जिसके अंदर कई तूफ़ान थे। वह बार-बार घड़ी देखता, फिर फ़ाइल देखता, फिर अपने बेटे को और फिर न जाने क्यों अपनी ज़ात को तकने लगता। आज इम्तिहान साजिद का नहीं, बल्कि उसके वालिदैन (माता-पिता) का था। उनकी ज़बान, अंग्रेज़ी, मुलाज़मत, आमदनी, रहन-सहन, लिबास, शख़्सियत और शायद उनके समाजी मर्तबे का भी इम्तिहान था। यह वह इम्तिहान था जिसका निसाब (पाठ्यक्रम) किसी किताब में नहीं मिलता और जिसकी तैयारी किसी उस्ताद के पास नहीं होती। इसका नतीजा सिर्फ़ “दाख़िला मिला” या “दाख़िला नहीं मिला” नहीं होता, बल्कि बाज़ औक़ात एक नन्हें से दिल में यह पहला एहसास भी छोड़ जाता है कि शायद वह दूसरों से कमतर है। शायद यही वह लम्हा होता है जब बचपन पहली बार ज़िंदगी के सामने हारने लगता है। दाख़िले का मौसम या वालिदैन का इम्तिहान? हमने तालीम को हमेशा रोशनी, उम्मीद और मसावात (समानता) की अलामत समझा है। स्कूल वह जगह थी जहां मुआशरे (समाज) के हर तबक़े का बच्चा एक ही बेंच पर बैठ कर यह सीखता था कि इल्म इंसानों के दरमियान फ़र्क़ नहीं करता। उस्ताद वह शख़्सियत था जो नाम, नसब या आमदनी नहीं पूछता था, बल्कि सिर्फ़ यह देखता था कि सामने बैठा बच्चा सीखना चाहता है या नहीं। लेकिन वक़्त ने तालीम का चेहरा बदल दिया है। आज बहुत से शहरों में स्कूल का दरवाज़ा इल्म से पहले समाजी शिनाख़्त को देखने लगा है। दाख़िला फ़ॉर्म अब सिर्फ़ बच्चे की मालूमात नहीं मांगते, बल्कि वालिदैन की माशी हैसियत, पेशा, ज़बान, तालीमी क़ाबलियत और तर्ज़-ए-ज़िंदगी तक जानने की कोशिश करते हैं। यहां सवाल यह है कि क्या एक चार साला बच्चे की क़िस्मत का फ़ैसला वाक़ई उसके वालिदैन की तनख़्वाह, अंग्रेज़ी लहजे या ड्राइंग रूम के साइज़ से होना चाहिए? हिंदुस्तान में हर साल जून का महीना सिर्फ़ तालीमी साल के आग़ाज़ की ख़बर नहीं लाता, बल्कि लाखों घरों में उम्मीद और मायूसी की एक नई दास्तान रक़म करता है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, चेन्नई और कोलकाता जैसे बड़े शहरों में हर साल दाख़िलों के मौसम में यही बेचैनी देखने को मिलती है। अख़बारात में रात भर लगने वाली क़तारों, महदूद (सीमित) नशस्तों (सीटों) और नर्सरी दाख़िलों के लिए क़ायम ख़ुसूसी कोचिंग सेंटर्स पर मुसलसल ख़बरें शाया होती हैं। अदालतों, माहिरीन-ए-तालीम और पॉलिसी साज़ों के दरमियान यह बहस जारी है कि इब्तिदाई (प्राथमिक) तालीम के दरवाज़े पर इंसाफ़ को कैसे यक़ीनी बनाया जाए। लेकिन यह सब कुछ देखने के बावजूद सबसे ज़्यादा ख़ामोश वह बच्चा होता है जिसके नाम पर यह पूरी जंग लड़ी जा रही होती है। बचपन की सबसे ख़ूबसूरत बात यह है कि वह कामयाबी और नाकामी की लुग़त (शब्दकोश) से बेख़बर होता है। चार साल का बच्चा न मेरिट जानता है, न वेटिंग लिस्ट। वह सिर्फ़ इतना जानता है कि सामने वाले घर का अली आज स्कूल गया है, लिहाज़ा वह भी जाना चाहता है। लेकिन जब बड़ों की दुनिया उसकी राह में अपनी शर्तें और दीवारें खड़ी कर देती है, तो वह कुछ नहीं समझता। वह सिर्फ़ इतना पूछता है: “अब्बू… मेरा स्कूल कब शुरू होगा?” यह सवाल बज़ाहिर छोटा है, मगर एक हस्सास (संवेदनशील) बाप के लिए इसका जवाब पूरी ज़िंदगी के मुश्किल तरीन सवालों में से एक बन जाता है। मेरे एक दोस्त हैं, नाम बदल कर उन्हें राशिद कह लेते हैं। पेशा सहाफ़त (पत्रकारिता), किताबों से मोहब्बत, सच बोलने की आदत और अपने चार साला बेटे साजिद से बेपनाह इश्क़। जिस दिन शहर के एक मारूफ़ (प्रसिद्ध) स्कूल में इंटरव्यू था, उस दिन राशिद ने अपनी बेहतरीन क़मीज़ पहनी और बीवी ने फ़ाइल तरतीब दी। हर काग़ज़ अपनी जगह मौजूद था, मगर एक चीज़ कहीं दर्ज नहीं थी: अपने बच्चे के लिए एक बाप की मोहब्बत, क्योंकि इस मोहब्बत का कोई ख़ाना फ़ॉर्म में मौजूद नहीं था। हमारे मुआशरे का शायद ही कोई और इम्तिहान हो जिसकी तैयारी तीन साला बच्चा कम और उसके वालिदैन ज़्यादा करते हों। घर में रोज़ाना मश्क़ होती; “गुड मॉर्निंग”, “थैंक यू”, “एप्पल, बॉल, कैट”। मां तस्वीरें दिखाती, बाप रंग याद कराता, दादा दुआएं देता और दादी नज़र उतारती। इंटरव्यू शुरू हुआ तो राशिद के मुताबिक़ चंद रस्मी सवालात के बाद गुफ़्तगू का रुख़ अचानक बदल गया। “आप क्या करते हैं? माहना आमदनी कितनी है? घर अपना है या किराए का? कितने कमरों का फ़्लैट है? घर में कौन
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