The Founder’s Compendium

استاد: مصلوب فرشتہ

عہدِ حاضر میں معلم کی مظلومیت، مسئولیت اور معراج کا نوحہ اور احتساب نامہ ڈاکٹر اسد اللہ خان جو معلم ہو وہ مفکر ہو، جو مفکر ہو وہ آزاد ہو — اور جو آزاد نہ ہو وہ نہ خود جی سکتا ہے نہ دوسروں کو جینا سکھا سکتا ہے ہر عہد اپنے استاد کو ایک نئے صلیب پر چڑھاتا ہے۔ کبھی غربت کی صلیب، کبھی غلامی کی، کبھی پورٹل اور ڈیٹا کی، اور کبھی اپنی ہی ذات کے زوال کی۔ یہ مضمون دو مختلف لمحوں، دو مختلف موسموں اور دو مختلف کیفیتوں میں لکھا گیا تھا — ایک میں استاد مظلوم تھا، دوسرے میں اس کی اپنی ذمہ داری زیرِ بحث تھی۔ مگر جب دونوں آوازوں کو ایک ساتھ سنا جائے تو ایک ہی سچائی ابھرتی ہے: استاد آج دہری چکی میں پس رہا ہے — ایک طرف نظام اسے غلام بناتا ہے، دوسری طرف ذمہ داری کا بوجھ اسے آزمائش میں ڈالتا ہے۔ یہ تحریر اسی دوہرے سچ کا حساب ہے۔ باب اول: ہڈپسر کا سبق — جب استاد، پیون سے بھی کم تھا ہم پونہ میں ہڈپسر کے مقام پر ایک تعلیمی کانفرنس میں مدعو تھے۔ ہمیں لینے کے لیے جو صاحب اسٹیشن پر آئے، ان کے لباس اور انداز سے ہرگز یہ گمان نہ گزرا کہ وہ ایک استاد ہیں۔ انہوں نے ہمارا سامان اٹھایا، بڑی عقیدت سے اپنے اسکوٹر پر بٹھایا اور جلسہ گاہ تک لے آئے۔ کانفرنس کے دوران وہ یہاں وہاں دوڑتے رہے، مہمانوں کے ہاتھ دھلواتے رہے، اور ہم نے اپنی آنکھوں سے دیکھا کہ وہ پلیٹیں دھو رہے تھے جب کہ ان کے ساتھی کھانا پروسنے میں مصروف تھے۔ کانفرنس میں اساتذہ کی ذمہ داریوں پر خوب دھواں دھار تقریریں ہوئیں، اور میزبان چیئرمین کو اس دور کے سرسید کا خطاب دیا گیا۔ ہم اسے پیون ہی سمجھتے رہے، یہاں تک کہ واپسی کے آدھے راستے میں ان کے اسکوٹر کا پیٹرول ختم ہو گیا۔ دم لینے کو ہم نے انہیں چائے کی دعوت دی، اور چائے کی چسکیوں کے دوران جو حقائق سامنے آئے، انہوں نے ہمیں حیرت کے سمندر میں غرق کر دیا۔ یہ دبلا پتلا نوجوان، جس کی تعلیمی لیاقت بی۔اے، بی۔ایڈ تھی، ایک معاون مدرّس تھا — مگر اسکول میں اس کی اور اس کے ساتھیوں کی اوقات پیون سے بدتر تھی۔ کئی برسوں سے وہ اس اسکول میں ملازم تھا، 5-7 ہزار روپے ماہوار کا یہ غلام اسکول کے لیے ریتی گارا بھی ڈھو چکا تھا اور دیواروں کو رنگ و روغن بھی کر چکا تھا۔ اگر کبھی اپنا حق مانگے تو اسکول سے نکال دیا جائے۔ پوری تنخواہ مانگنے کی مجال تو کیا، وہ اسکوٹر میں تیل بھروانے کے لیے بھی اپنے آقا کے سامنے گڑگڑانے پر مجبور تھا۔ شاید یہی وجہ تھی کہ رخصت ہوتے وقت پیٹرول کے پیسے مانگنے پر چیئرمین صاحب کی اہلیہ نے اسے بری طرح ڈانٹا تھا، اور اب وہ اسی کی سزا آدھے راستے سے اسکوٹر گھسیٹ کر بھگت رہا تھا۔ اپنی بے بسی کی داستان سناتے ہوئے اس کی ہچکیاں بندھ گئیں۔ عین اسی لمحے ہمارے کانوں میں کانفرنس کے ان مقالوں کی گونج سنائی دے رہی تھی جن میں اساتذہ کو ان کی ذمہ داریوں کا احساس دلایا گیا تھا۔ یہ صرف ایک ہڈپسر کی کہانی نہیں — یہ ریاست بھر کے بیشتر اردو اسکولوں کا نوحہ ہے۔ مردم شماری ہو، سروے ہو، الیکشن کی ڈیوٹی ہو، شناختی کارڈ بانٹنے ہوں یا جھونپڑوں کے فوٹو پاس — ہر سرکاری کام انہی کے کندھوں پر آ کر ٹکتا ہے۔ اور جب وہ یہ غیر تدریسی کام کرنے ہفتوں، مہینوں کے لیے جماعتوں سے غائب رہتے ہیں تو انہی جماعتوں کا کباڑہ ہو جاتا ہے۔ نتیجہ؟ کھیپ کی کھیپ برباد۔ “ہم اسکول کی بنیاد کے پتھر ہیں، ہم نے اپنے لہو سے اسے سینچا ہے — لیکن کیا ہے ہماری اوقات؟” باب دوم: عہدِ جدید کا غلام — جب پورٹل، عزت سے بڑا ہو گیا ہڈپسر کے اس استاد کی زنجیر آج بھی نہیں ٹوٹی — صرف اس کی شکل بدل گئی ہے۔ کل وہ پلیٹیں دھو رہا تھا، آج وہ اسکرین پر ڈیٹا بھر رہا ہے۔ کل اسکوٹر کا پیٹرول مانگنے پر ڈانٹ پڑتی تھی، آج GPS لوکیشن نہ ملنے پر تنخواہ روک لی جاتی ہے۔ آج ہمارے تعلیمی نظام کا سب سے گہرا بحران نصاب کا نہیں، عمارت کا نہیں، وسائل کا نہیں — استاد کا ہے۔ وہ استاد جو صدیوں سے تہذیب کا امین اور روح کا مربی رہا، آج آہستہ آہستہ ایک انتظامی کارکن، ڈیٹا آپریٹر اور پورٹل ملازم میں تبدیل کیا جا رہا ہے۔ اسکول گرمیوں کی چھٹیوں کے لیے بند ہو جاتے ہیں، کلاس روم خاموش ہو جاتے ہیں، بچے آزاد ہو جاتے ہیں — مگر استاد آزاد نہیں ہوتا۔ اس کے موبائل پر پیغامات جاری رہتے ہیں، واٹس ایپ گروپس زندہ رہتے ہیں، پورٹل کھلے رہتے ہیں اور نئے احکامات کسی بھی وقت اس کا سکون منسوخ کر دیتے ہیں۔ یہی وجہ ہے کہ اساتذہ کے لیے آخری پیریڈ کبھی نہیں آیا۔ یہ محض ٹائم ٹیبل کا آخری پیریڈ نہیں — یہ زندگی کا وہ وقفہ ہے جس کے بعد انسان کو سکون، غور و فکر اور اپنے وجود کی طرف لوٹنے کا موقع ملتا ہے۔ جدید استاد کی زندگی سے یہ موقع چھن چکا ہے۔ اعداد و شمار کی زبان میں دیکھیں تو بھارت میں ایک کروڑ سے زائد اساتذہ تعلیمی نظام سے وابستہ ہیں، اور ان میں سے ساٹھ فیصد سے زیادہ غیر تدریسی فرائض کے بوجھ تلے دبے ہیں۔ ایک لاکھ سے زائد ایسے اسکول ہیں جہاں صرف ایک استاد، اکیلے، پانچ جماعتوں کو پڑھانے، کھانا پکوانے، ڈیٹا بھرنے اور مردم شماری کرنے کی ذمہ داری نبھاتا ہے۔ UDISE+، DIKSHA، MDM، SATS، NISHTHA اور ULLAS جیسے درجنوں پورٹلز پر اتنا وقت صرف ہوتا ہے کہ حقیقی تدریسی وقت سکڑتا چلا جاتا ہے۔ ایک استاد کے الفاظ یاد رکھنے کے قابل ہیں: شام چار بجے کی گھنٹی بجتی ہے مگر میں پھر بھی نہیں جاتا — ابھی پورٹل باقی ہے۔ دسمبر 2025 میں مہاراشٹر کے وزیرِ تعلیم نے وزیرِ اعلیٰ کو خط لکھ کر مطالبہ کیا کہ اساتذہ کو بوتھ لیول آفیسر اور دیگر انتخابی کاموں سے فوری چھٹکارا دیا

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दस्ते-ख़िज़्र से शम्अ-ए-हिदायत ही छिन गई!

इस्तिदाद का क़हत, असातिज़ा की ऑनलाइन तिजारत और नई नस्ल का फ़िक्री क़त्ले-आम डॉ. असदुल्लाह ख़ान इत्तिलाआत व मालूमात का यह धमाका-ख़ेज़ दौर, जहाँ मस्नूई ज़ेहानत इंसानी सोच के मुतबादिल के तौर पर उभर रही है, वहाँ एक ऐसे उस्ताद की ज़रूरत थी जो मादी तरक़्क़ी के इस दौर में नई नस्ल के ज़मीर का निगहबान बनता। क़ौमों की तामीरे-नौ में उस्ताद का वुजूद रीढ़ की हड्डी की मानिंद होता है, क्योंकि उस्ताद सिर्फ़ किताब नहीं पढ़ाता, वह रूह की तराश-ख़राश करता है। कारे-मुअल्लिमी दरअसल कारे-नुबुव्वत है, जिसका मंसब तक़द्दुस और ज़िम्मेदारी का तक़ाज़ा करता है। लेकिन अफ़सोस! आज सन 2026 के हिंदुस्तान में जब हम अपने तालीमी ढाँचे और असातिज़ा की तरबियत के निज़ाम (Teacher Education) पर निगाह डालते हैं, तो रूह काँप उठती है। रहबर ही जब राहज़न बन जाएँ, तो कारवाँ की तबाही का गिला किससे किया जाए? हमने जिस दौर में बी.एड. कॉलेजों की बोलियों का रोना रोया था, वह तो महज़ नक़्द रक़म और चंद हज़ार रुपये की हीरा-फेरी का इब्तिदाई दौर था। आज का दौर तो डिजिटल माफ़िया और इदाराजाती बदउनवानी का वह मुहीब समंदर है जिसने पूरे मुल्क के मुस्तक़बिल को अपनी लपेट में ले लिया है। आज मीडिया की सुर्ख़ियां और अदालतों के फ़ैसले गवाह हैं कि असातिज़ा की तय्यारी से लेकर उनकी तअय्युनाती तक का पूरा निज़ाम कैंसर की आख़िरी स्टेज पर खड़ा है। महाराष्ट्र का (TAIT) और (TET) अभी ज़्यादा अर्सा नहीं गुज़रा जब महाराष्ट्र टीचर्स एलिजिबिलिटी टेस्ट (TET) में हज़ारों ऐसे असातिज़ा के नाम सामने आए जिन्होंने लाखों रुपये की रिशवत देकर कम्प्यूटराइज़्ड रिज़ल्ट शीट्स में अपने नम्बर बढ़वाए। जो उस्ताद ख़ुद एक अहलकार को चाय-पानी के नाम पर रिशवत देकर, या सर्वर हैक करवा कर पास हुआ हो, वह पुणे, नागपुर या मुम्बई के स्कूलों में बैठकर अगली नस्ल को दियानतदारी का क्या सबक़ देगा? उत्तर प्रदेश में असातिज़ा की भर्ती टीचर भर्ती के इम्तिहानात और बिहार के बीपीएससी टीचर इम्तिहानात के दौरान ब्लूटूथ डिवाइसेस, सॉल्वर गैंग्स (Solver Gangs) और पेपर लीक के जो शर्मनाक वाक़िआत सामने आए, उन्होंने मेरिट का जनाज़ा निकाल दिया। दसवीं जमाअत की किताब का दुरुस्त तलफ़्फ़ुज़ न कर पाने वाले, और ब्लैकबोर्ड पर अंग्रेज़ी में एजुकेशन की हिज्जे ग़लत लिखने वाले लोग लाखों रुपये की बोली लगाकर स्कूलों में ‘मुस्तक़्बिल के मेमार’ बनकर बैठ गए। बी.एड. और एम.एड. कालिजेस अब तालीमगाहें नहीं, शादी हॉलों की तरह नफ़ा-बख़्श कारोबार हैं। नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन और यूनिवर्सिटियों की जो मुआइना टीमें आती हैं, उनके लिए फ़ाइव स्टार होटलों में क़ियाम और डिजिटल ट्रांसफ़र्स के ज़रिए पहले ही सब कुछ तय कर दिया जाता है। कालिज में न लाइब्रेरी है, न लेबोरेटरी, न लेसन प्लान का वजूद—बस साल के आख़िर में एक सर्टिफ़ाइड मज़दूर तैयार करके मार्केट में फेंक दिया जाता है। उस्ताद जब ख़ुद इल्म के समन्दर से महरूम हो, तो वह दूसरों की प्यास क्या बुझाएगा? आज जो फ़ौज इन ट्रेनिंग कालिजों से निकल रही है, वह तालीम की ग़ैर-पैदावारी प्रोडक्ट है। यह वह भीड़ है जो किसी और पेशे में जगह न पा सकी, तो आख़िरी हर्बे के तौर पर मुअल्लिमी के मुक़द्दस पेशे में घुस आई। रवायती तालीमी निज़ाम का उस्ताद अपनी ज़ात में एक चलती-फिरती दरसगाह हुआ करता था। उसका अस्ल सरमाया उसका ज़ाती मुताला, किताबों से गहरा तअल्लुक़, लाइब्रेरियों से वाबस्तगी और इल्म के लिए न ख़त्म होने वाली प्यास होती थी। उसकी शख़्सियत में वक़ार, गुफ़्तार में संजीदगी और किरदार में ऐसी पुख़्तगी होती थी जो तुलबा के लिए ख़ुद एक ज़िन्दा नमूना बन जाती थी। उसके नज़दीक तदरीस सिर्फ़ निसाब मुकम्मल करने का नाम नहीं थी, बल्कि वह तालिब-ए-इल्म की शख़्सियत साज़ी, अख़लाक़ी तरबियत, फ़िक्री बालीदगी और किरदार की तामीर को अपनी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी समझता था। इम्तिहानात भी उसके नज़दीक महज़ नम्बर हासिल करने का ज़रिया नहीं थे, बल्कि वह सख़्त मेहनत, गहरी फ़िक्र, अस्ल इल्म और दियानतदाराना जांच के ज़रिए तालिब-ए-इल्म की हक़ीक़ी सलाहियत को परखने का पैमाना होते थे। इसके बरअक्स, जदीद दौर का नाम-निहाद सर्टिफ़ाइड उस्ताद एक ऐसे निज़ाम की पैदावार बनता जा रहा है जहां ख़ुद मुताला तक़रीबन ख़त्म हो चुका है। किताबों की जगह गूगल सर्च, तहक़ीक़ी मुताले की जगह वाट्सएप यूनिवर्सिटी, और इल्मी गुफ़्तगू की जगह सोशल मीडिया के मुख़्तसर क्लिप्स और रील्स ने ले ली है। क्लास रूम, जो कभी इल्म व हिकमत का मरकज़ था, अब बाज़ औक़ात महज़ रस्मी हाज़िरी और वक़्त गुज़ारी का मुक़ाम बनकर रह गया है। तदरीस का मक़सद भी तालिब-ए-इल्म की फ़िक्री और अख़लाक़ी तरबियत के बजाय सिर्फ़ हाज़िरी मुकम्मल करना, तन्ख़वाह हासिल करना और फ़ोटोकॉपी शुदा नोट्स तक़सीम करके अपनी ज़िम्मेदारी पूरी समझ लेना रह गया है। इसी ज़वाल का सबसे अफ़सोसनाक इज़हार इम्तिहानी निज़ाम में दिखाई देता है, जहां कभी मेहनत, इस्तिदाद और इल्मी क़ाबलियत कामयाबी का मेआर हुआ करती थी, वहां आज पेपर लीक, सॉल्वर गैंग्स, ग़ैर-क़ानूनी ज़राए, नुक़्ल, और जाली कामयाबियों की मण्डी ने मेरिट का गला घोंट दिया है। नतीजतन ऐसे अफ़राद तदरीस जैसे मुक़द्दस पेशे में दाख़िल हो रहे हैं जिनके पास डिग्रियां तो मौजूद हैं, मगर न इल्म की गहराई है, न तहक़ीक़ की सलाहियत, न किरदार की मज़बूती और न ही नई नस्ल की रहनुमाई का शुऊर। यही वह बुनियादी फ़र्क़ है जो रवायती मुअल्लिम और जदीद सर्टिफ़ाइड उस्ताद के दरमियान एक फ़िक्री, अख़लाक़ी और तहज़ीबी ख़लीज पैदा कर देता है, और यही ख़लीज आज हमारे पूरे तालीमी निज़ाम के ज़वाल की सबसे बड़ी अलामत बन चुकी है। जज़बाती और फ़िक्री दीवालियापन (हमें यह मानना होगा) कि हमारी अगली नस्लें गूंगी और ज़ेहनी तौर पर अपाहज होती जा रही हैं। इसकी वजह यह नहीं कि उनके पास मालूमात नहीं हैं, बल्कि वजह यह है कि उनके पास सही रहबर नहीं है। जब एक उस्ताद क्लास रूम में जाकर ख़ुद अपने मोबाइल में मसरूफ़ हो जाता है, या यूट्यूब की किसी सस्ती वीडियो का सहारा लेकर अपना लेक्चर पूरा करता है, तो वह तालिब-ए-इल्म के अन्दर छुपी तक़्लीक़ी सलाहियत का गला घोंट देता हैं। अलिफ़ के नाम पर लट्ठ लिए फिरने वाले यह पी.एच.डी. और अपना नाम तक दुरुस्त अंग्रेज़ी या उर्दू में न लिख पाने वाले यह बी.एड. असातिज़ा, दरअसल इस निज़ाम के मुजरिम हैं जिसने सलाहियत के बजाय ‘सिफ़ारिश और सरमाये’ को तरजीह

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बच्चे हमारे अहद के चालाक हो गए!!!

जदीद समाजी ज़वाल, डिजिटल यल्ग़ार और मासूमियत का क़त्ल-ए-आम डॉ. असदुल्लाह ख़ान देहली पब्लिक स्कूल के उस पुराने एमएमएस स्कैंडल को गुज़रे बरसों बीत गए, जिसे कभी समाज ने एक ग़ैर-मुतवक़्क़े (अप्रत्याशित) ज़लज़ला समझा था। उस वक़्त लोग चौंके थे कि पानी सर से ऊँचा हो चुका है। लेकिन आज, सन 2026 ई. के इस महीब (भयानक) डिजिटल दौर में जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो वो पुराना वाक़िया महज़ एक मासूमना लग़ज़िश (भूल) महसूस होता है। आज पानी सर से ऊँचा नहीं हुआ, बल्कि पूरा मुआशरा (समाज) ही इख़लाक़ी (नैतिक) दिवालियेपन और बे-हंगम टेक्नोलॉजी के तूफ़ान में ग़र्क़ हो चुका है। अब चौंकने का वक़्त भी गुज़र गया, अब तो सिर्फ़ मातम का दौर है। कल का बच्चा वक़्त से पहले बालिग़ हो रहा था, मगर आज का बच्चा वक़्त से पहले “चालबाज़” और मुजरिमाना ज़ेहनियत का हामिल (युक्त) हो रहा है। कल मासूमियत दाग़दार हुई थी, आज मासूमियत का बीज ही दज्जाली टेक्नोलॉजी की भट्टी में झुलसकर राख हो चुका है। आज हिंदुस्तान, बा-ख़ूसूस (विशेषकर) महाराष्ट्र और मुल्क के दीगर (अन्य) हिस्सों से रोज़ाना जो ख़बरें अख़बारात की सुर्खियाँ बनती हैं, वो रूह को कपकपा देने के लिए काफ़ी हैं। मुंबई और पुणे जैसे मेट्रो शहरों में नौवीं और दसवीं जमात (कक्षा) के मासूम नज़र आने वाले बच्चे इंस्टाग्राम और दीगर सोशल मीडिया ऐप्स पर जाली (फ़र्ज़ी) प्रोफ़ाइल्स बनाकर अपने ही हम-जमातों (सहपाठियों) या बड़ों को “हनी ट्रैप” कर रहे हैं और लाखों रुपये बटोर रहे हैं। मसनूई ज़हानत (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के इस दौर में अब किसी कैमरे से चोरी-छिपे वीडियो बनाने की ज़रूरत भी नहीं रही। स्कूल के बच्चे अपने ही दोस्तों और असातिज़ा (शिक्षकों) की तस्वीरों को चंद सेकेंड्स में “डीपफेक” टेक्नोलॉजी के ज़रिए नाज़ेबा (आपत्तिजनक) तस्वीरों और वीडियोज़ में तब्दील करके वायरल करने की धमकियाँ दे रहे हैं। महाराष्ट्र साइबर सेल के रिकॉर्ड्स ऐसे ना-बालिग़ मुजरिमों की दास्तानों से भरे पड़े हैं। बच्चों के बस्तों से अब सिर्फ़ मानए-हमल अद्वियात (गर्भनिरोधक दवाएँ) ही नहीं निकलतीं, बल्कि उनके मोबाइल वॉलेट्स में लाखों रुपये की डिजिटल करेंसी और ऑनलाइन सस्ते नशे सप्लाई करने वाले नेटवर्क्स के लिंक्स मिलते हैं, जिनका सुराग़ लगाना क़ानून के लिए भी दर्द-ए-सर बन चुका है। दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर या कोलकाता का कोई नाम-निहाद बा-वक़ार (प्रतिष्ठित) स्कूल अब इस वबा (महामारी) से महफ़ूज़ नहीं है। कच्ची उम्र की “मारिया” अब गली के नुक्कड़ पर ‘रॉकी’ का इंतज़ार नहीं करती, वो डेटिंग ऐप्स के ख़ुफ़िया चैट रूम्स में रात भर वर्चुअल उरियानियत (अश्लीलता) का सौदा करती है। “पुष्पा” अब सिर्फ़ बस्ता लेकर घर से ग़ायब नहीं होती, वो ऑनलाइन घोटाले के ज़रिए सरहद पार बैठे मुजरिमों के चंगुल में फँसकर इंसानी स्मगलिंग का ईंधन बन जाती है। उरियानियत का नया रूप: ओटीटी और प्राइवेट स्क्रीन्स हमारी नस्ल ने जिस “इडियट बॉक्स” यानी टेलीविज़न का रोना रोया था, वो तो अब ड्रॉइंग रूम का एक बे-ज़रर (हानिरहित) शो-पीस बनकर रह गया है। अब असल फ़ित्ना (आफ़त) हर बच्चे की जेब में मौजूद “ज़ाती स्क्रीन” (पर्सनल स्क्रीन) है। ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स पर सेंसरशिप की धज्जियाँ उड़ाते हुए जो मवाद (कांटेंट) पिघलाकर बच्चों के ज़ेहन में उतारा जा रहा है, उसने हया और पाकीज़गी के मफ़ाहीम (मायने) ही बदल दिए हैं। इंस्टाग्राम रील्स पर चंद “लाइक्स” और “व्यूज़” के लिए बारह-चौदह साल की बच्चियों का नीम-बरहना (अर्ध-नग्न) रक़्स और लड़कों का गैंग्स्टर कल्चर को आइडियल बनाना अब एक आम चलन है। इंटरनेट अब मालूमात (जानकारी) का ज़रिया नहीं, शहवत (कामुकता), ख़ुशूनत (हिंसा) और ज़ेहनी गंदगी का वो समंदर है जिसका कोई किनारा नहीं। नफ़्सियाती ज़वाल और ख़ुदकुशियों का सैलाब जब एक कच्चा और ना-पुख़्ता ज़ेहन इस महीब दलदल में क़दम रखता है, तो वो इसके अंजाम से बे-ख़बर होता है। वो सिर्फ़ एक “तजुर्बा” करना चाहता है, लेकिन ये तजुर्बा उसे एक ऐसे अंधे कुएँ में धकेल देता है जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं होता। पहले झिझक मरती है, फिर हया रुख़्सत होती है, फिर अक़्ल का चिराग़ गुल होता है और आख़िरकार जब वो अमली इक़दाम (कदम उठाने) की ज़िल्लत में फँसता है, तो ब्लैकमेलिंग, बदनामी और ज़ेहनी दबाव (तनाव) उसे मौत के मुँह में धकेल देते हैं। ये कोई फ़र्ज़ी कहानी नहीं है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के ताज़ा तरीन आदाद-ओ-शुमार (आँकड़े) गवाह हैं कि मुल्क में ना-बालिग़ बच्चों में ख़ुदकुशी की शरह (दर) में होल्नाक हद तक इज़ाफ़ा हुआ है। पिछली दहाई (दशक) के मुक़ाबले में नशा-आवर अश्या (मादक पदार्थों) का इस्तेमाल स्कूल के बच्चों में दुगना हो चुका है। कम-उम्र बच्चे अब जड़ाईम (अपराधों) की दुनिया का सिर्फ़ ईंधन नहीं हैं, बल्कि वो शूटर, सप्लायर और हैकर बनकर उभर रहे हैं। समाज के दानिशवर (बुद्धिजीवी) अब भी वही पुराना राग अलाप रहे हैं: “सेक्स एजुकेशन।” मगर सवाल ये है कि क्या सेक्स एजुकेशन इस तूफ़ान को रोक सकती है? हमारे स्कूलों का निज़ाम, जहाँ असातिज़ा ख़ुद इख़लाक़ी ज़वाल का शिकार हैं या इस मौज़ू (विषय) की हस्सासियत (संवेदनशीलता) से ना-वाक़िफ़ हैं, वहाँ ये तालीम सिर्फ़ एक तमाशा बनकर रह जाती है। हुकूमतें निसाब (पाठ्यक्रम) बदलती हैं, क्लासें चलाती हैं, लेकिन नतीजा? मासूम ज़ेहनों को वक़्त से पहले वो सब कुछ पता चल जाता है जिसकी उन्हें ज़रूरत भी नहीं थी। ये इलाज नहीं, बल्कि कच्चे ज़ेहनों में जिंसी जरासीम (यौन कीटाणुओं) की दानिस्ता (जानबूझकर) पैवंदकारी (प्लांटेशन) है। काम बनने के बजाय मज़ीद (और) बिगड़ जाता है। अभी हाल ही में महाराष्ट्र के दारुल-हुकूमत (राजधानी) मुंबई के एक इंतिहाई महँगे और नामवर इंटरनेशनल स्कूल का एक वाक़िया सामने आया, जिसने पुलिस और माहिरीन-ए-नफ़्सियात (मनोवैज्ञानिकों) दोनों को हिलाकर रख दिया। दसवीं जमात के तीन लड़कों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के टूल्स इस्तेमाल करके अपनी ही हम-जमात लड़कियों की तस्वीरों को नाज़ेबा और बरहना तस्वीरों में तब्दील कर दिया। बात यहाँ ख़त्म नहीं हुई। इन चौदह-पंद्रह साल के बच्चों ने इन तस्वीरों को सोशल मीडिया पर वायरल करने की धकमी देकर उन लड़कियों से लाखों रुपये और महँगे गैजेट्स का मुतालबा (माँग) किया। जब एक लड़की ने डिप्रेशन में आकर ख़ुदकुशी की कोशिश की, तब जाकर ये उक़्दा (राज़) खुला। ज़रा सोचिए, जिस उम्र में बच्चे खिलौनों और पढ़ाई के तनाव से गुज़रते थे, उस उम्र में वे साइबर क्राइम और ब्लैकमेलिंग के मास्टरमाइंड बन चुके हैं। ना-बालिग़ों में नशाख़ोरी का चलन महाराष्ट्र के

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دستِ خضر سے شمعِ ہدایت ہی چھن گئی!

استعداد کا قحط، اساتذہ کی آن لائن تجارت اور نئی نسل کا فکری قتلِ عام ڈاکٹر اسد اللہ خان اطلاعات و معلومات کا یہ دھماکہ خیز دور، جہاں مصنوعی ذہانت انسانی سوچ کے متبادل کے طور پر ابھر رہی ہے، وہاں ایک ایسے استاد کی ضرورت تھی جو مادی ترقی کے اس دور میں نئی نسل کے ضمیر کا نگہبان بنتا۔ قوموں کی تعمیرِ نو میں استاد کا وجود ریڑھ کی ہڈی کی مانند ہوتا ہے، کیونکہ استاد صرف کتاب نہیں پڑھاتا، وہ روح کی تراش خراش کرتا ہے۔ کارِ معلمی دراصل کارِ نبوت ہے، جس کا منصب تقدس اور ذمہ داری کا تقاضا کرتا ہے۔ لیکن افسوس! آج سن 2026ء کے ہندوستان میں جب ہم اپنے تعلیمی ڈھانچے اور اساتذہ کی تربیت کے نظام (Teacher Education) پر نگاہ ڈالتے ہیں، تو روح کانپ اٹھتی ہے۔ رہبر ہی جب راہزن بن جائیں، تو کارواں کی تباہی کا گلہ کس سے کیا جائے؟ ہم نے جس دور میں بی ایڈ کالجوں کی بولیوں کا رونا رویا تھا، وہ تو محض نقد رقم اور چند ہزار روپے کی ہیرا پھیری کا ابتدائی دور تھا۔ آج کا دور تو ڈیجیٹل مافیا اور ادارہ جاتی بدعنوانی کا وہ مہیب سمندر ہے جس نے پورے ملک کے مستقبل کو اپنی لپیٹ میں لے لیا ہے۔ آج میڈیا کی سرخیاں اور عدالتوں کے فیصلے گواہ ہیں کہ اساتذہ کی تیاری سے لے کر ان کی تعیناتی تک کا پورا نظام کینسر کی آخری اسٹیج پر کھڑا ہے۔ مہاراشٹرا کا ٹی اے آئی ٹی (TAIT) اور ٹی ای ٹی (TET) ابھی زیادہ عرصہ نہیں گزرا جب مہاراشٹرا ٹیچرز ایلیجیبلٹی ٹیسٹ (TET) میں ہزاروں ایسے اساتذہ کے نام سامنے آئے جنہوں نے لاکھوں روپے کی رشوت دے کر کمپیوٹرائزڈ رزلٹ شیٹس میں اپنے نمبر بڑھوائے۔ جو استاد خود ایک اہلکار کو چائے پانی کے نام پر رشوت دے کر، یا سرور ہیک کروا کر پاس ہوا ہو، وہ پونے، ناگپور یا ممبئی کے اسکولوں میں بیٹھ کر اگلی نسل کو دیانت داری کا کیا سبق دے گا؟ اتر پردیش میں اساتذہ کی بھرتی ٹیچر بھرتی کے امتحانات اور بہار کے بی پی ایس سی ٹیچر امتحانات کے دوران بلیو ٹوتھ ڈیوائسز، سالور گینگز (Solver Gangs) اور پیپر لیک کے جو شرمناک واقعات سامنے آئے، انہوں نے میرٹ کا جنازہ نکال دیا۔ دسویں جماعت کی کتاب کا درست تلفظ نہ کر پانے والے، اور بلیک بورڈ پر انگریزی میں ایجوکیشن کی ہجے غلط لکھنے والے لوگ لاکھوں روپے کی بولی لگا کر اسکولوں میں ‘مستقبل کے معمار’ بن کر بیٹھ گئے۔ بی ایڈ اور ایم ایڈ کالجز اب تعلیم گاہیں نہیں، شادی ہالوں کی طرح نفع بخش کاروبار ہیں۔ نیشنل کونسل فار ٹیچر ایجوکیشن اور یونیورسٹیوں کی جو معائنہ ٹیمیں آتی ہیں، ان کے لیے فائیو اسٹار ہوٹلوں میں قیام اور ڈیجیٹل ٹرانسفرز کے ذریعے پہلے ہی سب کچھ طے کر دیا جاتا ہے۔ کالج میں نہ لائبریری ہے، نہ لیبارٹری، نہ لیسن پلان کا وجود—بس سال کے آخر میں ایک سرٹیفائیڈ مزدور تیار کر کے مارکیٹ میں پھینک دیا جاتا ہے۔ استاد جب خود علم کے سمندر سے محروم ہو، تو وہ دوسروں کی پیاس کیا بجھائے گا؟ آج جو فوج ان ٹریننگ کالجوں سے نکل رہی ہے، وہ تعلیم کی غیر پیداواری پروڈکٹ ہے۔ یہ وہ بھیڑ ہے جو کسی اور پیشے میں جگہ نہ پا سکی، تو آخری حربے کے طور پر معلمی کے مقدس پیشے میں گھس آئی۔ روایتی تعلیمی نظام کا استاد اپنی ذات میں ایک چلتی پھرتی درسگاہ ہوا کرتا تھا۔ اس کا اصل سرمایہ اس کا ذاتی مطالعہ، کتابوں سے گہرا تعلق، لائبریریوں سے وابستگی اور علم کے لیے نہ ختم ہونے والی پیاس ہوتی تھی۔ اس کی شخصیت میں وقار، گفتار میں سنجیدگی اور کردار میں ایسی پختگی ہوتی تھی جو طلبہ کے لیے خود ایک زندہ نمونہ بن جاتی تھی۔ اس کے نزدیک تدریس صرف نصاب مکمل کرنے کا نام نہیں تھی، بلکہ وہ طالب علم کی شخصیت سازی، اخلاقی تربیت، فکری بالیدگی اور کردار کی تعمیر کو اپنی سب سے بڑی ذمہ داری سمجھتا تھا۔ امتحانات بھی اس کے نزدیک محض نمبر حاصل کرنے کا ذریعہ نہیں تھے، بلکہ وہ سخت محنت، گہری فکر، اصل علم اور دیانت دارانہ جانچ کے ذریعے طالب علم کی حقیقی صلاحیت کو پرکھنے کا پیمانہ ہوتے تھے۔ اس کے برعکس، جدید دور کا نام نہاد سرٹیفائیڈ استاد ایک ایسے نظام کی پیداوار بنتا جا رہا ہے جہاں خود مطالعہ تقریباً ختم ہو چکا ہے۔ کتابوں کی جگہ گوگل سرچ، تحقیقی مطالعے کی جگہ واٹس ایپ یونیورسٹی، اور علمی گفتگو کی جگہ سوشل میڈیا کے مختصر کلپس اور ریلز نے لے لی ہے۔ کلاس روم، جو کبھی علم و حکمت کا مرکز تھا، اب بعض اوقات محض رسمی حاضری اور وقت گزاری کا مقام بن کر رہ گیا ہے۔ تدریس کا مقصد بھی طالب علم کی فکری اور اخلاقی تربیت کے بجائے صرف حاضری مکمل کرنا، تنخواہ حاصل کرنا اور فوٹو کاپی شدہ نوٹس تقسیم کر کے اپنی ذمہ داری پوری سمجھ لینا رہ گیا ہے۔ اسی زوال کا سب سے افسوسناک اظہار امتحانی نظام میں دکھائی دیتا ہے، جہاں کبھی محنت، استعداد اور علمی قابلیت کامیابی کا معیار ہوا کرتی تھی، وہاں آج پیپر لیک، سالور گینگز، غیر قانونی ذرائع، نقل، اور جعلی کامیابیوں کی منڈی نے میرٹ کا گلا گھونٹ دیا ہے۔ نتیجتاً ایسے افراد تدریس جیسے مقدس پیشے میں داخل ہو رہے ہیں جن کے پاس ڈگریاں تو موجود ہیں، مگر نہ علم کی گہرائی ہے، نہ تحقیق کی صلاحیت، نہ کردار کی مضبوطی اور نہ ہی نئی نسل کی رہنمائی کا شعور۔ یہی وہ بنیادی فرق ہے جو روایتی معلم اور جدید سرٹیفائیڈ استاد کے درمیان ایک فکری، اخلاقی اور تہذیبی خلیج پیدا کر دیتا ہے، اور یہی خلیج آج ہمارے پورے تعلیمی نظام کے زوال کی سب سے بڑی علامت بن چکی ہے۔ جذباتی اور فکری دیوالیہ پن ہمیں یہ ماننا ہوگا کہ ہماری اگلی نسلیں گونگی اور ذہنی طور پر اپاہج ہوتی جا رہی ہیں۔ اس کی وجہ یہ نہیں کہ ان کے پاس معلومات نہیں ہیں، بلکہ وجہ یہ ہے کہ ان کے پاس صحیح رہبر نہیں ہے۔ جب ایک استاد کلاس روم میں جا کر

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بچےّ ہمارے عہد کے چالاک ہوگئے!!!

جدید سماجی زوال، ڈیجیٹل یلغار اور معصومیت کا قتلِ عام ڈاکٹر اسداللہ خان دہلی پبلک اسکول کے اس پرانے ایم ایم ایس اسکینڈل کو گزرے برسوں بیت گئے، جسے کبھی سماج نے ایک غیر متوقع زلزلہ سمجھا تھا۔ اس وقت لوگ چونکے تھے کہ پانی سر سے اونچا ہو چکا ہے۔ لیکن آج، سن 2026ء کے اس مہیب ڈیجیٹل دور میں جب ہم پیچھے مڑ کر دیکھتے ہیں، تو وہ پرانا واقعہ محض ایک معصومانہ لغزش محسوس ہوتا ہے۔ آج پانی سر سے اونچا نہیں ہوا، بلکہ پورا معاشرہ ہی اخلاقی دیوالیہ پن اور بے ہنگم ٹیکنالوجی کے طوفان میں غرق ہو چکا ہے۔ اب چونکنے کا وقت بھی گزر گیا، اب تو صرف ماتم کا دور ہے۔ کل کا بچہ وقت سے پہلے بالغ ہو رہا تھا، مگر آج کا بچہ وقت سے پہلے “چالباز” اور مجرمانہ ذہنیت کا حامل ہو رہا ہے۔ کل معصومیت داغدار ہوئی تھی، آج معصومیت کا بیج ہی دجالی ٹیکنالوجی کی بھٹی میں جھلس کر راکھ ہو چکا ہے۔آج ہندوستان، بالخصوص مہاراشٹرا اور ملک کے دیگر حصوں سے روزانہ جو خبریں اخبارات کی سرخیاں بنتی ہیں، وہ روح کو کپکپا دینے کے لیے کافی ہیں۔ ممبئی اور پونے جیسے میٹرو شہروں میں نویں اور دسویں جماعت کے معصوم نظر آنے والے بچے انسٹاگرام اور دیگر سوشل میڈیا ایپس پر جعلی پروفائلز بنا کر اپنے ہی ہم جماعتوں یا بڑوں کو “ہنی ٹریپ” کر رہے ہیں اور لاکھوں روپے بٹور رہے ہیں۔ مصنوعی ذہانت کے اس دور میں اب کسی کیمرے سے چوری چھپے ویڈیو بنانے کی ضرورت بھی نہیں رہی۔ اسکول کے بچے اپنے ہی دوستوں اور اساتذہ کی تصاویر کو چند سیکنڈز میں “ڈیپ فیک” ٹیکنالوجی کے ذریعے نازیبا تصاویر اور ویڈیوز میں تبدیل کر کے وائرل کرنے کی دھمکیاں دے رہے ہیں۔ مہاراشٹرا سائبر سیل کے ریکارڈز ایسے نابالغ مجرموں کی داستانوں سے بھرے پڑے ہیں۔ بچوں کے بستوں سے اب صرف مانع حمل ادویات ہی نہیں نکلتیں، بلکہ ان کے موبائل والٹس میں لاکھوں روپے کی ڈیجیٹل کرنسی اور آن لائن سستے نشے سپلائی کرنے والے نیٹ ورکس کے لنکس ملتے ہیں، جن کا سراغ لگانا قانون کے لیے بھی دردِ سر بن چکا ہے۔ دہلی، ممبئی، بنگلور یا کولکتہ کا کوئی نام نہاد باوقار اسکول اب اس وبا سے محفوظ نہیں ہے۔ کچی عمر کی “ماریا” اب گلی کے نکر پر راکی کا انتظار نہیں کرتی، وہ ڈیٹنگ ایپس کے خفیہ چیٹ رومز میں رات بھر ورچوئل عریانیت کا سودا کرتی ہے۔ “پشپا” اب صرف بستہ لے کر گھر سے غائب نہیں ہوتی، وہ آن لائن گھوٹالے کے ذریعے سرحد پار بیٹھے مجرموں کے چنگل میں پھنس کر انسانی اسمگلنگ کا ایندھن بن جاتی ہے۔ عریانیت کا نیا روپ: او ٹی ٹی اور پرائیویٹ اسکرینز ہماری نسل نے جس “ایڈیٹ باکس” یعنی ٹیلی ویژن کا رونا رویا تھا، وہ تو اب ڈرائنگ روم کا ایک بے ضرر شو پیس بن کر رہ گیا ہے۔ اب اصل فتنہ ہر بچے کی جیب میں موجود “ذاتی اسکرین” ہے۔ او ٹی ٹی پلیٹ فارمز پر سنسرشپ کی دھجیاں اڑاتے ہوئے جو مواد پگھلا کر بچوں کے ذہنوں میں اتارا جا رہا ہے، اس نے حیا اور پاکیزگی کے مفاہیم ہی بدل دیے ہیں۔انسٹاگرام ریلز پر چند “لائکس” اور “ویوز” کے لیے بارہ چودہ سال کی بچیوں کا نیم برہنہ رقص اور لڑکوں کا گینگسٹر کلچر کو آئیڈیل بنانا اب ایک عام چلن ہے۔ انٹرنیٹ اب معلومات کا ذریعہ نہیں، شہوت، خشونت اور ذہنی گندگی کا وہ سمندر ہے جس کا کوئی کنارہ نہیں۔ نفسیاتی زوال اور خودکشیوں کا سیلاب جب ایک کچا اور ناپختہ ذہن اس مہیب دلدل میں قدم رکھتا ہے، تو وہ اس کے انجام سے بے خبر ہوتا ہے۔ وہ صرف ایک “تجربہ” کرنا چاہتا ہے، لیکن یہ تجربہ اسے ایک ایسے اندھے کنویں میں دھکیل دیتا ہے جہاں سے واپسی کا کوئی راستہ نہیں ہوتا۔ پہلے جھجک مرتی ہے، پھر حیا رخصت ہوتی ہے، پھر عقل کا چراغ گل ہوتا ہے اور آخر کار جب وہ عملی اقدام کی ذلت میں پھنستا ہے، تو بلیک میلنگ، بدنامی اور ذہنی دباؤ اسے موت کے منہ میں دھکیل دیتے ہیں۔ یہ کوئی فرضی کہانی نہیں ہے۔ نیشنل کرائم ریکارڈز بیورو کے تازہ ترین اعداد و شمار گواہ ہیں کہ ملک میں نابالغ بچوں میں خودکشی کی شرح میں ہولناک حد تک اضافہ ہوا ہے۔ پچھلی دہائی کے مقابلے میں نشہ آور اشیاء کا استعمال اسکول کے بچوں میں دگنا ہو چکا ہے۔ کم عمر بچے اب جرائم کی دنیا کا صرف ایندھن نہیں ہیں، بلکہ وہ شوٹر، سپلائر اور ہیکر بن کر ابھر رہے ہیں۔ سماج کے دانشور اب بھی وہی پرانا راگ الاپ رہے ہیں: “سیکس ایجوکیشن۔” مگر سوال یہ ہے کہ کیا سیکس ایجوکیشن اس طوفان کو روک سکتی ہے؟ ہمارے اسکولوں کا نظام، جہاں اساتذہ خود اخلاقی زوال کا شکار ہیں یا اس موضوع کی حساسیت سے ناواقف ہیں، وہاں یہ تعلیم صرف ایک تماشہ بن کر رہ جاتی ہے۔ حکومتیں نصاب بدلتی ہیں، کلاسیں چلاتی ہیں، لیکن نتیجہ؟ معصوم ذہنوں کو وقت سے پہلے وہ سب کچھ پتا چل جاتا ہے جس کی انہیں ضرورت بھی نہیں تھی۔ یہ علاج نہیں، بلکہ کچے ذہنوں میں جنسی جراثیم کی دانستہ پیوند کاری ہے۔ کام بننے کے بجائے مزید بگڑ جاتا ہے۔ ابھی حال ہی میں مہاراشٹرا کے دارالحکومت ممبئی کے ایک انتہائی مہنگے اور نامور انٹرنیشنل اسکول کا ایک واقعہ سامنے آیا، جس نے پولیس اور ماہرینِ نفسیات دونوں کو ہلا کر رکھ دیا۔ دسویں جماعت کے تین لڑکوں نے آرٹیفیشل انٹیلیجنس کے ٹولز استعمال کر کے اپنی ہی ہم جماعت لڑکیوں کی تصاویر کو نازیبا اور برہنہ تصاویر میں تبدیل کر دیا۔ بات یہاں ختم نہیں ہوئی۔ ان چودہ پندرہ سال کے بچوں نے ان تصاویر کو سوشل میڈیا پر وائرل کرنے کی دھمکی دے کر ان لڑکیوں سے لاکھوں روپے اور مہنگے گجٹس کا مطالبہ کیا۔ جب ایک لڑکی نے ڈپریشن میں آ کر خودکشی کی کوشش کی، تب جا کر یہ عقدہ کھلا۔ ذرا سوچیے، جس عمر میں بچے کھلونوں اور پڑھائی کے تناؤ سے گزرتے تھے، اس عمر میں وہ سائبر کرائم اور بلیک میلنگ کے ماسٹر مائنڈ بن چکے ہیں۔ نابالغوں میں

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चलो स्कूल, नाकामी सीखें!

जब तालीम का पहला दरवाज़ा ही एहसास-ए-महरूमी में खुलने लगे दाख़िलों की दौड़, बचपन की पहली शिकस्त और तालीम के बदलते हुए चेहरे की दास्तान डॉ. असदुल्लाह ख़ान वह सुबह, जिस दिन एक बच्चा पहली बार हार गया सुबह के सात बज रहे थे। बारिश अभी थमी ही थी और खिड़की के शीशों पर बारिश के चंद क़तरे अब भी ऐसे ठहरे हुए थे जैसे किसी ने वक़्त को चंद लम्हों के लिए रोक दिया हो। गली में स्कूल बस के हार्न की आवाज़ गूंजी तो चार साला साजिद अचानक बिस्तर से उछल कर उठ बैठा। उसने दौड़ते हुए अपनी नन्ही सी पानी की बोतल उठाई, अलमारी से नीले रंग का नन्हा सा बैग निकाला, उसे अपनी पुश्त पर लटकाया और आईने के सामने जा खड़ा हुआ। वह ख़ुद को बार-बार देख रहा था; कभी बैग सीधा करता, कभी अपने बालों पर हाथ फेरता, और कभी तसव्वुर ही तसव्वुर में किसी टीचर को “गुड मॉर्निंग मैम” कह कर मुस्कुरा देता। उसे यक़ीन था कि आज वह भी दूसरे बच्चों की तरह स्कूल जाएगा। वह नहीं जानता था कि स्कूल जाने के लिए सिर्फ़ मासूमियत काफ़ी नहीं रही, अब इसके लिए एक ऐसा इम्तिहान ज़रूरी है जिसकी न उसे ख़बर है, न इसके मायने मालूम हैं, और न इसके नताइज (परिणाम)। वह तो सिर्फ़ इतना जानता है कि स्कूल में दोस्त मिलते हैं, रंग-बिरंगी किताबें होती हैं, झूले होते हैं, और शायद एक ऐसी टीचर भी जो मां की तरह प्यार करती होगी। लेकिन इसी वक़्त घर के दूसरे कमरे में एक और मंज़र चल रहा था। खाने की मेज़ पर दाख़िला फ़ॉर्म, आधार कार्ड की फ़ोटो कॉपियां, पैदाइश का सर्टिफ़िकेट, बिजली का बिल, बैंक स्टेटमेंट, पासपोर्ट साइज़ तस्वीरें, पैन कार्ड, और न जाने कितने काग़ज़ात बिखरे हुए थे। साजिद की मां बार-बार एक फ़ाइल खोल कर बंद कर रही थी। बाप ख़ामोश बैठा था—एक ऐसी ख़ामोशी जिसके अंदर कई तूफ़ान थे। वह बार-बार घड़ी देखता, फिर फ़ाइल देखता, फिर अपने बेटे को और फिर न जाने क्यों अपनी ज़ात को तकने लगता। आज इम्तिहान साजिद का नहीं, बल्कि उसके वालिदैन (माता-पिता) का था। उनकी ज़बान, अंग्रेज़ी, मुलाज़मत, आमदनी, रहन-सहन, लिबास, शख़्सियत और शायद उनके समाजी मर्तबे का भी इम्तिहान था। यह वह इम्तिहान था जिसका निसाब (पाठ्यक्रम) किसी किताब में नहीं मिलता और जिसकी तैयारी किसी उस्ताद के पास नहीं होती। इसका नतीजा सिर्फ़ “दाख़िला मिला” या “दाख़िला नहीं मिला” नहीं होता, बल्कि बाज़ औक़ात एक नन्हें से दिल में यह पहला एहसास भी छोड़ जाता है कि शायद वह दूसरों से कमतर है। शायद यही वह लम्हा होता है जब बचपन पहली बार ज़िंदगी के सामने हारने लगता है। दाख़िले का मौसम या वालिदैन का इम्तिहान? हमने तालीम को हमेशा रोशनी, उम्मीद और मसावात (समानता) की अलामत समझा है। स्कूल वह जगह थी जहां मुआशरे (समाज) के हर तबक़े का बच्चा एक ही बेंच पर बैठ कर यह सीखता था कि इल्म इंसानों के दरमियान फ़र्क़ नहीं करता। उस्ताद वह शख़्सियत था जो नाम, नसब या आमदनी नहीं पूछता था, बल्कि सिर्फ़ यह देखता था कि सामने बैठा बच्चा सीखना चाहता है या नहीं। लेकिन वक़्त ने तालीम का चेहरा बदल दिया है। आज बहुत से शहरों में स्कूल का दरवाज़ा इल्म से पहले समाजी शिनाख़्त को देखने लगा है। दाख़िला फ़ॉर्म अब सिर्फ़ बच्चे की मालूमात नहीं मांगते, बल्कि वालिदैन की माशी हैसियत, पेशा, ज़बान, तालीमी क़ाबलियत और तर्ज़-ए-ज़िंदगी तक जानने की कोशिश करते हैं। यहां सवाल यह है कि क्या एक चार साला बच्चे की क़िस्मत का फ़ैसला वाक़ई उसके वालिदैन की तनख़्वाह, अंग्रेज़ी लहजे या ड्राइंग रूम के साइज़ से होना चाहिए? हिंदुस्तान में हर साल जून का महीना सिर्फ़ तालीमी साल के आग़ाज़ की ख़बर नहीं लाता, बल्कि लाखों घरों में उम्मीद और मायूसी की एक नई दास्तान रक़म करता है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, चेन्नई और कोलकाता जैसे बड़े शहरों में हर साल दाख़िलों के मौसम में यही बेचैनी देखने को मिलती है। अख़बारात में रात भर लगने वाली क़तारों, महदूद (सीमित) नशस्तों (सीटों) और नर्सरी दाख़िलों के लिए क़ायम ख़ुसूसी कोचिंग सेंटर्स पर मुसलसल ख़बरें शाया होती हैं। अदालतों, माहिरीन-ए-तालीम और पॉलिसी साज़ों के दरमियान यह बहस जारी है कि इब्तिदाई (प्राथमिक) तालीम के दरवाज़े पर इंसाफ़ को कैसे यक़ीनी बनाया जाए। लेकिन यह सब कुछ देखने के बावजूद सबसे ज़्यादा ख़ामोश वह बच्चा होता है जिसके नाम पर यह पूरी जंग लड़ी जा रही होती है। बचपन की सबसे ख़ूबसूरत बात यह है कि वह कामयाबी और नाकामी की लुग़त (शब्दकोश) से बेख़बर होता है। चार साल का बच्चा न मेरिट जानता है, न वेटिंग लिस्ट। वह सिर्फ़ इतना जानता है कि सामने वाले घर का अली आज स्कूल गया है, लिहाज़ा वह भी जाना चाहता है। लेकिन जब बड़ों की दुनिया उसकी राह में अपनी शर्तें और दीवारें खड़ी कर देती है, तो वह कुछ नहीं समझता। वह सिर्फ़ इतना पूछता है: “अब्बू… मेरा स्कूल कब शुरू होगा?” यह सवाल बज़ाहिर छोटा है, मगर एक हस्सास (संवेदनशील) बाप के लिए इसका जवाब पूरी ज़िंदगी के मुश्किल तरीन सवालों में से एक बन जाता है। मेरे एक दोस्त हैं, नाम बदल कर उन्हें राशिद कह लेते हैं। पेशा सहाफ़त (पत्रकारिता), किताबों से मोहब्बत, सच बोलने की आदत और अपने चार साला बेटे साजिद से बेपनाह इश्क़। जिस दिन शहर के एक मारूफ़ (प्रसिद्ध) स्कूल में इंटरव्यू था, उस दिन राशिद ने अपनी बेहतरीन क़मीज़ पहनी और बीवी ने फ़ाइल तरतीब दी। हर काग़ज़ अपनी जगह मौजूद था, मगर एक चीज़ कहीं दर्ज नहीं थी: अपने बच्चे के लिए एक बाप की मोहब्बत, क्योंकि इस मोहब्बत का कोई ख़ाना फ़ॉर्म में मौजूद नहीं था। हमारे मुआशरे का शायद ही कोई और इम्तिहान हो जिसकी तैयारी तीन साला बच्चा कम और उसके वालिदैन ज़्यादा करते हों। घर में रोज़ाना मश्क़ होती; “गुड मॉर्निंग”, “थैंक यू”, “एप्पल, बॉल, कैट”। मां तस्वीरें दिखाती, बाप रंग याद कराता, दादा दुआएं देता और दादी नज़र उतारती। इंटरव्यू शुरू हुआ तो राशिद के मुताबिक़ चंद रस्मी सवालात के बाद गुफ़्तगू का रुख़ अचानक बदल गया। “आप क्या करते हैं? माहना आमदनी कितनी है? घर अपना है या किराए का? कितने कमरों का फ़्लैट है? घर में कौन

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तालीम के ज़रिए۔۔۔ तामीर या तख़रीब ? ۔۔۔

डॉ. असदुल्लाह ख़ान बच्चों को आप स्कूल क्यों भेजते हैं? यह सवाल सुनने में जितना सादा लगता है, अपने बातिन (अंदर) में उतना ही तूफ़ान समोए हुए है। यह एक सवाल नहीं, एक तहज़ीब का एहतसाब (आत्म-मूल्यांकन) है। एक तड़पते हुए बाप का, एक फ़िक्रमंद मां का और एक बिखरती हुई क़ौम का वह मुक़दमा है जो आज अपने ही हाथों अपनी नस्ल को कटहरे में खड़ा कर रही है और इसे ख़बर भी नहीं! जब भी किसी बाप की आंखों में झांक कर यह पूछा जाए तो जवाब एक ही लय में, एक ही बेफ़िक्री से आता है: ”बच्चे पढ़ लिख कर कुछ बन जाएं।” लेकिन कभी तन्हाई में बैठकर सोचिए कि इस ”कुछ बनने” का ख़वाब कब का सुकड़ कर महज़ चंद हज़ार या चंद लाख की कमाई का हदफ़ (लक्ष्य) बन चुका है? शख़्सियत की तामीर, किरदार की परवरिश, ज़ेहन की रोशनी — यह अलफ़ाज़ अब सिर्फ़ स्कूलों के चमकदार ब्रोशरों में ख़ूबसूरत फ़ॉन्ट में छपते हैं, किसी के दिल में नहीं उतरते। वालिदैन बच्चों को स्कूल ऐसे भेजते हैं जैसे ख़त को लिफ़ाफ़े में बंद करके पोस्ट बॉक्स में डाल दिया जाए — कि अब आगे का ज़िम्मा डाकख़ाने का है, हमारा काम ख़त्म हुआ। साल २०२६ء का यह वह लमहा है जब इस सवाल की गहराई हमारी बर्दाश्त से बाहर हो चुकी है। मसनूई ज़हानत (Artificial Intelligence) का तूफ़ान अब दरवाज़े पर दस्तक नहीं दे रहा, वह तो हमारे बेडरूम्स और क्लास रूम्स के अंदर आ बैठा है। ChatGPT और Gemini अब हर चौथी जमात के बच्चे की जेब में हैं, हर स्मार्टफ़ोन के अंदर मौजूद हैं। वह हर सवाल का जवाब चंद सेकंड में उगल देते हैं। अब सवाल यह नहीं रहा कि आपके बच्चे का हाफ़िज़ा (याददाश्त) कितना तेज़ है और वह कितने जवाब जानता है — अब रोने का मुक़ाम यह है कि क्या वह सोचना भी जानता है? क्या हम हाड़-मांस के इंसान बना रहे हैं या माइक्रोचिप्स से चलने वाले बेजान आले (यंत्र)? स्कूल की चहार दीवारी: दरसगाह या उक़ूबत ख़ाना? जिस स्कूल में देर से आने की सज़ा यह हो कि आठ-दस किलो का बस्ता कांधों पर लाद कर मैदान के दस चक्कर लगवाए जाएं — वहां बच्चे के क़दम स्कूल की तरफ़ शौक़ से बढ़ेंगे या ख़ौफ़ से? जिस क्लास में एक की ग़लती पर पचास बच्चों के मासूम हाथों पर बेद मार कर लाल कर दिया जाए, वहां मोहब्बत का कौन सा फूल उगेगा? वहां सिर्फ़ इंतक़ाम (बदले) का कांटा परवान चढ़ेगा। यह जिस्मानी और ज़ेहनी तशद्दुद (हिंसा) अब सिर्फ़ माज़ी (भूतकाल) का क़िस्सा नहीं रहा, बल्कि आज हमारे आस-पास रोज़ का मामूल बन चुका है। मुल्क के अलग-अलग कोनों से आने वाली हालिया ख़बरें पढ़ कर रूह कांप उठती है और दिल ख़ून के आंसू रोता है: बेंगलुरु का वहशियाना वाक़िया: अभी हाल ही में बेंगलुरु के एक निजी स्कूल में महज़ दो दिन ग़ैर-हाज़िर रहने पर पांचवीं जमात के एक मासूम ९ साल के बच्चे को स्कूल के इंतिज़ामिया (प्रबंधन) ने प्लास्टिक के पाइप से इस बेरहमी से पीटा कि उसके पूरे जिस्म पर नील पड़ गए, और हद तो यह है कि उसे कई घंटों तक एक अंधेरे कमरे में अकेला बंद करके तड़पने के लिए छोड़ दिया गया। जब दुखी वालिदैन ने जवाब मांगा, तो उन्होंने ढिटाई से कहा: “हमारे यहां डिसिप्लिन सिखाने का यही तरीक़ा है!” आंध्र प्रदेश में मासूमियत पर वार: चित्तूर के एक स्कूल में छठी जमात की ११ साल की बच्ची क्लास में किसी से बात कर रही थी। तैश में आकर उस्ताद ने उसकी तरफ़ स्कूल का भारी बस्ता उठा कर फेंका। बस्ते के अंदर मौजूद स्टील का लंच बॉक्स बच्ची के सर पर इतनी ज़ोर से लगा कि वह वहीं चकरा कर गिर गई। बाद में जब दर्द न रुका तो हस्पताल के स्कैन में मालूम हुआ कि इस मासूम बच्ची के सर की हड्डी (Skull) में फ्रैक्चर आ चुका है। कर्नाटक की बर्बरीय्यत: एक और दिलसोज़ लहर उस वक़्त दौड़ी जब एक रिहायशी स्कूल (Residential School) के उस्ताद ने ९ साल के एक छोटे से बच्चे को सिर्फ़ इसलिए ज़मीन पर गिरा कर बेरहमी से लातों और थप्पड़ों से पीटा क्योंकि उसने हॉस्टल से अपने घर फ़ोन करने की “जसारत” (हिमाकत) की थी। वह मासूम बच्चा उस्ताद के पैरों में गिर कर रोते हुए माफ़ियां मांग रहा था, लेकिन उस जल्लाद का दिल नहीं पिघला। यह चंद मिसालें तो वह हैं जो मीडिया की नज़र चढ़ीं और एफ़आईआर तक पहुंचीं, वरना रोज़ाना ज़्यादातर मासूम रूहें इन चहार दीवारों के पीछे सिसकती हैं और किसी को ख़बर तक नहीं होती। हम डिसिप्लिन के नाम पर बच्चों को तहज़ीब नहीं सिखा रहे, बल्कि उनके अंदर के इंसान को क़त्ल कर रहे हैं। यह तो वह जिस्मानी वहशत है जो नज़र आ जाती है, लेकिन अब जो नई डिजिटल बर्बरीय्यत आई है, उसने रूहों को ऐसे ज़ख़्म दिए हैं जिनका कोई एक्स-रे नहीं हो सकता। मुंब्रा, कल्यान और भिवंडी के बाज़ अंग्रेज़ी स्कूलों में अब बच्चों के होमवर्क का ‘ऑनलाइन रिकॉर्ड’ रखा जाता है। बच्चा रात को थक कर सो गया, होमवर्क अधूरा रह गया। सुबह क्लास व्हाट्सऐप ग्रुप में, जहां पचास दीगर वालिदैन मौजूद हैं, बच्चे का नाम सुर्ख़ (लाल) हुरूफ़ में डाल दिया जाता है जैसे वह कोई मुजरिम हो। सत्तर साल पहले स्कूलों में सज़ा के तौर पर बच्चे के गले में तख़्ती लटकाई जाती थी जिस पर लिखा होता था: ‘I am Donkey’। आज वह तख़्ती डिजिटल हो गई है — स्कूल ऐप पर रेड अलर्ट, पैरेंट पोर्टल पर नाम, डैशबोर्ड पर रुसवाई! ज़रिया बदल गया, असातिज़ा (शिक्षकों) की वहशियाना ज़ेहनियत नहीं बदली। क्या यह तालीम है? या किसी नाज़ुक, मासूम आईने पर पत्थर मार-मार कर उसे चकनाचूर करना और फिर उसके मलबे को पॉलिश करके कहना कि देखो हमने कितना चमकदार शीशा बनाया है? अंग्रेज़ी का बुत और वालिदैन का सजदा हमारी क़ौम ने अंग्रेज़ी ज़बान के साथ जो रिश्ता जोड़ा है, वह अब ज़बान का रिश्ता नहीं रहा, वह अंधी पूजा बन चुका है। एक ऐसा बुत जिसके सामने हम अपनी ग़ैरत, अपनी तहज़ीब, और अपना सकून क़ुर्बान कर रहे हैं। एक ग़रीब बाप को देखिए, जो बारह-बारह घंटे ओवरटाइम करता है,

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मेहनत करे इंसान तो क्या हो नहीं सकता!

डॉ. असदुल्लाह ख़ान आज के दौर में आला तालीम हासिल कर लेने के बावजूद नौकरी पा लेना गोया जूए-शेर लाने से कम नहीं। आप में सैकड़ों सलाहियतें हों, मगर अगर एक भी ‘कमी’ नज़र आ जाए — कोई जिस्मानी माज़ूरी, कोई कमज़ोरी, कोई ‘दाग़’ — तो पूरा चराग़ नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। काम नामुमकिन नहीं होता, मगर मुश्किल ज़रूर हो जाता है। मुझे एक ऐसे ही होनहार नौजवान का क़िस्सा याद आता है। मुल्क के एक मुमताज़ इंजीनियरिंग इदारे से फ़ारिग़ुत्तहसील, तालीमी रिकॉर्ड इस क़दर शानदार कि काग़ज़ात देखते ही एक बड़ी कंपनी ने उसे हाथों-हाथ लेने का इरादा कर लिया। मगर जब इंटरव्यू में यह खुला कि वह नौजवान क़ुव्वत-ए-समाअत की एक बीमारी में मुब्तला है, तो वही कंपनी — जो अभी-अभी उसकी ज़ेहानत पर फ़रेफ़्ता थी — चुपचाप क़दम पीछे खींच लाई। डिग्री, मेहनत और क़ाबिलियत — सब एक ‘तिब्बी रिपोर्ट’ के सामने हार गए। मगर कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती, और न होनी चाहिए। क्योंकि माज़ूरी जिस्म की होती है, हौसले की नहीं। तारीख़ गवाह है कि जिन लोगों ने दुनिया बदली, उनमें से बेश्तर ने ‘कमी’ को ‘ताक़त’ में बदला। आइए आज ऐसे ही दस रोशन चराग़ों की दास्तानें सुनते हैं — जिनकी लौ आँधियों में भी बुझी नहीं, बल्कि और तेज़ हुई। अज़मत और हिम्मत की रोशन मिसालें इंसान अगर सच्चे दिल से कुछ करने का इरादा कर ले तो जिस्मानी आज़ा की महरूमी उसके ख़्वाबों के आड़े कभी नहीं आ सकती। तारीख़ और हाल के उफ़ुक़ पर ऐसे कई दरख़्शंदा सितारे चमक रहे हैं जिन्होंने अपनी हिम्मत के बलबूते पर तूफ़ानों का रुख़ मोड़ दिया। श्रीकांत बोल्ला (Srikanth Bolla): पैदाइशी तौर पर मुकम्मल नाबीना श्रीकांत बोल्ला को बचपन ही से इंतिहाई ग़ुर्बत और समाजी तअस्सुब का सामना करना पड़ा। हद तो यह हुई कि जब उन्होंने दसवीं जमाअत के बाद साइंस पढ़ने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की, तो भारतीय निज़ाम-ए-तालीम ने उनके नाबीना होने का बहाना बनाकर साफ़ इनकार कर दिया। उन्होंने इस नाइंसाफ़ी के आगे सर-ए-तस्लीम ख़म करने के बजाय अदालत का दरवाज़ा खटखटाया और छह माह की तवील क़ानूनी जद्दोजहद के बाद कामयाबी हासिल की, जिसके बाद उन्होंने ग्यारहवीं जमाअत में ९८ प्रतिशत नंबर लेकर सबको हैरान कर दिया। जब मुल्क के मायानाज़ इदारे आई आई टी (IIT) ने भी उन्हें दाख़िला देने से इनकार किया, तो उन्होंने हिम्मत हारने के बजाय अमरीका की मशहूर यूनिवर्सिटी एम आई टी (MIT) का रुख़ किया और वहाँ दाख़िला पाने वाले पहले बैनुल-अक़्वामी नाबीना तालिबे-इल्म बन गए। भारत वापस आकर उन्होंने ‘बोलान्ट इंडस्ट्रीज़’ (Bollant Industries) क़ायम की, जो माहौल-दोस्त मस्नूआत बनाती है और जहाँ सैकड़ों माज़ूर अफ़राद को रोज़गार फ़राहम किया गया है। आज श्रीकांत करोड़ों रुपये की कंपनी के मालिक और दुनिया भर के नौजवानों के लिए एक आलमी रोल मॉडल हैं। सुधा चंद्रन (Sudha Chandran): महज़ १६ साल की उम्र में एक ख़ौफ़नाक सड़क हादिसे और डॉक्टरों की मुजरिमाना ग़फ़लत की वजह से सुधा चंद्रन की दाहिनी टांग काटनी पड़ी। एक क्लासिकल रक़्क़ासा के लिए यह मुसीबत किसी मौत से कम न थी क्योंकि उनका पूरा करियर पाँव की थिरकन से वाबस्ता था। मगर सुधा ने बैसाखियों के सहारे जीने को ठुकरा दिया और ‘जयपुर फ़ुट’ (मसनूई टांग) लगवाकर इंतिहाई शदीद तकलीफ़ के बावजूद दोबारा रक़्स सीखना शुरू किया। मश्क़ के दौरान अक्सर उनके ज़ख़्मों से ख़ून बह निकलता था, मगर उनका अज़्म मुतज़लज़िल न हुआ। उन्होंने मसनूई टांग के साथ स्टेज पर वापसी की और ऐसा शानदार रक़्स पेश किया कि पूरी दुनिया दंग रह गई। आज वह न सिर्फ़ एक आलमी शोहरत-याफ़्ता रक़्क़ासा हैं बल्कि भारतीय फ़िल्म व टेलीविज़न की एक मानी हुई और कामयाब अदाकारा भी बन चुकी हैं। इरा सिंघल (Ira Singhal): रीढ़ की हड्डी की एक नायाब बीमारी ‘स्कोलियोसिस’ (Scoliosis) की वजह से इरा सिंघल के दोनों बाज़ुओं की हरकत इंतिहाई महदूद थी। उन्होंने अपनी इस कमज़ोरी को पढ़ाई के आड़े नहीं आने दिया और २०१० में मुल्क का सबसे मुश्किल इम्तिहान यू पी एस सी (UPSC) पास किया, मगर इंतिज़ामिया ने उनकी जिस्मानी हालत का बहाना बनाकर उन्हें सरकारी मुलाज़मत देने से इनकार कर दिया। इरा ने इस इम्तियाज़ी सुलूक़ को चुपचाप क़बूल करने के बजाय सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) में केस दायर किया और चार साल तक एक सब्र-आज़मा क़ानूनी जंग लड़कर अपना हक़ जीता। उन्होंने २०१४ में दोबारा इम्तिहान दिया और इस बार न सिर्फ़ कामयाब हुईं बल्कि पूरे मुल्क में पहली पोज़िशन (Rank 1) हासिल करके जनरल कैटेगरी में टॉप किया। आज वह एक बेहतरीन और निडर सिविल सर्विसेज़ ऑफ़िसर के तौर पर मुल्क की ख़िदमत कर रही हैं। अरुणिमा सिन्हा (Arunima Sinha): क़ौमी सतह की वॉलीबॉल खिलाड़ी अरुणिमा सिन्हा की ज़िंदगी में २०११ में उस वक़्त अँधेरा छा गया जब कुछ चोरों ने उन्हें चलती ट्रेन से नीचे फेंक दिया, जिसके बाइस उनकी एक टांग काटनी पड़ी। अस्पताल के बिस्तर पर जहाँ लोग उन पर तरस खा रहे थे और उन्हें ‘बेचारी’ समझ रहे थे, उन्होंने वहीं लेटे-लेटे दुनिया की बुलंद-तरीन चोटी सर करने का नाक़ाबिल-ए-यक़ीन फ़ैसला किया। अस्पताल से डिस्चार्ज होते ही उन्होंने पहली भारतीय ख़ातून एवरेस्ट फ़ातेह बचेंद्री पाल से सख़्त ट्रेनिंग शुरू की। सरफिरे अज़्म की बदौलत २०१३ में वह मसनूई टांग के साथ माउंट एवरेस्ट सर करने वाली दुनिया की पहली माज़ूर ख़ातून बनीं और उसके बाद उन्होंने दुनिया के तमाम ७ बर्र-ए-आज़मों की बुलंद-तरीन चोटियों पर कामयाबी से अपने मुल्क का तिरंगा लहराया। सातोशी ताजीरी (Satoshi Tajiri): जापान में पैदा होने वाले सातोशी ताजीरी को बचपन ही में ‘ऑटिज़्म’ (Autism) की तश्ख़ीस हुई, जो कि एक ऐसी ज़ेहनी हालत है जिसमें इंसान के लिए समाजी ताल्लुक़ात क़ायम करना और आम लोगों की तरह बात-चीत करना इंतिहाई मुश्किल हो जाता है। स्कूल में उनका कोई दोस्त नहीं बनता था और वह अकेले जंगलों में कीड़े-मकोड़े पकड़ते रहते थे, जिसकी वजह से लड़के उन्हें ‘पागल’ कहकर चिढ़ाते थे। मगर सातोशी के वालिदैन ने उनका यह शौक़ छुड़वाने के बजाय उनका हौसला बढ़ाया। सातोशी ने अपनी इसी तन्हाई और कीड़े-मकोड़े जमा करने के शौक़ को एक मुनफ़रिद आइडिया में बदला और सोचा कि काश बच्चे एक ही जगह ऐसी मुख़्तलिफ़ ख़याली मख़लूक़ात जमा कर सकें और आपस में शेयर कर सकें। उन्होंने निन्टेन्डो (Nintendo) कंपनी को एक गेम का आइडिया

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बे-बसीरत नस्ल-ए-नौ माँगे ज़िंदगी की ज़मानत

जेन ज़ी, तालीमी निज़ाम और मुस्तक़बिल के ख़ौफ़ की नफ़्सियात डॉ. असदुल्लाह ख़ान कभी-कभी मुआशरों में आने वाली तब्दीलियाँ शोर मचाकर नहीं आतीं। वह ख़ामोशी से नस्लों के रवैयों में उतरती हैं। फिर एक दिन हमें महसूस होता है कि दुनिया बदल चुकी है। आज दुनिया भर में एक अजीब मंज़र दिखाई देता है। इंजीनियर कारोबार सीख रहा है, डॉक्टर यूट्यूब चैनल चला रहा है, उस्ताद ऑनलाइन कोर्स बेच रहा है, तालिबे-इल्म शेयर मार्केट समझ रहा है, और यूनिवर्सिटी से फ़ारिग़ होने वाला नौजवान मुलाज़मत ढूँढ़ने से पहले “Passive Income” के तरीक़े तलाश कर रहा है। सवाल यह नहीं कि ऐसा क्यों हो रहा है, अस्ल सवाल यह है कि आख़िर ऐसी कौन-सी तब्दीली रूनुमा हुई है कि एक पूरी नस्ल नौकरी से पहले “Exit Plan” तैयार कर रही है? ऐसा क्यों है कि आज का नौजवान किसी कंपनी में दाख़िल होने से पहले उस दिन के बारे में सोच रहा है जब वह कंपनी उसे निकाल देगी? आख़िर वह कौन-सा ख़ौफ़ है जो इस नस्ल के ला-शऊर में बैठ गया है? पिछली नस्लों का ख़्वाब सादा था। पढ़ो, अच्छी डिग्री हासिल करो, अच्छी नौकरी हासिल करो, घर बनाओ, बच्चों को पढ़ाओ और रिटायर हो जाओ। यही कामयाबी थी, यही इस्तिहकाम था, यही ज़िंदगी का नक़्शा था। लेकिन आज का नौजवान इस नक़्शे पर यक़ीन नहीं रखता। क्यों? इसलिए कि उसने अपनी आँखों से देखा है कि बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ बेरोज़गारी की ज़मानत बन सकती हैं। उसने देखा कि कोरोना की एक लहर ने करोड़ों मुलाज़मतें ख़त्म कर दीं। उसने देखा कि मसनूई ज़ेहानत चंद सेकंड में वह काम कर रही है जो कभी हज़ारों अफ़राद किया करते थे। उसने देखा कि कई बरसों की वफ़ादारी के बाद भी एक ईमेल इंसान को बेरोज़गार बना सकती है। चुनाँचे इस नस्ल ने एक नया सबक़ सीख लिया: “किसी एक चीज़ पर इनहिसार ख़तरनाक है।” लेकिन यहाँ एक और सवाल जन्म लेता है। क्या वाक़ई मसअला सिर्फ़ रोज़गार का है, या मसअला इससे कहीं ज़्यादा गहरा है? मेरा ख़याल है कि यह सिर्फ़ मआशी बुहरान नहीं बल्कि तालीमी बुहरान भी है। क्योंकि हमारी पूरी तालीमी मशीनरी अब भी बीसवीं सदी के लिए बच्चों को तैयार कर रही है जबकि दुनिया इक्कीसवीं सदी के तीसरे अशरे में दाख़िल हो चुकी है। हम अब भी बच्चों से पूछते हैं: “बड़े होकर क्या बनोगे? डॉक्टर? इंजीनियर? पायलट? उस्ताद? अफ़सर?” मगर शायद अब सवाल बदलने का वक़्त आ गया है। आज का सवाल यह होना चाहिए: “तुम कौन-सी सलाहियतें पैदा करोगे जो हर दौर में तुम्हें ज़िंदा रख सकें?” यहाँ हमारी तालीम की एक बुनियादी कमज़ोरी सामने आती है। हम बच्चों को इम्तिहान पास करना सिखाते हैं, मसाइल हल करना नहीं। हम उन्हें मालूमात देते हैं, बसीरत नहीं देते। हम उन्हें नौकरी हासिल करना सिखाते हैं, मौक़े पैदा करना नहीं सिखाते। हम उन्हें याददाश्त देते हैं, तख़्लीक़ नहीं देते। आज का नौजवान एक अहम सवाल पूछ रहा है। शायद वह अल्फ़ाज़ में बयान न कर सके लेकिन उसके अंदर यह सवाल मुसलसल मौजूद है: “अगर मेरी डिग्री मुझे तहफ़्फ़ुज़ नहीं दे सकती तो फिर मुझे क्या चीज़ महफ़ूज़ बना सकती है?” इस सवाल का जवाब सिर्फ़ मुलाज़मत नहीं, सिर्फ़ कारोबार नहीं, सिर्फ़ सरमायाकारी नहीं, बल्कि सलाहियतों का ऐसा मजमूआ है जो इंसान को हर दौर में कारआमद बना दे। Communication Skills, Critical Thinking, Problem Solving, Leadership, Digital Literacy, Entrepreneurship, Character Building और सबसे बढ़कर Learning Agility यानी मुसलसल सीखते रहने की सलाहियत। बदक़िस्मती से हमारे बहुत से तालीमी इदारे अब भी सिर्फ़ निसाब मुकम्मल करने को तालीम समझते हैं। जबकि आने वाली दुनिया में निसाब से ज़्यादा अहम “क़ाबिलियत” होगी, इम्तिहान से ज़्यादा अहम “महारत” होगी और डिग्री से ज़्यादा अहम “Value Creation” होगी। यह भी एक दिलचस्प अलमिया है कि Gen Z को Work-Life Balance की नस्ल कहा जाता है, मगर हक़ीक़त यह है कि शायद यह नस्ल अपने वालिदैन से ज़्यादा काम कर रही है। दिन में नौकरी, रात में फ़्री-लांसिंग, हफ़्तावार कंटेंट क्रिएशन, सोशल मीडिया नेटवर्किंग और साथ में नई महारतें सीखने की कोशिश। यह सब क्यों? क्योंकि उन्हें काम से नफ़रत नहीं, उन्हें ग़ैर-यक़ीनी मुस्तक़बिल से ख़ौफ़ है। एक मुअल्लिम की हैसियत से मुझे सबसे ज़्यादा फ़िक्र इस बात की है कि कहीं हम नौजवानों को सिर्फ़ आमदनी पैदा करने वाली मशीनें न बना दें। क्योंकि ज़िंदगी सिर्फ़ माली आज़ादी का नाम नहीं, ज़िंदगी मक़सद का नाम भी है, अख़्लाक़ का नाम भी है, ख़िदमत का नाम भी है, किरदार का नाम भी है, मुआशरे की तामीर का नाम भी है। अगर तालीम सिर्फ़ पैसा कमाना सिखाए और इंसान बनना न सिखाए तो वह तालीम नहीं, महज़ तर्बियत-ए-मआश है। आने वाले ज़माने का सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होगा कि कौन-सी मुलाज़मत बाक़ी रहेगी, बल्कि यह होगा कि कौन-सा इंसान हर तब्दीली के बावजूद अपनी अफ़ादियत बरक़रार रख सकेगा। और यही वह मक़ाम है जहाँ तालीमी इदारों को अपना पूरा फ़लसफ़ा अज़सर-ए-नौ तरतीब देना होगा। हमारा मक़सद सिर्फ़ डॉक्टर, इंजीनियर, अफ़सर या ताजिर पैदा करना नहीं होना चाहिए बल्कि ऐसे इंसान पैदा करना होना चाहिए जो हालात के ग़ुलाम न हों बल्कि हालात को बदलने की सलाहियत रखते हों। शायद इसी लिए मैं समझता हूँ कि Gen Z नौकरीयों को मुस्तरद नहीं कर रही। वह काम से फ़रार नहीं चाहती, मेहनत से भी नहीं भाग रही। वह दरअसल एक ऐसी दुनिया में ज़िंदा रहने का रास्ता तलाश कर रही है जहाँ कोई चीज़ मुस्तक़िल नहीं रही। और शायद इस पूरी कहानी का सबसे अहम सबक़ यही है कि मुस्तक़बिल उन लोगों का नहीं होगा जिनके पास सिर्फ़ डिग्रियाँ होंगी, बल्कि उनका होगा जिनके पास सीखने, बदलने और नए रास्ते बनाने की सलाहियत होगी। और यही वह मक़ाम है जहाँ तालीम का अस्ल सफ़र शुरू होता है। “ज़माना बदलने से पहले अगर तालीम न बदले, तो फिर ज़माना तालीम को बे-मानी बना देता है।” Asadullahkhanschoolasadullahkhanschool.org

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तालीम की हक़ीक़ी रूह की तलाश!!!

डॉ. असदुल्लाह ख़ान अस्र-ए-हाज़िर का हिन्दुस्तान एक ऐसे फ़िक्री व तहज़ीबी मोड़ पर खड़ा है जहाँ मादी तरक़्क़ी की चकाचौंध तो उरूज पर है, मगर हमारी अख़्लाक़ी और तालीमी बुनियादें अंदर से खोखली होती जा रही हैं। आज जब हम अपने तालीमी गुलिस्तान पर नज़र डालते हैं, तो वहाँ इल्म की ख़ुशबू के बजाय इम्तिहानात का धुआँ और मुक़ाबलों का शोर सुनाई देता है। तालीम की हक़ीक़ी रूह जो इम्तिहानी परचों और मेरिट लिस्टों के नीचे दब कर दम तोड़ चुकी है, आज उसकी बाज़याफ़्त की पुकार ने बेचैन कर दिया है। इंसानी तारीख़ के औराक़ को पलट कर देखें तो कायनात के सबसे बड़े मुअल्लिम-ए-आज़म पर नाज़िल होने वाला पहला इल्हामी हुक्म “इम्तिहान दो” नहीं था। लौह-ए-महफ़ूज़ से इंसानियत के नाम जो पहला अबदी पैग़ाम उतरा, वह था— اِقْرَاْ بِاسْمِ رَبِّكَ الَّذِیْ خَلَقَ हुक्म हुआ— पढ़िए अपने रब के नाम से जिसने पैदा किया। इस पहले आसमानी सबक़ का मक़सद नम्बरात की दौड़ नहीं बल्कि शऊर की बेदारी था। उसका अव्वलीन हासिल कोई दुनियावी मुलाज़मत नहीं बल्कि ख़ालिक़ व मख़लूक़ की मारिफ़त था। इस्लाम की पूरी इल्मी तारीख़ इसी महवर के गिर्द घूमती है। जब तक तालीम एक इबादत थी, बग़दाद, क़ुर्तुबा, ग़रनाता, समरक़ंद, बुख़ारा और दिल्ली के मदारिस से ऐसे नाबिग़ा-ए-रोज़गार इंसान पैदा होते थे जो महज़ डिग्री-याफ़्ता मुलाज़िम नहीं, बल्कि कायनात के असरार व रुमूज़ को बेनक़ाब करने वाले फ़िलासफ़र, मोजिद और मुहक़्क़िक़ थे। इमाम ग़ज़ालीؒ, इब्न रुश्दؒ, इब्न ख़ल्दूनؒ, शाह वलीउल्लाहؒ और सर सैयद अहमद ख़ानؒ की इल्मी व फ़िक्री अज़मत का राज़ मालूमात के अम्बार में नहीं, बल्कि उनकी फ़िक्र की उस वुसअत में था जो ज़िंदगी और कायनात को अपने दामन में समेट लेती थी। मगर अफ़सोस! सदियों के इस सफ़र में हमने इस अस्ल-ए-असासा को कहीं खो दिया। आज का अलमिया यह है कि गूगल हमारी जेबों में तो मौजूद है लेकिन हिकमत हमारे दिलों से रुख़्सत हो चुकी है। हमारे पास मालूमात के अम्बार हैं मगर फ़िक्री गहराई का क़हत है। हमने ज़ेहनों को अंधा-धुंध मालूमात से भरना तो सीख लिया, मगर शख़्सियतों को तराशना और किरदार को तामीर करना यकसर भुला दिया। आज का हिन्दुस्तान तालीमी निज़ाम के नाम पर एक ऐसी कारगाह में तब्दील हो चुका है जहाँ इंसान नहीं, बल्कि “इम्तिहानी जंगजू” (Exam Warriors) तैयार किए जा रहे हैं। हालिया बरसों में NEET, JEE, CUET, SSC और HSC जैसे क़ौमी सतह के इम्तिहानात के गिर्द पैदा होने वाले पेपर लीक, इम्तिहानी माफ़िया, रिश्वत-स्तानी और संगीन बदउनवानियों के तनाज़आत ने पूरे मुल्क को हिला कर रख दिया है। लेकिन अलमिया देखिए कि हमारा समाज और पॉलिसी साज़ सिर्फ़ इस निज़ाम की ज़ाहिरी शाख़ों पर कुल्हाड़ी चला रहे हैं, कोई भी इस नासूर की अस्ल जड़ तक पहुँचने की ज़हमत नहीं कर रहा। असल बुहरान पेपर लीक होना नहीं है, बल्कि असल बुहरान यह है कि हमारा पूरा तालीमी ढाँचा अपनी रूह से महरूम हो चुका है। हमने तालीम को महज़ “मालूमात की मुन्तक़िली” (Information Transfer) का नाम दे दिया है, जबकि तालीम तो बुनियादी तौर पर “इंसान-साज़ी” (Human Making) का एक मुक़द्दस अमल था। आज एक मासूम बच्चे का पाँच साल की उम्र में स्कूल की दहलीज़ पर क़दम रखते ही बचपन का दायरा तंग कर दिया जाता है। उसके नातवाँ कंधों पर किताबों का भारी बस्ता लाद कर उसे एक ऐसी लामतनाही और अंधी दौड़ में धकेल दिया जाता है जहाँ हर अगला मोड़ पिछले से ज़्यादा बेरहम होता है— प्री-प्राइमरी से प्राइमरी की दौड़, प्राइमरी से सेकेंडरी की मशक़्क़त, सेकेंडरी से जूनियर कॉलेज का तनाव, जूनियर कॉलेज से एंट्रेंस इम्तिहानात के अज़ाब तक और आख़िर में रोज़गार की मंडी में ख़ुद को बेचने का मुक़ाबला। इस पूरी तग़-ओ-दौ में और इस तवील मसाफ़त के किसी भी मोड़ पर कोई हमदर्द उस्ताद या निज़ाम-ए-तालीम इस बच्चे से यह नहीं पूछता कि तुम क्या सोचते हो? तुम्हारे दिल के जज़्बात क्या हैं? तुम्हारे इन्फ़िरादी ख़्वाब क्या हैं? और तुम एक इंसान के तौर पर कैसे बन रहे हो? पूरा निज़ाम-ए-हुकूमत, स्कूल और वालिदैन सिर्फ़ एक ही रट लगाए बैठे हैं कि तुम्हारे परसेंटाइल कितने आए? मेरिट लिस्ट में तुम्हारा रैंक क्या है? यही वह तारीक लम्हा है जहाँ तालीम सिसक-सिसक कर दम तोड़ देती है और “इम्तिहान” एक जल्लाद की तरह ज़िंदा हो जाता है। यही वजह है कि फ़िक्रमंद अज़हान इन इम्तिहानात को समाजी कंट्रोल का हथियार क़रार देते हैं। यह एक ऐसा हथियार है जो लाखों नौजवानों की ज़िंदगी के सबसे ख़ूबसूरत, तख़्लीक़ी और सुनहरे सालों को तीन घंटे के एक बेजान परचे में क़ैद कर देता है। इस इम्तिहानी जुनून का नतीजा यह निकला है कि मुल्क में “कोचिंग इंडस्ट्री” के नाम से एक मुतवाज़ी और ज़ालिमाना तालीमी सल्तनत क़ायम हो चुकी है। करोड़ों रुपये के इस कारोबार में मासूम बच्चों का बचपन फ़रोख़्त हो रहा है, नौजवानों की सलाहियतें गिरवी रखी जा रही हैं, और उनके अछूते ख़्वाब इस मंडी में कौड़ियों के दाम नीलाम हो रहे हैं। फिर जब कोटा (Kota) जैसे तालीमी मराकिज़ से मासूम बच्चों की ख़ुदकुशियों की ख़बरें आती हैं, जब नौजवान नस्ल शदीद डिप्रेशन और ज़ेहनी तनाव का शिकार होकर मौत को गले लगाती है, तो यह समाज हैरत का इज़हार करता है! हम यह क्यों भूल जाते हैं कि हमने उन्हें जीना सिखाया ही कब था? हमने तो उन्हें सिर्फ़ मुक़ाबला करना सिखाया था। हमने उन्हें कामयाबी के तरीक़े तो रटाए, मगर ज़िंदगी का हक़ीक़ी मतलब नहीं बताया। हमने उन्हें नौकरी के लिए तो तैयार किया, मगर एक ज़िम्मेदार शहरी और बाक़िरदार इंसान बनने का गुर नहीं सिखाया। अगर हम ग़ौर व फ़िक्र की आँखों से देखें तो कायनात की कोई भी अज़ीम तब्दीली रट्टे-बाज़ी से नहीं आई। क़ुरआन करीम की आयात-ए-बय्यिनात का एक बड़ा हिस्सा इंसान को बार-बार तदब्बुर, तफ़क्कुर और तअक़्क़ुल की दावत देता है। कलाम-ए-इलाही पुकार-पुकार कर कहता है कि क़ुरआन का तालिब-ए-इल्म वह है जो अंधी तक़लीद नहीं करता, बल्कि कायनात का मुशाहदा करता है, अपने नफ़्स को पढ़ता है, तारीख़ की नब्ज़ पर हाथ रखता है और सवाल पूछता है। अगर तालीम सिर्फ़ तयशुदा निसाब को रट लेने का नाम होती तो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को फ़िरऔन के महल जैसे मुतज़ाद माहौल से इल्म और हिकमत न मिलती। अगर तालीम महज़ तयशुदा मालूमात तक

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